Category: religious

  • VIDEO : कोरोना वायरस से जंग : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अप्रैल दिन रविवार रात 9 बजे 9 मिनट तक को ही दीपदान के लिए क्यों चुना, इसका परिणाम जानकर हैरान हो जायेगें !

    यह अंक-ज्योतिष के आधार पर देखा जाय तो अति महत्वपूर्ण एवं विचारणीय विषय है। अंक-विज्ञान के अनुसार 5 अंक का स्वामी बुध है। बुध गला, फेफड़ा और मुख का कारक ग्रह होता है। वर्तमान में विश्वव्यापी महामारी कोरोना मनुष्य के मुख, फेफड़े और गले को ही अपना निशाना बनाए हुए है। बुध ग्रहों का राजकुमार तथा वर्तमान सम्वत् 2077 का अधिपति भी है। अतः 5 अप्रैल इस दृष्टि से भी अनुकूल है।

    रविवार सूर्य का दिन होता है। सूर्य नवग्रह का अधिपति है। समस्त ग्रह सौर ऊर्जा से ही प्रभावित हैं। सूर्य दीपक या प्रकाश का प्रतीक है, अतः 5 अप्रैल को रात्रि 9 बजे से 9 मिनट तक यमघण्ट काल को करोड़ों प्रज्वलित दीपक सूर्य को बल प्रदान करेंगे। नौ का अंक मंगल ग्रह का प्रतीक है। मंगल सौरमंडल का सेनापति होने के कारण महामारी अन्धकार को नष्ट करने में सूर्य का अपूर्व सहयोग करेगा। रात्रि या अन्धकार शनि का प्रतीक है और शनि सूर्य से अर्थात् अन्धकार प्रकाश से दूर होता है। अतः रविवार 5 अप्रैल को जो पूर्णिमा के नज़दीक की तिथि है, उस दिन चन्द्र की मज़बूती के लिए सभी प्रकाश बन्द कर दीपदान करना चन्द्रमा को अमृत-वृष्टि के लिए बाध्य करेगा।

    चौघड़िया (मुहूर्त) अमृत की रहेगी। होरा भी उस वक़्त सूर्य का होगा। अतः इस दीपदान प्रक्रिया से शनि-काल में भी ऊर्जा के स्रोत सूर्य को जागृत करने का सार्थक प्रयास होगा।9/9 पर मंगल-सूर्य साथ होंगे, जो मेष राशि की ओर जाते हुए विषाणु जनित व्याधि को नष्ट करने में पूर्ण सक्षम होंगे। अतः इस दृष्टि से भी सूर्य-मंगल की सकारात्मकता के लिए भी दीपदान आवश्यक है। शनि-राहु रूपी अन्धकार (कोरोना महामारी) को उसी के शासन-काल में बुध, सूर्य, चन्द्र और मंगल मिलकर नष्ट करने का संकल्प लेंगे। वर्तमान प्रमादी नाम सम्वत्-2077 का अधिपति बुध, मंत्री-चन्द्रमा, रक्षा-मंत्री मंगल तथा फलेश (फलदाता) सूर्य हैं। ऐसे में दीपदान से कोराना जैसे अंधकार को दूर करने में मदद मिलेगी।

    — ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट

  • कारोना वायरस की भविष्यवाणी रामायण में, लिखा है किस तरह से मुक्ति मिलेगी !

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    इन दिनों भारत सहित पूरी दुनिया कोरोना वायरसमहामारी से जूझ रही है। दुनिया के लाखों लोगों को कोरोना महामारी ने असमय ही अपना ग्रास बना लिया। इस कोरोना वायरस के बारे में सदियों पहले ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने हिंदू धर्म के एक पावन ग्रंथ रामायण में लिख दिया था। श्रीरामचरित मानस में कोरोना महामारी का कारण और इस वैश्विक बीमारी के लक्ष्य के बारे में भी बताया गया है। श्रीरामचरित्रमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने बताया है कि कोरोना नामक महामारी का मूल स्रोत चमगादड़ पक्षी होगा और इसी के साथ ही इसमें ये भी लिखा है कि इस बीमारी को पहचाने के मुख्य लक्ष्ण क्या होंगे। तो चलिए जानते हैं :

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    कारोना वायरस की भविष्यवाणी रामायण में, लिखा है किस तरह से मुक्ति मिलेगी !

