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  • नवरात्र उपवास से सुप्त जीवनी शक्ति का होगा जागरण, जानिये उपवास का विधान

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    Nav durgaNav durga

    नवरात्र उपवास का विधान शरीर को शुद्ध कर और ऋतु परिवर्तन के कारण होने वाले रोगों से मुक्ति पाने के लिए ही है। रामचरितमानस में स्पष्ट लिखा है ‘‘छिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पंचरचित यह अघम शरीरा ’’ अर्थात मानव शरीर धरती, जल, अग्नि, आकाश और वायु से बना है।

    इनमें से चार तत्व हम भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं जबकि आकाश तत्व मात्र उपवास द्वारा ही शरीर ग्रहण करते है। जबकि आकाश तत्व उपवास द्वारा ही शरीर ग्रहण करता है।

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    Breakfast

    नवरात्र ऋतु परिवर्तन के संधि काल पर पड़ता है। चैत्र माह में ऋतु शिशिर से ग्रीष्म की ओर आती है और आश्विन माह में ऋतु ग्रीष्म से शिशिर की ओर बढ़ती है। इस ऋतु परिवर्तन के कारण शरीर को रोग घेर लेते है।

    यदि उपवास द्वारा शरीर का शोधन कर लिया जाए तो रोगों का आक्रमण अगले नवरात्र तक नहीं होगा। नवरात्र उपवासों का यही मूल उद्देश्य है। हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे धार्मिक रूप देकर हमारे संस्कारों में शामिल किया है।

    नवरात्र में नौ दिनों का उपवास विधि विधान के अनुसार ही रखना चाहिए अन्यथा लाभ के बजाय हानि की संभावना रहती है।

    पहले तीन दिन: – प्र्रातः 9 बजे फलों का रस अथवा पानी में नींबू शहद मिलाकर। दोपहर 12 बजे मौसमी फल।
    रात्रि 8 बजे कच्ची व पकी हुई सब्जी खानी चाहिए।

    अगले तीन दिन: – प्रातः कुछ भी नहीं खाना चाहिए। दोपहर 12 बजे फलों का जूस लेना चाहिए। सायंकाल की पूजा के पश्चात रात्रि में कच्ची खाई जाने वाली सब्जियों का रस पीना चाहिए।

    अंतिम तीन दिन:- प्रातः काल फलों का रस अथवा नींबू पानी शहद के साथ पीना चाहिए। दोपहर 12 बजे मौसम के फल खाना चाहिए। रात्रि का कच्ची व पकी हुई सब्जियां ।

    इन नौ दिनों में दूध या दूध से बने पदार्थ कदापि नहीं लेने चाहिए।

    उपहास के अन्तिम दिन पर भोजन वितरण के बाद प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करना चाहिए। इन नौ दिनों के उपवास से शरीर की शुद्धि होगी, सुप्त जीवनी शक्ति का जागरण होगा।

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  • मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी करेंगी विवाह बाधा का अंत

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    नवरात्र के छठे दिन मां के जिस स्वरूप के स्तवन और ध्यान का विधान है। वे भगवती कात्यायनी के नाम से विख्यात हैं। मां कात्यायनी ऋषि की पुत्री के रूप में अवतरित होने के संदर्भ में कुछ भिन्न कथा भी प्रचलित है। कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए।

    इन्हीं कात्य केे गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षाे तक कठिन तपस्या की थी। उनकी मनोकामना थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली थी।
    देवानाम कार्य सिद्धार्थ माविर्भवति सात दा।

    अर्थात् देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए भगवती ने समय-समय पर अपने को अनेक रूपों में प्रकट किया है। उसी क्रम में देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई और महर्षि ने उन्हें अपनी पुत्री माना, इसलिए वे ‘कात्यायनी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। तीन नेत्रों से विभूषि सौम्य मुखवाली भगवती का ध्यान करने से सांसारिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है और महाभय से रक्षा होती है।

    वास्तुशास्त्र के अनुसार इनकी दिशा उत्तरपूर्व है। इनकी पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय है गौधूलि व इनकी पूजा पीले फूलों से करनी चाहिए। इन्हें बेसन के हलवे का भोग लगाना चाहिए व श्रृंगार में इन्हें हल्दी अर्पित करना श्रेष्ठ रहता है। देवी कात्यायिनी की साधना उन लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ है जिनकी आजीविका का संबंध अध्ययन, लेखापाल या कर विभाग से है। इनकी साधना से दुर्भाग्य से छुटकारा मिलता है, विवाह बाधा दूर होती है व शत्रुता का अंत होता हैं।

    शास्त्रों में कहा गया है कि विश्व का जीवन लक्ष्य से संचालन करने वाला मन है। जीवन और मृत्यु का कारण मन ही है। इसलिए मन के कारण शक्ति अर्थात् विश्वकारिणी शक्ति कात्यायनी कही जाती हैं। इस प्रकार यह प्रकृति का क्रियात्मक अंग है, जो मन तत्वात्मक है।

    जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा ,विष्णु, महेश तीनों ने अपने -अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि अश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को जन्म लेकर शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को, अष्टमी तथा नवमी तक, तीन दिनों तक इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था।

    मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत भव्य एवं दिव्य है।

    इनके देह का वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और भास्वर है। मां कात्यायनी की आठ भुजायें हैं। दाहिनी तरफ का ऊपर हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वरमुद्रा में हैं। बायें तरफ के ऊपर वाले हाथ में नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प सुशोभित है। मां कात्यायनी सिंह की सवारी करती है।

