Category: religious

  • इस विधि से रविवार के दिन करें सूर्य देव की पूजा, पूरी होगी हर मनोकाना

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    यह बात हम सभी जानते है कि रविवार के दिन भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। कहा जाता है कि भगवान सूर्य की कृपा यदि जातक के उपर हो जाए तो उसके जीवन के सभी संकट दूर हो जाते हैं। सूर्य देव को अर्घ्य देने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है।

    (1) रविवार के दिन जातक सूर्य उदय से पहले जरूर स्नान कर लें। जिसके बाद भगवान सूर्य देव को 3 बार अर्घ्य दें।

    (2) शाम के वक्त सूर्य अस्त से पहले जातक सूर्य देव को अर्घ्य दें।

    (3) सूर्य देव को खुश करने के लिए जातक नियमित आदित्य ह्रदय का पाठ करें।

    (4) वहीं इस दिन नमक, तेल खाने से बचें। इसके साथ ही रविवार के दिन एक बार फलहार जरूर करें।

    सूर्य देव को ऐसे दें अर्घ्य

    भगवान सूर्य देव को अर्घ्य देने से पहले तांबे के लोटे में जल भरें। इसके बाद लोटे में लाल फूल, चावल डालकर सूर्य देव के मंत्र का जाप करें।

    यदि आप ऐसा हर दिन करते हैं तो और ज्यादा अच्छा होगा।

  • इस वर्ष का अंतिम सूर्य ग्रहण कल, भारत के इन शहरों में दिखाई देगा !

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    नई दिल्‍ली । इस 26 दिसंबर को वर्ष 2019 का अंतिम सूर्य ग्रहण पड़ने वाला है। आपको यहां पर बता दें कि यह साल का तीसरा सूर्यग्रहण है, लेकिन पूर्ण सूर्यग्रहण के रूप में यह साल का पहला ग्रहण होगा।भारतीय समयानुसार यह ग्रहण सुबह 8:17 मिनट से 10: 57 मिनट तक रहेगा। यही वजह है कि वैज्ञानिकों के लिए और खगोलिय घटनाओं पर नजर रखने वालों के लिए इस दिन के बेहद खास मायने हैं। इस दौरान वैज्ञानिक सूर्य के वायुमंडल की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाने का प्रयास करेंगे। इससे पहले इस साल छह जनवरी और दो जुलाई को आंशिक सूर्यग्रहण लगा था, लेकिन, ये भारत में दिखाई नहीं दिए थे। इस वर्ष के अंतिम सूर्यग्रहण की खास बात ये है कि इस बार ग्रहण से 12 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा। ये इस बार 25 दिसंबर की शाम से 26 दिसंबर तक रहेगा। इस ग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे। यह सूर्य ग्रहण वलयाकार होगा।

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    इस वर्ष का अंतिम सूर्य ग्रहण कल, भारत के इन शहरों में दिखाई देगा !

    वर्ष के इस अंतिम सूर्य ग्रहण को भारत समेत नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, चीन, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में असर दिखाई देगा। वैज्ञानिकों की मानें तो दक्षिण भारत में यह सबसे बेहतर तरीके से दिखाई देगा। यहां पर डायमंड रिंग का नजारा बेहद अदभुत होगा। वहीं भारत के अन्‍य भागों में आंशिक सूर्य ग्रहण ही देखा जायेगा। इस सूर्य ग्रहण की कुल अवधि करीब 3.30 घंटे की रहेगी। जबकि भारत में सूर्य ग्रहण सुबह 8.04 बजे से शुरू हो जायेगा। ग्रहण के शुरू और समाप्त होने का समय अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग होगा।

    क्‍या होता है वलयाकार सूर्य ग्रहण

    हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी सूर्य के चक्‍कर लगाती है। वहीं चंद्रमा पृथ्‍वी के चक्‍कर काटता है। इसी प्रक्रिया में जब चंद्रमा सूर्य और धरती के बीच आकर सूर्य की रोशनी को धरती पर आने से रोक देता है तो इसको सूर्य ग्रहण कहा जाता है। यह घटना अक्‍सर अमावस्‍या के ही दिन होती है। अक्‍सर चंद्रमा इस प्रक्रिया के दौरान सूर्य के कुछ ही भाग को ढक पाता है जिसको खंड ग्रहण कहा जाता है। वहीं जब चंद्रमा सूर्य के करीब 97 फीसद भाग को ढक लेता है तो इसको वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं। ऐसा नजारा धरती पर कम ही देखने को मिलता है।

    आपको यहां पर ये भी बता दें कि वर्ष 2020 में दो बार सूर्य ग्रहण का मौका देखने को मिलेगा। इसमें से पहला सूर्य ग्रहण 21 जून को होगा भारत समेत दक्षिण पूर्व यूरोप और एशिया में दिखाई देगा। वहीं दूसरा सूर्य ग्रहण 14 दिसंबर को लगेगा जो प्रशांत महासागर में देखा जा सकेगा।

