Category: religious

  • DIWALI 2019 : जानिए क्यों होती हैं लक्ष्मीजी की पूजा दिवाली पर, इन चीजों का लगाएं भोग

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    हिंदुओं का प्रमुख त्योहार दिवाली पर्व को भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस बार दिवाली रविवार (27 अक्टूबर) को है और आप सभी जानते ही हैं कि दीपावली के दिन मां लक्ष्मी और गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। दिवाली के दिन देवी लक्ष्मी की साल की सबसे बड़ी पूजा होती है। लेकिन क्या आप जानते है कि दिवाली पर लक्ष्मीजी की पूजा क्यों की जाती है।

    दरअसल, मान्यता है कि प्राचीन काल में देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इस मंथन में ही कार्तिक मास की अमावस्या तिथि पर देवी लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसके बाद भगवान विष्णु ने लक्ष्मी का वरण किया था। इसलिए हर साल कार्तिक अमावस्या पर लक्ष्मी पूजन किया जाता है। समुद्र मंथन से देवताओं के वैद्य भगवान धनवंतरि भी प्रकट हुए थे। इनकी पूजा धनतेरस पर की जाती है।

    कहते हैं यह पूजा हर घर में बड़े ही विधि और विधान से की जाती है और साथ ही ऐसा कहा जाता है कि दिवाली पर देवी लक्ष्मी का पूजन करने से साल भर घर में धन की कमी नहीं होती। वहीं दिवाली के दिन मां लक्ष्मी को उनका मनपसंद प्रसाद लगाने से बहुत लाभ मिलता है। इस दिन देवी लक्ष्मी को प्रसाद में क्या-क्या चढ़ाना चाहिए आइए जानते हैं।

    सिंगाड़ा…
    कहा जाता है लक्ष्मी मां को पानी से बहुत प्रेम है इस वजह से पानी में उगने वाले फल-फूल उन्हें खूब पसंद आते हैं। वहीं आप सभी ने तस्वीरों पर देखा भी होगा कि देवी लक्ष्मी पानी में उगने वाले फूल कमल पर विराजमान रहती हैं। वहीं कहा जाता है कि उन्हें पानी में उगने वाला सिंगाड़ा बहुत प्रिय है इस वजह से उन्हें दिवाली पर यह फल प्रसाद के रूप में चढ़ा दें।

    चीनी के खिलौने…

    कहते हैं देवी मां को चीनी के खिलौने और बताशे खूब पसंद हैं और ऐसा भी माना जाता है कि ये दोनों ही चीजें चंद्रमा को भी प्रिय हैं इस कारण से दिवाली पर चीनी के खिलौने, लड्डू गुड़ से बनी चीजें, बताशे लक्ष्मी माता को चढ़ाएं जाते हैं।

    नारियल…
    कहा जाता है नारियल देवी लक्ष्मी का बहुत ही प्रिय फल है और अगर आप दिवाली पर नारियल को प्रसाद के रूप में देवी लक्ष्मी पर चढ़ाते हैं तो देवी लक्ष्मी आप से प्रसन्न हो सकती हैं।

    पान..
    कहते हैं दिवाली की पूजा में पान का भी बहुत महत्व है और पूजा में पान भगवान को अर्पित करने से लाभ होता है। वहीं दिवाली पूजा में खास तौर पर मीठा पान मां लक्ष्मी को चढ़ाया जाता है।

    मखाने…

    कहते हैं देवी लक्ष्मी को प्रसाद में मखाने का भोग लगाना भी बहुत फलदायक होता है। प्रसाद में मखाने को आप शुद्ध घी में भून कर चढ़ा सकते हैं।

  • दिवाली पर होता है शुभ बिल्ली का दिखना, जानिए होता है क्या ये जानवर दिखने पर…

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    दिवाली का त्योहार पूरे देश में धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस बार दिवाली रविवार (27 अक्टूबर) को है और आप सभी जानते ही हैं कि दीपावली के दिन मां लक्ष्मी और गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। दिवाली के दिन देवी लक्ष्मी की साल की सबसे बड़ी पूजा होती है। शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी को धन की देवी और गणेश को बुद्धि का दाता माना गया है।

    दिवाली पर इस बार कुछ खास योग बन रहा है। दिवाली के दिन लोग पूजा-पाठ में व्यस्त रहते हैं। सभी अपने घर में माता लक्ष्मी और गणपति की स्थापना करने में लगे रहते हैं। पूजा पाठ करने के बाद घर में दिये जलाए जाते हैं।

    लेकिन क्या आप जानते है कि इस अमावस्या की काली रात में कुछ खास जानवरों को देखने से लाभ भी होता है। ज्योतिषों के अनुसार, यदि ऐसे जानवरों के दर्शन हो जाएं तो धन की प्राप्ति होती है।