    तुलसीदास जी लिखते हैं-

    दोहा– सब कै निंदा जे जड़ करहीं. ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥
    सुनहु तात अब मानस रोगा. जिन्ह ते दु:ख पावहिं सब लोगा॥

    भावार्थ– कोरोना महामारी के लक्षणों के बारे में उन्होंने लिखा है कि इस बीमारी में कफ़ और खांसी बढ़ जाएगी और फेफड़ों में एक जाल या आवरण उत्पन्न होगा या कहें lungs congestion जैसे लक्षण उत्पन्न होने लगेंगे।

    दोहा– मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला. तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला
    काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।

    भावार्थ– इस दोहे में गोस्वामी जी कहते हैं कि इन सब के मिलने से “सन्निपात” या टाइफाइड रोग होगा जिससे लोग बहुत दुःख पाएंगे-

    दोहा– प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई. उपजइ सन्यपात दुखदाई..
    बिषय मनोरथ दुर्गम नाना. ते सब सूल नाम को जाना..
    जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका.
    कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका..

    आगे तुलसीदास जी लिखते हैं-

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    कारोना वायरस की भविष्यवाणी रामायण में, लिखा है किस तरह से मुक्ति मिलेगी !

    दोहा- एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि.
    पीड़हिं संतत जीव कहुं सो किमि लहै समाधि॥

    दोहा- नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान.
    भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान

    इन सब के परिणाम स्वरूप क्या होगा गोस्वामी जी लिखते हैं-
    दोहा- एहि बिधि सकल जीव जग रोगी।। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥
    मानस रोग कछुक मैं गाए।। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥

    इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व के जीव रोग ग्रस्त हो जाएंगे, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और अपनों के वियोग के कारण और दुःख में डूब जाएंगे.

    इस महामारी से मुक्ति कैसे मिलेगी- जब इस बीमारी के कारण लोग मरने लगेंगे तथा भविष्य में ऐसी अनेकों बीमारियां आने को होंगी तब आपको कैसे शान्ति मिल पाएगी, इसका उत्तर भी श्री राम चरित्र मानस में ही मिलेगा.

    इस विषय पर गोस्वामी जी लिखते हैं-

    राम कृपां नासहिं सब रोगा. जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
    सदगुर बैद बचन बिस्वासा. संजम यह न बिषय कै आसा॥

    भावार्थ-यदि श्री रामजी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ। सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो॥

    रघुपति भगति सजीवन मूरी. अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥
    एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं. नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥

    भावार्थ-श्री रघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जाएँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते।

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    कारोना वायरस की भविष्यवाणी रामायण में, लिखा है किस तरह से मुक्ति मिलेगी !