    धार्मिक मान्‍यता के अनुसार समुद्र मंथन के बाद देवगण और दानवों के बीच अमृतपान को लेकर विवाद हो गया था। तब भगवान विष्णु मोहिनी का रूप धरकर आए। उन्‍हें देखकर दानव उन पर मोहित हो गए। मोहिनी रूपी भगवान विष्‍णु ने दैत्यों और देवगणों को अलग लग बिठा दिया। उन्‍होंने पहले देवताओं को अमृतपान पिलाना शुरू किया। इस बीच उनकी यह चाल एक असुर भांप गया और देवताओं के बीच चुपचाप जाकर बैठ गया। तभी मोहिनी ने उसको भी अमृतपान करा दिया। लेकिन उसी वक्‍त वहां बैठे सूर्य और चंद्रमा ने उसे देख लिया और इसकी शिकायत भगवान विष्णु से कर दी। इससे क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन क्‍योंकि उसने अमृतपान कर लिया था तो वह मरा नहीं। इसी असुर का सिर का हिस्सा राहू और धड़ केतू कहलाया। कहा जाता है कि ये दोनों ही अपनी इस हालत के लिए सूर्य और चंद्रमा को जिम्‍मेदार मानते हैं। मान्‍यताओं के मुताबिक इसका बदला लेने के लिए राहू हर वर्ष पूर्णिमा और अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा का ग्रास कर लेते हैं। इसे सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण कहा जाता है।

    सूतक काल में ये करें

    धार्मिक मान्‍यताओं के मुताबिक ग्रहण को शुभ नहीं माना जाता है। इसलिए सूतक काल के दौरान खाने पीने की चीजों में तुलसी की पत्तियां डाल कर रखनी चाहिए, जिससे ये दूषित न हो सकें। वहीं तुलसी के पत्‍तों को भी सूतक काल शुरू होने से पहले ही तोड़ कर रख लें।

    ज्योतिष गणना के अनुसार, ग्रहण से ठीक एक दिन पहले पौष माह में मंगल वृश्चिक में प्रवेश करने वाला है। यह स्थिति बड़े प्राकृतिक आपदा की ओर इशारा कर रही है। इस ज्‍योतिषीय गणना के मुताबिक ग्रहण के 3 से 15 दिनों के भीतर भूकंप, सुनामी और अत्यधिक बर्फबारी हो सकती है।

    अगर आपको रोंगो से मुक्ति चाहिए तो करिये इस मंत्र का जाप

  • आपकी किस्मत का पता चलता है शरीर के इन अंगों से ऐसे

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    हस्तरेखा ज्योतिष में हाथ की रेखाओं और उससे बने निशानों से भविष्य का पता चलता है। बहुत से लोग अपनी कुंडली के जरिए भी अपनी किस्मत और भविष्य को लेकर फैसला करते है। लेकिन क्या आप जानते है कि जातक के भविष्य को जानने के लिए केवल उसकी कुंडली या हाथ ही जरूरी नहीं बल्कि उसके शरीर के कई अंग उसके भाग्य के बारे में बताते है। इसके अलावा जातक अपने पैरों की बनावट से जान सकता है कि भाग्य साथ देगा या नहीं।

    यदि आपको अपने पैर का अंगूठा जरूरत से ज्यादा बड़ा लगता हो या मोटा हो तो यह आपके लिए अशुभ संकेत है। ऐसे जातको का भाग्य बहुत लाभकारीन नहीं होता है। ज्योतिष के अनुसार ऐसे जातकों काे तमाम कोशिशों के बाद भी मन लायक फल नहीं मिलता है।

    जिन व्यक्तियों की घुटने पर जिनकी हड्डियां साफ दिखाई आती हैं ऐसे लोग भाग्य के धनी नहीं होते है। ऐसे लोगों को कुछ भी बहुत संघर्ष के बाद ही मिलता है।

    यदि किसी जातक के पैर की तर्जनी उंगली अंगूठे से लंबी हो तो ऐसे व्यक्ति बहुत भाग्शाली माने जाते हैं। यह सौभाग्य सूचक मानी जाती है।

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    ज्योतिष के अनुसार, जिन लोगों की जांघे और लंबी टांगे होती है, वो सुनहरे भविष्य की ओर इशारा करती है। जिनकी टांगे बहुत भरी हुई हों और साथ ही उसमें लंबाई भी हो तो ऐसे लोगों के जीवन में भाग्य बहुत मजबूती से खड़ा होता है। धन और सुख ऐसे लोगों के जीवन में खूब होता है।

    ज्योतिष के अनुसार, जिन व्यक्ति का पेट गोलाई में उभार लिए होता है और पेट हमेशा भरा भरा सा नजर आए तो ऐसे जाताकों के जीवन में धन की कमी नहीं होती। ऐसे लोगों पर मां लक्ष्मी की कृपा बनी होती है।

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  • वास्तु शास्त्र : आशियाना बनाये इन उपायों से, आएगी जीवन में खुशियां

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    जीवन में सफलता पाने में शुभ ऊर्जा और सकारात्मक सोच की खासी जरूरत होती है, जो कि हमें आसपास के माहौल और हमारे निवास से मिलती है। ऐसे में यदि नव निर्माण वास्तु सम्मत कराया जाए तो घर का हर कोना आपको सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। अपने घर को वास्तु के अनुसार कुछ यूं बनाया जा सकता है।