    नवरात्र के छठे दिन भक्त आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मनवाला साधक मां कात्यायनी का भक्त अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त होता है। रोग, शोक, संताप, भय आदि बाधायें उसे छू नहीं पाती हैं।

    जन्म-जन्मान्तर के पापों को विनष्ट करने के लिए मां उपासना से अधिक सुगम और सरल मार्ग दूसरा नहीं है। इनका उपासक निरंतर इनके सानिध्य में रहकर परमपद प्राप्त करता है। अतः हमें सर्वतोभावेन् मां के शरणागत होकर उनकी

    पूजा उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए।
    एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितम्।
    यातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते।।

    चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवरवाहना।
    कात्यायनी शुभं दघाघेवी दानवघातिनी।।

  • जानें, कैसा रहेगा आपका आज का दिन – 21 March Rashifal

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    मेष- आज जो भी कार्य करेंगें उसमें सफलता मिलेगी। परिवार से मिलने वाले सुख एवं सहयोग में वृद्धि होगी। मित्र वर्ग का अच्छा साथ मिलेगा।

    वृषभ- शिक्षा के क्षेत्र में आपको अच्छी सफलता मिलेगी। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें। किसी से विवाद तथा झूठे आरोप लग सकते है। फिजुल खर्चा बढ़ सकता है।

    मिथुन- परिवार की तरफ से खुषी एवं प्रसन्नता का माहौल होगा। मनोरंजक यात्राएं होंगी। कामकाज में सफलता मिलेगी। किसी प्रकार की दुर्घटना हो सकती है।

    कर्क-  पारिवारिक सुख मिलेगा। नवीन मित्रता होगी। आज के दिन अपने से बड़ों का कहना मानने से शुभ फलों की प्राप्ति होगी। स्वास्थ्य सामान्यतौर पर अच्छा बना रहेगा।

    सिंह- कामकाज में सफलता मिलेगी। आप प्रभावी व्यक्तित्व के होंगे। परिवार के लोगों के साथ अच्छा समय व्यतीत करेंगे। यात्राएं होंगी।

    कन्या- किसी प्रकार का षुभ कार्य घर-परिवार में संपन्न होगा। भाई-बंधुओं के साथ अच्छा समय व्यतीत होगा। किसी से बेवजह के मतभेद हो सकते है। क्रोध पर नियंत्रण रखें।

    तुला- शरीर में भी फुर्तीला पन देखने को मिलेगा। कामकाज में तनाव बन सकता है। किसी से लड़ाई-झगड़ा परेषानी का कारण बनेगा। क्रोध पर काबू रखें।

    वृश्चिक-  आज के दिन कामकाज में कोई दिक्कते नहीं आएंगी। पारिवारिक सुख भी अच्छा मिलेगा। आज के दिन आपके स्वभाव में गंभीरता एवं एकाग्रता की झलक देखने को मिलेगी।

    धनु-  वाणी का प्रभाव अच्छा बना रहेगा। आज के दिन परिवार के सदस्यों की तरफ से सुख और सहयोग मिलेगा। आपका व्यक्तित्व प्रभावशाली बना रहेगा। आज के दिन आपको परिवार से मिलने वाले सुख में कमी बन सकती है।

    मकर-  आज मन में जोष एवं चुस्ती बनी रहेगी। परिवार में खुषनुमा माहौल बना रहेगा। आप कुछ नया सीखने का प्रयास करेंगे। धन से संबंधित चिंताएं बढ़ सकती है।

    कुंभ- कामकाज में लाभदायक फलों की प्राप्ति होगी। घर-परिवार या किसी रिश्तेदार के यहां कोई मांगलिक समारोह में षामिल होने का अवसर मिलेगा। आपको भाग्य से हर संभव सहायता मिलेगी। दूसरों पर आपका प्रभाव अच्छा रहेगा।

    मीन- आज परिवार के लोगों के साथ अच्छा समय व्यतीत होगा। प्रभावी व्यक्तित्व बना रहेगा। आपको भाग्य का साथ हासिल होगा। गुस्से पर काबू रखना जरूरी है अन्यथा दिक्कते आएंगी।

  • पारिवारिक शांति, रोग मुक्त जीवन का वरदान देंगी देवी स्कंदमाता

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    नवरात्र के पांचवे दिन आज मां भगवती स्कंदमाता रूप पूजा अर्चना होगी । नवदुर्गाआं में पांचवी दुर्गा हैं-माता स्कंदमाता। स्कंदमाता के नाम से मां का पांचवा स्वरूप विख्यात है। क्योंकि दुर्गा मां के पांचवे स्वरूप को भगवान स्कंद की माता होने का अधिकार प्राप्त हुआ। भगवान स्कंद का एक दूसरा नाम कुमार कार्तिकेय भी है। जब देवता और असुरों का संग्राम हुआ था तो भगवान स्कंद ने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया था। इन्हें कुार तथा शक्तिधर के नाम से भी जाना जाता है। मयूर की सवारी करने कारण इन्हें मयूरवाहन भी कहा जाता है।

    स्कंदमाता आकाश तत्व की द्योतक हैं। नवदुर्गाओं में एक ओर चार कन्याएं तथा बीच में स्कंदमाता हैं इसमें मातृभाव है। अर्थात् यह सभी तत्वों का मूल बिंदु है। एक ओ भू, जल, अग्नि और वायु में चार तत्व हैं। दूसरी ओर मन, बुद्धि , चित्त और अहंकार है। इस प्रकार तत्व लक्ष्य से यह आकाश जननी है। क्रिया लक्ष्य में आधार जगदात्री हैं। इसलिए प्रकृति का क्रियात्मक अंग है। , जो आकाश तत्वात्मक है।

