Category: politics

  • Lok Sabha Elections 2024: बीजेपी-कांग्रेस दोनों के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं लोकसभा चुनाव

    Lok Sabha Elections 2024: अगले साल मई होने वाले लोकसभा चुनाव बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिहाज से निर्णायक साबित होने वाले हैं. अगर इंडिया का गठबंधन फेल होता है तो कांग्रेस का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. वहीं अगर बीजेपी नेतृत्व वाला एनडीए को मात मिलती है तो बीजेपी और ब्रांड मोदी को तगड़ा झटका लगेगा. 

    जिसकी वजह से बीजेपी लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बेहद संजीदा है. वह अपने सभी कील-कांटे दुरूस्त करने में जुटी हुई है. इसी की एक अहम कड़ी बिहार का जातीय समीकरण है. जिसे साधने में बीजेपी ने अपनी ताकत झोंकनी शुरू कर दी है. 

    जातीय समीकरणों में बंटा बिहार
    देखा जाए तो बिहार की राजनीति का इतिहास गवाह रहा है यहां कोई मुद्दा चुनावी होता ही नहीं है. यहां सारा चुनाव जाति यानी कास्ट के आधार पर होता है. इसलिए यहां एससी-एसटी का 17 फीसदी वोट बैंक निर्णायक भूमिका में रहता है. पिछली बार नीतीश कुमार और रामविलास पासवान एनडीए के साथ थे. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता हासिल करने में कोई खास परेशानी नहीं हुई थी. मगर इस बार अब रामविलास पासवान नहीं हैं, जबकि नीतीश कुमार एनडीए का साथ छोड़कर इंडिया के पाले में चले गए हैं. इस कारण बिहार में बीजेपी और एनडीए का जातीय समीकरण कुछ गड़बड़ा रहा है. बीजेपी भी अच्छी तरह जानती है कि बिहार में हिंदू के नाम पर वोट बैंक बटोरा नहीं जा सकता.

    चिराग पासवान के पास कितना फीसदी वोट बैंक
    बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार में 40 में से 39 सीटों पर कब्जा किया था. हालांकि उस समय स्थिति दूसरी थी. उस समय नीतीश और रामविलास पासवान जैसे दिग्गज नेता एनडीए के साथ थे. हालांकि, इस बार रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने उप चुनाव में बीजेपी का साथ देकर एनडीए के साथ आने के संकेत दे दिए हैं. अगर चिराग पासवान एनडीए के साथ आते हैं तो उनका 7 फीसदी पासवान वोट भी बीजेपी के खाते में आएगा. पासवान वोटों पर चिराग की पकड़ अपने पिता जैसी ही मजबूत है. इसके अलावा उनके साथ कुछ अन्य जातियों के वोट भी आ सकते हैं.

    मुकेश सहनी और मल्लाह वोट बैंक
    पासवान के बाद एक और बड़ा वोट बैंक मल्लाहों का है. जिस पर इस समय मुकेश सहनी की पकड़ सबसे ज्यादा मजबूत नजर आ रही है. मल्लाह वोट बैंक में बीजेपी का चेहरा रहे अजय निषाद की स्थिति अपने समाज में कमजोर नजर आ रही है. वह अपनी पत्नी को भी चुनाव नहीं जितवा सके थे. इसलिए बीजेपी का रुख मुकेश सहनी की ओर है. मुकेश सहनी को इंडिया गठबंधन ने कोई तवज्जो नहीं दी है. इसलिए उनका बीजेपी की ओर झुकाव लगभग तय माना जा रहा है. इसी के मद्देनजर मुकेश सहनी को बीजेपी ने वाई प्लस सुरक्षा भी दे दी है. मुकेश सहनी के आने से 6 फीसदी का बड़ा वोटबैंक बीजेपी के पाले में आ सकता है. 

    जीतन मांझी और मायावती
    बिहार में जीतनराम मांझी और उत्तर प्रदेश में मायावती के वोट बैंक में अगर बीजेपी सेंध लगाने में सफल हो जाती है तो एनडीए की सरकार फिर से बन सकती है. मगर यह सबकुछ आसान इसलिए नहीं है, क्योंकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी अपने करीब 40 साल के राजनीतिक जीवन में 8 बार पाला बदल चुके हैं. इस बार वह 9वीं बार पाला बदलने की फिराक में हैं. उन्हें सत्तासीन रहना पसंद है. वैसे भी मांझी को इंडिया के महागठबंधन ने तवज्जो नहीं दी है. अगर वह पलटते हैं तो एनडीए के खाते में बिहार से 3 फीसदी या उससे अधिक वोट बैंक का इजाफा और हो सकता है.