    स्नानघर
    स्नानघर, गुसलखाना, नैऋत्य (पश्चिम-दक्षिण) कोण और दक्षिण दिशा के मध्य या नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य में होना सर्वोत्तम है। इसका पानी का बहाव उत्तर-पूर्व में रखे। गुसलखाने की उत्तरी या पूर्वी दीवार पर एग्जास्ट फैन लगाना बेहतर होता है। गीजर आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) कोण में लगाना चाहिए क्योंकि इसका संबंध अग्नि से है। ईशान व नैऋत्य कोण में इसका स्थान कभी न बनवाएं।

    शौचालय
    शौचालय सदैव नैऋत्य कोण व दक्षिण दिशा के मध्य या नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य बनाना चाहिए। शौचालय में शौच करते समय आपका मुख दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिए। शौचालय की सीट इस प्रकार लगाएं कि उस पर बैठते समय आपका मुख दक्षिण या पश्चिम की ओर ही हो। प्रयास करें शौचालय एवं स्नानगृह अलग-अलग बनाएं। वैसे आधुनिक काल में दोनों को एक साथ संयुक्त रूप में बनाने का फैशन चल गया है। उत्तरी व पूर्वी दीवार के साथ शौचालय न बनाएं।

    मुख्यद्वार
    द्वार में प्रवेश करते समय द्वार से निकलती चुंबकीय तरंगें बुद्धि को प्रभावित करती हैं। इसलिए प्रयास करना चाहिए कि द्वार का मुंह उत्तर या पूर्व में ही हो। दक्षिण और पश्चिम में द्वार नहीं होना चाहिए।

    आंगन
    भवन का प्रारूप इस प्रकार बनाना चाहिए कि आंगन मध्य में हो या जगह कम हो तो भवन में खुला क्षेत्र इस प्रकार उत्तर या पूर्व की ओर रखें जिससे सूर्य का प्रकाश व ताप भवन में अधिकाधिक प्रवेश करें। ऐसा करने पर भवन में रहने वाले स्वस्थ व प्रसन्न रहते हैं। पुराने समय में बड़ी-बड़ी हवेलियों में विशाल चौक या आंगन को देखकर इसके महत्व का पता चलता है।

    सोपान या सीढ़ी
    भवन में सीढि़यां वास्तु नियमों के अनुरूप बनानी चाहिए। सीढि़यों का द्वार पूर्व या दक्षिण दिशा में होना शुभफलप्रद होता है। सीढि़यां भवन के पाश्र्व में दक्षिणी व पश्चिमी भाग में दाएं ओर हो, तो उत्तम है। यदि सीढि़यां घुमावदार बनानी हो, तो उनका घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व की ओर होना चाहिए। कहने का मतलब यह है कि चढ़ते समय सीढि़यां हमेशा बाएं से दाएं ओर मुड़नी चाहिए। सीढि़यां हमेशा विषम संख्या में बनानी चाहिए। सीढि़यों की संख्या ऐसी हो कि उसे 3 से भाग दें तो 2 शेष रहे। जैसे 5, 11, 17, 23, 29 आदि की संख्या। सीढि़यों के नीचे एवं ऊपर द्वार रखने चाहिए। यदि किसी पुराने घर में सीढि़यां उत्तर-पूर्व दिशा में बनी हो, तो उसके दोष को समाप्त करने के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक कमरा बनाना चाहिए। वास्तु में सोपान का अहम रोल होता है।

    बालकनी
    हवा, सूर्य प्रकाश और भवन के सौंदर्य के लिए आवासीय भवनों में बालकनी का खासा स्थान है। बालकनी भी एक प्रकार से भवन में खुले स्थान के रूप में मानी जाती है। बालकनी से सूरज कीक किरणें और प्राकृतिक हवा मिलती है। वास्तु सिद्धांतों के अनुसार बालकनी बनाई जा सकती है। यदि पूर्वोन्मुख भूखंड है, तो बालकनी उत्तर-पूर्व में उत्तर की ओर बनानी चाहिए। बालकनी उत्तर-पश्चिम में उत्तर की ओर बनानी चाहिए। यदि उत्तरोन्मुख भूखंड है, तो बालकनी उत्तर-पूर्व में उत्तर की ओर बनानी चाहिए। यदि दक्षिणोन्मुख भूखंड है, तो बालकनी दक्षिण-पूर्व में दक्षिण दिशा में बनाएं। बालकनी का स्थान भूखंड के मुख पर निर्भर है। लेकिन प्रयास यह होना चाहिए कि प्रात: कालीन सूर्य एवं प्राकृतिक हवा का प्रवेश भवन में होता रहे। ऐसा होने से मकान कई दोषों से मुक्त हो जाता है।

    गैराज
    वाहन (कार, गाड़ी) खड़ा करने के लिए गैराज की आवश्यकता होती है। फ्लैट, बंगला या बड़े घर ( जिसके पास जगह अधिक है) में गैराज दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में बनाना चाहिए। यह बात ध्यान में रखें कि गैराज में उत्तर और पूर्व की दीवार पर वजन कम होना चाहिए। यदि भूखंड पूर्वोन्मुखी है, तो दक्षिण-पूर्व दिशा में पूर्व की ओर, यदि भूखंड उत्तरोन्मुख है, तो उत्तर-पश्चिम दिशा में उत्तर की ओर, यदि भूखंड पश्चिमोन्मुख है, तो दक्षिण-पश्चिम दिशा में पश्चिम की ओर, यदि भूखंड दक्षिणोन्मुख हो, तो दक्षिण-पश्चिम दिशा में पश्चिम की ओर गैराज बनाना चाहिए।