    स्कंदमाता मानव को सोचने समझने की शक्ति प्रदान करने वाली देवी है। सभी प्रकार के ज्ञान, रूचि, समझ और तर्क की अधष्इात्री देवी स्कंदमाता की पूजा त्रिदेवों सहित यक्ष, किन्नरों और दैत्यों ने भी की है। स्कंदमाता की अर्चना और ध्यान इस मंत्र के साथ करना चाहिए-

    या देवी सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।।

    नवरात्रि के पांचवे दिन मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन भक्त का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। स्कंदमाता की गोद में भगवान स्कंद सुशोषित होते हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। दाहिनी ऊपरी तीन भुजाओं से स्कंदमाता भगवान स्कंद की गोद में पकड़ी हुई हैं। दाहिनी ऊपर उठी हुई निचलीभुजा में वह कमल का पुष्प धारण की हुई हैं। वरमुद्रा में बांयी ऊपर वाली भुजा तथा निचली भुजा जो ऊपर उठी हुई हैं इनमें स्कंदमाता कमल का पुष्प धारण की हुई है। श्वेतवर्णी स्कंदमाता कमल के आसन पर विराजमान रहती है।

    यही कारण है कि इन्हें पद्मासना देवी के नाम से भी जाना जाता है। इस चक्र में चंचल मन वाले भक्त की समस्त चित्तवृत्तियां विलुप्त हो जाती हैं। नवरात्रि पूजन के पांचवे स्कंदमाता की आराधना के पश्चात भक्त विशुद्ध चैतन्यस्वरूपा हो जाता है। वह सांसारिक मायामोह से मुक्त होकर पूर्णतः स्कंदमाता के स्वरूप में ही तल्लीन हो जाता है। स्कन्दमाता की आराधना के समय भक्त को ध्यान एकाग्रचित कर पूर्णतः सावधानी के साथ उपासना करनी चाहिए। समस्त वृत्तियों का त्याग कर भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।

    सांसारिक सुख-दुख के साथ अर्थात् मृत्युलोक के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए स्कंदमाता की उपासना के फलस्वरूप भक्त की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा उसे सुख और शांति की सुखद अनुभूति होती है। स्कन्दमाता की उपासना के साथ ही साथ भगवान स्कंद की भी उपासना स्वयंमेव हो जाती है। देवी के नवों रूपों में मात्र स्कंदमाता को ही यह विशेषता प्राप्त है। अतः इनकी उपासना से भक्त को अतिरिक्त फल की प्राप्ति होती है।

    इसलिए भक्त को इनकी उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्कंदमाता सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी हैं। अतः भक्तों को पवित्र भाव से एकाग्रचित्त होकर मां के शरण में जाना चाहिए। यह वैकुण्ठ प्राप्त करने का सरल एवं उत्तम साधन है।

    संहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरंद्वया।
    शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।।
    ‘ओं में र्चैओं में चै

  • देवी ब्रह्मचारिणी की कृपा से छात्रों के लिए खुलेंगे सफलता के द्वार

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    सोमवार 19.03.18 को चैत्र शुक्ल द्वितीया पर अर्थात नवरात्रि के दूसरे दिन द्वितीय दुर्गा देवी ब्रह्मचारिणी का पूजन किया जाएगा। शब्द ब्रह्मचारिणी का अर्थ है ब्रह्म का आचरण करने वाली देवी। मंगल ग्रह पर आधिपत्य रखने वाली ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्मत्व स्वरूपा हैं। देवी ब्रह्मचारिणी मनुष्य जीवन की बाल अवस्था रूपी विद्यार्थी को संबोधित करती हैं। प्रकाश निकलते हुए खिलते कमल जैसा इनका ज्योर्तिमय स्वरूप, शांत व निमग्न होकर तप में लीन है। इनके मुखमंडल पर कठोर तप के कारण अद्भुत तेज है। इनके दाएं हाथ में अक्षमाला व बाएं हाथ में कमण्डल है। ध्वल वस्त्र धारण किये हुए गौरवर्णा देवी के कंगन, कड़े, हार, कुंडल व बाली आदि सभी जगह कमल जड़े हुए हैं। ब्रह्मचारिणी स्वरुप पार्वती का वो चरित्र है जब उन्होंने शिव अर्थात ब्रह्म को साधने हेतु तप किया था।

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    कालपुरूष सिद्धांतानुसार मंगल प्रधान देवी व्यक्ति की कुंडली के पहले व आठवें घर पर अपनी सत्ता से व्यक्ति की बुद्धि, मानसिकता, सेहत व आयु पर अपना स्वामित्व रखती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार इनकी साधना का संबंध मंगल ग्रह की दक्षिण दिशा से है। इनकी साधना का सर्वश्रेष्ठ समय ब्रह्म महूर्त है। देवी ब्रह्मचारिणी की साधना सर्वाधिक रूप से उन लोगों को फलित होती है जिनकी आजीविका का संबंध चिकित्सा, इंजीनियरिंग, मैकेनिकल, सुरक्षा सेवा से है। ब्रह्मचारिणी का पूजन लाल फूल, सिंदूर, गुड से करना चाहिए। इनकी साधना से मूर्ख भी सयाने बनते हैं, साधारण स्टूडैंट को भी डॉक्टर व इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में सफलता मिलती है व अत्यधिक क्रोध से मुक्ति मिलती है।
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    विशेष पूजन विधि: लाल कपड़े पर देवी ब्रह्मचारिणी का चित्र स्थापित करके विधिवत पूजन करें। आटे के दिए में चमेली के तेल का दीप करें, गुगल धूप करें, लाल फूल चढ़ाएं, सिंदूर चढ़ाएं, गुड़ से बने हलवे का भोग लगाएं व लाल चंदन या मूंगे की माला से इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें।

