श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हर साल पूरे देश में धूमधाम से मनाई जाती है. भगवान श्रीहरि विष्णु के सर्वकलामयि अवतार श्रीकृष्ण की जयंती आने वाली है. यशोदा-नन्द के लाला और देवकी-वसुदेव के पुत्र कन्हैया का जन्म रोहिणी नक्षत्र में भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को मध्य रात्रि वृष लग्न में हुआ था. यह संयोग इस बार 2 सितंबर को बन रहा है. इस दिन कृष्णोपासक दिनभर व्रत रखकर रात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं.
आइए जानते हैं, मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को कौन सी चीजेंअर्पित करनी चाहिए.
1 कृष्ण भगवान को गाय के दूध से भोग लगायें
पँचामृत से अभिषेक करें
प्यार सफल होगा
2 मक्खन का भोग लगायें
कच्ची लस्सी से अभिषेक करें
ऐश्वर्य साधन बढेंगे
3 कृष्ण भगवान को मिश्री का भोग लगायें
गन्ने के रस से अभिषेक करें
मनोकामनायें पूरी होगी
4 दूध में तुलसी डालकर भगवान को भोग लगायें
कच्चे दूध के साथ अभिषेक करें
रोग दूर होंगे
5 झूला झूलायें केसर की बर्फी से भगवान को भोग लगायें
गुलाब के शरबत से कृष्ण जी का अभिषेक करें
विवाह में आये विलम्ब दूर होंगे
6 कृष्ण जी को लडडू का भोग लगायें
गन्ने का रस से अभिषेक करायें
कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होंगे
7 मक्ख्नन का भोग लगायें
कच्ची लस्सी से अभिषेक करें
धन प्राप्त होने लगेगा
8 कृष्ण भगवान को गाय के दूध से भोग लगायें
पँचामृत से अभिषेक करें
दूश्मन दूर होंगे
9 बेसन की बर्फी से भोग लगायें
दूध से अभिषेक करें
मनमुटाव दूर होंगे
10 झूला झूलायें मक्खन से प्रभु को भोग लगायें
गँगा जल से अभिषेक करायें
अच्छी पढाई हो सकेगी
11 शुद्ध घी की मिठाई से भोग लगायें
पँचामृत से अभिषेक करें
मनोकामनायें पूरी होगी
12 बेसन की बर्फी से भोग लगायें
केसर युक्त दूध से अभिषेक करें
व्यापार में सफलता मिलेगी
खास उपाय
झूला झूलायें कृष्ण भगवान को चाँदी की बाँसुरी अर्पित करें
प्रेम में सफलता मिलेगी
व्यापार में लाभ के लिए
दो मोर पँख लें एक कृष्ण जी को अर्पित करें दूसरा मोर पँख उनके
मुकुट में लगाकर तिजोरी में रखें अपार धन प्राप्त होगा
नई दिल्ली । भारत के हर स्थान में छिपा है उसका एक अतीत जो अपनी कहानी बयां करता है। इन धार्मिक जगहों में छुपे ये राज लोगों को भगवान का अस्तित्व मानने पर मजबूर करते हैं। ऐसी ही जगहों में से एक है धार्मिक नगर वृंदावन में मौजूद निधिवन। ये स्थान बेहद पवित्र, धार्मिकऔर रहस्यमयी है। लेकिन आज हम आपको बताते हैं कि ऐसा कौन सा रहस्य है जो इस जगह को खास बनाता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि विदेशी पर्यटक भी इस जगह की ओर खिंचे चले आते हैं। मान्यता है कि निधिवन में आज भी हर रात कृष्ण गोपियों संग रास रचाते है। यही कारण है की सुबह खुलने वाले निधिवन को संध्या आरती के पश्चात बंद कर दिया जाता है। उसके बाद वहां कोई नहीं रहता है यहां तक कि निधिवन में दिन में रहने वाले पशु-पक्षी भी संध्या होते ही निधिवन को छोड़कर चले जाते है।
निधिवन के बारे में मान्यता
निधिवन के अंदर ही है ‘रंग महल’ जिसके बारे में मान्यता है की रोज रात यहां पर राधा और कन्हैया आकर रास रचाते हैं। रंग महल में राधा और कन्हैया के लिए रखे गए चंदन की पलंग को शाम सात बजे के पहले सजा दिया जाता है। पलंग के बगल में एक लोटा पानी, राधाजी के श्रृंगार का सामान और दातुन संग पान रख दिया जाता है।सुबह पांच बजे जब ‘रंग महल’ का पट खुलता है तो बिस्तर अस्त-व्यस्त, लोटे का पानी खाली, दातुन कुची हुई और पान खाया हुआ मिलता है। रंगमहल में भक्त केवल श्रृंगार का सामान ही चढ़ाते है और प्रसाद स्वरुप उन्हें भी श्रृंगार का सामान मिलता है।