    स्वागत कक्ष या बैठक
    आज के दौर में भवन में स्वागतकक्ष का महत्व सबसे ज्यादा है। प्राचीनकाल में इसे बैठक के नाम से जाना जाता था। स्वागतकक्ष या बैठक में मसनद व तकिए या फर्नीचर दक्षिण और पश्चिम दिशाओं की ओर रखना चाहिए। स्वागतकक्ष या बैठक जहां तक संभव हो उत्तर और पूर्व की ओर खुली जगह अधिक रखनी चाहिए। स्वागतकक्ष भवन में वायव्य और ईशान और पूर्व दिशा के मध्य में बनाना चाहिए।

    अध्ययन कक्ष
    अध्ययन कक्ष हमेशा ईशान कोण में ही पूजागृह के साथ पूर्व दिशा में होना चाहिए। प्रकाश की ऊर्जा ही घर में सकारात्मकता लाती है, लिहाजा पूरब दिशा में स्टडी रूम काफी प्रभावी माना जाता है। वायव्य और पश्चिम दिशा के मध्य या वायव्य व उत्तर के मध्य बना सकते हैं। ईशान कोण पूजागृह के पास सर्वोत्तम है।

    खिड़कियां
    भवन में मुख्य गेट के सामने खिड़कियां ज्यादा प्रभावी होती हैं। कहते हैं इससे चुंबकीय चक्र पूर्ण होता है औरघर में सुख-शांति निवास करती है। पश्चिमी, पूर्वी और उत्तरी दीवारों पर भी खिड़कियों का निर्माण शुभ होता है। भवन में खिड़कियों का मुख्य लक्ष्य भवन में शुद्ध वायु के निरंतर प्रवाह के लिए होता है। यहां सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात यह है कि भवन में कभी भी खिड़कियों की संख्या विषम न रखें। सम खिड़कियां शुभ होती हैं।

    भोजनालय या भोजनकक्ष
    भोजनकक्ष ड्राइंगरूम का ही एक भाग बन गया है या अलग भी बनाया जाता है। डायनिंग टेबल ड्राईंगरूम के दक्षिण-पूर्व में रखनी चाहिए अथवा भोजन कक्ष में भी दक्षिण-पूर्व में रखनी चाहिए।

    मीटर बोर्ड, विद्युतकक्ष
    अग्नि या विद्युत-शक्ति, मीटरबोर्ड, मेन स्विच, विद्युतकक्ष आदि भवन में दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशा में लगाने चाहिए। अग्नि कोण इसके लिए सदैव उत्तम रहता है।

    पूजागृह पूजन
    भजन, कीर्तन, अध्ययन-अध्यापन सदैव ईशान कोण में होना चाहिए। पूजा करते समय व्यक्ति का मुख पूर्व में होना चाहिए। ईश्वर की मूर्ति का मुख पश्चिम व दक्षिण की ओर होना चाहिए। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र, सूर्य, कार्तिकेय का मुख पूर्व या पश्चिम की ओर होना चाहिए। गणेश, कुबेर, दुर्गा, भैरव, षोडश मातृका का मुख नैऋत्य कोण की ओर होना चाहिए। ज्ञान प्राप्ति के लिए पूजागृह में उत्तर-दिशा में बैठकर उत्तर की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए और धन प्राप्ति के लिए पूर्व दिशा में पूर्व की ओर मुख करके पूजा करना उत्तम है।

    जल प्रवाह
    भवन निर्माण में जल के प्रवाह का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। भवन का समस्त जल प्रवाह पूर्व, वायव्य, उत्तर और ईशान कोण में रखना शुभ होता है। भवन का जल ईशान (उत्तर-पूर्व) या वायव्य (उत्तर-पश्चिम) कोण से घर से बाहर निकालना चाहिए। वास्तु के अनुसार दिशाओं का जरूर ध्यान रखें। दिशाएं दशा बदलने का माद्दा रखती हैं।

  • माने जाते हैं अशुभ हथेली पर ये निशान, हो सकती है अकाल मृत्यु

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    यह बता हम सभी जानते है कि हमारी हाथों की रेखाओं के जरिए भूतकाल, वर्तमान और भविष्य तीनों के बारे में पता लगाया जा सकता है। ज्योतिष के अनुसार, अगर हम अपनी हथेली देखें तो हमें उसमें बहुत से निशान या आकर बनते दिखाई देते हैं।

    इन चिन्हों का अपना ही एक अर्थ होता है। इनमें से कुछ चिन्ह हमारे लिए शुभ होते हैं तथा कुछ अशुभ। मगर क्या आप जानते है कि हमारी हथेली में कुछ ऐसे स्थान भी होते हैं जहां क्रॉस का चिन्ह होना अकाल मृत्यु या असमय मृत्यु का सूचक माना जाता है।

    मगर हमारी हथेली में कुछ ऐसे स्थान भी हैं जहां पर क्रॉस के चिन्ह होने से हमें शुभ फल मिलता है। समुद्रशास्त्र के मुताबिक, अगर आपकी हथेली में गुरु पर्वत पर क्रॉस चिन्ह है तो यह आपके लिए बहुत शुभ है। गुरु पर्वत पर यह निशान होने से आपको शिक्षित और समझदार पत्नी मिलती है और वैवाहकि जीवन सुखमय रहता है। इन्हें ससुराल पक्ष से सहयोग एवं सहायता मिलती रहती है।