  • भगवान विष्णु के छठे अवतार महावीर परशुराम की गाथा

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    आज देश जगत के पालनहार भगवान विष्णु जी के छठे अवतार  भगवान परशुराम जी के जन्मोत्सव का पावन पर्व मना रहा है। हमारे वैदिक सनातन धर्म की धार्मिक मान्यताओं व पौराणिक वृत्तान्तों के अनुसार भृगुकुल तिलक, अजर-अमर, अविनाशी, विश्व के अष्ट चिरंजीवियों में सम्मिलित, शस्त्र व शास्त्र के महान ज्ञाता परम वीर भगवान परशुराम जी का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया के पावन दिन माता रेणुका के गर्भ से हुआ था। भगवान परशुराम जी राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय सप्तऋषि महर्षि जमदग्नि के पाँचवें पुत्र थे। भगवान परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि वेद-शास्त्रों के महान ज्ञाता थे और वो सप्तऋषियों में से एक थे। हमारे शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम अजर-अमर हैं और वह किसी समाज विशेष के आदर्श ना होकर, बल्कि वो संपूर्ण वैदिक सनातन धर्म को मानने वालें सभी हिन्दूओं के आदर्श हैं। उनको अष्ट चिरंजीवियों में से एक चिरंजीवी माना गया हैं, उनका उल्लेख हमें रामायण में माता सीता के स्वंयवर के समय भगवान श्रीराम के काल में भी मिलता है, तो उनका उल्लेख हमें महाभारत के भगवान श्रीकृष्ण के काल में भी मिलता है। उन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था। श्रीमद्भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा कल्कि पुराण में भी भगवान परशुराम जी का उल्लेख मिलता है। धर्म के ज्ञाता कहते हैं कि वे कलिकाल के अंत में उपस्थित होंगे, ऐसी धार्मिक मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि वे कल्प के अंत तक धरती पर ही तपस्यारत रहेंगे। पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरि पर्वत पर भगवान परशुराम जी की तपोस्थली है और वह उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए तपस्यारत होने के लिए चले गए।
    भगवान परशुराम जी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। वह भगवान शिव के अनन्य परम भक्त हैं। इन्हें भगवान शिव से ही विशेष परशु प्राप्त हुआ था। जिसके चलते इनका नाम परशुराम हो गया। वैसे इनका नाम तो राम था, किन्तु शंकर के द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण इनका नाम परशुराम पड़ गया था। परशुराम भगवान विष्णु के दस अंशावतार में से छठे अवतार थे, जो वामन अवतार एवं राम के मध्य में आता है। सप्तऋषि महर्षि जमदग्नि के पुत्र होने के कारण इन्हें ‘जामदग्न्य’ भी कहा जाता हैं। भृगु कुल में उत्पन्न परशुराम जी सदैव अपने गुरुजनों तथा माता-पिता की आज्ञा का पालन हर हाल में करते थे। भगवान परशुराम के कथनानुसार राजा का कर्तव्य होता है वैदिक सनातन धर्म के अनुसार राजधर्म का पालन करते हुए प्रजा के हित में कार्य करे, न कि प्रजा से अपनी आज्ञा का पालन करवाए और राजा उसके अधिकारों पर अंकुश लगाए।
    धरती को पाप से मुक्त करने के लिए अवतार
    जब परशुराम का धरती पर जन्म हुआ तब उस समय दुष्ट व राक्षसी प्रवृत्ति के बहुत सारे राजाओं का पृथ्वी पर बोलबाला था। उन्हीं में से एक राजा ने उनके पिता महर्षि जमदग्नि को मार दिया था। इससे परशुराम बहुत कुपित हुए और उन्होंने उस दुष्ट राजा का वध किया। उन्होंने राक्षसी प्रवृत्ति के सभी राजाओं का वध करके पृथ्वीवासियों को भयमुक्त किया था। कुछ कथाओं के आनुसार परशुराम ने पृथ्वी पर क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। उस समय के क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से व पापियों से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए ही भगवान परशुराम का जन्म हुआ था।
    भगवान परशुराम जन्म कथा
    भृगु ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधू से वर माँगने को कहा। उनकी पुत्रवधू सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र की कामना की। भृगु ने उन दोनों को ‘चरु’ भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेड़ तथा उसकी माता पीपल के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु ऋषि पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार करने वाला होगा। सत्यवती के बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा, किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा। सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए, जो क्रमशः रुमण्वान, सुषेण, वसु, विश्वावसु तथा पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था और वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था।
    परशुराम की गाथाएं 
    भगवान परशुराम की शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया ।
    – परशुराम गुरुजनों, माता-पिता की आज्ञा का पालन हर हाल में करते थे। एकबार जमदग्नि मुनि ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को माँ रेणुका की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। फिर उन्होंने परशुराम को आदेश दिया कि वो अपनी माँ की हत्या करें। आज्ञाकारी परशुराम ने तुरन्त पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ऋषि ने प्रसन्न होकर परशुराम से वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने सबसे पहले वर से माँ का पुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों को क्षमा कर देने के लिए कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम को आशीर्वाद देते हुए  कहा कि वो सदा अजर-अमर रहेगा।
    – एक दूसरी कथा के अनुसार ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। तब सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। इस युद्ध में उन्होंने सहस्त्रार्जुन की भुजाएं और मस्तक काट दिया था।