वैसे तो शाम होते ही निधि वन बंद हो जाता है और सब लोग यहां से चले जाते है। लेकिन फिर भी यदि कोई छुपकर रासलीला देखने की कोशिश करता है तो वह अंधा, गूंगा, बहरा, पागल हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाता है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाता है।
जिसने की कोशिश उसका हुआ ये हाल
कुछ वर्ष पूर्व एक ऐसा ही वाक्या यहां हुआ था, जब जयपुर से आया एक कृष्ण भक्त रास लीला देखने के लिए निधिवन में छुपकर बैठ गया। जब सुबह निधि वन के गेट खुले तो वो बेहोश अवस्था में मिला, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका था। ऐसे अनेकों किस्से यहां के लोग बताते है। ऐसे ही एक अन्य व्यक्ति थे पागल बाबा जिनकी समाधि भी निधि वन में बनी हुई है। उनके बारे में भी कहा जाता है की उन्होंने भी एक बार निधि वन में छुपकर रास लीला देखने की कोशिश की थी। जिससे वो पागल हो गए थे। चूंकि वो कृष्ण के अनन्य भक्त थे इसलिए उनकी मृत्यु के पश्चात मंदिर कमेटी ने निधिवन में ही उनकी समाधि बनवा दी।
पेड़ों की खासियत
लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत होते हैं। यहां लगे तुलसी के पेड़ जोड़े में हैं। इसके पीछे यह मान्यता है कि जब राधा संग कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं।
नहीं ले जाता कोई एक भी टहनी
साथ ही एक अन्य मान्यता यह भी है की इस वन में लगी तुलसी की कोई भी एक डंडी नहीं ले जा सकता है। लोग बताते हैं कि जो लोग भी ले गए वो किसी न किसी आपदा का शिकार हो गए। इसलिए कोई भी इन्हें नहीं छूता। वन के आसपास बने मकानों में खिड़कियां नहीं हैं। यहां के निवासी बताते हैं कि शाम सात बजे के बाद कोई इस वन की तरफ नहीं देखता। जिन लोगों ने देखने का प्रयास किया या तो अंधे हो गए या फिर उनके ऊपर दैवी आपदा आ गई। जिन मकानों में खिड़कियां हैं भी, उनके घर के लोग शाम सात बजे मंदिर की आरती का घंटा बजते ही बंद कर लेते हैं। कुछ लोगों ने तो अपनी खिड़कियों को ईंटों से बंद भी करवा दिया है।
बुजुर्गों के निर्णय गलत साबित होते है[object Promise]
घर में सूनापन हमेशा रहता है।
काम बनते बनते रुकना।
पेड़ पौधे घर में नई पनपते।
परिवार धीरे धीरे छोटा होने लगता है।
धन की कमी
पड़ोसियों से न बनाना।
संतान की शादी असनी से न होना।
रोग हमेशा बने रहना ।
कारण :
जिस घर मे गाय की सेवा न होने के कारण मृत्यु हो गयी हो।
घर में नारियों का अपमान।
जिस घर में जल की बर्बादी और पेड़ पौधों का अनादर।
घर के बीचों बीच पानी का स्रोत हो।
जिस घर में जीव हत्या होती है
उपाय :
ब्रस्पतिवार, शनिवार को कुष्ट रोगियों की सेवा करें।
अमावस को नदी में स्नान करें।
घर में गायत्री यज्ञ करें।
ब्राह्मण को अमावस के दिन भोजन कराएं।
बुजुर्गों का सम्मान करें।
ये फलादेश / उपाय सभी बारह राशियों पर लागू होगा ये सभी ज्योतिष गणनायों एवं अनुभवयों पर आधारित है तथा यह व्यक्तिगत रूप से अलग हो सकता है । प्रदान की गई जानकारियों के द्वारा एवं उपायों के द्वारा हानि होती है तो ज्योतिषी एवं साइट की कोई जिम्मेदरी नही होगी । अतः आप किसी विद्वान ज्योतिषी से व्यक्तिगत रूप से सलाह लें।
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गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। पुराणों के अनुसार इस दिन गणेश जी का जन्म हुआ था। इस बार गणेश चतुर्थी 13 सितंबर को है। इस दौरान भगवान गणेश की आराधना कर श्रद्धालु उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। बता दें 13 सितंबर से शुरू होकर 23 सितंबर तक गणेश चतुर्थी उत्सव चलेगा। गणेश जी अमंगल और विघ्नहर्ता कहा जाता हैं।
कहा जाता है कि जिस पर गणेश जी की कृपा हो जाए उसके जीवन से सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। शास्त्रों में भी कुछ ऐसे आसान उपाय बताए गए हैं जिनकी मदद से आप गणेश जी को जल्दी खुश कर सकते हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ खास उपाय।