    पूजन मुहूर्त: प्रातः 09:30 से प्रातः 10:30 तक।

    पूजन मंत्र: ॐ ब्रह्मचारिण्यै देव्यै: नमः॥

    आज का शुभाशुभ
    आज का अभिजीत मुहूर्त: 
    दिन 12:05 से दिन 12:52 तक।
    आज का अमृत काल: शाम 17:45 से शाम 19:21 तक।
    आज का राहु काल: प्रातः 08:00 से प्रातः 09:29 तक।
    आज का गुलिक काल: दिन 13:58 से दिन 15:28 तक।
    आज का यमगंड काल: प्रातः 10:59 से दिन 12:29 तक।

    यात्रा मुहूर्त: आज दिशाशूल पूर्व व राहुकाल वास वायव्य में है। अतः पूर्व व वायव्य दिशा की यात्रा टालें।

    आज का गुडलक ज्ञान
    आज का गुडलक कलर: 
    श्वेत।
    आज का गुडलक दिशा: दक्षिण-पूर्व।
    आज का गुडलक मंत्र: ब्रीं ब्रह्मवादिन्यै नमः॥
    आज का गुडलक टाइम: रात 20:09 से शाम 21:09 तक।

    आज का बर्थडे गुडलक: कुशाग्र बुद्धि हेतु देवी ब्रह्मचारिणी पर चढ़े सिंदूर से नित्य तिलक करें।

    आज का एनिवर्सरी गुडलक: क्रोध से मुक्ति हेतु देवी ब्रह्मचारिणी पर चढ़े गेहूं के दाने कर्पूर से जलाएं।

    गुडलक महागुरु का महा टोटका: प्रवेश परीक्षा में सफलता हेतु देवी ब्रह्मचारिणी पर चढ़ा लाल-सुनहरी पेन इस्तेमाल करें।

  • कल्याणकारी एवं शांति प्रदान करने वाला स्वरूप है माता चन्द्रघण्टा

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    नवरात्र की तृतीया तिथि को देवी के चन्द्रघंटा स्वरूप की पूजा होगी। नव दुर्गाओं में तृतीय माता है-माता चन्द्रघण्टा। माता चन्द्रघण्टा का यह स्वरूप कल्याणकारी एवं शांति प्रदान करने वाला है। इनके मस्तिष्क पर घंटे के आकार का अद्धचन्द्र शोभायमान रहता है इसीलिए इन्हें चन्द्रघण्टा कहा जाता है।

    चन्द्र में सूर्य से मांगा हुआ प्रकाश है। उसमें मूल प्रकाश नहीं है। उसमें जलती हुई अग्नि नहीं है। परन्तु गुप्त अग्नि है। ‘घण्टा’ अर्थात् अग्नि है, पर दिखती नहीं है। उसमें पृथक्करण की शक्ति है। इसलिए ‘चन्द्रघण्टा’ प्रकृति का ‘क्रियात्मक’ है। जो अग्नि तत्वात्मक है।

    चन्द्र घण्टायां यस्यां सा आहलादकारी। चन्द्रमा जिनके घण्टे की घोर ध्वनि से दसों दिशाये कम्पायमान हो उठीं थी। असुर हृदय विदीर्ण हो रहे थे माता अपनी घण्टाध्वनि के द्वारा असुरों की शक्ति क्षीण कर रही थीं। देवी के इस स्वरूप के स्तवन मात्र से ही – भयाद मुच्यते नरः।

    अर्थात् मनुष्य भय से मुक्त होकर शक्ति प्राप्त करता है। इस स्वरूप का पूजन समस्त संकटों से मुक्त करता है। मान्यता है कि जब असुरों के बढ़ते प्रभाव से देवता त्रस्त हो गये। तब देवी चन्द्रघण्टा रूप में अवतरित हुई। देवी के इस स्वरूप की आराधना इस मंत्र से की जा सकती है।

    ऐं कारी सृष्टि रूपाय हलींकारी प्रतिपालिका।
    क्लांकारी काम रूपण्ये बीच रूपे नमोस्तुते।।

    घण्टा माता ब्रह्मचारिणी का रूप स्वर्ण के सदृश्य चमकीला एवं इनके दस हाथ हैं। खड्ग, शस्त्र तथा बाण इत्यादि अस्त्र इनके दसाों हाथों में शोभायमान हैं। सिंह इनकी सवारी है। इनकी चण्डध्वनि घंटे के सदृृश्य भयानक है जिससे दानव, दैत्य तािा राक्षस सदैव भयभीत रहते हैं।

    सदैव युद्ध के लिये उद्यत रहने वाली इनकी मुद्रा है। नवरात्रि के तीसरे दिन पूजा का अत्यधिक महत्व है। इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है। अलौकिक सुगंधियों की अनुभूति होती है। नाना प्रकार की दिव्य ध्वनियां सुनायी पड़ती है। इस समय साधक को सावधान रहने की आवश्यकता होती है। सदैव युद्ध के लिये उद्यत रहने वाली इनकी मुद्रा है।

