Category: religious

  • janmashtami 2019: जानिए जन्माष्टमी की पूजा का मुहूर्त

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    हिंदू पंचांग के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी या भगवान श्रीकृष्ण की जयंती भद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (आठवें दिन) को मनाई जाती है। भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का एक अवतार माना जाता है। अष्ठमी की रात 12 बजे भगवान का श्रीकृष्ण का संकेतिक रूप से जन्म होने पर व्रत का परायण किया जाता है। बहुत से लोग मथुरा जाकर भगवान श्रकृष्ण की जन्मभूमि का दर्शन करते हैं। यह हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। कहा जाता है कि इस दिन सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्‍णु ने श्रीकृष्‍ण के रूप में आठवां अवतार लिया था। ऐसा बी कहा जाता है कि कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के समय किए गए अनुष्ठान एकादशी व्रत के दौरान किए गए अनुष्ठानों के समान हैं।

    ये है मुहूर्त

    अष्टमी तिथि- 24 अगस्त की रात्रि 12:01 से 12:46 तक
    ऐसे रखें व्रत

    जन्‍माष्‍टमी के दिन सुबह स्‍नान करने के बाद भक्‍त व्रत का संकल्‍प लेते हुए अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्‍टमी तिथि के खत्‍म होने के बाद पारण यानी कि व्रत खोल सकते हैं। कृष्‍ण की पूजा आधी रात को की जाती है।

     

  • वास्तु के अनुसार कैसी होनी चाहिए घर की सीढ़ियां

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    वास्तु में घर के हर हिस्से के लिए कुछ नियम बताए गए हैं। जिनका पालन करने से घर में खुशियां और समृद्धि आती है। वास्तु में घर की सीढ़ियों के लिए कुछ नियम बताए गए हैं जिनका पालन जरूर करना चाहिए। वास्तुशास्त्र के नियम के अनुसार सीढ़ियों का निर्माण उत्तर से दक्षिण की ओर अथवा पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर करवाना चाहिए। जो लोग पूर्व दिशा की ओर से सीढ़ी बनवा रहे हों उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सीढ़ी पूर्व दिशा की दीवार से लगी हुई नहीं हो। 

    सीढ़ी के लिए नैऋत्य यानी दक्षिण पश्चिम दिशा उत्तम होती है। इस दिशा में सीढ़ी होने पर घर प्रगति ओर अग्रसर रहता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर पूर्व यानी ईशान कोण में सीढ़ियों का निर्माण नहीं करना चाहिए। इससे आर्थिक नुकसान, स्वास्थ्य की हानि, नौकरी एवं व्यवसाय में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस दिशा में सीढ़ी का होना अवनति का प्रतीक माना गया है। दक्षिण पूर्व में सीढ़ियों का होना भी वास्तु के अनुसार नुकसानदेय होता है। इससे बच्चों के स्वास्थ्य उतार-चढ़ाव बना रहता है।

    जो लोग खुद ग्राउंड फ्लोर पर रहते हैं और किरायेदारों को ऊपरी मंजिल पर रखते हैं उन्हें मुख्य द्वार के सामने सीढ़ियों का निर्माण नहीं करना चाहिए। वास्तु विज्ञान के अनुसार इससे किरायेदार दिनोंदिन उन्नति करते और मालिक की परेशानी बढ़ती रहती है।

    सीढ़ियों के वास्तुदोष को दूर करने के उपाय
    1.सीढ़ियों के आरंभ और अंत में द्वार बनवाएं।
    2.सीढ़ी के नीचे जूते-चप्पल एवं घर का बेकार सामान नहीं रखें।
    3.मिट्टी के बर्तन में बरसात का जल भरकर उसे मिट्टी के ढक्कन से ढंक दें। इसे सीढ़ी के नीचे मिट्टी में दबा दें।

  • शहादत को याद करने का दिन

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    विमल गुप्ता की रिपोर्ट 

    मोहर्रम मातम मनाने और धर्म की रक्षा करने वाले हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का दिन है ।मोहर्रम महीने में मुसलमान शोक मनाते हैं। और अपनी हर खुशी का त्याग कर देते हैं ।कब है ।मोहर्रम इस बार मोहर्रम का महीना 1 सितंबर से 28 सितंबर तक है ।लेकिन इस बार दसवां मोहर्रम कुछ खास है मान्यता है। कि इस महीने की 10 तारीख को इमाम हुसैन की शहादत हुई थी ।जिसके चलते इस दिन को रोज ए आशूरा कहते हैं ।मोहर्रम का सबसे अहम दिन माना गया है ।इस दिन जुलूस निकालकर हुसैन की शहादत को याद किया जाता है ।दसवे मोहर्रम पर रोजा रखने की भी परंपरा है ।