    – ऐसा भी कहा जाता है कि उस काल में हैहयवंशीय क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार था। भार्गव और हैहयवंशियों की पुरानी दुश्मनी चली आ रही थी। हैहयवंशियों का राजा सहस्रबाहु अर्जुन भार्गव आश्रमों के ऋषियों को सताया करता था। एक समय सहस्रबाहु के पुत्रों ने जमदग्नि ऋषि के आश्रम की कामधेनु गाय को लेने तथा परशुराम से बदला लेने की भावना से परशुराम के पिता का वध कर दिया। जब परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखी हुए और क्रोधवश उन्होंने हैहयवंशीय क्षत्रियों की वंश-बेल का विनाश करने की कसम खाई।
     पिता के वियोग में भगवान परशुराम की माता चिता पर सती हो गयीं। पिता के शरीर पर 21 घाव को देखकर भगवान परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वह इस धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे। इसके बाद पूरे 21 बार उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। इसी कसम के तहत उन्होंने इस वंश के लोगों से बार-बार युद्ध कर उनका 21बार समूल नाश कर दिया था। तभी से शायद यह भ्रम फैल गया कि भगवान परशुराम ने धरती पर से क्षत्रियों का समूल नाश कर दिया था, लेकिन धर्म के ज्ञाता कहते है कि परशुराम ने महिलाओं का वध नहीं किया था जिससे बाद में वंश चलता रहा। उन्होंने संमत पंचक क्षेत्र (कुरुक्षेत्र) में क्षत्रियों के रुधिर से पाँच कुंड भर दिये थे। रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक ऋषि साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों को दक्षिणा में समस्त पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये।
    -भगवान गणेश और परशुराम के बीच युद्ध- ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार भगवान परशुराम अपने इष्ट भगवान शंकर के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। वहां भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान थे और वह माता पार्वती को राम-कथा सुना रहे थे। कथा में बाधा उत्पन्न न हो इसके लिए उन्होंने अपना दिव्य त्रिशूल गणेश जी को प्रदान कर दरवाजे पर यह कहकर खड़ा कर दिया था कि किसी को भी वहां न आने दे।
    लेकिन जब भगवान परशुराम  कैलाश पहुंचकर सीधे भगवान शंकर के दर्शन के लिए कैलाश के द्वार में प्रवेश करने लगे। तो द्वार पर नंदी, शृंग आदि शिवगणों से उनकी भेंट हुई। भगवान परशुराम ने उनसे भगवान शिव के बारे में पूछा कि इस समय वे कहां हैं? इस पर नंदी ने कहा कि इस बात की उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि भगवान शिव कहां हैं। इस पर भगवान परशुराम ने नंदी आदि शिवगणों पर गुस्सा करते हुए कहा कि तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम्हारे आराध्य देव कहां हैं। ऐसे में तुम शिवगण कहलाने के लायक ही नहीं हो।
    परशुराम जी ने शिवगणों पर क्रोध किया और खुद भगवान शिव को ढूंढने कैलाश में प्रवेश कर गए। बहुत ढूंढने के बाद भी उन्हें भगवान शंकर कहीं नहीं मिले। अंत में एक घर दिखाई दिया, जहां द्वार पर एक बालक पहरा दे रहा था। भगवान परशुराम उस बालक के पास पहुंचे और वहीं से द्वार में प्रवेश करने लगे। तब भगवान गणेश जी ने उन्हें वहीं रोक दिया। इस पर परशुराम जी ने कहा तुम कौन हो जो मुझे इस तरह यहां रोकने का प्रयास कर रहे हो? इस पर गणेश जी ने कहा आप कौन हैं जो इस तरह अंतःपुर में बिना अनुमति के प्रवेश कर रहे हैं।
    इतने में नंदी आदि शिवगण वहां आए और भगवान परशुराम को बताया यह गजमुख वाला बच्चा माता पार्वती के पुत्र गणेश जी हैं। साथ ही गणेश जी से कहा कि ये परशुधारी भगवान शिव के अनन्य भक्त परशुराम हैं। भगवान परशुराम ने कहा कि ये विचित्र बालक, जिसका मुंह गज का है और बाकी का शरीर इंसान का, कैसे माता पार्वती का पुत्र हो सकता है। तभी गणेश जी ने भगवान परशुराम का उपहास करते हुए कहा कि आप देखने में तो ब्राह्मण लगते हैं, लेकिन आपके हाथों में कमंडल की जगह यह परशु क्यों है? इस पर दोनों में बहस होती रही।
    इसके बाद परशुराम भगवान शिव से मिलने के लिए उनके निवास स्थान पर अंदर जाने लगे। इतने में गणेश जी ने शिव जी द्वारा दिए गए त्रिशूल को परशुराम के सामने कर उन्हें युद्ध के लिए सावधान किया। उधर परशुराम जी ने भी अपना परशु तान कर चुनौती स्वीकार की। फिर दोनों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में परशुराम जी के फरसे द्वारा गणेश जी का एक दांत काट गया जिसके चलते उनका नाम एकदंत भी पड़ा।
    – परशुराम भीष्म युद्ध-
    भगवान परशुराम वह शूरवीर थे, जिन्होंने एक स्त्री के अनुरोध पर स्त्री की रक्षा के लिए भीष्म के साथ इसलिए युद्ध किया था ताकि भीष्म खुद अपने द्वारा अपहरण करके लाई गई अम्बा (अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका वाली अम्बा) के साथ विवाह करें, पर वे भीष्म को आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा के चलते उन्हें डिगा नहीं सके।
    भगवान परशुराम जी शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त “शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र” भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-“ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।” वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया, ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है। यह भी कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण, गोवा एवं केरल का समावेश है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब उन्होंने पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर दी थी तो भगवान परशुराम ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरल तक समुद्र को पीछे धकेल दिया था, और अपनी तपस्या के लिए नई भूमि का निर्माण किया। इसी कारण से कोंकण, गोवा और केरल में भगवान परशुराम बहुत अधिक वंदनीय हैं। वो ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे, लेकिन वह अपने कर्म से एक महान क्षत्रिय योद्धा थे। भगवान परशुराम जी एक ऐसे सच्चे शूरवीर थे, जिनका जन्म पृथ्वी पर धर्म, संस्कृति, न्याय, सदाचार व सत्य की रक्षा करने के लिए हुआ था। आज जन्मोत्सव उन्हें हम सभी कोटि-कोटि नमन करते हैं।
    ।। जय हिन्द जय भारत ।।
    ।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।
    दीपक कुमार त्यागी
    स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