गणेश जी को प्रसन्न करने का सबसे सरल तरीका है कि सुबह उठते ही सबसे पहले स्नान करके पूजा करते समय गणेश जी को गिनकर पांच दूर्वा यानी हरी घास अर्पित करें। दुर्वा गणेश जी के मस्तक पर रखनी चाहिए।ध्यान रखें कि कभी भी गणेश जी के चरणों में दुर्वा नहीं रखनी चाहिए।
दुर्वा अर्पित करते हुए मंत्र बोलें ‘इदं दुर्वादलं ऊं गं गणपतये नमः’
शास्त्रों के अनुसार शमी ही एक मात्रा पौधा है जिसकी पूजा से गणेश जी और शनि दोनों प्रसन्न होते हैं। ऐसे माना जाता है कि भगवान श्री रमा ने भी रावण पर विजय पाने के लिए शमी की पूजा की थी।
शमी गणेश जी को अत्यंत प्रिय है। शमी के कुछ पत्ते नियमित गणेश जी को अर्पित करें तो घर में धन एवं सुख की वृद्धि होती है।
भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए पवित्र चावल अर्पित करें। पवित्र चावल उसे कहा जाता है जो टूटा हुआ नहीं हो। उबले हुए धन से तैयार चावल का पूजा में प्रयोग नहीं करना चाहिए।
सूखा चावल गणेश जी को नहीं चढ़ाएं। चावल को गीला करें फिर, ‘इदं अक्षतम् ऊं गं गणपतये नमः’ मंत्र बोलते हुए तीन बार गणेश जी को चावल चढ़ाएं।
सिंदूर की लाली गणेश जी को बहुत पसंद है। गणेश जी की प्रसन्नता के लिए लाल सिंदूर का तिलक लगाएं। गणेश जी को तिलक लगाने के बाद अपने माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं। इससे गणेश जी की कृपा प्राप्त होती है।
इससे आर्थिक क्षेत्र में आने वाली परेशानी और विघ्न से गणेश जी रक्षा करते हैं। गणेश जी को सिंदूर चढ़ाते समय मंत्र बोलें, सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम। शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम ओम गं गणपतये नमःश्
गणेश जी का एक दांत परशुराम जी से युद्ध में टूट गया था। इससे अन्य चीजों को खाने में गणेश जी को तकलीफ होती है, क्योंकि उन्हें चबाना पड़ता है।मोदक काफी मुलायम होता है जिससे इसे चबाना नहीं पड़ता है। यह मुंह में जाते ही घुल जाता है। इसलिए गणेश जी को मोदक बहुत ही प्रिय है।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी के 10 दिन तक गणेश उत्सव मनाया जाता है। विघ्नहर्ता की दिल से पूजा करने से इंसान को सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है और मुसीबतों से छुटकारा मिलता है।
भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है।
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गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त : श्री गणेश उत्सव सितंबर 13 से सितंबर 23 तक
गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, 10 दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।
गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त
ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल, अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है।
हिन्दु समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम से जाना जाता है।
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।
नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।
चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अन्त समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिये वर्जित हो सकता है। धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है और इसी नियम के अनुसार, चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी, चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा के दर्शन चन्द्रास्त तक वर्ज्य होते हैं।
अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जायें तो मिथ्या दोष से बचाव के लिये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये
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गणेश चतुर्थी पर्व के दौरान भगवान गणेश का आगमन शुभ मुहूर्त में होना चाहिए। यदि आप चाहते हैं कि आपके घर में भगवान गणेश एक दिन पहले लाए जाएं तो आप बुधवार यानी 12 सितंबर को भी भगवान गणेश को अपने घर ला सकते हैं। भगवान गणेश को घर लाने के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं –
गणेश जी की मूर्ति लाने का मुहूर्त:
1
[object Promise] दिनांक 12 सितम्बर दिन बुधवार को मध्याह्न 3:30 से सांयकाल 6:30 तक
2
[object Promise] दिनांक 13 सितम्बर दिन गुरुवार प्रातः 6:15- 8:05 तक तथा 10:50-11:30 तक
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: दिनांक 12 सितंबर दिन बुधवार को शाम 4:07 से
चतुर्थी तिथि समाप्त: दिनांक 13 सितंबर दिन गुरूवार को दोपहर 2:51 बजे तक
पौराणिक मान्यतानुसार गणपति जी का जन्म मध्यकाल में हुआ था इसलिए उनकी स्थापना इसी काल में होनी चाहिए। इस बार चतुर्थी वाले दिन काफी अच्छे संयोग बन रहे हैं।
गणेश पूजन के लिए मुहूर्त: दिनांक 13 सितंबर दिन गुरूवार को सुबह 11:02 से 13:31तक
हमारे देश में 33 करोड़ देवी देवताओं को पूजा जाता है, लेकिन हर पूजा और हर शुभ काम से पहले गणेश की ही पूजा होती है. गणपति को लेकर ये कहानियां बचपन से ही सुनी जाती रही हैं कि उनका सिर हाथी का कैसे हो गया? उन्हें क्यों सबसे पहले पूजा जाता है? लेकिन गणपति के बारे में कई ऐसे सवाल भी हैं जिनके जवाब अधिकतर लोग नहीं जानते हैं. ये ऐसे सवाल हैं जो शायद पहली बार में गणेश पूजा करने वालों के मन में आएं भी न. विध्नहर्ता के बारे में आज कुछ सवालों के जवाब जानते हैं.
1. गणपति की दो शादियां क्यों हुई थीं?
गणपित को अधिकतर कहानियों में और पुराणों में कुवांरा बताया गया है, फिर भी कुछ कहानियां और पुराण कहते हैं कि गणपति की दो पत्नियां थीं रिद्धी और सिद्धी. तो आखिर कैसे हुई थी दो लड़कियों से गणपति की शादी? इसको लेकर भी दो कथाएं कही जाती हैं.
गणेश जी को कई पुराणों में कुवांरा बताया है.
पहली कहानी-
गणपति और कार्तिकेय में एक बार झगड़ा हो गया कि श्रेष्ठ कौन है और किसकी शादी पहले होगी? इस बात पर शिव और पार्वति ने एक प्रतियोगिता रखी कि जो पहले पृथ्वी के 7 चक्कर लगा कर आएगा उसी की शादी पहले की जाएगी. ऐसा सुनकर कार्तिकेय अपने मोर पर बैठकर उड़ गए और गणपति अपने चूहे के साथ वहीं खड़े रह गए. गणपति ने ऐसे में माता-पिता के ही 7 चक्कर लगा लिए. जैसे ही गणपति का सातवां चक्कर खत्म हुआ वैसे ही कार्तिकेय वापस आ गए और कहने लगे कि उन्होंने शर्त पूरी की है. ऐसे में गणपति ने कहा कि उन्हें हमेशा यही सिखाया गया है कि माता-पिता की सेवा और परिक्रमा का मतलब है सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा. ऐसा सुनकर शिव और पार्वति ने खुश होकर गणपति की शादी विश्वरूपम की दोनों बेटियों रिद्धी और सिद्धी से करवा दी. गणपति के दो बेटे हुए शुभ और लाभ.
दूसरी कहानी-
दूसरी कहानी के अनुसार गणपति के हाथी जैसे सिर होने के कारण कोई भी लड़की उनसे शादी करने को तैयार नहीं थी, सभी देवताओं की पत्नियां थीं और ये बात गणेश को बहुत अखरती थी. ऐसे में गणपति ने अन्य देवताओं की शादियों में विध्न पैदा करना शुरू कर दिया और किसी न किसी तरह से वो देवताओं की शादी में कुछ गड़बड़ करते. ऐसे में सभी देवता ब्रह्मा के पास गए और ब्रह्मा ने गणपति के लिए दो सुंदर कन्याओं की रचना की. ये थीं रिद्धी और सिद्धी. इसके बाद गणपति की शादी हुई और शुभ और लाभ पैदा हुए.
2. गणेश को विध्नहर्ता ही क्यों कहा जाता है
गणपति को खास वर्दान मिला था जिसके तहत हर पूजा या शुभ कार्य से पहली उनकी पूजा जरूरी होती थी. गणपति के धड़ पर हाथी का सिर लगाने के बाद सभी देवताओं ने गणपति को आशिर्वाद दिया था. ऐसे में शिव का आशिर्वाद था कि अगर किसी भी शुभ कार्य के पहले उनकी पूजा होगी और अगर उनकी पूजा कर कार्य शुरू किया तो कार्य सफल होगा और बिना किसी विध्न पूरा होगा. यही कारण है कि गणपति को विध्नहर्ता कहा जाता है.