    मुहर्रम क्यों मनाया जाता है ,

    इस्लामी मान्यताओं के अनुसार इराक में अजीत नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था। यह जीत खुद को खलीफा मानता था लेकिन अल्लाह पर उसका कोई विश्वास नहीं था ।वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उनके खेमे में शामिल हो जाए लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था। उन्होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था पैगंबर इस्लाम हजरत मोहम्मद ने नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ सहित कर दिया गया था ।जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था। वह मोहर्रम का ही महीना माना जाता था ।

    विमल गुप्ता की रिपोर्ट उन्नाव

  • इन 5 बातों का रखें विशेष ध्यान पितृ पक्ष में श्राद्ध करते समय

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    Pitru Paksha Shradh 2019 Rules: इस वर्ष पितृ पक्ष श्राद्ध 13 सितंबर दिन शुक्रवार से प्रारंभ हो रहा है, जो 28 सितंबर तक चलेगा। इन दिनों में पितरों को पिंडदान करते हैं, जिससे वे तृप्त होते हैं। इससे परिवार में सुख, समृद्धि और शांति आती है। पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म के भी नियम होते हैं, जिसका पालन करना आवश्यक माना गया है। इन नियमों से श्राद्ध कर्म को पूरा करने से पितर तृप्त होते हैं।

    तर्पण और श्राद्ध/Pind Daan Or Shradh

    अपने पितरों को तृप्त करने की क्रिया तथा देवताओं, ऋषियों या पितरों को काले तिल मिश्रित जल अर्पित करने की प्रक्रिया को तर्पण कहा जाता है। पितरों को तृप्त करने के लिए श्रद्धा पूर्वक जो प्रिय भोजन उनको दिया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है।

    श्राद्ध के नियम /Rules of Shradh

    पितरों के श्राद्ध के लिए कुछ नियम हैं, जिनका अनुसरण करना जरूरी है। आइए जानते हैं उन नियमों के बारे में —

    1. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितर लोक दक्षिण दिशा में होता है। इस वजह से पूरा श्राद्ध कर्म करते समय आपका मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।

    2. पितर की तिथि के दिन सुबह या शाम में श्राद्ध न करें, यह शास्त्रों में वर्जित है। श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर में करना चाहिए।

    3. पितरों को तर्पण करने के समय जल में काले तिल को .2जरूर मिला लें। शास्त्रों में इसका महत्व बताया गया है।

    4. श्राद्ध कर्म के पूर्व स्नान आदि से निवृत्त होकर व्यक्ति को सफेद वस्त्र धारण करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करें, मांस-मदिरा का सेवन न करें। मन को शांत रखें।

    5. पितरों को जो भी भोजन दें, उसके लिए केले के पत्ते या मिट्टी के बर्तन का इस्तेमाल करें।

    जो लोग इन नियमों का पालन करते हुए श्राद्ध कर्म को पूरा करते हैं, वे स्वर्ग के भागी बनते हैं।

  • विश्वकर्मा पूजा से होती है कारोबार, व्यवसाय में तरक्की

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    भगवान विश्वकर्मा को निर्माण और सृजन का देवता माना जाता है, उन्हें दुनिया का सबसे पहला इंजीनियर भी कहा जाता है। अगर इस दिन कारोबारी और व्यवसायी लोग भगवान विश्वकर्मा की पूजा करें तो तरक्की मिलती है।

    स्तुकला के आचार्य भगवान विश्वकर्मा वास्तुदेव तथा माता अंगिरसी के पुत्र हैं। भारत के कुछ भाग में यह मान्यता है कि अश्विन मास की प्रतिपदा को विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ था, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि लगभग सभी मान्यताओं के अनुसार यही एक ऐसा पूजन है जो सूर्य केपारगमन के आधार पर तय होता है। इस लिए प्रत्येक वर्ष यह 17 सितम्बर को मनाया जाता है।

    भगवान विश्वकर्मा की पूजा हर व्यक्ति को करनी चाहिए। सहज भाषा में कहा जाए कि सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी कर्म सृजनात्मक है, जिन कर्मों से जीव का जीवन संचालित होता है। उन सभी के मूल में विश्वकर्मा हैं। अत: उनका पूजन जहां प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक ऊर्जा देता है वहीं कार्य में आने वाली सभी अड़चनों को खत्म करता है।