    आमतौर पर छछूंदर को अशुभ माना जाता है। इसके शरीर से अलग तरह की बदबू निकलती है। पर यह दिवाली की काली रात में शुभ हो जाता है। यदि इस रात यह आपके घर में प्रवेश कर जाए तो समझिए किस्मत बदल गया। हिन्दू धर्म के अनुसार घरों मे अमावस्या की रात छछूंदर का दिखना शुभ माना गया है।

    छिपकली तो ऐसे अमूमन रोज घर की दीवारों पर दिखती है। लेकिन दिवाली की रात में दिख जाए तो आपके भाग्य खुल जाएंगे। आपकों विशेष धन की प्राप्ति हो सकती है। ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।

    उल्लू ऐसा प्राणी है जो रात में ही निकलता है। क्योंकि इसे दिन में दिखाई नहीं देती। आप सभी जानते हैं कि नवरात्रि में उल्लू का दिखना शुभ संकेत माना जाता है। कुछ इसी तरह की मान्यता दिवाली की रात को भी है। यदि आपको उल्लू नजर आ जाए तो समझिए कि आपके घर में लक्ष्मी मां धन बरसने वाली है। आपको बता दें कि उल्लू को माता लक्ष्मी की सवारी कहा गया है।

     

    ऐसा कहा जाता है कि अगर कहीं जाने से पहले बिल्ली रास्ता काट दे तो अनहोनी की शंका रहती है। कई लोग तो बिल्ली द्वारा रास्ता काट देने पर अपनी यात्रा तक स्थगित कर देते हैं। लेकिन अमावस्या की रात बिल्ली को दिखना शुभ माना गया है। ऐसी मान्यताएं हैं कि यदि बिल्ली घर में घुसकर रखा हुआ दूध पी ले तो कुछ शुभ होने वाला है।

  • DIWALI PUJA 2019 : ये शुभ संयोग बन रहा इस दिवाली पर, ऐसे करें मां लक्ष्मी की पूजा

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    दीपावली का त्योहार हिंदुओं के लिए बहुत ही मुख्य त्योहार होता है। इस बार दीपावली का पर्व 27 अक्‍टूबर को मनाया जाएगा। प्रति वर्ष दिवाली का पर्व अमावस्या के दिन पड़ता है।

    हिन्दू पंचाग के अनुसार दीपावली पर इस बार शुभ संयोग बन रहा है। कई वर्षों के बाद इस बार दीपावली में दो अमावस्‍या पड़ रही हैं। ज्योतिषों के मुताबिक, ऐसा होने पर मां लक्ष्‍मी की असीम कृपा बरसती है। घर में धन-धान्‍य आने के अलावा पति की उम्र भी बंढती है।

    27 अक्टूबर को अमावस्या तिथि 11.30 बजे से ही प्रारम्भ हो जाएगी, जो कि अलगे दिन सुबह 9.23 बजे तक रहेगी। आयुष्यमान और सौभाग्य योग रहेगा। ऐसे में दीपावली, चतुर्दशी तिथि से लगी हुई अमावस्या को मनाई जाएगी। इस कारण उदया तिथि के अनुसार दीपावली का त्योहार नहीं मनाया जाएगा। दीपावली के दूसरे दिन यानि की सोमवार को उदया तिथि होगी जो कि अमावस्या पड़ने की वजह से महत्वपूर्ण है।

    दिवाली की पूजा विधि…
    – दिवाली पूजन में सबसे पहले श्री गणेश का ध्यान करें।
    – इसके बाद देवी लक्ष्मी का पूजन शुरू करें। मां लक्ष्मी की प्रतिमा को पूजा स्थान पर रखें।
    – मूर्ति में मां लक्ष्मी का आवाहन करें।
    – हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करें कि वे आपके घर आएं।
    – इत्र अर्पित कर कुमकुम का तिलक लगाएं।
    – अब धूप व दीप जलाएं और माता के पैरों में गुलाब के फूल अर्पित करें।
    – इसके बाद बेल पत्थर और उसके पत्ते भी उनके पैरों के पास रखें।
    – 11 या 21 चावल अर्पित कर आरती करें।
    – आरती के बाद उन्हें भोग लगाएं।