    इस तरह से अकेले बिहार से राजग को 20 फीसद जातिगत वोटों का लाभ मिलने की संभावना है. हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है. राजनीति में अंतिम समय में कौन पलटी मार जाए कोई नहीं जानता. वहीं उत्तर प्रदेश में भले ही मायावती पिछली बार की तरह स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ें, लेकिन अगर सरकार बनाने में जरूरत पड़ी तो उनका पलड़ा एनडीए की ओर ही झुकता नजर आएगा. वहीं दलित वोट बैंक को साधने के लिए नीतीश कुमार ने भी एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है. चिराग पासवान को साधने के लिए ललन सिंह को लगा रखा है.

  • Lok Sabha Elections 2024: बीजेपी-कांग्रेस दोनों के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं लोकसभा चुनाव

    Lok Sabha Elections 2024: अगले साल मई होने वाले लोकसभा चुनाव बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिहाज से निर्णायक साबित होने वाले हैं. अगर इंडिया का गठबंधन फेल होता है तो कांग्रेस का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. वहीं अगर बीजेपी नेतृत्व वाला एनडीए को मात मिलती है तो बीजेपी और ब्रांड मोदी को तगड़ा झटका लगेगा. 

    जिसकी वजह से बीजेपी लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बेहद संजीदा है. वह अपने सभी कील-कांटे दुरूस्त करने में जुटी हुई है. इसी की एक अहम कड़ी बिहार का जातीय समीकरण है. जिसे साधने में बीजेपी ने अपनी ताकत झोंकनी शुरू कर दी है. 

    जातीय समीकरणों में बंटा बिहार
    देखा जाए तो बिहार की राजनीति का इतिहास गवाह रहा है यहां कोई मुद्दा चुनावी होता ही नहीं है. यहां सारा चुनाव जाति यानी कास्ट के आधार पर होता है. इसलिए यहां एससी-एसटी का 17 फीसदी वोट बैंक निर्णायक भूमिका में रहता है. पिछली बार नीतीश कुमार और रामविलास पासवान एनडीए के साथ थे. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता हासिल करने में कोई खास परेशानी नहीं हुई थी. मगर इस बार अब रामविलास पासवान नहीं हैं, जबकि नीतीश कुमार एनडीए का साथ छोड़कर इंडिया के पाले में चले गए हैं. इस कारण बिहार में बीजेपी और एनडीए का जातीय समीकरण कुछ गड़बड़ा रहा है. बीजेपी भी अच्छी तरह जानती है कि बिहार में हिंदू के नाम पर वोट बैंक बटोरा नहीं जा सकता.

    चिराग पासवान के पास कितना फीसदी वोट बैंक
    बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार में 40 में से 39 सीटों पर कब्जा किया था. हालांकि उस समय स्थिति दूसरी थी. उस समय नीतीश और रामविलास पासवान जैसे दिग्गज नेता एनडीए के साथ थे. हालांकि, इस बार रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने उप चुनाव में बीजेपी का साथ देकर एनडीए के साथ आने के संकेत दे दिए हैं. अगर चिराग पासवान एनडीए के साथ आते हैं तो उनका 7 फीसदी पासवान वोट भी बीजेपी के खाते में आएगा. पासवान वोटों पर चिराग की पकड़ अपने पिता जैसी ही मजबूत है. इसके अलावा उनके साथ कुछ अन्य जातियों के वोट भी आ सकते हैं.

    मुकेश सहनी और मल्लाह वोट बैंक
    पासवान के बाद एक और बड़ा वोट बैंक मल्लाहों का है. जिस पर इस समय मुकेश सहनी की पकड़ सबसे ज्यादा मजबूत नजर आ रही है. मल्लाह वोट बैंक में बीजेपी का चेहरा रहे अजय निषाद की स्थिति अपने समाज में कमजोर नजर आ रही है. वह अपनी पत्नी को भी चुनाव नहीं जितवा सके थे. इसलिए बीजेपी का रुख मुकेश सहनी की ओर है. मुकेश सहनी को इंडिया गठबंधन ने कोई तवज्जो नहीं दी है. इसलिए उनका बीजेपी की ओर झुकाव लगभग तय माना जा रहा है. इसी के मद्देनजर मुकेश सहनी को बीजेपी ने वाई प्लस सुरक्षा भी दे दी है. मुकेश सहनी के आने से 6 फीसदी का बड़ा वोटबैंक बीजेपी के पाले में आ सकता है. 