    स्वर्गलोक और सोने की लंका का किया निर्माण : भगवान विश्वकर्मा को देव शिल्पी कहा जाता है। उन्होंने सतयुग में स्वर्गलोक, त्रेतायुग में सोने की लंका, द्वापर में द्वारिका और कलियुग में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की विशाल मूर्तियों का निर्माण करने के साथ ही यमपुरी, वरुणपुरी, पांडवपुरी, कुबेरपुरी, शिवमंडलपुरी तथा सुदामापुरी आदि का निर्माण किया। ऋगवेद में इनके महत्व का वर्णन 11 ऋचाएं लिखकर किया गया है।

    विधि-विधान से करें पूजा, कारोबार में होगा इजाफा : 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती पर शुभ मुहूर्त में किया गया पूजन कारोबार में इजाफा करने के साथ ही आपको धनवान भी बना सकता है। भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधि-विधान से करने पर विशेष फल प्रदान करती है। सबसे पहले पूजा के लिए जरूरी सामग्री जैसे अक्षत, फूल, चंदन, धूप, अगरबत्ती, दही, रोली, सुपारी, रक्षा सूत्र, मिठाई, फल आदि की व्यवस्था कर लें। इसके बाद फैक्टरी, वर्कशॉप, ऑफिस, दुकान आदि के स्वामी को स्नान करके सपत्नीक पूजा के आसन पर बैठना चाहिए। इसके बाद कलश को स्थापित करें और फिर विधि-विधान से क्रमानुसार पूजा करें।

    विश्वकर्मा भगवान का परिचय

    स्कंद पुराण के अंतर्गत विश्वकर्मा भगवान का परिचय ‘बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी। प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च। विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति’ श्लोक के जरिए मिलता है। इस श्लोक का अर्थ है महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मविद्या की जानकार थीं। उनका विवाह आठवें वसु महर्षि प्रभास के साथ संपन्न हुआ था। विश्वकर्मा इन दोनों की ही संतान थे। विश्वकर्मा भगवान को सभी शिल्पकारों और रचनाकारों का भी ईष्ट देव माना जाता है।

  • नवरात्रि 2019: जाने किस दिन करे नवदेवी घटस्थापना

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    शारदीय नवरात्रि 2019 का आगमन आज से ठीक नौंवे दिन होने जा रहा है। शक्ति पूजा के नौ रूपों को समर्पित यह नौ दिवसीय पर्व 29 सितंबर से शुरू होजा जो 07 अक्टूबर 2019 तक चलेगा। 29 सितंबर को नवरात्रि का पहला दिन होगा। इस दिन घटस्थापना/कलश स्थापना और पंडालों में सजने वाली मां दुर्गा की मूर्तियों की स्थापना होगी। इस बार लोगों को कलश स्थापना को लिए पर्याप्त समय मिलेगा क्योंकि प्रतिपदा तिथि 29 सितंबर को रात्रि 10 बजे तक है। ऐसे में लोग 29 सितंबर की सुबह से लेकर देर शाम तक आराम से कलश स्थापना कर सकेंगे।

     

  • अजन्‍मी बेटियों के श्राद्ध की अनूठी पहल

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    धर्म नगरी काशी में सोमवार को पितृपक्ष की मातृनवमी तिथि पर गंगा तट पर अनोखा श्राद्ध किया गया। बाढ़ के पानी में डूबे दशाश्‍वमेध घाट के पास बजड़े पर बनी वेदी पर 5500 उन अजन्‍मी बेटियों के मोक्ष के लिए पिंडदान किया गया जिन्‍हें उन्‍हीं के माता-पिता ने जन्‍म लेने से पहले ही मार दिया।

    धार्मिक मान्‍यता है कि पितरों के श्राद्ध और सम्‍मान के पर्व पितृपक्ष के 16 दिनों में पितृगण अपने परिजनों के पास विविध रुपों में आते हैं और अपने लिए मोक्ष की कामना करते हैं। श्राद्ध करने के लिए देश के हर हिस्‍से से बड़ी संख्‍या में लोगों का बनारस आना जारी है। इसी क्रम में मातृनवमी पर कन्‍या भ्रूण हत्‍या रोकने के लिए लोगों को जागृत करने के मकसद से अजन्‍मी बेटियों के श्राद्ध की अनूठी पहल सामाजिक संस्‍था ‘आगमन’ ने की। यह संस्‍था कई साल से बनारस में ‘बेटी बचाओ’ अभियान के तहत कन्‍या भ्रूण हत्‍या रोकने के लिए जागरुकता फैलाने में जुटी है।