    मां चन्द्राघण्टा की पूजा अर्चना के फलस्वरूप साधक पर मां चन्द्रघण्टा की कृपा होती है। जिससे साधक के समस्त पाप व बाधाएं नष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सदा फलदायी है।

    सिंह वाहन होने के कारण इनका भक्त सिंह की ही भांति वीर , पराक्रमी तथा भयहीन होता है। माता चन्द्रघण्टा अपने घण्टे की ध्वनि से अपने भक्तों को प्रेत बाधादि से दूर रखती हैं। विपत्ति के समय जैसे ही साधक मां का स्मरण करता है। तुरन्त इस घण्टे की ध्वनि निनादित होने लगती है।

    आततायीयों एवं पापियों के विनाश के लिये मां का यह स्वरूप सदैव तत्पर रहता है। इसके बाद भी मां का यह स्वरूप साधक के लिये सौम्यता एवं शांति की पूर्ति ही होता हैं मां चन्द्रघण्टा की भक्ति से आराधक में वीरता निर्भयता और सौम्यता एवं विनम्रता जैसे सद्गुणों का विकास होता है। भक्त की सम्पूर्ण काया में क्रंाति का उदभव व विकास होता है। भक्त के स्वर में दिव्यता , अलौकिकता, माधुर्य इत्यादि गुणों का उद्भव होता है।

    इनके उपासकों को देखकर अन्य लोग शांति एवं सुख की सुखद अनुुभूति करते हैं। इन भक्तगणों के शरीर से दिव्य प्रकाशमय तेज का उद्भव होता रहता है। परन्तु यह सब कुछ साधारण मनुष्य नहीं देख पाते हैं। क्योंकि यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से नहीं देखी जा सकती है। लेकिन ऐसे भक्तगणों के सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों को इसकी अनुभूति हो जाती है। हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके मां चन्द्रघण्टा के शरणागत होकर उनकी उपासना आराधना मंे तत्पर हों।

    उनकी उपासना से हम समस्त सांसरिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद केे अधिकारी बन सकते हैं। हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान मंे रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिये परमकल्याणकारी और सद्गति को देने वाला है।

    पिण्ढाजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
    प्रसादं तनुते महृां चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

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  • चैत्र नवरात्रि की चौथी देवी “कुष्मांडा” देंगी नौकरी में प्रमोशन का वरदान

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    नवरात्र के चौथे दिन भगवती के कूष्माण्डा स्वरूप का स्तवन किया जाता है। नवदुर्गाओं में चौथी दुर्गा हैं-माता कुष्माण्डा। मां का चैथा स्वरूप कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। माता कूष्माण्डा ने अपनी मंद हंसी द्वारा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति किया। इसीलिए इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है।

    जो माता कुत्सित, ऊष्मा, कूष्मा त्रिविध तापयुक्त संसार अर्थात तीनों तापों दैहिक, दैविक और भौतिक से ग्रस्त संसार को मुक्ति प्रदान कर भक्त को दुखों से छुटकारा दिलाती हैं।

    ‘सः अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या सा कूष्माण्डा’
    अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनक उदर में स्थित है, वे भगवती कूष्माण्डा के नाम से विख्यात हुई, शास्त्रों के अनुसार कूष्माण्ड अर्थात् गतियुक्त अण्ड ‘वायु’ पैदा करता है। इस कारण प्रकृति का क्रियात्मक अंग है, जो वायु तत्वात्मक है।

    जब असुरों के घोर अत्याचार से देव, नर और मुनि त्रस्त हो उठे तो देवी जनसंताप नाशन हेतु कूष्माण्डा स्वरूप में अवतारित हुई। पुष्प, धूप , नैवेद्य और दीप सहित देवी सूक्त का पाइ करते हुए जो कूष्माण्डा देवी की आराधना करता है, देवी उस पर प्रसन्न होकर, उसे संतापों से मुक्ति दिलाती हैं। देवी के इस स्वरूप के पूजन में निम्नलिखित मंत्र का विशेष का महत्व है –

    अर्ध मात्रा स्थिता नित्या यानुच्चायां विशेषतः।
    त्वमेव संध्या गायत्री त्वं देवि, जननी परा।।

    सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व माता कूष्माडा ने अपने ‘ईषत्’ हंसी से ब्रह्माण्ड की वियुत्ति की। इसलिए उनहें सृष्टि की आदि स्वरूपा, आदि शक्ति माना जाता है। इनकी इस रचना से पर्व ब्रह्माण्ड की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

    सूर्यमण्डल के भीतरी लोक में इनका निवास स्थान है। सूर्य लोक जैसे ग्रीष्म लोक में रहने की शक्ति मात्र माता कूष्माण्डा में ही है। इनके तेजस्वी रूप की तुलना सूर्य से की जा सकती है। क्योंकि इनके शरीर की कांति एवं प्रभा भी , सूर्य के सदृश्य ही दीप्तमान हैं यदि किसी अनय देवी देवता की तुलना सूर्य से करना चाहें तो नहीं कर सकते हैं। क्योंकि इनके तेज और प्रकाश से ही दसों दिशायें प्रकाशवान होती हैं।