     

  • बरतें यह सावधानियां सूर्य ग्रहण के दौरान

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    ज्योतिषाचार्य विकास नौटियाल के अनुसार साल का पहला सूर्य ग्रहण आज (21 जून 2020) को घटित होगा और यह वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा।
    सूतक 20 जून 21:15:58 से प्रारम्भ हो जाएगा !
    ग्रहण की अवधि 21 जून 09:15:58 से 15:04:01 तक होगी! यह सूर्य ग्रहण भारत के साथ-साथ साउथ ईस्ट यूरोप, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, अफ्रीका और अमेरिका के कुछ भागों से भई देखा जा सकता है। चुंकि सूर्य ग्रहण भारत में भी दृश्य होगा इसलिये सूतक काल भी यहां प्रभावी होगा। नीचे तालिका में सूतक के समय के बारे में जानकारी दी गई है।

    सूर्य ग्रहण 21 जून 2020 के दौरान बरतें यह सावधानियां

    सूर्य ग्रहण को आंखों पर बिना किसी सुरक्षा के नहीं देखना चाहिए। ग्रहण के दौरान आपको अपनी आंखों पर ग्रहण के दौरान प्रयोग किये जाने वाले चश्में लगाने चाहिए। इसके अलावा सामान्य दर्पण या तस्तरी में पानी डालकर सूर्य ग्रहण को देखा जाना चाहिए।

    इस दौरान तेज किनारों वाली वस्तु जैसे, चाकू, छुरी का प्रयोग न करें।

    ग्रहण के दौरान भोजन और पानी का सेवन न करें।

    इस समय पूजा करना और स्नान करना भी शुभ नहीं माना जाता।

    ग्रहण के दौरान आप आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।

    ग्रहण के बुरे प्रभावों से बचने के लिये महा मृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

    नीचे दिये गये मंत्र का जाप करना भी आपके लिये अच्छा रहेगा।

    मंत्र- “ॐ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात”