  • प्रकाश व खुशियों की दीपमाला का पावन पर्व दीपावली

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    दीपक कुमार त्यागी

    सनातन धर्म व हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार हम सभी के जीवन में त्यौहारों का विशेष महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ तक कि अगर हम भारत को त्यौहारों की अद्भुत संस्कृति के महाकुंभ की संपन्न विशाल नगरी कहें तो यह कहना भी गलत नहीं होगा। हमारे प्यारे देश में वर्ष भर आयेदिन कोई न कोई पर्व या उत्सव लगातार चलते ही रहते है। हालांकि कुछ उत्सव केवल देश के किसी अंचल मात्र में मनाए जाते हैं तो कुछ उत्सव सम्पूर्ण देश में अलग-अलग नाम व ढंग से मनाये जाते हैं। भारत में शायद ही कोई माह या ॠतु होगी जिसमें हम लोग कोई त्यौहार ना मनाये। यही हमारे भारत की संस्कृति का गौरवशाली इतिहास व आज रहा है। हम भारतीयों के अनुसार पर्व हमारे जीवन में नया उत्साह संचार करने के महत्वपूर्ण आवश्यक कारक होते हैं। जिनकी स्वीकार्यता व महत्ता देश में सर्वव्यापी है। पर्व हमारी जिंदगी में आपसी भाईचारा, प्यार-मौहब्बत, ख़ुशी और हर्षोल्लास का एक अद्भुत नया पुट लाते हैं।

    वैसे तो हम भारतीय अपनी मान्यताओं व परम्पराओं के अनुसार रोज ईश्वर की आराधना करते हैं, लेकिन प्रभु की अर्चना के सभी उत्सवों में दीपावली का अपना एक प्रमुख स्थान है। हमारे देश में जितने भी त्यौहार हैं, उनमें दीपावली सर्वाधिक आम से लेकर खास तक सभी के बीच में बहुत लोकप्रिय है। यह त्यौहार जन-जन के मन में हर्ष-उल्लास पैदा करने वाला पर्व है। हमारे यहां प्रार्थना है कि- ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय:’ अर्थात अंधकार से प्रकाश में ले जाने वाला, दीपावली वही पावन त्यौहार है जो हमकों जीवन में एक नई राह दिखाता है। दीपावली के पावन पर्व पर हमारे देश में माँ लक्ष्मी, भगवान गणेश, माँ काली, भगवान श्रीराम आदि की विशेष पूजा का प्रावधान है।

    लेकिन अधिकांश लोग माता लक्ष्मी व भगवान गणेश की विशेष पूजा जरूर करते हैं। वैसे भी अधिकांश लोगों का मानना हैं कि आज के व्यवसायिक समय में माता लक्ष्मी की कृपा के अभाव में किसी भी भौतिक अथवा सांसारिक कार्य का होना असंभव हो गया है, इसलिए इनकों हमेशा प्रसंन्न रखना है। दीपावली पर हम उस कृपालु परम पिता परमेश्वर की विशेष आराधना करते है। उसके बाद दीपक व विभिन्न प्रकार की आधुनिक व प्राचीन दीपमालाओं की झिलमिलाती मनमोहक रोशनी को देखकर अपने जीवन को सकारात्मक उर्जा से भर लेते हैं। बच्चे, बड़े व बुजुर्ग सभी इस त्यौहार पर जमकर पटाखे चलाकर खुशियाँ मनाते हैं।

    जीवन में इन ढ़ेरों खुशियों की जगमग-जगमग करती दीपमाला को लाने का पावन पर्व ही दीपावली है। दीपावली का पर्व हर वर्ष शरद ऋतू की शुरुआत में आता है। यह पावन त्यौहार भारतीय संस्कृति का प्रमुख पर्व है और इसको प्रतिवर्ष पवित्र कार्तिक मास की अमावस्या को बहुत ही जोशोखरोश के साथ देश व विदेशों तक में मनाया जाता है। दीपावली सनातन धर्म की गौरवशाली परम्पराओं के अनुसार हिंदुओं का सबसे पवित्र और सबसे बड़ा पावन पर्व माना जाता है। हमारी धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार दीपावली मनाने की कई कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन दीपावली के दिन लंका युद्ध में रावण का वध करके, भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या नगरी वापस आए थे, तब अयोध्या के सभी वासियों ने भगवान श्री राम के वापस आने की खुशी में अयोध्या को साफ-सुथरा करके दीपों से, फूलो से, जगह-जगह रंगोली बनाकर, पूरी अयोध्या नगरी को दुल्हन की तरह सज़ा दिया था। तब से लेकर आज तक दीपावली मनाने की यह पावन गौरवशाली परम्परा लगातार चली आ रही है। इस दिन हम सभी कार्तिक मास की अमावस्या के गहन अन्धकार को दूर करने के लिए दीपों को प्रज्वलित करके अपने घर-आंगन, गांव-शहर ओर हर जगह को टिमटिमाती जगमग-जगमग करने वाली दीपावली के दियों की रोशनी से जगमगा देते हैं।