    जीतन मांझी और मायावती
    बिहार में जीतनराम मांझी और उत्तर प्रदेश में मायावती के वोट बैंक में अगर बीजेपी सेंध लगाने में सफल हो जाती है तो एनडीए की सरकार फिर से बन सकती है. मगर यह सबकुछ आसान इसलिए नहीं है, क्योंकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी अपने करीब 40 साल के राजनीतिक जीवन में 8 बार पाला बदल चुके हैं. इस बार वह 9वीं बार पाला बदलने की फिराक में हैं. उन्हें सत्तासीन रहना पसंद है. वैसे भी मांझी को इंडिया के महागठबंधन ने तवज्जो नहीं दी है. अगर वह पलटते हैं तो एनडीए के खाते में बिहार से 3 फीसदी या उससे अधिक वोट बैंक का इजाफा और हो सकता है.

    इस तरह से अकेले बिहार से राजग को 20 फीसद जातिगत वोटों का लाभ मिलने की संभावना है. हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है. राजनीति में अंतिम समय में कौन पलटी मार जाए कोई नहीं जानता. वहीं उत्तर प्रदेश में भले ही मायावती पिछली बार की तरह स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ें, लेकिन अगर सरकार बनाने में जरूरत पड़ी तो उनका पलड़ा एनडीए की ओर ही झुकता नजर आएगा. वहीं दलित वोट बैंक को साधने के लिए नीतीश कुमार ने भी एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है. चिराग पासवान को साधने के लिए ललन सिंह को लगा रखा है.

  • Congress plan for 2024 Election: क्या 2004 के फॉर्मूल से 2024 में रचा जाएगा इतिहास

    Congress plan for 2024 Election: आने वाले लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2024) के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों चुनावी ताना-बाबा बुनने में जुटे हैं। विपक्ष जहां कई बड़े राजनीतिक दलों को एकजुट करके एनडीए के खिलाफ चुनावी बिगुल फूंकना चाहता है वही एनडीए भी छोटे दलों के साथ गठबंधन करने की रणनीति पर काम कर रही है। 

    वही कांग्रेस बीजेपी को हराने के लिए अब स्वयं को विपक्षी एकता का नेतृत्वकर्ता बनाने में जुटी हुई है। बीते दिन विपक्ष की बेंगलुरु में बैठक हुई- बैठक में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी शामिल हुईं। सोनिया की मौजूदगी ने विपक्ष एकता को कई संकेत दे दिए। बड़े नेता ममता बनर्जी और शरद पवार राहुल के नेतृत्व को स्वीकार करने में थोड़ा असहज थे वही अब सोनिया गांधी की मौजूदगी ने नेतृत्व का असमंजस खत्म कर दिया है। वही विपक्ष के नेताओं को सोनिया का नेतृत्व भी स्वीकार होगा। 

    विपक्ष की मीटिंग में सोनिया की उपस्थिति यह संकेत दे रही है कि कांग्रेस सोनिया गांधी के बलबूते विपक्ष एकता का नेतृत्व करना चाहती है। अगर हम जानकारों की मानें तो कांग्रेस  लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2024) के लिए साल 2004 का पुराना फार्मूला दोहरा रही है। इस साल कांग्रेस ने एनडीए का मुकाबला करने के लिए 6 विपक्षी दलों के साथ गठबंधन किया था और जीत दर्ज कर इतिहास रचा था। वही अब कांग्रेस पुनः विपक्ष एकता के बलबूते सत्ता में पुनर्वापसी की रणनीति बना रही है। 

    बता दें 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने गठबंधन के बलबूते 188 लोकसभा सीटों में से 114 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वही  56 सीट पर उसके सहयोगी दलों में जीत का परचम लहराया। 

  • Opposition Party Meet: नीतीश-उद्धव अचानक सेक्युलर हो गए

    Opposition Party Meet: 2024 में पीएम मोदी का रथ रोकने के लिए देश के 26 राजनीतिक पार्टियों के नेता 18 जुलाई को कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में मिले, लेकिन इसमें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) शामिल नहीं थी. एआईएमआईएम ने बेंगलुरु की बैठक को लेकर विपक्ष पर हमला बोला है. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा कि उन्होंने (विपक्षी पार्टियों) हमें नहीं बुलाया, उनके लिए हम राजनीतिक अछूत हैं.