    अगर आपकी विवाह रेखा पर क्रॉस का निशान है तो आपके विवाह में कई तरह की बाधाएं आ सकती हैं। इन लोगों के वैवाहिक जीवन में तनाव रहता है। अगर आपकी जीवन रेखा पर क्रॉस का चिन्ह है तो आपके जीवन में स्वास्थ्य को लेकर उतार चढ़ाव बने रहेंगे। जीवन रेखा के जिस स्थान पर क्रॉस है आयु के उस भाग में मृत्यु तुल्य कष्ट भोगने होंगे।

    जिन व्यक्तियों की हथेली में चन्द्रपर्वत पर क्रॉस चिन्ह है। उन्हें नदी, तालाब, समुद्र के आस-पास विशेष सजग रहना चाहिए। क्योंकि ऐसे व्यक्ति की जल में डूबने की आशंका रहती है।

    अगर आपकी हथेली में क्रॉस का चिन्ह शनि पर्वत पर है तो यह आपके लिए बहुत ही अशुभ है। क्योंकि शनि पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह होने से अक्सर चोट लगती रहती है और अकाल मृत्यु की आशंका रहती है।

    मंगल पर्वत पर क्रॉस का अर्थ है कि व्यक्ति को किसी कारण जेल जाना पड़ सकता है। इन व्यक्तियों की आत्महत्या करने की आशंका रहती है। इनका अकाल मृत्यु का भी डर रहता है।

    जिनके शुक्र पर्वत पर क्रॉस का निशान है उन्हें प्रेम में असफलता मिलती है और बदनामी सहनी पड़ती है।

    अगर आपकी यात्रा रेखा पर क्रॉस का चिन्ह है तो सावधानी से यात्रा करें। क्योंकि यात्रा रेखा पर क्रॉस के चिन्ह को यात्रा के दौरान दुर्घटनाग्रस्त होने का सूचक माना जाता है।

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  • जीवन में सकारात्मक बदलाव आएगा स्वामी विवेकानंद की इन 10 बातों से

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    नई दिल्ली। महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद ने भारत के उत्थान में खास भूमिका निभाई थी। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उन्होंने बेहद कम उम्र में ही वेद और दर्शन शास्त्र का ज्ञान हासिल कर लिया था। विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता हाईकोर्ट के वकील थे, जबकि मां भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं।

    पिता की 1884 में पिता की मौत के बाद विवेकानंद पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। 25 साल की उम्र में गुरु से प्रेरित होकर उन्होंने मोह-माया त्याग दी और संन्यासी बन गए। अमेरिका में 11 सितंबर 1893 को हुई धर्म संसद में जब विवेकानंद ने भाषण शुरू किया तो दो मिनट तक आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो में तालियां बजती रहीं।

    विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ की स्थापना की। वर्ष 1985 से 12 जनवरी को भारत में हर साल राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। विवेकानंद ने 4 जुलाई 1902 को बेलूर स्थित रामकृष्ण मठ में ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिए।

    ये हैं स्वामी विवेकानंद के 10 अनमोल विचार :-

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    1. जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।

    2. जितना ज्यादा संघर्ष होगा, उतनी ही शानदार जीत होगी।

    3. पढऩे के लिए एकाग्रता और एकाग्रता के लिए ध्यान जरूरी है। ध्यान से इंद्रियों पर संयम रख हासिल कर सकते हैं एकाग्रता।

    4. मैं तीनों गुण पवित्रता, धैर्य और उद्यम एक साथ चाहता हूं।

    5. उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते।

    6. ज्ञान खुद में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।

    7. एक समय एक काम करो और ऐसा करते समय पूरी आत्मा उसमें डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।

    8. जब तक आप खुद पर भरोसा नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।

    9. ध्यान तथा ज्ञान का प्रतीक हैं भगवान शिव, सीखें आगे बढऩे के सबक।

    10. लोग तुम्हारी स्तुति करें या निंदा, लक्ष्य कृपालु हो या न हो, तुम्हारा निधन आज हो या युग में, न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।

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  • वास्तु शास्त्र: रंगों का भी पड़ता है आपकी जिंदगी में प्रभाव, जो किस्मत के लिए हो सकते हैं शुभ या अशुभ