    विधि विधान से पूजन कर मोक्ष की कामना
    आचार्य दिनेश शंकर दूबे के साथ कर्मकांडी ब्राह्मण सीतराम पाठक, नितिन गोस्‍वामी, उमेश तिवारी व बजरंगी पांडेय ने 5500 पिंड निर्माण कर गंगा की मिट्टी से बनी पांच अलग-अलग वेदियों पर वैदिक मंत्रों से आह्वान कर अजन्‍मी बेटियों को प्रतीक स्‍वरूप स्‍थापित किया। पिंडों का विधि विधान से पूजन कर मोक्ष की कामना की गई। इसके बाद गंगा की धारा में पिंड विसर्जन और जल तर्पण के उपरान्‍त बाह्मण भोज के साथ श्राद्ध कर्म पूरा हुआ। यजमान की भूमिका ‘आगमन’ के संस्‍थापक सचिव डॉ. संतोष ओझा ने निभाई। इस अनूठे आयोजन के साक्षी समाज के अलग-अलग वर्ग के लोग बने जिन्‍होंने अजन्‍मी बेटियों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

    ‘गर्भपात है हत्‍या’
    अब तक 26 हजार बेटियों के श्राद्धकर्ता डॉ. संतोष ओझा का कहना है कि आमतौर पर गर्भपात को महज एक ऑपरेशन माना जाता है, लेकिन स्‍वार्थ में डूबे परिजन यह भूल जाते हैं कि भ्रूण में प्राण-वायु के संचार के बाद किया गया गर्भपात जीव हत्‍या है। संस्‍था का स्‍पष्‍ट विचार है कि अभागी बेटियों को जीने का अधिकार तो नहीं नहीं मिल सका लेकिन उन्‍हें मोक्ष तो मिलना ही चाहिए।

  • Navratri में भक्तों की आराधना से प्रसन्न हो माता देती हैं भाग्य बदलने का ये संकेत

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    नवरात्रि में मां के 9 स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवरात्रि में आप माता की विधिवत् पूजा-अर्चना करते हैं तो माता रानी आपको कुछ ऐसे संकेत देती है।

    जिससे यह जाना जा सकता है कि माता की कृपा आप के ऊपर हुई है या नहीं। आइए जानते हैं नवरात्रि के 9 दिनों में माता भक्तों की पूजा से प्रसन्न होकर क्या संकेत देती हैं।

    नवरात्रि के दिनों में यदि आपको सपने में कोई छोटी कन्या सिक्का दे तो यह आपके लिए शुभ संकेत हैं क्योंकि कन्याओं को साक्षात देवी दुर्गा का रूप माना जाता हैं।

    नवरात्रि के दिनों में यदि आपको उल्लू नवरात्रि के दिनों में दिखाई दे जाये तो समझिए कि माँ आपकी पूजा से प्रसन्न हुयी हैं और जल्द ही आपके घर धन-सम्पदा आने वाली हैं।

    नवरात्रि के दिनों में किसी कन्या का सपने में नजर आने का मतलब कि देवी की कृपा आपके ऊपर हैं और वो आपकी पूजा से प्रसन्न हुयी हैं।

    नवरात्रि के दिनों में यदि आपको एक जगह बैठा हुआ साँप नवरात्रि के दिनों में नजर आ जाए तो समझ ले की जल्द ही आपको धन लाभ होने वाला हैं।

    नवरात्रि के दिनों में सोलह श्रृंगार की हुयी महिला आपको रास्ते में कहीं जाते हुये नजर आ जाए तो समझ ले की आपके मुसीबतों के दिन अब खत्म वाले हैं और माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा आपके ऊपर होने वाली हैं।

    नवरात्रि के दिनों में नवरात्रि के दिनों में यदि सुबह-सुबह नारियल या फिर कमल का नजर आ जाए तो समझ लेना चाहिए कि आपके ऊपर देवी माँ की विशेष कृपा होने वाली हैं।

  • बारिश पर आस्था भारी, नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री के दर्शन