    जो इस त्यौहार की अनोखी छटा को चार चाँद लगा देता है। इस पर्व पर आजकल हम लोग माता लक्ष्मी-गणेश पूजन करने के बाद, अपने मित्रों, पड़ौसियों व नातेदारों के यहाँ जाकर मिठाई उपहार आदि देते हैं। इस त्यौहार में ऐसी शक्ति है कि वह हम लोगों में आपसी प्यार सौहार्द के साथ परिवार की तरह रहने के लिए प्रेरित करता है तथा यह त्यौहार हम सभी के जीवन में एक नई उर्जा का संचार कर देता है। इस त्यौहार को हम लोग दीपावली या आम-बोलचाल की भाषा में दीवाली के नाम से भी पुकारते हैं। दीपावली हम सभी के जीवन में खुशियों के नये रंग भरने वाला बहुत ही शानदार त्यौहार है। जो देश व समाज में हर तरफ प्रकाश की नवज्योति फैलाते हुए लोगों के जीवन को हर्षोल्लास, आनंद से परिपूर्ण कर देता है।

    किसी भी सनातन धर्म व भारतीय संस्कृति को मानने वाले व्यक्ति के जीवन में दीपावली का बहुत बड़ा महत्व होता हैं। शास्त्रों के अनुसार यह त्यौहार व्यक्ति के जीवन को ‘अंधेरे से ज्योति’ अर्थात प्रकाश की ओर लेकर जाता है। इस त्यौहार पर प्रत्येक सनातनी मनुष्य अपने जीवन के गम के अंधेरों को भुलाकर, जीवन को एक नये उजाले की ओर ले जाने का ठोस प्रयास करता है। मेरा मानना हैं कि आज के भागदौड़ भरे आपाधापी वाले व्यवसायिक दौर में सही में दीपावली वह है जब व्यक्ति अपने मन के अंधेरों को प्रण लेकर स्थाई रूप से खत्म करके, जीवन में प्रकाशमयी सकारात्मक उर्जा के साथ लोगों के साथ मिलजुलकर प्यार मोहब्बत से जीवन लीला का भरपूर आनंद ले। तब ही जीवन में प्रकाश व खुशियों की दीपमाला को झिलमिलाने वाले पावन पर्व दीपावली के त्यौहार का असली उद्देश्य पूर्ण होता है।

  • DHANTERAS 2019: आपको मिलेगा ये लाभ धनतेरस पर इन वस्तुओं की खरीददारी करने से

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    दिवाली से दो दिन पहले धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। यह कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान अमृत का कलश लेकर देवताओं के वैद्य धनवंतरि प्रकट हुए थे। स्वास्थ्य रक्षा और आरोग्य के लिए इस दिन धनवंतरि देव की पूजा की जाती है। इस दिन को कुबेर का दिन भी माना जाता है और धन सम्पन्नता के लिए कुबेर की पूजा की जाती है। इस दिन लोग मूल्यवान वस्तु, सोने, चांदी और नए बर्तनों-आभूषणों का खरीददारी करते हैं। उन्हीं बर्तनों तथा मूर्तियों आदि से दीपावली की मुख्य पूजा की जाती है। आज पूरे देश में धनतेरस पर्व मनाया जा रहा है।
    इस दिन इन वस्तुओं की करें खरीददारी-


    – गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां दोनों अलग-अलग होनी चाहिए।

    • धातु का बर्तन, पानी का बर्तन हो तो ज्यादा ही मंगलकारी होगा।

    • खील-बताशे और मिटटी के दीपक, एक बड़ा दीपक भी अवश्य खरीदें।

    • चाहें तो अंकों का बना हुआ धन का कोई यंत्र भी खरीद सकते हैं।

    • इनकी पूजा धनतेरस के दिन कर सकते हैं।

    धनतेरस पर किस मनोकामना की पूर्ति के लिए क्या खरीदें?
    – आर्थिक लाभ के लिए पानी का बर्तन आवयश्यक खरीदें।

    • कारोबार में विस्तार और उन्नति के लिए धातु का दीपक बनाया गया है।

    • संतान सम्बन्धी समस्या के लिए थाली या कटोरी बनाई गई है।

    • स्वास्थ्य और आयु के लिए धातु की घंटी
      खरीदें।

    • घर में सुख शांति और प्रेम के लिए खाना पकाने का बर्तन खरीदें।

    इस प्रकार करें धनतेरस के दिन पूजा …


    – संध्याकाल में उत्तर की ओर कुबेर और धनवंतरि की स्थापना करें।

    • दोनों के सामने एक एक मुख का घी का दीपक जलाएं।

    • कुबेर को सफेद मिठाई और धनवंतरि को पीली मिठाई अर्पित करें।

    • पहले “ॐ ह्रीं कुबेराय नमः” का जाप करें।

    • फिर “धन्वन्तरि स्तोत्र” का पाठ अवश्य करें।

    • इसके बाद प्रसाद ग्रहण करें।

    • पूजा के बाद दीपावली पर कुबेर को धन स्थान पर और धन्वन्तरि को पूजा स्थान पर स्थापित करें।