    आठ भुजाओं के कारण ही माता कूष्माण्डा अष्ट भुजा के नाम से जानी जाती हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल,पुष्प, अमृतपूर्ण लश, चक्र तथा गदा है। बायें हाथ में जयमाला है। सिंह इनका वाहन है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा का अर्थ होता कुम्हड़े । इनका नाम कूष्माण्डा होने कायह भी एक कारण है कि ऐसा माना जाता है, बलियों में कुम्हड़े की बलि से यह सबसे अधिक प्रसन्न होती हैं।

    नवरात्रि के चैथे दिन कूष्माण्डा देवी की पूजा की जाती है। नवरात्रि के चैथे दिन भक्त मन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है। इस दिन भक्त को पवित्र एवं शांत मन से माता कूष्माण्डा को स्मरण कर आराधना करनी चाहिए। माता कूष्माण्डा अपने भक्तों को रोग शोक मुक्त करती हैं। इनकी भक्ति द्वारा आयु, यश, बल तथा आयोग्य का विकास होता है। सच्चे हृदय से माता कूष्माण्डा के शरण में जाने से भक्तों को परम पद प्राप्त हो जाता है।

    देवी कुष्मांडा की साधना का संबंध सूर्य से है। कालपुरूष सिद्धांतानुसार कुष्मांडा का संबंध कुंडली के पंचम व नवम भाव से है। अतः देवी कुष्मांडा की साधना का संबंध व्यक्ति की सेहत, मानसिकता, व्यक्तित्व, रूप, विद्या, प्रेम, उद्दर, भाग्य, गर्भाशय, अंडकोष व प्रजनन तंत्र से है। वास्तु शास्त्र के अनुसार देवी कुष्मांडा की दिशा पूर्व है। इनकी पूजा का श्रेष्ठ समय हैं सूर्योदय। इनकी पूजा लाल रंग के फूलों से करनी चाहिए।

    इन्हें सूजी से बने हलवे का भोग लगाना चाहिए व श्रृंगार में इन्हें रक्त चंदन प्रिय है। इनकी साधना उन लोगों को सर्वश्रेष्ठ फल देती है जिनकी आजीविका राजनीति, प्रशासन हो। इनकी साधना से निसंतान को संतान की प्राप्ति होती है, प्रोफैशन में सफलता मिलती है, नौकरी में प्रमोशन मिलता है।

    हमें चाहिए कि हम शास्त्रों-पुराणों में वर्णित विधि विधान के अनुसार मां दुर्गा की उपासना और भक्ति के मार्ग पर अहर्निश अग्रसर हों। मां के भक्ति मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुखः स्वरूप संसार उसके लिये अत्यंतसुखद और सुगम बन जाताहै। मां की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिये सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है।

    मां कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को अधियों व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर जाने वाली है। अतः अपनी लौकिक-परलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए।

    सुरासम्पर्णकलशं रूधिराप्लुत्मेव च।
    दधाना हस्तपद्माभ्यां कूश्माण्डा शुभदास्तु में।।

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  • जानें, कैसा रहेगा आपका आज का दिन – 18 March Rashifal

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    मेष- आप अपने काम को अपनी इच्छानुसार पूरा करेंगे। अपने परिवार तथा मित्रों के साथ अच्छा समय व्यतीत करेंगे या हो सकता है उनके साथ आप किसी यात्रा पर चलें जाएं। पढ़ाई के प्रति रूचि बनी रहेगी। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहे वर्ना दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। परिवार का अच्छा सुख मिलेगा। किसी भी प्रकार के वाद-विवाद से बचें।

    वृषभ – आप अपने बुद्धि का उचित प्रयोग कर सफलता प्राप्त करेंगे। आपका अपने परिवार के साथ अच्छा समय व्यतीत होगा। धर्म के कार्यों में पूरी श्रद्धा के साथ सहयोग करेंगे। कामकाज में लाभदायक फल प्राप्त होंगे। षरीर में फृर्तीला पन देखने को मिलेगा। कोई अषुभ समाचार मिल सकता है। वाहन के प्रति सावधानी बरतें। धन के खर्चे बढ़ेंगे।

    मिथुन- मित्रों के साथ अच्छा समय व्यतीत होगा। परिवार की जिम्मेदारियों को अच्छे से निभायेंगे। आपके ऊपर बेवजह के आरोप लगने की संभावना है जिसके कारण मन अशांत रहेगा। आपको स्वास्थ्य संबंधी परेशानी उत्पन्न हो सकती है जिसके कारण मन परेशान रहेगा। कार्य क्षेत्र में शुभ समाचारों की अधिकता रहेगी।

    कर्क- परिवार के सदस्यों से मिलने वाले सुख में कमी बनी रहेगी। परिवार के किसी सदस्य को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। स्वभाव में क्रोध की अधिकता बढ़ने कारण बाहरी व्यक्ति के साथ वाद-विवाद होने की संभावना होगी। आपको पेट से संबंधित तकलीफें उत्पन्न हो सकती है। कामकाज में धन-लाभ होगा। घर-परिवार में कोई अषुभ घटना घटित हो सकती है। मानसिक तनाव बढ सकता है।

    सिंह- चरित्रवान् बनकर रहें साथ ही ईश्वर में विश्वास बनाएं रखें। मित्रों के साथ यात्राएं होंगी। मन में प्रसन्नता बनी रहेगी। परिवार में किसी सदस्य का स्वास्थ्य खराब रहेगा जिसके कारण मन परेशान रहेगा। वाहन के प्रति सावधानी अपेक्षित है अन्यथा वाहन से चोट लगने की भी संभावना है। घर में किसी का स्वास्थ्य खराब हो सकता है। धन खर्च अधिक होगा।