इससे जुड़ी एक कहानी भी है, लोककथा के अनुसार एक बार त्रिपुरासुर को मारने से पहले भगवान शिव ने गणेश को याद नहीं किया था तो इसलिए वो त्रिपुरासुर को आसानी से हरा नहीं पा रहे थे. जैसे ही उन्हें इस बात का अहसास हुआ उन्होंने गणपति को याद किया और फिर त्रिपुरासुर का वध किया. ये भी माना जाता है कि गणेश की पूजा करने से शनि की बुरी दृष्टि और ग्रहदोष से मुक्ति मिलती है इसलिए गणपति की पूजा होती है.
3. आखिर गणपति का विसर्जन क्यों किया जाता है?
गणपति विसर्जन से जुड़ी भी दो कहानियां हैं, एक पौराणिक और दूसरी को ऐतिहासिक माना जाता है.
पौराणिक मान्यता-
पौराणिक मान्यता ये कहती है कि गणपति की पूजा 10 दिन करके मूर्ति को 11वें दिन विसर्जित कर देना चाहिए. इसका कारण ये है कि गणपति 10 दिन की पूजा के बाद कैलाश लौट जाते हैं और इस काम में कोई बाधा न आए इसलिए विसर्जन किया जाता है. मान्यता है कि गणपति अपने साथ अपने भक्तों के सभी दुख-दर्द ले जाते हैं.
ऐतिहासिक कहानी-
पहले गीली-पिसी हुई हल्दी से गणपति की एक छोटी मूर्ति बनाई जाती थी. उसकी 10 दिन तक पूजा की जाती थी, फिर उस हल्दी की मूर्ति को पानी में विसर्जित किया जाता था और उस पानी को पेड़ की जड़ में डाल दिया जाता था. मूर्ति बहुत छोटी होती थी जो हथेली में आ सके.
गणपति विसर्जन का इतिहास बाल गंगाधर तिलक से जुड़ा हुआ है
स्वतंत्रता सैनानी बाल गंगाधर तिलक ने 1857 में गणपति विसर्जन को विशाल रूप दिया. इतिहासकार मानते हैं कि ये पूजा सबसे पहले शिवाजी महाराज ने शुरू की और इसे तब सामाजिक रूप से नहीं मनाया जाता था. (हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 271 BC से 1190 AD के बीच चालुक्या, राष्टकुटा और सत्वाहना राजवंशों में भी होती रही है.) इसके बाद बाल गंगाधर तिलक ने इस पूजा को एक विराट रूप दिया ताकि अलग-अलग हिंदू समाजों को एक साथ लाया जा सके और इसलिए एक पंडाल में पूजा की गई और ये पूजा पुणे में हुई थी. धीरे-धीरे इसे देश भर में अपना लिया गया और ये एक प्रथा बन गई. तब से ही विसर्जन नदी, तालाब या समुद्र में होने लगा.
4. गणपति बप्पा मोरिया में मोरिया शब्द का अर्थ क्या है?
गणपति बप्पा मोरिया के नारे तो सभी लगाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही जानते हैं कि आखिर जिस गणपति बप्पा मोरिया का जाप करते रहते हैं उसका मतलब क्या है? दरअसल, मोरिया कोई मंत्र नहीं है बल्कि कथाओं के अनुसार 14वीं सदी में गणपति के सबसे बड़े भक्त का नाम था मोरिया गोसावी. ये कर्नाटक के शालिग्राम गांव से था. कर्नाटक में मोरिया की भक्ति को पागलपन कहा जाता था. उसने कर्नाटक छोड़ दिया और पुणे में चिंचवाड़ा में रहने लगा. मान्यताओं के अनुसार उसने सिद्धी हासिल कर ली, मोरिया जी के बेटे ने चिंतामणी में एक मंदिर बनवाया जहां उसके पिता ने सिद्धी की थी. मोरिया जी ने सिद्धी विनायक में जाकर भी तपस्या की थी, अमदाबाद में भी और मोरेश्वय या मयुरेश्वर में भी. गणपति भगवान उसकी सिद्धी से बहुत खुश थे और इस कारण ही मोरिया की एक इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने हामी भर दी थी.