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    वैसे तो देखा जाएं तो प्रकृति ने हमें कई रंगों से संवारा है और शायद आप समझ सकते हैं कि अगर प्रकृति से हमे ये रंग नहीं मिलते तो हमारी जिदंगी कैसी होती। वैसे तो इन रंगों का हमारी जिंदगी में बहुत महत्व है। जसै कपड़े, गाड़ी, खाने की चीजे हो या फिर कुछ ओर हम हमेशा अपने हिसाब से ही अपना रंग चुनते हैं। हमें पता रहता है कि कौन सा रंग हमारे लिए अच्छा होगा। वैसे वास्तु के बारे में भी सब लोग जानते हैं, क्योंकि ये हमारी जिंदगी के सुख-दुख, यश-वैभव और संपन्नता पाने के लिए बहुत जरूरी है। वैसे देखा जाएं तो हम वास्तु का मतलब सिर्फ घर से लेते हैं और मान्यता भी यही है कि हम अगर सही वास्तु से अपना घर बनाएंगे तो ये हमारे साथ साथ हमारे परिवार जनों के लिए भी अच्छा होगा, लेकिन क्या आपकों पता है कि रंगों का भी अपना-अपना वास्तु होता है और ये भी हमारे घर में सुख-दुख, यश-वैभव और संपन्नता पाने के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। घर में कौनसी दिशा के लिए कौनसा पेंट, कौनसा रंग अच्छा हो इसके लिए आज हम आपकों बताते हैं कुछ रंगों के बारे में जो हमारे घर में वास्तु के हिसाब से सही रहते हैं।
    वैसे तो रंग हमारे लिए सारे ही जरूरी होते हैं, क्योंकि प्रकृति ने हमें ये रंग उपहार में दिए हैं, लेकिन वास्तु में ये रंग हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। तो आइए जानते हैं इन रंगों के बारे में…

    लाल- लाल रंग प्यार की निशानी माना जाता है, फिर भी लोग लाल रंग का प्रयोग अपने घरों में कम ही करते हैं। वैसे देखा जाए तो लाल रंग का प्रयोग हमारे घर के लिए अच्छा होता है और इसके प्रयोग से हमारे घर और परिवार में प्यार और मिलन सरिता बनी रहती है।

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    काला- काला रंग हमे ज्यादा पसंद आता है और कई बार हम अपने घर का निर्माण कराते समय इस रंग को महत्व देते हैं। लेकिन काला रंग वास्तु के हिसाब से हमारें घरों के लिए अच्छा नहीं माना जाता। लोगों को ये याद रखना चाहिए कि अपने घर में फर्श बनवाते समय काले रंग के पत्थर का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे घर में राहु का प्रभाव में वृद्धि होती है और घर में चिंताओं में बढ़ोतरी होती है। इसलिए हमें अपने घर में काले रंग के पत्थर की फर्श नहीं बनावानी चाहिए।

    पीला-
    पीला रंग वैसे ज्यादातर लोग अपने घरों में दीवारों के लिए इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि ये लाइट रंग होता है और इससे घर में उजाला बना रहता है। लेकिन यदि आपका गुरु अशुभ शत्रुक्षेत्री व निर्बल हो तो घर में पीले रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये घर-परिवार में विरोधाभास को जन्म देता है।

    गुलाबी- गुलाबी रंग प्यार का विश्वास होता है। लोग इसे सिर्फ प्यार का रंग ही नहीं मानते बल्कि कई बार घरों में वह गुलाबी रंग से अपनी दीवारों को पेंट कराते हैं। गुलाबी रंग का घर में प्रयोग करने ये हमारे कोमलता और स्वभाव की सरलता को दर्शाते हैं।

    हरा- हरे रंग का वैसे तो घरों में कम ही इस्तेमाल होता है, लेकिन गहरा हरा रंग घर में होना आपकी और आपके परिवार के भोलेपन को दर्शाता है। वहीं हल्का हरा रंग आपके स्वभाग के खुलेपन के बारे में बयां करता है।

    नीला-नीले रंग का वैसे तो घरों में ज्यादा उपयोग नहीं लिया जाता, लेकिन जिन घरों में नीले रंग का उपयोग किया जाता है वहां ये आपके और आपके परिवार की ईमानदारी और लग्न को दर्शाता है।

    सफेद-
    सफेद रंग हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा होता है क्योंकि लोगों को सफेद रंग बहुत पसंद आता है। चाहे वह कपड़े हो या फिर गाड़ी, लोग ज्यादा तर सफेद चीजों की तरफ अट्रैक्ट होते हैं, यहां तक कि कई लोग अपने घर में भी सफेद रंग की चीजों को ज्यादा महत्व देते हैं, जैसे मार्बल, पेंट आदि, लेकिन क्या आपका पता है सफेद वास्तु के हिसाब से घर में ज्यादा सफेद रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये हमारे गृहस्थ जीवन में बाधा डाल सकते हैं। वास्तु के हिसाब से हमें अपने घर के अंदर फर्श या दीवारों पर सफेद रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने पर हमारा गृहस्थ जीवन अत्यधिक महत्वाकांक्षी हो जाएगा और भविष्य में अत्यधिक विलासिता और भांग के कारण हमारे गृहस्थ जीवन खतरे में पड़ सकता है। अत: जहां तक हो हमें अपने घरों में सफेद रंग का उपयोग कम से कम करना चाहिए। वैसे अगर शुक्र और बली उच्च स्तर पर हो तो सफेद रंग शुभ भी हो सकता है।

     

     

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  • MAKAR SANKRANTI 2020 : जानिए क्यों बनाए जाते है मकर संक्रांति पर तिल के लड्डू

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    मकर संक्रांति हिंदुओं का प्रमुख त्यौहार है। जो हर साल 14 जनवरी मनाया जाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से सूर्य के राशि परिवर्तन के समय में अंतर आने की वजह से यह पर्व 15 जनवरी को भी मनाया जाने लगा है।