    कन्या- शिक्षा एवं प्रतियोगिता के क्षेत्र में सफलता मिलेगी। पारिवारिक सुख अच्छा मिलेगा। स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ सकती है। परिवार में किसी को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें बनी रहनी संभव हैं, जिसके कारण मन परेशान रहेगा। आप अपनों से बड़ों एवं सज्जन व्यक्तियों का आदर सत्कार करने में अग्रणी रहेंगे। काम काज में आषा अनुरूप सफलता मिलेगी।

    तुला- काम काज के प्रति मन में नया उत्साह और जोष बना रहेगा। साझेदारी में किए गए काम में नुकसान होगा। आपके भाईयों के लिए मुश्किल भरा रहेगा। वार्तालाप की निपणुता और अपनी व्यवहार कुशलता से आप अपने बिगड़े हुए कामों को भी आसानी से पूरा कर सकेंगे। स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें। घर में भी तनाव भरा माहौल उत्पन्न होगा।

    वृश्चिक- आज शुभ  समाचार मिल सकता है। वाणी  की निपणुता और अपनी व्यवहार कुशलता से आप अपने कामों को भी आसानी से पूरा कर सकेंगे। कामकाज में सफलता मिलेगी। आप अपने काम को अपनी इच्छानुसार पूरा करेंगे। यात्राएं होंगी। परिवार में खुषनुमा माहौल बना रहेगा। परिवार की जिम्मेदारियों को अच्छे से आज निभायेंगे।

    धनु- किसी मांगलिक कार्यक्रम में शामिल  हो सकते है। कार्यक्षेत्र में नवीन मित्र बनेंगे। अचानक धनहानि भी हो सकती है। परिवार के साथ अच्छा समय व्यतीत होगा। आपको पेट से संबंधित तकलीफें उत्पन्न हो सकती है। रूपए-पैसे को लेकर चिंताएं बढ़ सकती है। घर-परिवार में कोई अषुभ समाचार मिल सकता है। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें।

    मकर- आप आज अपने बुद्धि का उचित प्रयोग कर कामकाज में सफलता प्राप्त करेंगे। पढ़ाई के लिए आज का दिन मिला-जुला रहेगा। धार्मिक कार्य की तरफ रूचि बढेगी। परिवार में किसी को षारीरिक कश्ट हो सकते है। कोई अप्रिय घटना घटित हो सकती है। वाहन के प्रति सावधानी बरतें। धन के खर्चे बढ़ेंगे परंतु धन का निवेष हो सकता है।

    कुंभ- आज घर-परिवार में कोई मांगलिक कार्यक्रम होनें की संभावना है। धार्मिक कार्य की ओर रूचि बनेगी। साथ लोगों के साथ मेलजोल बढ़ेगा। मन प्रसन्न रहेगा। बेवजह किसी से विवाद हो सकता है। संगति का विषेश ध्यान रखें। ही ईश्वर में विश्वास बनाएं रखें। मित्रों के साथ यात्राएं होंगी। किसी प्रकार के बडे़ काम करने से पहले बड़ों की सलाह लेना न भूले।

    मीन-  आज के दिन भाग्य की संभव सहायता मिलेगी। शरीर  में जोश  तथा नया उत्साह देखने को मिलेगा। मित्रों के साथ अच्छा समय व्यतीत होगा। विद्यार्थी वर्ग के लिए आज का दिन मिला-जुला रहेगा। धार्मिक कार्य की तरफ रूचि बढेगी। परिवार में किसी को षारीरिक कश्ट हो सकते है। कोई अप्रिय घटना घटित हो सकती है। सावधानी बरतें।

  • महाअष्टमी पर महागौरी देंगी दुर्घटनाओं से सुरक्षा

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    भगवती दुर्गाजी की आठवीं शक्ति महागौरी हैं। भगवती महागौरी अत्यंत गौरवर्णी हैं। इनके अत्यंत गौरवर्ण की तुलना शंख, चंद्र और कुंद के फूल से की गयी है।
    ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी।’

    अर्थात् मां महागौरी की आयु मात्र आठ वर्ष मानी गयी है। महागौरी का वर्ण ही श्वेत नहीं है। महागौरी का वर्ण ही श्वेत नहीं है। अपितु ये वस्त्र, आभूषण इत्यादि भी श्वेत वर्ण का ही धरण करती है। इनकी चार भुजाएं हैं। इनका वाहन वृषभ है।

    इनके ऊपर वाले बायें हाथ में डमरू और नीचे के बायें हाथ में वर-मुद्रा है। अत्यंत शांत महागौरी की मुद्रा होती है। जो भगवती एक मात्र सत्वगुण के आश्रित हों। पार्वती जी के शरीर से प्रकट हुई उन भगवती के स्वरूप को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक स्मरण करता है। वह सभी प्रकार के भय से मुक्ति प्राप्त करता है और उसकी संपूर्ण कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

    पुरार्णो के अनुसार देवी अन्नपूर्णा का प्रादुर्भाव मां महागौरी के अंशरूप में ही हुआ है। इसलिए अष्टमी की पूजा में शुभ्ररंग का विशेष महत्व है। देवाधिदेव भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए भगवती ने अपने पार्वती स्वरूप में अत्यंत कठोर तपस्या किया था। नारद-पांचरात्र के अनुसार महागौरी ने प्रतिज्ञा की थी कि ‘व्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात्।

    इस विषय पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति इस प्रकार की है-
    जनम कोटि लागि रगरि हमारी।
    बरौं संभु न त रहउं कुंआरी।।