मोरिया की एक लौती इच्छा थी कि उसका नाम गणपति के परम भक्त के तौर पर पृथ्वी में प्रसिद्ध हो जाए और इसलिए मोरिया शब्द भगवान गणेश से हमेशा के लिए जुड़ गया. हर बार गणपति बप्पा मोरिया बोलने पर मोरिया को याद किया जाता है.
5. गणेश का एक दांत टूटा क्यों है?
गणेश जी का एक दांत परशुराम जी की वजह से टूटा था. परशुराम को विष्णु का अवतार माना जाता है. वो शिव के परम भक्त हैं. लोककथा के अनुसार जब परशुराम शिव से मिलने गए थे तब गणपति जी ने उनका रास्ता रोक लिया था. परशुराम जी को हमेशा गुस्से का बहुत तेज़ माना जाता था और इसी बात पर वो गुस्सा हो गए. गणेश से युद्ध तक की स्थिती बन गई. परशुराम जी ने गणेश पर अपनी कुल्हाड़ी से वार किया. गणपति जी जानते थे कि ये कुल्हाड़ी खुद शिव ने उन्हें दी है इसलिए वार से उन्हें कुछ नुकसान होगा, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया. इसलिए गणेश जी को चोट लगी और उनका एक दांत टूट गया. (साभार: ichowk.in)
नई दिल्ली. दशहरा भारत में धूमधाम से मनाया जाएगा। देश में दशहरे को लेकर कई मैदानों में अभी से रावण खड़े कर दिए गए है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध किया था। जिसकी खुशी में दशहरा मनाया जाता है। भगवान रावण को लेकर ग्रंथों में कई बातें लिखी गई है। आज हम आपकों रावण से जुड़ी कई रहस्यमयी बाते बताने जा रहे है।
विद्वानों के अनुसार रावण के दस सिर नहीं थे किंतु वह दस सिर होने का भ्रम पैदा कर देता था इसी कारण लोग उसे दशानन कहते थे। जैन शास्त्रों में उल्लेख है कि रावण के गले में बड़ी-बड़ी गोलाकार नौ मणियां होती थीं। उक्त नौ मणियों में उसका सिर दिखाई देता था जिसके कारण उसके दस सिर होने का भ्रम होता था। रावण को वेद और संस्कृत का ज्ञान था। वो साम वेद में निपुण था। उसने शिवतांडव, युद्धीशा तंत्र और प्रकुठा कामधेनु जैसी कृतियों की रचना की। साम वेद के अलावा उसे बाकी तीनों वेदों का भी ज्ञान था।
यह भी कहा जाता है कि मेघनाथ के जन्म से पहले रावण ने ग्रह नक्षत्रों को अपने हिसाब से सजा लिया था, जिससे उसका होना वाला पुत्र अमर हो जाए। लेकिन आखिरी वक़्त में शनि ने अपनी चाल बदल ली थी। रावण इतना शक्तिशाली था कि उसने शनि को अपने पास बंदी बना लिया था।
थाइलैंड में जो रामायण है उसके अनुसार सीता रावण की बेटी थी, जिसे एक भविष्यवाणी के बाद रावण ने ज़मीन में दफ़ना दिया था। भविष्यवाणी में कहा गया था कि ‘यही लड़की तेरी मौत का कारण बनेगी’। बाद में देवी सीता जनक को मिलीं। यही कारण था कि रावण ने कभी भी देवी सीता के साथ बुरा बर्ताव नहीं किया था।
करवा चौथ 27 अक्टूबर 2018 को मनाया जा रहा है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ कहते हैं। करवा चौथ में करवा का अर्थ मिट्टी के टोंटीदार बर्तन से होता है। वहीं चौथ का शाब्दिक अर्थ चतुर्थी है इस प्रकार यह करवा चौथ बन जाता है। करवा चौथ के दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए व्रत करती हैं।
विवाहित महिलाओं के अलावा अविवाहित युवतियां सुयोग्य वर की कामना के लिए भी इस व्रत को करती हैं। इस व्रत के प्रभाव और प्रसिद्धि के कारण ही इसकी महिमा बढ़ जाती है।इस बार करवा चौथ राजयोग बन रहा है। इसके साथ ही सर्वार्थसिद्धि और अमृतसिद्धि योग भी बन रहे हैं। इन 3 बड़े शुभ योगों के कारण व्रत और पूजा के लिए दिन और खास हो जाएगा। यह महिलाओं के लिए बहुत लाभकारी होने वाला है।
व्रत में सरगी का भी खास महत्व होता है। करवा चौथ के दिन सुहागन महिलाएं निर्जला और भूखी रहकर व्रत करती हैं। करवा चौथ के एक दिन पहले सरगी का खास महत्व बताया गया है।सरगी न खाएं तो सुहागनें पूरे दिन भूखे प्यासी रहकर व्रत नहीं कर पाएंगी। इसलिए महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले उठकर सरगी खाती हैं। यह खाना आमतौर पर उनकी सास बनाती हैं।