  • DIWALI PUJA 2019 : ये शुभ संयोग बन रहा इस दिवाली पर , मां लक्ष्मी की ऐसे करें पूजा

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    दीपावली का त्योहार हिंदुओं के लिए बहुत ही मुख्य त्योहार होता है। प्रति वर्ष दिवाली का पर्व अमावस्या के दिन पड़ता है। हिन्दू पंचाग के अनुसार दीपावली पर इस बार शुभ संयोग बन रहा है। कई वर्षों के बाद इस बार दीपावली में दो अमावस्‍या पड़ रही हैं। ज्योतिषों के मुताबिक, ऐसा होने पर मां लक्ष्‍मी की असीम कृपा बरसती है। घर में धन-धान्‍य आने के अलावा पति की उम्र भी बंढती है।

    27 अक्टूबर को अमावस्या तिथि 11.30 बजे से ही प्रारम्भ हो जाएगी, जो कि अगले दिन सुबह 9.23 बजे तक रहेगी। आयुष्यमान और सौभाग्य योग रहेगा। ऐसे में दीपावली, चतुर्दशी तिथि से लगी हुई अमावस्या को मनाई जाएगी। इस कारण उदया तिथि के अनुसार दीपावली का त्योहार नहीं मनाया जाएगा। दीपावली के दूसरे दिन यानि की सोमवार को उदया तिथि होगी जो कि अमावस्या पड़ने की वजह से महत्वपूर्ण है।

    दिवाली की पूजा विधि…
    – दिवाली पूजन में सबसे पहले श्री गणेश का ध्यान करें।
    – इसके बाद देवी लक्ष्मी का पूजन शुरू करें। मां लक्ष्मी की प्रतिमा को पूजा स्थान पर रखें।
    – मूर्ति में मां लक्ष्मी का आवाहन करें।
    – हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करें कि वे आपके घर आएं।
    – इत्र अर्पित कर कुमकुम का तिलक लगाएं।
    – अब धूप व दीप जलाएं और माता के पैरों में गुलाब के फूल अर्पित करें।
    – इसके बाद बेल पत्थर और उसके पत्ते भी उनके पैरों के पास रखें।
    – 11 या 21 चावल अर्पित कर आरती करें।
    – आरती के बाद उन्हें भोग लगाएं।

  • भैया दूज 2019: भाई दूज की कहानी है यमराज से जुडी, जानें शुभ मुहूर्तशुभ मुहूर्त भाई को टीका लगाने का

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    दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल द्वितिया को भैया दूज का पर्व मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने भाइयों को घर पर निमत्रण कर उन्‍हें तिलक लगाकर भोजन कराती हैं। वहीं, भैया दूज के दिन घर में रहने वाले भाई-बहन एकसाथ बैठकर खाना खाते हैं। इस तिथि से यमराज और द्वितिया तिथि का सम्बन्ध होने के कारण इसको यमद्वितिया भी कहा जाता है, इस दिन मृत्‍यु के देवता यम की पूजा का भी विधान है।

    कब है भैया दूज का पर्व
    गुरूड पुरानों के अनुसार कार्तिक शुक्‍ल पक्ष की द्वितीया को भैया दूज का त्‍योहार मनाया जाता है। दीपावली के दो दिन बाद भैया दूज आता है, इस बार भाई दूज का पर्व मंगलवार के दिन 29 अक्‍टूबर को है।

    भाई दूज का शुभ मुहूर्त
    भाई दूज तिथि का प्रारंभ: 29 अक्‍टूबर 2019 को सुबह 06 बजकर 13 मिनट से।
    भाई दूज का शुभ मुहूर्त : दोपहर 01 बजकर 11 मिनट से दोपहर 03 बजकर 23 मिनट तक रहेंगा।
    भाई दूज तिथि का समापन: 30 अक्‍टूबर 2019 को सुबह 03 बजकर 48 मिनट तक।

    भैया दूज का महत्‍व

    हिन्‍दू धर्म में भैया दूज का विशेष महत्‍व है। स्नेह, सौहार्द व प्रीति का प्रतीक है यम द्वितीया यानी भैया-दूज। इस दिन कार्तिक शुक्ल को यमराज अपने दिव्य स्वरूप में अपनी भगिनि यमुना से भेंट करने पहुंचते हैं। यमुना यमराज को मंगल तिलक कर स्वादिष्ट व्यंजनों का भोजन कराकर आशीर्वाद प्रदान करती है। इस दिन बहन-भाई साथ-साथ यमुना स्नान करें तो उनका स्नेह सूत्र अधिक सुदृढ़ होगा। इस बार भैया दूज 29 अक्टूबर, 2019 मंगलवार को मनाया जाएगा।