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    वाराणसी: वाराणसी में हो रही मूसलाधार बारिश के बीच भक्तों ने नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री का दर्शन किया। इस दौरान बारिश पर श्रद्धालुओं की आस्था भारी दिखी। नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री के दर्शन की मान्यता है। वाराणसी में इनका मंदिर अलइपुर क्षेत्र में वरुणा नदी के किनारे स्तिथ है। नवरात्री के पहले दिन मां शैलपुत्री के दर्शन के लिए 3 दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश ने भी भक्तो की खूब परीक्षा ली। लेकिन बारिश पर आस्था भारी रही। श्रद्धालु रेनकोट और छाता लेकर मंदिर पहुंचे। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर जय माता दी के उद्घोष से गूंज उठा।

    माना जाता है कि मां शैलपुत्री महान उत्साह वाली देवी और भय का नाश करने वाली है। इनकी आराधना से यश, कीर्ति, धन और विद्या कि प्राप्ति होती है और इनकी पूजा मात्र मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। मान्यतानुसार जगदम्बा मां शैलपुत्री स्वरुप मे पर्वत राज हिमालय के घर मे पुत्री रूप में अवतरित हुई थी और कालांतर मे जगदम्बा इसी स्वरुप मे पार्वती के नाम से देवाधिदेव भगवान शंकर की अर्धांगनी हुई।

  • SHARAD PURNIMA 2019 : क्या है शरद पूर्णिमा का महत्व, जानें क्यों खानी चाहिए इस दिन खीर

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    महारास की रात्रि शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को पड़ती है। शास्त्रों में इस पूर्णिमा को बेहद खास महत्व प्रदान किया गया है। इसी दिन से सर्दियों का आरम्भ माना जाता है। कहते हैं कि शरद पूर्णिमा का व्रत रखने से हर प्रकार की मनोकामना की पूर्ति हो जाती है।

    महारास की रात्रि शरद पूर्णिमा की महिमा का वर्णन प्राचीन धर्मग्रंथों में विभिन्न रूपों में किया गया है। साल भर की सभी पूर्णिमा में शरद पूर्णिमा ही सबसे चमकीला और देखने में आकर्षक लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 16 कलाओं से सुसज्जित होता है। वहीं दूसरी और इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ उदित होकर अमृत की वर्षा करते हैं। खीर बना कर शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखना चाहिए और सुबह भगवान को भोग लगाकर सभी को प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। इसके पीछे मान्यता है कि चांद से बरसा अमृत औषधि का काम करता है। इससे मानसिक और दमा जैसे रोग नष्ट हो जाते हैं।

    मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात में ही भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के संग रास रचाया था। इस कारण कई स्थानों पर इसे रास पूर्णिमा के नाम से भी पुकारा जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो लोग पूर्णिमा व्रत शुरू करना चाहते हैं उनके इसका संकल्प शरद पूर्णिमा के दिन लेना चाहिए। इसके अलावा शरद पूर्णिमा की रात में चांद की किरणें शरीर पर पड़ने से शारीरिक स्वस्थता बनी रहती है। अगर कोई आँखों की समस्या से परेशान है तो उसे शरद पूर्णिमा की चांद को खुली आँखों से देखना चाहिए। क्योंकि आयुर्वेद के जानकार ऐसा मानते हैं कि शरद पूर्णिमा की चाँद का दर्शन करने से आँखों के रोग खत्म हो जाते हैं साथ ही आँखों की रोशनी भी बढ़ती है।

    कैसे रखें व्रत…
    इस दिन संतान की कामना के लिए महिलाएं कोजागरी व्रत रखती हैं। शरद पूर्णिमा के व्रत में व्रती को अपने इष्ट देव का पूजन करना चाहिए। व्रत में पूरी सात्विकता बरतनी चाहिए। यानि व्रत में तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए।

    व्रत-पूजन में इन्द्र देव और माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। पूजन सामग्री में धूप, दीप, नैवेद्य (खीर) इत्यादि को शामिल करना अच्छा माना गया है। पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मण को यथा शक्ति दक्षिणा देनी चाहिए। लक्ष्मी जी का आशीर्वाद पाने के लिए इस पूर्णिमा पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। इसलिए व्रती को चाहिए कि पूर्णिमा की रात्रि में जागरण करे। व्रती को चन्द्र को अर्घ्य देने के बाद ही अन्न ग्रहण करना चाहिए।

    शरद पूर्णिमा मुहूर्त…
    पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 13 अक्टूबर की मध्यरात्रि 12 बजकर 36 मिनट से होगी। जबकि पूर्णिमा तिथि का समापन 14 अक्टूबर की सुबह 02 बजकर 38 मिनट पर होगा। इसके अलावा शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय का समय संध्या 05 बजकर 56 मिनट है।