करवा चौथ शुभ मुहूर्त
इस बार पूजा का मुहूर्त शाम 5.40 से 6.47 तक है। अगर समय के लिहाज से देखें तो इसकी कुल अवधि 1 घंटे 7 मिनट है।
करवा चौथ पूजा विधि
शाम को भगवान गणेश, शिव और पार्वती की पूजा की जाती है। जिसमें पति की लंबी उम्र की कामना की जाती है। इसके बाद चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य दिया जाता है और पूजा की जाती है। फिर छलनी से पति और चंद्रमा की छवि देखती हैं। पति इसके बाद पत्नी को पानी पिलाकर व्रत तुड़वाता है।
कब खोलें करवा चौथ व्रत
रात को 8 बजे से पहले चंद्रोदय होने का मुहूर्त है। सुहागिनों को चांद के दिखने के बाद ही व्रत खोलना चाहिए। चांद को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है। इस बार चंद्रोदय शाम 7.55 पर होगा इसलिए महिलाएं चांद को अर्घ्य देकर व्रत समापन करें।
करवा चौथ कथा
एक समय की बात है, करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी किनारे बसे गांव में रहती थीं। एक दिन इनके पति नदी में स्नान करने गए।
स्नान करते समय नदी में एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया गहरे पानी में ले जाने लगा। मृत्यु को करीब देखकर करवा माता के पति ने करवा को नाम लेकर पुकारना शुरू किया।
पति की आवाज सुनकर करवा माता नदी तट पर पहुंची और पति को मृत्यु के मुख में देखकर क्रोधित हो गईं। करवा माता ने एक कच्चे धागे से मगरमच्छ को बांध दिया और कहा कि अगर मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा है तो मगरमच्छ मेरे पति को लेकर गहरे जल में नहीं ले जा सके।
इसके बाद यमराज वहां उपस्थित हुए। उन्होंने करवा से कहा कि तुम मगरमच्छ को मुक्त कर दो। इस पर करवा ने कहा कि मगरमच्छ ने मेरे पति को मारने का प्रयत्न किया है इसलिए इसे मृत्युदंड दीजिए और मेरे पति की रक्षा कीजिए। तब यमराज ने कहा कि अभी मगरमच्छ की आयु शेष है, अत: मैं उसे नहीं मार सकता।
इस पर करवा ने यमराज से अपने पति के प्राण न हरने की विनय करते हुए कहा कि मैं अपने सतीत्व के बल पर आपको अपने पति के प्राण नहीं ले जाने दूंगी, आपको मेरी विनय सुननी ही होगी।
इस पर यमराज ने कहा कि तुम पतिव्रता स्त्री हो और मैं तुम्हारे सतीत्व से प्रभावित हूं। ऐसा कहकर यमराज ने मगरमच्छ के प्राण ले लिए और करवा के पति को दीर्घायु का वरदान मिला। तबसे करवा चौथ का त्यौहार मनाया जाता है।
आप सभी जानते ही हैं कि दुनियाभर में कई लोगों को दिन-रात मेहनत करने के बाद भी जीवन में आसानी से सफलता नहीं मिलती ऐसे में लोग टोटके करते हैं और उपाय करते हैं जिससे उन्हें धनलाभ हो. ऐसे में आज हम जो उपाय बताने जा रहे हैं उस उपाय को करने के बाद आप अमीर बन सकते हैं इस उपाय में आपको दिवाली के दिन अपने पर्स में इन तीनो में से कोई एक चीज रखनी होगी जिससे आपको तरक्की मिलने लगेगी. तो आइए जानते हैं वह उपाय।
भगवान सूर्य देव को सम्पूर्ण रूप से समर्पित खास त्योहार कहलाता है छठ. यह पर्व पूरी स्वच्छता के साथ मनाया जाता है और इस व्रत को पुरुष और स्त्री दोनों ही सामान रूप से धारण करते हैं. यह पावन पर्व पुरे चार (4) दिनों तक चलता है. व्रत के पहले दिन यानि कि कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाए खाए होता है, जिसमें सारे वर्ती आत्म सुद्धि के हेतु केवल शुद्ध आहार का ही सेवन करते हैं. वहीं, कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन खरना रखा जाता है, जिसमें शरीर की शुद्धि के बाद पूजा करके सायं काल में ही गुड़ की खीर और पुड़ी बनाकर छठी माता को भोग लगाया जाता है. सबसे पहले इस खीर को प्रसाद के तौर पर वर्तियों को खिलाया जाता है और फिर ब्राम्हणों और परिवार के लोगो में बांटा जाता है.