    रक्षाबंधन के बाद भैया दूज दूसरा ऐसा त्‍योहार है जिसे भाई-बहन बेहद उत्‍साह के साथ मनाते हैं। जहां, रक्षाबंधन में भाई अपनी बहन को सदैव उसकी रक्षा करने का वचन देते हैं वहीं भाई दूज के मौके पर बहन अपने भाई की लंबी आयु के लिए प्रार्थना करती है। कई जगहों पर इस दिन बहनें अपने भाइयों को तेल लगाकर उन्‍हें स्‍नान भी कराती हैं। यमुना नदी में स्‍नान कराना अत्‍यंत शुभ माना जाता है। यदि यमुना में स्‍नान संभव न हो तो भैया दूज के दिन भाई को अपनी बहन के घर नहाना चाहिए। अगर बहन विवाहित है तो उसे अपने भाई को आमंत्रित कर उसे घर पर बुलाकर यथा सामर्थ्‍य भोजन कराना चाहिए।

    जानिए क्‍यों मनाया जाता है भैया दूज?
    भाई दूज को लेकर एक लेकर एक पौराणिक मान्यता भी है। कहते हैं यह वही तिथि है जब यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने के लिए जाते हैं और उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए पूरा देश इस दिन को भाई दूज के रूप में मनाता है। इस दिन यम देवता के पूजन का खास महत्व है। इस दिन यमुना, चित्रगुप्‍त और यमदूतों की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। कथा के अनुसार सूर्य की संज्ञा नामक पत्नी से दो संतानें थी। पुत्र यमराज और पुत्री यमुना, संज्ञा सूर्य का तेज सहन नहीं कर पाईं, जिसके चलते उन्होंने अपनी छाया का निर्माण कर अपने पुत्र -पुत्री को उसे सौंपकर वहां से चली गई।

    छाया को यम और यमुना से कोई लगाव नहीं था, लेकिन भाई और बहन में बहुत प्रेम था। यमुना अपने भाई यमराज से उसके घर आने का निवेदन करती थी, लेकिन यमराज यमुना की बात को टाल जाते थे। एक बर कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने पहुंचे। यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को देखकर बेहद खुश हो गई। यमुना ने अपने भाई का स्वागत-सत्कार कर उन्हें भोजन करवाया.बहन के आदर सत्कार से खुश होकर यमदेव ने यमुना से कुछ मांगने को कहा तभी यमुना ने उनसे हर साल इस तिथि के दिन उनके घर आने का वरदान मांगा.ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन बहन से तिलक करवाता है उसे कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता।

    इस दिन को यम द्वितिया के नाम से भी जाना जाता है.वैसे तो देश भर की पवित्र नदियों में इस दिन भाई बहन स्नान के लिए पहुंचते हैं.लेकिन मथुरा वृन्दावन में यमुना स्नान का विशेष महत्व बताया जाता है.इस दिन भारी संख्या में लोग मथुरा पहुंचते है और अपने भाई बहन बहन की लंबी आयु के लिए देवी यमुना से प्रार्थना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भाई बहन इस दिन यमुना में स्नान करते हैं उनकी सभी मनोकामनाएं स्वयं यमदेव पूरी करते हैं।

  • महापर्व  Chath Puja 2019 : आइए जानते हैं कैसे हुई इसकी शुरुआत और क्‍या हैं पौराणिक कथाएं !

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    नई दिल्ली। महापर्व छठ पूजा इस साल 31 अक्टूबर से लेकर 3 नवबंर तक मनाई जाएगी। पूर्वी भारत में मनाए जाने वाले इस पर्व का मुख्य केंद्र बिहार रहा है लेकिन समय के साथ-साथ यह पर्व केवल पूरे देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मनाया जाने लगा है।

    हिंदी कैलेण्डर के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से सप्तमी तिथि तक इस महापर्व को मनाया जाता है। चार दिन तक चलने वाले इस त्योहार पर पूरा परिवार एक साथ इकट्ठा होता है और इसे धूमधाम से मनाता है।

    इस दिन बड़े बुजुर्ग से लेकर बच्चों तक नए कपड़े पहनते हैं। लोगों के बीच इस महापर्व का काफी उत्साह होता है. महापर्व छठ हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है।

    महापर्व छठ पूजा की कब शुरूआत हुई, इसको लेकर चार पौराणिक कथाएं हैं- आइए जानते हैं पहली कथा के बारे में जिसमें महापर्व छठ पूजा करने की बात कही गई है। फिर उसी दिन से छठ पूजा मनाने की शुरूआत हुई। पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि भगवान राम ने सबसे पहले छठ पूजा किया था।

    अयोध्या नगरी में दशरथ नाम के राजा थे। जिनकी कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा नाम की पत्नियां थी। भगवान राम के विवाह के बाद राजा दशरथ ने राम जी का राज्याभिषेक करने की इच्छा जताई. इस पर देव लोक में देवताओं को चिंता होने लगी कि राम को राज्य मिल जाएगा तो फिर रावण का वध असंभव हो जाएगा।