    पठान ने कहा, उस बैठक में नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे और महबूबा मुफ्ती भी शामिल हैं, जो कभी बीजेपी के साथ सरकार में रहे हैं. ये सब अचानक से सेक्युलर हो गए. उन्होंने आगे कहा, वहां केजरीवाल जी हैं, जिन्होंने गुजरात के चुनाव में गालियां दे-देकर कांग्रेस को हरवा दिया और अब जाकर उनके साथ बैठ गए हैं. वे भी सेक्युलर हो गए हैं.

    हम भी बीजेपी को हराने में लगे- वारिस पठान

    एआईएमआईएम प्रवक्ता ने विपक्षी दलों पर उनकी पार्टी को अलग-थलग रखने का आरोप लगाते हुए कहा, उनका (विपक्ष) का कहना है कि हमें संविधान को बचाना है, लोकतंत्र को बचाना और बीजेपी को हराना है. तो हमारा भी मेन मुद्दा यही है कि किसी भी तरह बीजेपी को हराएं और 2024 में फिर से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री न बनें. आप हमको नजर अंदाज कैसे कर सकते हैं.

    वारिस पठान ने आगे कहा, एआईएमआईएम को यूपीए की सरकार में आपके साथ थी. प्रफुल्ल पटेल साहेब पहली बैठक में आपके साथ आए और अब बीजेपी के साथ चले. अब मंत्री बनने वाले हैं, वो आपको नहीं दिखता और एक शख्स जो संविधान को बचाने की बात कर रहा है, यूसीसी के खिलाफ लड़ रहा है, आप इस तरह से उन्हें कैसे इग्नोर कर सकते हैं.

    पठान बोले- सबको पता चल गया बी टीम कौन

    एआईएमआईएम नेता ने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों को मुसलमानों का वोट तो चाहिए लेकिन मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं चाहिए. हमें सब बीजेपी की बी टीम बोलते हैं. कुछ दिन पहले सबने महाराष्ट्र में देख लिए कि असल में बीजेपी की बी टीम कौन है

  • Centre For Media Studies Report: 2019 लोकसभा चुनाव था दुनिया का सबसे महंगा चुनाव

    Centre For Media Studies Report: चुनावों के दौरान करोड़ों रुपये कैश जब्त होने की तस्वीरें हर बार नजर आती हैं, जिससे अंदाजा लगाया जाता है कि किसी भी राज्य या फिर लोकसभा के चुनाव में कैसे पानी की तरह पैसे बहाए जाते हैं. अब इसे लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि पिछले लोकसभा चुनाव (2019) के दौरान करीब 8 अरब डॉलर यानी 55 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए. जिसके बाद इस चुनाव ने खर्च के मामले में दुनियाभर के देशों के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए. ये खर्च 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से भी ज्यादा है. जिसमें करीब 6.5 बिलियन डॉलर का खर्च हुआ था. 

    पिछले 20 साल में 6 गुना बढ़ा खर्च
    साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी और ज्यादा प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई और नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने. इसी चुनाव को लेकर सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की रिपोर्ट सामने आई है. जिसमें बताया गया है कि चुनाव खर्च पिछले 20 सालों में 1998 से लेकर 2019 तक 9 हजार करोड़ से करीब 6 गुना बढ़कर 55 हजार करोड़ रुपये हो गया है. 

    बीजेपी ने किया सबसे ज्यादा खर्च
    रिपोर्ट में बताया गया है कि सत्ताधारी बीजेपी ने इस कुल खर्च का आधा पैसा अकेला चुनाव पर खर्च किया है. यानी बाकी सभी दलों के मुकाबले अकेले बीजेपी ने चुनाव पर बेतहाशा पैसा बहाया और पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. इस चुनाव में करीब 90 करोड़ वोटर्स ने हिस्सा लिया और ये करीब 75 दिनों तक चला. इस दौरान कई रैलियां, बड़े स्तर पर विज्ञापन और सोशल मीडिया कैंपेन पर जमकर पैसा खर्च किया गया.   

    रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल पैसे का सबसे ज्यादा लगभग एक तिहाई सिर्फ प्रचार पर खर्च किया गया. दूसरा सबसे बड़ा खर्च वोटर्स के हाथों में सीधे पैसे पहुंचाना था. रिपोर्ट में एक अनुमान के तहत बताया गया है कि लगभग 15 हजार करोड़ रुपये अवैध तौर पर मतदाताओं के बीच बांटे गए. 

    लोगों को बांटा गया हजारों करोड़ कैश
    रिपोर्ट में कैश के बंटवारे के ट्रेंड को लेकर कहा गया है कि पिछले चुनाव में ये सबसे ज्यादा देखा गया. इसमें 10 से 12 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें नकद पैसे मिले थे. वहीं कई लोगों ने ये भी स्वीकार किया कि उनके जानने वाले और आसपास के लोगों को भी वोट देने के लिए नकद पैसे मिले थे. 2019 में ज्यादातर पार्टियों की तरफ से इसे एक रणनीति के तहत इस्तेमाल किया गया.

    इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले अधिकारियों का कहना है कि ये सिर्फ उस अनुमान पर आधारित रिपोर्ट है, जिसे मीडिया रिपोर्ट, उम्मीदवारों के एनालिसिस और चुनावी अभियान पर रिसर्च कर तैयार किया गया है. इसके अलावा बाकी कई तरह के खर्च हो सकते हैं. उन्होंने इसे ‘टिप ऑफ आइसबर्ग’ बताया.

  • NDTV-CSDS Survey: ‘INDIA’ के आने से बढ़ेगी एनडीए की टेंशन

    Lok Sabha Election Survey: 2024 के महामुकाबले का मंच तैयार हो चुका है. पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए का रथ रोकने के लिए कांग्रेस समेत 26 विपक्षों दलों ने I.N.D.I.A नाम से नया गठबंधन किया है. गठबंधन के ऐलान के बाद 2024 की जंग दिलचस्प होती जा रही है. इस बीच सीएसडीएस के एक सर्वे के आंकड़े ने पीएम मोदी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है.

    एनडीटीवी के लिए सीएसडीएस ने ये सर्वे इसी साल मई में मोदी सरकार के 9 साल पूरे होने किया था, लेकिन विपक्षी दलों के गठबंधन के बाद इसके आंकड़े एक बार फिर से प्रासंगिक हो गए हैं. वैसे तो सर्वे के अनुसार, नरेंद्र मोदी देश के सबसे पॉपुलर नेता हैं और अपने विरोधियों से काफी आगे हैं, लेकिन इसी सर्वे के आंकड़ों को अध्ययन करें तो बीजेपी को चिंता करने की जरूरत है. पहले सर्वे के आंकड़े जान लेते हैं.

    कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी काफी आगे

    सर्वे के अनुसार, वोटिंग शेयर के मामले में बीजेपी अपनी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से काफी आगे है. सर्वे में शामिल 39 फीसदी लोगों ने बताया था कि अगर अभी चुनाव होते हैं, तो वे बीजेपी को वोट करेंगे. ध्यान देने की बात है कि सर्वे में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 37.7 प्रतिशत वोट मिले थे.

    सर्वे में कांग्रेस को 29 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान लगाया था, जो कि 2019 के मुकाबले काफी अच्छी बढ़त है, लेकिन ग्रैंड ओल्ड पार्टी अभी भी बीजेपी से 10 फीसदी के अंतर से पीछे है. आंकड़ों में बीजेपी की बढ़त के बावजूद उसके लिए चिंता करने की वजह मौजूद है.

    कम हो सकता है अंतर

    भले ही सर्वे में बीजेपी आगे है लेकिन ध्यान देने की बात है कि ये आंकड़े एनडीए और विपक्ष के गठबंधन के नहीं हैं. इसलिए सर्वे के वोट शेयर में अंतर आ सकता है, खास तौर पर जब चुनाव के पहले नए गठबंधन बन रहे हैं.

    ये महत्वपूर्ण है कि सर्वे में अन्य को जा रहा 28 प्रतिशत वोट बीजेपी और कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों को मिलता दिखाया गया था. 2019 के बाद से देश की राजनीति में नया समीकरण बना है. विपक्ष का कुनबा बढ़ा है, जबकि नीतीश कुमार की जेडीयू, शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुट और शिरोमणि अकाली दल जैसे एनडीए के बड़े सहयोगी साथ छोड़ चुके हैं.