    सूर्य ग्रहण 2020: सूतक काल- ग्रहण के दौरान अशुभ अवधि

    सूतक काल ग्रहण शुरु होने से पहले वाली अवधि को कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस समय काल में किसी भी तरह का शुभ काम नहीं करना चाहिए। सूतक काल ग्रहण शुरु होने से काफी समय पहले ही शुरु हो जाता है। सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले यानि 4 पहर पहले सूतक काल शुरु हो जाता है। बता दें कि एक पहर 3 घंटों का होता है। सूतक ग्रहण समाप्त होते ही खत्म हो जाता है। सूतक के बाद शुद्ध जल से स्नान अवश्य करना चाहिए।ज्योतिषाचार्य विकास नौटियाल के अनुसार यह साल 2020 में घटित होने वाला पहला सूर्य ग्रहण भारत में भी दिखाई देगा इसलिये सूतक का असर भारत के लोगों पर भी पड़ेगा।

  • क्या आप जानते है ज्योतिष मे आकर्षण का कारण

    शुक्र और चंद्रमा मुख्य रूप से आकर्षण के लिए जिम्मेदार होते है। चंद्रमा के द्वारा स्वभाव का आकर्षण मिलता है अर्थात चंद्रमा शुभ होने पर व्यक्ति अपने व्यवहार से लोगो को प्रभावित करने की क्षमता रखता है एवं शुक्र शुभ स्थिति मे होने पर प्रेम और सौंदर्य का आकर्षण प्राप्त होता है।

    कुंडली मे बुध शुभ हो तो वाणी और अभिव्यक्ति का आकर्षण होता है एवं बृहस्पति ज्ञान का आकर्षण प्रदान करते है। इसके अतिरिक्त सामान्यतः बाकी ग्रह आकर्षण नही देते है। शनि प्रायः आकर्षक नही बनाता है किंतु कुछ परिस्थितियों में सफलता जरूर देता है।

    आकर्षण की कमी को दूर करने के उपाय –

    1. सूर्य को नित्य प्रातः जल अर्पित करें।

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    सूर्य को नित्य ( demo pic )

    2. नित्य स्नान करें एवं हल्की सुगंध का प्रयोग करें।

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    3. आहार सात्विक रखें।

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    4. हल्के रंगों का प्रयोग करें।
    5. अपने इष्ट की नित्य पूजा करते रहें।

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    एस्ट्रोलॉजर सुमित तिवारी
    एम. ए. ज्योतिष

  • गोस्वामी तुलसीदास जयंती क्यों और कब मनाई जाती है

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    भारत वर्ष में श्रावण मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष 27 जुलाई 2020 को तुलसीदास जी की जयंती है। गोस्वामी तुलसीदास ने सगुण भक्ति की रामभक्ति धारा को ऐसा प्रवाहित किया कि वह धारा आज भी प्रवाहित हो रही है और आगे भी प्रवाहित होती रहेगी।

    गोस्वामी तुलसीदास ने रामभक्ति के द्वारा न केवल अपना ही जीवन कृतार्थ किया वरन्‌ सम्पूर्ण मानव जाति को श्रीराम के आदर्शों से बांधने का प्रयास भी किया। तुलसीदास जी ने अपनी रचनाओं के द्वारा समाज में आ रही अनेक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास भी किया।

    गोस्वामी जी ने संस्कृत भाषा वाले ग्रंथों की रचना सरल भाषा मे की जिससे आगे आने वाली पीढ़ी इसे आसानी से समझकर भक्ति मार्ग को अपना सकें। आज घर घर मे तुलसीदास जी के द्वारा लिखें हुए ग्रंथ सुने एवं गाये जाते है और व्यक्ति अपना और समाज का मंगल करता है।

    आज भी भारत के कोने-कोने में रामलीलाओं का मंचन होता है। उनकी जयंती के उपलक्ष्य में हम सब उनको प्रणाम करें क्योंकि इस कलिकाल मे उन्होंने हमको भक्ति का सरल साधन प्रदान किया।