    देवताओं ने व्याकुल होकर देवी सरस्वती से उपाए करने की प्रार्थना की। देवी सरस्वती ने मन्थरा , जो कि रानी कैकयी की दासी थी, उसकी मती को फेर दिया। इसके बाद मन्थरा की सलाह पर रानी कैकयी कोपभवन में चली गई।

    राजा दशरथ जब रानी को कैकयी को मनाने आए तो उन्होंने वरदान मांगा कि भरत को राजा बनाया जाए और राम को 14 साल के लिए वनवास पर भेज दिया जाए। इसके बाद भगवान राम जी के साथ सीता और लक्ष्मण भी वनवास पर चले गए।

    मान्यता है कि भगवान राम सूर्यवंशी थे और इनके कुल देवता सूर्य भगवान थे. इसलिए भगवान राम और सीता जब वनवास खत्म होने और लंका से रावण वध करके अयोध्या वापस लौटे तो अपने कुलदेवता का आशीर्वाद पाने के लिए इन्होंने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया. सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसके बाद से आम जन भी सूर्यषष्ठी का पर्व हर साल मनाने लगे।

  • लोक आस्था का महापर्व Chhath Puja 2019 : जानिए नहाए खाए, सूर्य को अर्घ्य देने तक का शुभ मुहूर्त और महत्व

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    नई दिल्ली। Chhath Puja Date 2019 India: दीपावली के छठवें दिन से शुरू होने वाले सूर्य उपासना के महापर्व छठ पूजा की चर्चा इस वक्‍त काफी तेज है। चूंकि यह त्‍योहार पूरे परिवार के साथ धूमधाम से मनाया जाता है, इसलिए जो लोग नौकरी या व्‍यवसाय के सिलसिले में घर से दूर रहते हैं । वे अब छठ पूजा में घर जाने की तैयारी कर रहे हैं।

    छठ पर्व 2019 का इंतजार हर सुहागिन महिलाएं दिल थाम कर इंतजार कर रही हैं। ये पर्व दिवाली 2019 के ठीक बाद में आता है। ये पर्व उत्तर भारत में काफी धूमधाम के साथ मनाया जाता है. इस पर्व की रौनक ज्यादातर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पड़ोसी देश नेपाल में मनाया जाता है।

    ये पर्व 4 दिनों तक चलता है और इस बार ये पर्व 31 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा है, जो 3 नंबर तक चलेगा। इस पर्व को कार्तिक शुक्ल पक्ष की पष्ठी को मनाया जाता है, जिसकी शुरूआत छठ पर्व 2019 नहाए खाए से होती है और जितने दिन तक ये चलता है उतने दिनों तकछठ पर्व 2019 पूजा होती है।

    पर्व  की शुरूआत सुबह नहाए खाए से होगी। सभी महिलाएं सुबह नहाने के बाद इसका व्रत रखेंगी और पूजा की सामग्री के लिए अनाज को अच्छे से साफ करेंगी। फिर साफ किए हुए अनाज को धूप में सुखाएंगी। इन सभी विधी के दौरान साफ-सफाई का खासा ध्यान रखा जाता है ।

    इसके बाद व्रती महिलाएं एक बार फिर नहाएंगी और पूरे दिन में बस एक बार ही अनाज का सेवन करेंगी. इन दिनों में केवल व्रती महिलाएं ही नहीं बल्कि पूरा परिवार उसके साथ सात्विक अहार लेता है।

    साथ ही इन दिनों में व्रती महिलाए कच्चे चुल्हे पर बनी रोटी और लौकी की सब्जी चने की दाल मिला कर खाती हैं । पूजा खत्म करने के बाद सभी व्रती महिलाएं एक बार खा सकती हैं और अगले दिन खरना का प्रसाद ले सकती हैं.

    खरना छठ पूजा के अगले दिन को कहा जाता है. इस दिन व्रती महिलाएं नहाए खाए के बाद सुखाए गए अनाज को चक्की में पिसवाती हैं। इसे पिसवाने के दौरान खास बात यह है कि इस अनाज को मुंह पर पट्टी बांधकर पीसा जाता है, जिससे की यह पीसे हुए अनाज की पवित्रता बनी रहे।इस दिन गुड की खीर बनाई जाती है। साथ ही कच्चे चूल्हे पर रोटियां बनाई जाती हैं. फिर इस भोजन को छठ माइ की पूजा के बाद प्रसाद के तौर पर व्रती महिला खाती और ज्यादा से ज्यादा बंटवाती हैं।

    पूजा के तीसरे दिन यानी की 2 नवंबर को व्रती महिलाएं नहा धोकर डाला (बांस की डलिया) तैयार करती हैं. इस डाले में पांच तरह के फल, सब्जियां, गन्ना, चुकंदर, शकरकंद, मूली, गाजर, अदरक को पूजा के प्रसाद को तौर पर रखा जाता है ।