    देवाधिदेव भगवान शंकर की प्राप्ति के लिए महागौरी ने जो कठोर तप किया। उसके फलस्वरूप उनकी संपूर्ण काया श्यामल वर्ण की हो गयी है। परंतु इनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने महागौरी के शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया।

    तत्पश्चात वह बिजली की किरण की भांति अत्यंत कांतिमान और गौर हो उठा। तभी से यह महागौरी के नाम से विख्यात हुई। नवरात्र के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। भगवती महागौरी की आराधना से इनके भक्तों के सभी पाप-दोष धुल जाते हैं। साथ ही पूर्वजन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। पाप-दोष, दुख, दरिद्रता, विपत्ति उसे छू भी नहीं पाती। इनके भक्तों को सभी प्रकार के पुण्य प्राप्त होते है।

    मां महागौरी की पूजा अर्चना, ध्यान, स्मरण, साधकों के लिए सर्वथा मंगलमय होती है। मानव मात्र को सदैव मां महागौरी का स्मरण करना चाहिए। इनकी असीम अनुकम्पा से भक्तों को अलौकिक सिद्वियां प्राप्त होती हैं। मनुष्य को ध्यान एकाग्रचित्त कर महागौरी का स्मरण करना चाहिए। इनकी अपने भक्तों पर विशेष कृपा होती है। इनकी उपासना से भक्तों के रूके कार्य पूर्ण होते हैं।

    अतः हमेशा मनुष्य को महागौरी की शरणागत बनना चाहिए। ये मानव की सत्वृत्तियों को प्रेरित करती है। इनकी उपासना से भक्तों के रूके कार्य पूर्ण होते हैं। अतः हमेशा मनुष्य को महागौरी की शरणागत बनना चाहिए। ये मानव की सत्वृत्तियों को प्रेरित करती हैं तथा असत् वृत्तियों का विनाश करती हैं।
    श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
    महागौरी शुभं दघान्महादेवप्रमोददा।।

  • श्रीराम को लगायें इन विषेष चीजों का भोग, आपके हर कष्ट का होगा निवारण !

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    चैत्र मास की नवमी को रामनवमी का पर्व मनाया जाता है। इसे भारत में लोग बड़े हर्षो-उल्लास से मनाया जाता है। इस वर्ष राम नवमी का यह त्यौहार कल यानी 25 मार्च 2018 को मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त कर और पुन: धर्म की स्थापना हेतु भगवान विष्णु ने इस दिन धरती पर मनुष्य के रूप में राम अवतार लिया था।

    आमतौर पर रामनवमी का यह पर्व मार्च-अप्रैल के दौरान मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार राम नवमी चैत्र माह का नौवें दिन होता है, जो चैत्र नवरात्रि का आखिरी दिन भी होता है। इसलिए भी हिंदू त्यैहारों में राम नवमी का विशेष महत्त्व है, पूरे देश में रामनवमी के पर्व को उत्साह के साथ मनाया जाता है लेकिन उत्तर भारत में विशेष रूप  भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में इस दिन भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है।

    राम नवमी के दिन मंदिरों में भजन-कीर्तन आयोजन किया जाता है और कई जगह पर भगवान राम और सीता की झांकिया भी निकाली जाती हैं। इस दिन लोग पूरे दिन का उपवास करके सूर्यास्त के बाद भोजन करते हैं।

    प्रसाद के रूप में पंचामृत, श्री खंड, खीर या हलवे का भोग लगाया जाता है। राम जी के पूजन में दूध और घी का अहम स्थान होता है और इसी वजह से राम नवमी के शुभ अवसर घी की बनाई गई मिठाईयां खाई जाती हैं। इन चोजों के भोग से प्रसन्न होकर श्रीराम भक्तों के समस्त कष्टों का निवारण करते हैं। उपवास और भोज दोनों ही इस पर्व का आवश्यक हिस्सा है।

    राशि के अनुसार लगाएं श्रीराम को भोग
    मेष: राशि के लोग लड्डू और अनार का भोग लगाएं तो अच्छा रहेगा।
    वृष: इस राशि के जातक श्रीराम को रसगुल्ले का भोग लगाएं तो उनकी हर मनोकामना पूरी होगी
    मिथुन: काजू की मिठाई भगवान श्रीराम को अर्पित करें।

    हर कष्ट का होगा निवारण
    कर्क: इस राशि के लोग मावे की बर्फी और नारियल का भोग लगाएं।
    सिंह:इस राशि के लोग गुड़ व बेल का फल श्रीराम को भोग में चढ़ाएं।
    कन्या: श्रीराम को तुलसी के पत्ते और नाशपाति अथवा कोई भी हरे फल का भोग लगाएं।
    तुला: इस राशि के लोग कलाकंद और सेब का भोग लगाएं।
    वृश्चिक: गुड़ की रेवड़ी का भोग लगाएं।
    धनु: इस राशि के लोग बेसन की मिठाई का भोग लगाएं।
    रुके हुए काम शीघ्र ही हो जाएंगे

    रुके हुए काम शीघ्र ही हो जाएंगे
    मकर: इस राशि के लोग पीला पेड़ा चढ़ाएं, उन्हें धन लाभ होगा।
    कुंभ:इस राशि के लोग चॉकलेटी रंग की बर्फी और चीकू चढ़ाएं।
    मीन: भगवान श्रीराम को जलेबी और केले का भोग लगाएं। इससे इनके सभी रुके हुए काम शीघ्र ही हो जाएंगे।