    कांग्रेस के वोटों का बढ़ना बीजेपी के लिए टेंशन

    बीजेपी के लिए दूसरी चिंता कांग्रेस के वोटों का तेजी से बढ़ना है. सर्वे में बीजेपी को 39 प्रतिशत, जबकि कांग्रेस को 29 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान लगाया गया है. खास बात ये है कि बीजेपी के वोट शेयर में सिर्फ 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि 2019 की तुलना में कांग्रेस का वोट शेयर 9.3 प्रतिशत ऊपर आया है. 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस को 19.67 प्रतिशत वोट मिले थे.

    महंगाई-भ्रष्टाचार पर मोदी सरकार के लिए चिंता वाली बात

    सर्वे में पीएम मोदी 43 प्रतिशत वोट के साथ अभी भी देश के नंबर 1 नेता हैं, लेकिन देश में घरेलू मुद्दे खासतौर पर महंगाई को लेकर जनता की राय मोदी सरकार को लेकर ठीक नहीं है. सीएसडीएस के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 57 प्रतिशत लोग वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को लेकर मोदी सरकार से खुश नहीं हैं. 33 प्रतिशत ने कहा है कि सरकार महंगाई पर ठीक काम कर रही है भ्रष्टाचार पर 45 प्रतिशत ने मोदी सरकार के प्रदर्शन को खराब बताया है, जबकि 41 प्रतिशत ने इसे ठीक कहा है.

  • Manipur Violence: बंगाल की घटनाओं को याद कर रो पड़ीं बीजेपी सांसद लॉकेट चटर्जी

    Locket Chatterjee Breaks Down: बीजेपी सांसद लॉकेट चटर्जी ने शुक्रवार (21 जुलाई) को मणिपुर की घटना का जिक्र करते हुए पश्चिम बंगाल में महिलाओं पर हुए अत्याचार की बात पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही. इस दौरान महिलाओं पर अत्याचार का जिक्र करते वह बेहद भावुक हो गईं और रो पड़ीं. इसी के साथ उन्होंने कांग्रेस, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधा.

    बीजेपी सांसद ने कहा, ”…वीडियो जब वायरल होता है, तब हम लोग बात करेंगे? अभी कांग्रेस भी ममता बनर्जी के साथ जुड़ी हुई है. भारत का नाम दिया, INDIA दिया. सोनिया गांधी क्यों चुप हैं? प्रियंका गांधी क्यों चुप हैं? क्योंकि ममता बनर्जी को उन्होंने साथ दिया है. बाकी प्रदेश में जाकर ये लोग रोते हैं लेकिन बंगाल में जाकर ये लोग कुछ नहीं बोलेंगे.”

    ‘हम लोग भी महिला हैं’

    लॉकेट चटर्जी ने कहा, ”अभी (अधीर रंजन) चौधरी जी हैं, उनको जाकर पूछिए कि बंगाल में उनके क्षेत्र मुर्शिदाबाद में क्या-क्या हुआ है. एक के बाद एक… घटना घट रही है लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री महिला होकर भी चुप हैं.” इतना कहते हुए लॉकेट चटर्जी रो पड़ीं और उन्होंने कहा, ”आप लोग बोलिए हम लोग कहां जाएंगे? हम लोग भी महिला हैं. आप लोग भी चाहते हैं कि हमारी बेटी है वो, उनको बचा लो, हम लोग भी देश की बेटी हैं, मणिपुर की भी देश की बेटी है, पश्चिम बंगाल बाहर नहीं है, पश्चिम बंगाल देश में ही है.”

    लॉकेट चटर्जी का वीडियो-

    बीजेपी सांसद ने कहा, ”प्रधानमंत्री जी कल मणिपुर की घटना के लिए बोले लेकिन सब राज्यों के लिए बोले. हमारी सब बेटियों के लिए बोले कि सब राज्यों में कानून व्यवस्था स्ट्रांग होना चाहिए. सिर्फ मणिपुर की बेटी नहीं, देश की बेटी है वो और हम भी चाहते हैं कि हमारे लिए भी कुछ बात आप लोग करें. हमारी बेटी कहां जाएंगी…

    ‘पंचायत चुनाव के नाम से ये खून का चुनाव हुआ’

    इससे पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बात शुरू करते हुए बीजेपी सांसद ने कहा, ”मणिपुर की जो घटना घटी है, ये तो बहुत दुख की बात है, बहुत संवेदनशील है, जो वीडियो सामने आए. मणिपुर की बेटी देश की बेटी है लेकिन हम लोग भी कुछ बोलना चाहते हैं.”