    इन सभी चीजों को मिला कर ही डाला तैयार किया जाता है. साथ ही दिन भर महिलाएं उस डाले और भी कई प्रकार की चीजें डालती रहती हैं और शाम होते ही किसी नदी और तालाब किनारे पहुंच जाती हैं ।

    जैसे ही सूर्य ढलता है महिलाएं डाले की सभी सामग्री को चढाती हैं और सूर्य की पहली पत्नी देवी अस्ताचल की आराधना करती हैं. सूर्य के ढलने के बाद सभी महिलाएं अपने घर आ जाती हैं और रात भर भजन कीर्तन करती हैं।अस्ताचल की पूजा का समय 17:35:42 बेज है। इस दौकान ढलते सूर्य को अर्ध्य देना काफी शुभ माना जाता है. इस दिन सभी महिलाएं बिना खाए पिए निर्जला व्रत रखती हैं।

    छठ पर्व के आखिरी दिन यानी 3 नवंबर को व्रती महिलाएं निकलते सूर्य को अर्ध्य देती हैं. इस दिन सूर्य उदय का समय होगा 06:34:11 बजे. इस दिन सूर्य की दूसरी पत्नी की पूजा की जाती हैं जो काफी फलदायी बताई जाती है। व्रत की आखिरी दिन महिलाएं 3 से 4 बजे की बीच उठती हैं और पूजा की तैयारियां शुरू कर देती हैं।

    इस दिन व्रती महिलाएं निकलते सूर्य को अर्ध्य देती हैं. फिर उसके आधे घंटे बाद पहले ही कमर तक की गहरे पानी में खड़ी हो जाती हैं और सूर्य की पहली किरण के निकलने का इंतजार करती हैं. फिर उगते सूर्य को अर्ध्य देते ही इस पर्व का समाप्न हो जाता है, जिसके बाद व्रती महिलाए प्रसाद खाकर अपना व्रत खोलती हैं, जिससे पारण या परना कहते हैं।

  • अगर कंगाली में बिताना पड़ेगा जीवन आपकी हथेली में भी है ये अशुभ निशान

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    ज्योतिष शास्त्र के अुनसार हथेली पर कुछ निशान शुभ होते है तो कुछ अशुभ। शुभ निशान होने पर व्यक्ति भाग्यशाली और धनवान बनता है और वहीं अशुभ निशान वाले लोग जीवन पर कंगाली में बीतता है।

    अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग थोड़े ही प्रयास में हर काम में सफल हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो तमाम प्रयास करने क बाद भी असफल रह जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र में इसका कारण बताया गया है। हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हथेली पर कुछ निशान शुभ होते है तो कुछ अशुभ। शुभ निशान होने पर जातक भाग्यशाली और धनवान बनता है। वहीं हथेली पर अशुभ निशान होने पर जातक का जीवन कंगाली में बीतता है। जानते हैं हथेली पर बने ऐसे ही कुछ अशुभ निशान।

    भाग्यरेखा
    जातक की हथेली पर भाग्यरेखा होना काफी मायने रखता है। अच्छी भाग्यरेखा बनने से जातक भाग्यशाली होता है जिससे उसके जीवन में धन-संपदा की कभी भी कमी नहीं होती। यदि किसी व्यक्ति की भाग्यरेखा कमजोर, टूटी-फूटी या अन्य कोई रेखा उसको काटते हुए जाए तो ऐसा जातक भाग्यहीन कहलाता है। उस जातक को हमेशा आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है।

    जातक के हथेली में सूर्य रेखा का नहीं होना
    हस्तरेखा ज्योतिष के मुताबिक सूर्य रेखा से जातक के मान-सम्मान में वृद्धि होती है। यदि किसी व्यक्ति की हथेली में सूर्य रेखा न बनी हो तो जातक को उचित मान-सम्मान प्राप्त नहीं होता है। मेहनत करने के बावजूद भी उसे सफलता नहीं मिलती।

    हथेली पर ज्यादा क्रास का निशान होना
    कुछ जातक की हथेली बिल्कुल स्पष्ट और साफ होती तो कुछ लोगों की हथेली में जरूरत से ज्यादा क्रास के निशान बने हुए होते हैं। जरूरत से ज्यादा क्रास के निशान होने से जातक की आर्थिक स्थिति सही नहीं रहती है।

    हथेली में पर्वत में उभार का नहीं होना
    अगर हथेली में यदि सभी पर्वतों में किसी भी प्रकार का कोई उभार नहीं हो तो जातक बहुत भाग्यहीन कहलाता है। उसका सारा जीवन सुख में व्यतीत होता है।