बता दें कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन घर में पवित्रता को ध्यान में रखकर पकवान बनाये जाते है और सूर्यास्त होते ही सारे पकवानों को बड़े-बड़े बांस के डालों में भरकर निकट घाट पर ले जाया जाता है. वहीं, नदियों में ईख का घर बनाकर उनपर दीप भी जलाया जाता हैं. व्रत करने वाले सारे स्त्री और पुरुष जल में स्नान कर इन डालों को अपने हाथों में उठाकर षष्ठी माता और भगवान सूर्य को अर्ग देते है. यही नहीं, सूर्यास्त के पश्चात अपने-अपने घर वापस आकर सह-परिवार रात भर सूर्य देवता का जागरण किया जाता है. जान लें कि इस जागरण में छठ के गीतों का अपना एक अलग ही महत्व होता है.
दूसरी ओर कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सूर्योदय से पहले ब्रम्ह मुहूर्त में सायं काल की भाती डालों में पकवान, नारियल और फलदान रख नदी के तट पर सारे वर्ती एक जुट हो जाते हैं. इस दिन व्रत करने वाले स्त्रियों और पुरुषों को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देना होता है. इस खास दिन छठ व्रत की कथा सुनी जाती है और कथा के बाद लोगों के बीच प्रसाद वितरण किया जाता है. सारे वर्ती इसी दिन प्रसाद ग्रहण कर पारण करते हैं.
छठ पर्व से जुड़ी पौराणिक परंपरा
इस पर्व से जुड़ी एक पौराणिक परंपरा भी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं और वह यह है कि जब छठ मईया से मांगी हुई मुराद पूरी हो जाती है, तब सारे वर्ती सूर्य भगवान की दंडवत आराधना करते है. अब आपके दिमाग में यह सवाल ज़रूर आ रहा होगा कि यह दंडवत आराधाना क्या होती है? दरअसल, सूर्य को दंडवत प्रणाम करने की विधि काफी कठिन होती है.
दंडवत प्रणाम की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार है –
पहले सीधे खड़े होकर सूर्य देव को सूर्य नमस्कार किया जाता है और उसके पश्चात् पेट के बल जमीन पर लेटकर अपने दाहिने हाथ से ज़मीन पर एक रेखा खिंची जाती है. इस प्रक्रिया को घाट पर पहुँचने तक बार-बार दोहराया जाता है. बता दें कि इस प्रक्रिया से पहले सारे वर्ती अपने घरों के कुल देवता की आराधना करते है.
छठ पूजा से जुड़े कुछ खास नियम –
• छठ पर्व में पुरे चार दिन शुद्ध कपड़े पहने के नियम हैं और इन कपड़ो में सिलाई ना होने का पूर्ण रूप से खास ध्यान रखा जाता है. जहां महिलाएं साड़ी पहनती हैं तो वहीं, पुरुष धोती धारण करते हैं.
• त्योहार के पुरे चार दिन व्रत करने वाले वर्तियों का जमीन पर सोना ज़रूरी होता है. कम्बल या फिर चटाई का प्रयोग करना उनके इच्छा पर निर्भर करता है.
• इन खास दिन प्याज और लहसुन भी वर्जित होता है.
• वहीं, पूजा के बाद अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राम्हणों को भोजन कराने का नियम है.
• बता दें कि इस पावन पर्व में वर्तियों के पास बांस के सूप का होना बहुत अनिवार्य माना जाता है.
• प्रसाद के तौर पर गेहूँ और गुड़ के आटों से बना ठेकुआ और फलों में केले प्रमुख होते हैं.
• यही नहीं, अर्घ्य देते वक्त सारी वर्तियों के पास गन्ना होना बहुत आवश्यक माना जाता है. जान लें कि गन्ने से भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.
छठ पर्व का खास मंत्र –
दोस्तों अगर आप सही रूप से बताए जा रहे मंत्रों का जाप करेंगे तो आपकी मनोकामना अवश्य से पूरी होगी और यह मंत्र कुछ इस प्रकार है –
ॐ सूर्य देवं नमस्ते स्तु गृहाणं करूणा करं. अर्घ्यं च फ़लं संयुक्त गन्धमाल्याक्षतै युतम् || साभार: वेद संसार डॉट कॉम