    उन्होंने कहा, ”ये पंचायत चुनाव के नाम से ये खून का चुनाव हुआ… ये महिला के अत्याचार के ऊपर चुनाव हुआ, ये चुनाव नहीं है, ये भी महिला लोगों पर अत्याचार की एक पिक्चर सामने आई है. बहुत सारी घटनाएं महिलाओं के ऊपर घटती हैं. 10-12 साल में आप देखिए ममता बनर्जी एक महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद भी बार-बार महिलाओं के ऊपर घटना करती हैं.” 

    8 जुलाई की घटना का किया जिक्र

    लॉकेट चटर्जी ने कहा, ”इस पंचायत चुनाव में 8 जुलाई (चुनाव के दिन) को ग्रामसभा की एक महिला कैंडिडेट को बूथ के अंदर जाकर उसको निर्वस्त्र करके उसको प्राइवेट पार्ट में टच करके ये सब बदतमीती की गई. 11 जून को मतगणना के दिन तृणमूल की एक महिला कैंडिडेट को काउंटिंग रूम में उसके साथ अत्याचार किया गया.”

    उन्होंने कहा, ”आप देख रहे हैं कि वहां का कुछ वीडियो नहीं है. वीडियो वायरल नहीं हुआ. कोई वहां जाकर ऐसे वीडियो नहीं कर पाया. वहां पर तो सब गन लेकर काउंटिंग रूम में चले गए. गन-बम लेकर गए, महिला को सामने खड़ा करके, उसके सिर पर बंदूक रखकर उसको निर्वस्त्र किया. उस पर अत्याचार किया, तो उस पर कोई जांच नहीं होगी? उसके लिए हम लोग कुछ नहीं बोलेंगे?” उन्होंने कहा, ”कालियागंज में पंचायत चुनाव के पहले एक दलित महिला पर अत्याचार करके उसका खून कर दिया. उसको खींचते-खींचते पुलिस लेकर जा रही है, वो भी वीडियो आपके सामने आया है.”

  • Manipur Violence: आप कैसे पीएम हैं, संसद में गूंजा मणिपुर,मणिपुर,मणिपुर

    Manipur Violence:  कल सोशल मीडिया पर मणिपुर की घटना के वीडियो ने सभी को झझकोर दिया। महिला सुरक्षा सवालों के घेरे में खड़ी हो गई। घटना इतनी भयावह थी की रूह कांप उठी। पूरा देश क्रोध से आग बबूला था, भारत का रोम-रोम रो रहा था। केंद्र सरकार सवालों के घेरे में थी और लगातार मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग उठ रही थी। विपक्ष बार-बार पूछ रहा था मोदी जी ऐसी क्या मजबूरी है कि आप मणिपुर के सीएम से इस्तीफ़ा नहीं ले रहे हैं। वही मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने सदन में एकजुट होकर मणिपुर हिंसा के संदर्भ में आवाज उठाई। पूरे सदन में मणिपुर गूंज रहा था। 

    लेकिन इस सबसे बीच तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन क्रोध में दिखे। वह बोले पीएम आप कहाँ हैं, आपको इस मुद्दे पर बोलना होगा, हम मणिपुर पर बात करना चाहते हैं। कैसे पीएम हैं वो। अभी कोई और नियम कैसे आएगा। आपको पहले मणिपुर का मसला सुलझाना होगा। मणिपुर,मणिपुर,मणिपुर। वही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कहते हैं, मणिपुर जल रहा है, महिलाओं के साथ दरिंदगी हो रही है, अभद्रता की सभी हदें लांघी जा रही हैं, उन्हें नंगा करके सड़क पर घुमाया जा रहा है लेकिन पीएम मौन हैं। वह सदन के बाहर एक बयान देते हैं। इस विषय पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। 

    बता दें पीएम मोदी ने अपने बयान में कहा था कि मणिपुर में जो हुआ उससे मेरा ह्रदय दुखी है, मै क्रोध में हूँ। मणिपुर में जो हुआ वह शर्मनाक है, मणिपुर की घटना ने 140 करोड़ देशवाशियों को शर्मशार किया है। अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा। 

  • Politics: बीजेपी को वसुंधरा के ‘फेस’ पर भरोसा क्यों नहीं?