    एस्ट्रोलॉजर सुमित तिवारी
    एम. ए. ज्योतिष

  • ज्योतिष के माध्यम से जाने क्या आप में है निर्णय लेने की क्षमता

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    ज्योतिष मे किसी व्यक्ति के सोचने का तरीका पंचम, नवम एवं लग्न भाव से मुख्य रूप से देखा जाता है। अलग अलग ग्रहों के स्वामित्व से निर्णय लेने का तरीका भी अलग होता है जैसे सूर्य प्रभावित व्यक्ति तुरन्त निर्णय लेगा, चंद्रमा भावनाओं से, मंगल जोश में आकर निर्णय लेगा, बुध वाला व्यक्ति संशय से, बृहस्पति और शुक्र सोच विचारकर, शनि वाला प्रायः सही निर्णय लेते है एवं राहू केतु प्रायः सही निर्णय नही लेते है। हस्तरेखा मे अंगूठे के द्वारा निर्णय लेने की क्षमता देखी जाती है।

    उपाय –

    1 -सूर्य ऊर्जा का स्रोत है इसलिए नित्य जल अर्पित करें।

    2- भगवान शिव या भगवान विष्णु की नित्य उपासना करें।

    3- बहुत गाढ़े रंगों का प्रयोग कम किया करें।

    एस्ट्रोलॉजर सुमित तिवारी
    एम. ए. ज्योतिष

  • अपनी राशि से जानिए कौन होगा आपका मित्र ?

    अपनी राशि से जानिए कौन होगा आपका मित्र ?

    यदि आपने अपनी विपरित राशि या शत्रु राशि के व्यक्ति से विवाह या व्यापार किया है तो आपको जीवनभर वैचारिक मतभेद का सामना करना होगा।
    हर राशि की कुछ मित्र राशि और कुछ शत्रु राशि होती है। फिलहाल अभी हम मित्र राशियों पर चर्चा करेंगे। किस व्यक्ति के साथ आपकी दोस्ती अच्छी रहेगी इस बात की जानकारी ज्योतिष से प्राप्त हो सकती है। आइए जानते हैं राशि के अनुसार आपकी मित्र राशि कौन सी होगी।

    मेष – वृश्चिक : सिंह, कर्क, धनु, मीन।

    वृष – तुला : मिथुन, कन्या, मकर, कुम्भ।

    मिथुन – कन्या : सिंह, वृष, तुला।

    कर्क : सिंह, मिथुन, कन्या।

    सिंह : कर्क, मेष, वृश्चिक, धनु, मीन।

    धनु – मीन : सिंह, कर्क, मेष, वृश्चिक।

    मकर – कुम्भ : मिथुन, कन्या, वृष, तुला।

    *यह एक सामान्य जानकारी है जो आपकी व्यक्तिगत कुंडली से भिन्न भी हो सकती है।

    एस्ट्रोलॉजर सुमित तिवारी
    एम. ए. ज्योतिष

  • जानिए क्या है ज्योतिष विज्ञान

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    ज्योतिष एक ऐसा शब्द है जिससे वर्तमान समय में सभी लोग भली-भाँति परिचित हैं। यह एक ऐसी विद्या है जो अति प्राचीन विद्याओं में से एक मानी गई है। ज्योतिष के संदर्भ में एक पंक्ति प्रसिद्ध है ‘ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्र्‌म’ इसका मतलब यह हुआ कि ग्रह, नक्षत्र और समय का ज्ञान कराने वाले विज्ञान को ज्योतिष अर्थात ज्योति प्रदान करने वाला विज्ञान कहते हैं। एक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह रास्ता बतलाने वाला विज्ञान है अर्थात ज्योतिष के माध्यम से हम जीवन की सही दिशा का पता लगा सकते है क्योंकि सही दिशा मे की गई मेहनत ही सफलता दिलाती है।

    भारतीय वैदिक ज्योतिष मूल रूप से नौ ग्रहों पर आधारित है। इसमें सात ग्रह मुख्य माने जाते हैं और दो को छाया ग्रह कहते हैं। सात मुख्य ग्रह सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और छाया ग्रह राहु, केतु है।

    ज्योतिष विज्ञान यह प्रमाणित करता है कि हमारे सौरमंडल में स्थित सूर्य के साथ-साथ सभी नौ ग्रहों एवं नक्षत्रों का मानव जीवन पर प्रभाव पड़ता है | यदि ज्योतिष को चमत्कार या अंधविश्वास न मानकर उसे अपने जीवन में सही ढंग से प्रयोग में लाया जाए तो वह बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