    भारत के हर कोने में जिस तरह अलग-अलग प्रकार के व्यंजन होते हैं, वैसे ही इस देश में जितने तरह के त्योहार मनाए जाते हैं, उनमें उतने ही प्रकार के खाने की चीजें भी बनती हैं। जैसे की होली पर गुजिया और दीवाली पर पेड़े बनाए जाते हैं, ठीक उसी तरह मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ से बनी चीजें खाने की परंपरा है।

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    मकर संक्रांति पर क्याे है तिल का महत्व

    मकर संक्रांति को तिल की महत्ता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इस पर्व को ”तिल संक्रांति” के नाम से भी पुकारा जाता है। मकर संक्रांति के दिन तिल को इतना महत्व क्यों दिया जाता है।

    मकर संक्रांति को सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसी कारण इस पर्व को मकर संक्रांति कहा जाता है और मकर के स्वामी शनि देव हैं। सूर्य और शनि देव भले ही पिता−पुत्र हैं मगर फिर भी वे आपस में बैर भाव रखते हैं। ऐसे में जब सूर्य देव शनि के घर प्रवेश करते हैं तो तिल की उपस्थिति की वजह से शनि उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं देता है।

    तिल और गुड़ के लड्डू का महत्व

    पौराणिक शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति को तिल और गुड़ का वैज्ञानिक महत्व भी है। मकर संक्रांति के समय उत्तर भारत में सर्दियों के सीजन में रहता है और तिल-गुड़ की तासीर गर्म होती है। इस मौसम में गुड़ और तिल के लड्डू खाने से शरीर गर्म रहता है। साथ ही यह शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है।

    मकर संक्रांति को तिल खाने व उसका दान करने के पीछे एक प्राचीन कथा भी है। बता दें कि सूर्य देव की दो पत्नियां थी छाया और संज्ञा। छाया शनि देव की मां थी, जबकि यमराज संज्ञा के पुत्र थे। एक दिन सूर्य देव ने छाया को संज्ञा के पुत्र यमराज के साथ भेदभाव करते हुए देखा और क्रोधित होकर छाया व शनि को स्वयं से अलग कर दिया। जिसके कारण शनि और छाया ने रूष्ट होकर सूर्य देव को कुष्ठ रोग का शाप दे दिया। अपने पिता को कष्ट में देखकर यमराज ने कठोर तप किया और सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से मुक्त करवा दिया मकर सूर्य देव ने क्रोध में शनि महाराज के घर माने जाने वाले कुंभ को जला दिया।

    इससे शनि और उनकी माता को कष्ट भोगना पड़ा। तब यमराज ने अपने पिता सूर्यदेव से आग्रह किया कि वह शनि महाराज को माफ कर दें। जिसके बाद सूर्य देव शनि के घर कुंभ गए। उस समय सब कुछ जला हुआ था, बस शनिदेव के पास तिल ही शेष थे। इसलिए उन्होंने तिल से सूर्य देव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनिदेव को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन काले तिल से सूर्य की पूजा करेगा, उसके सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाएंगे। इस लिए इस दिन न सिर्फ तिल से सूर्यदेव की पूजा की जाती है, बल्कि किसी न किसी रूप में उसे खाया भी जाता है।

    मकर संक्रांति को तिलदान का महत्व

    (1) मकर-संक्रांति को तिल से बनी हुई चीजों का दान देना श्रेष्ठ रहेगा।

    (2) तिल मिश्रित जल से स्नान करने से, पापों से राहत मिलती है और निराशा समाप्त होती है।

    (3) ज्योतिष के अनुसार, तिल दान से शनि के कुप्रभाव कम होते हैं।

    (4) मकर संक्रांति के पवित्र अवसर पर सूर्य पूजन और सूर्य मंत्र का 108 बार जाप करने से जरूर फल मिलता है।

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  • MAUNI AMAVASYA 2020 :गंगा में क्यों करते हैं स्नान मौनी अमावस्या पर, जानिए दान और मौन व्रत का महत्व

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    हिंदू धर्म में स्नान, दान और ध्यान का बड़ा महत्व होता है। बता दें कि 24 जनवरी को माघ मास की अमावस्या तिथि है जिसे मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। ज्योतिष के अनुसार इस दिन पवित्र संगम में स्वर्ग के देवी-देवताओं भी स्नान करने के लिए गंगा नदी में आते हैं। माघ मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत रखकर गंगा स्नान करने अथाह पुण्यफल की प्राप्ति होती है।

    गंगा स्नान का महत्व

    हिन्दु धर्म के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में संगम में गंगा स्नान से तन और मन की शुद्धि तो होती ही है, दान करने से धन की वृद्धि होती है। कहा जाता है कि मौनी अमावस्या के दिन गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र संगम पर देवताओं का वास होता है।

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    मौनी अमावस्या प्राचीन धार्मिक कथा

    संगम में स्नान के संदर्भ में एक अन्य कथा का भी उल्लेख आता है, वह है सागर मंथन की कथा। जब समुद्र मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए उस समय देवताओं एवं असुरों में अमृत कलश के लिए विवाद होने लगा और इसी बीच अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें छलक कर इलाहाबाद, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन आदि नगरों गिर गई।