     

    ज्योतिष केवल बाहरी विज्ञान की ही नहीं, जो भौतिक ब्रह्मांड की प्रकृति से संबंधित है बल्कि यह आंतरिक या आध्यात्मिक विज्ञानों में सबसे महत्वपूर्ण है जो मन और आत्मा से संबंधित है।

    एस्ट्रोलॉजर सुमित तिवारी
    एम. ए. ज्योतिष

  • जन्माष्टमी स्पेशल : कहां है कान्हा की ससुराल, जहां आज भी जीवंत है बरसों पुरानी प्राचीन विरासत

    औरैया, [शंकर पोरवाल]। श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ और बचपन नंदगांव में बीता था लेकिन बहुत कम ही लोग जानते होंगे उनकी ससुराल कहां पर है। उस समय का कुंदनपुर राज्य आज औरैया का कुदरकोट है, यहीं पांडु नदी के रास्ते उन्होंने रुक्मिणी का हरण किया था। इसका उल्लेख श्रीमद्भगवत गीता में भी मिलता है और यहां पर पांच हजार साल पुरानी विरासत के निशां अाज भी जीवंत हैं।

    राजा भीष्मक की पुत्री थी रुक्मिणी

    श्रीमद्भागवत में उल्लेख मिलता है कि पांच हजार साल पुराना कुंदनपुर वर्तमान में कुदरकोट के नाम से जाना जाता है। यहां के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी व रुक्मी समेत पांच पुत्र थे। रुक्मी की मित्रता शिशुपाल से थी, इसलिए वह अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था, जबकि राजा और उनकी पुत्री रुक्मिणी की इच्छा भगवान श्रीकृष्ण से विवाह करने की थी। जब राजा की पुत्र के आगे नहीं चली तो उन्होंने बेटी की शादी शिशुपाल से तय कर दी थी। यह बात नागवार गुजरने पर रुक्मिणी ने द्वारिका नगरी में दूत भेजकर भगवान कृष्ण को बुलाया था। यहां पर नदी पार करने के बाद कान्हा ने रुक्मिणी का हरण किया था।

    जन्माष्टमी स्पेशल : कहां है कान्हा की ससुराल, जहां आज भी जीवंत है बरसों पुरानी प्राचीन विरासत
    Krishna Janmashtami 2020 औरैया के कुदरकोट तब कुंदनपुर राज्य आकर पांडु नदी के रास्ते भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण करके अपने साथ द्वारिका नगरी लेकर चले गए थे।

     

    रुक्मिणी के जाते ही गौरी माता हो गई थीं अलोप

    मान्यता है कि कुंदनपुर महल में स्थित गौरी माता रुक्मिणी हरण के बाद अलोप हो गई थीं। इसीलिए वहां पर अलोपा देवी मंदिर की स्थापना हुई। मंदिर के पश्चिम दिशा में राजा भीष्मक के द्वारा स्थापित द्वापर कालीन शिवलिंग है, जिसकी अब पहचान बाबा भयानक नाथ के नाम से है। मंदिर के पुजारी सुभाष चौरसिया बताते हैं, यहां चैत्र व आषाढ़ की नवरात्र में प्रतिवर्ष मेला

    50 एकड़ में फैले महल के अवशेष

    मुगल शासनकाल में कुंदनपुर का नाम कुदरकोट पड़ गया। यहां राजा भीष्मक के महल के अवशेष 50 एकड़ क्षेत्र में फैले हैं। वर्तमान में जहां कुदरकोट का माध्यमिक स्कूल है, वहां कभी राजा भीष्मक का निवास स्थान था। ऐसा उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। सरकारी उदासीनता के कारण मथुरा वृंदावन की तरह कुदरकोट को पहचान नहीं मिल सकी है।

    लगता है। 116 साल से भव्य रामलीला का आयोजन हो रहा है। दशहरा पर रावण वध का मंचन होता है। मां अलोपा देवी मंदिर जमीन से 60 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। प्रतिवर्ष फाल्गुनी अमावस्या पर 84 कोसी परिक्रमा का भी आयोजन होता है।