    इसी कारण इन स्थानों पर कुंभ मेला का आयोजन भी होने लगा जिसके लाखों की संख्या में साधु-संत, श्रद्धालु भाग लेकर पवित्र स्थान भी करने लगे। माना जाता है कुंभ मेले के अतिरिक्त माघ माह की अमावस्या तिथि पर यहां स्नान करने से अमृत पुण्य की प्राप्ति होती है। तभी से ये माना जाने लगा कि इन चार स्थानों पर विशेष दिन नदियों में स्नान करने से अमृत स्नान का पुण्य लाभ प्राप्त होता है।

    मौन व्रत रखने के फायदा
    माघ मौनी अमावस्या के दिन तिल दान भी उत्तम कहा गया है और इस तिथि को मौनी अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन पूरे समय मौन व्रत रखकर अपने ईष्ट देव के मंत्रों का मानसिक जाप करना चाहिए।

  • वास्तु शास्त्र : जरूर करें वास्तु नियमों का पालन नये घर के निर्माण में, कभी नहीं होगी धन हानि

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    नये भवन, मकान का निर्माण करते समय या प्लाट खरीदते समय वास्तु के नियमों का पालन जरूर करना चाहिए। कहा जाता है कि वास्तु सकारात्मक होने पर सुख-समृद्धि और शांति रहती है। वहीं वास्तु दोष होने से जीवन में कई प्रकार की परेशानियां और बाधाएं बनी रहती हैं। आइए जानते है मकान का वास्तु कैसा होना फलदायक माना जाता है।

    वास्तु मुताबिक घर का मुख्य दरवाजा – पूर्व या उत्तर दिशा
    भवन का नक्शा बनवाते समय सर्वप्रथम मुख्य द्वार निर्धारित किया जाता है। ज्योतिष के मुताबिक पूर्व या उत्तर दिशा मुख्य द्वार के लिए श्रेष्ठ होती है। सूर्योदय की दिशा होने की वजह से इस तरफ से सकारात्मक व ऊर्जा से भरी किरणें हमारे घर में प्रवेश करती हैं। घर के मालिक की लंबी उम्र और संतान सुख के लिए घर के मुख्य दरवाजे और खिड़की सिर्फ पूर्व या उत्तर दिशा में होना शुभ माना जाता है।

     

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    वास्तु मुताबिक घर की रसोई- दक्षिण-पूर्वी
    रसोईघर के लिए सबसे शुभ स्थान आग्नेय कोण यानी दक्षिण-पूर्वी दिशा है। इस दिशा में रसोईघर का स्थान होने से परिवार के सदस्यों सेहत अच्छी रहती है। यह ‘अग्नि’ की दिशा है इसलिए इसे आग्नेय दिशा भी कहते हैं। इस दिशा में गैस, बॉयलर, इन्वर्टर आदि होना चाहिए। इस दिशा में खुलापन अर्थात खिड़की, दरवाजे बिल्कुल ही नहीं होना चाहिए। इससे अलावा उत्तर-पश्चिम दिशा में भी रसोई घर का निर्माण सही है।

    वास्तु मुताबिक घर का पूजाघर- उत्तर-पूर्व
    घर में पूजा का स्थान सबसे खास होता है। वास्तु के अनुसार देवी-देवताओं के लिए उत्तर-पूर्व की दिशा श्रेष्ठ मानी जाती है। इस दिशा में पूजाघर स्थापित करें। पूजाघर से सटा हुआ या ऊपर या नीचे की मंजिल पर शौचालय या रसोईघर नहीं होना चाहिए। ‘ईशान दिशा’ के नाम से जानी जाने वाली यह दिशा ‘जल’ की दिशा होती है। इस दिशा में बोरिंग, स्वीमिंग पूल, पूजास्थल आदि होना चाहिए। घर के मुख्य द्वार का इस दिशा में होना वास्तु की दृष्टि से बहुत शुभ माना जाता है।

     

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    वास्तु अनुसार शौचालय की दिशा
    शौचालय भवन के नैऋत्य यानि पश्चिम-दक्षिण कोण में या फिर नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य में होना शुभ माना जाता है।

    वास्तु अनुसार स्टडी रूम की दिशा
    वास्तु में पूर्व, उत्तर, ईशान तथा पश्चिम के मध्य में अध्ययन कक्ष बनाना शुभ होता है। पढ़ाई करते समय दक्षिण तथा पश्चिम की दीवार से सटकर पूर्व तथा उत्तर की ओर मुख करके बैठना चाहिए।

     

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    वास्तु मुताबिक शयनकक्ष की दिशा
    शयनकक्ष के लिए मकान की दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) या उत्तर-पश्चिम (वायव्य) में होना चाहिए। शयनकक्ष में बेड के सामने आईना और दरवाजे के सामने पलंग न लगाएं। बिस्तर पर सोते समय पैर दक्षिण और पूर्व दिशा में नहीं होना चाहिए। उत्तर दिशा की ओर पैर करके सोने से स्वास्थ्य लाभ तथा आर्थिक लाभ की संभावना रहती है।

    वास्तु मुताबिक अतिथि कक्ष- उत्तर-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा
    मेहमानों के लिए अतिथि कक्ष उत्तर-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में होना चाहिए। वास्तु शास्त्रों के अनुसार इस दिशा में अतिथि कक्ष होना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतिथि कक्ष को भी दक्षिण-पश्चिम दिशा में नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि इससे घर में नकारात्मता बढ़ती है।

     

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