    साल 2023 के अंत में राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. इस चुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस समेत सभी स्थानीय पार्टियों ने भी अपनी तैयारी तेज कर दी है. अब खबरें आ रही है कि राज्य में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के मैदान में उतर सकती है.

    एक तरफ जहां कांग्रेस विधानसभा चुनाव में बिना सीएम चेहरे के मैदान में उतरने का औपचारिक ऐलान कर चुकी है, तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी भी बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के मैदान में उतरने की तैयारी में है.

    सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि बीजेपी के पास वसुंधरा राजे और कांग्रेस के पास अशोक गहलोत जैसे दिग्गज नेता मौजूद हैं फिर भी दोनों पार्टियां सीएम पद के चेहरे के बिना चुनाव में क्यों उतरना चाहती है?

    बात पहले सत्ताधारी कांग्रेस की…
    राजस्थान के स्थानीय पत्रकार और रहीम खान कहते हैं, ‘कांग्रेस की बात करें तो वहां अशोक गहलोत के अलावा सचिन पायलट भी मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं. लेकिन अगर अशोक गहलोत के चेहरे पर चुनाव लड़ा गया तो पायलट गुट के लोग कांग्रेस में रहकर ही कांग्रेस को हराने का काम करेंगे.’

    रहीम खान आगे कहते हैं- दूसरा पायलट जिस गुर्जर समुदाय से आते हैं उसकी नाराजगी भी उठानी पड़ेगी. कुछ लोगों में अभी भी इस बात को लेकर नाराजगी है कि साल 2018 का चुनाव पायलट के नेतृत्व में लड़ा गया था लेकिन बहुमत मिलने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बनाया गया.

    उन्हें लगता है कि पिछली बार पायलट के साथ पार्टी आलाकमान ने धोखा किया है. इस बार उन्हें यह उम्मीद है कि अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री पायलट को बनाया जाएगा. इसलिए किसी एक को मुख्यमंत्री का चेहरा बना कर कांग्रेस पार्टी अभी किसी की भी नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती है.

    एक और स्थानीय पत्रकार कहते हैं, ‘कांग्रेस में गहलोत चेहरा तो है, लेकिन पिछला रिकॉर्ड देखें तो गहलोत की छवि अच्छे मैनेजर की जरूर रही है लेकिन चुनाव जिताऊ के मामले में उनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया है. बताया जा रहा है कि इस बार इतना जोर लगाने के पीछे भी यही कारण है गहलोत 1998 का अपना टैग हटाना चाहते हैं. इसके अलावा पायलट फैक्टर भी एक वजह है जहां चुनावों से पहले फेस बनाने से गुर्जर वोट बैंक छिटक सकता है.

    बीजेपी में सीएम दावेदार की लंबी लिस्ट-
    रहीम खान कहते हैं कि अगर बीजेपी की बात की जाए तो इस पार्टी में फिलहाल वसुंधरा राजे सिंधिया के अलावा मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की एक लंबी लिस्ट है जो अपने अपने क्षेत्र में प्रभाव रखते हैं. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया 4 साल तक प्रदेश अध्यक्ष के पद पर रहे हैं और वो खुद को मुख्यमंत्री का दावेदार समझ रहे थे. ले

    हालांकि, कुछ महीने पहले अचानक से उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. इस एक्शन को लेकर जाट समुदाय में नाराजगी है. इस नाराजगी को कम करने के लिए ही उन्हें विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है लेकिन किसी और को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर देने से जाटों की नाराजगी और बढ़ सकती है.

    रहीम आगे कहते हैं कि इसके अलावा नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ भी सीएम पद के दावेदार हैं. केन्द्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह, सांसद राज्यवर्धन सिंह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला भी सीएम पद के दावेदार बताए जा रहे हैं. अभी हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए सांसद सीपी जोशी भी खुद को सीएम पद की दौड़ में मान रहे हैं.

    वसुंधरा राजे भी समय समय पर शक्ति प्रदर्शन कर अपनी ताकत का एहसास करवाती रहती हैं. कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के भले ही सिर्फ दो दावेदार हैं लेकिन भाजपा में एक लंबी लिस्ट है, ऐसे में किसी एक को मुख्यमंत्री का चेहरा बना कर पार्टी बाकी सब की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती है.

    जानकारों के मुताबिक 2023 के चुनावों में दोनों ही दलों के बिना किसी चेहरे के चुनावों में उतरने के अपने-अपने कारण है. बीजेपी जहां केंद्रीकरण कल्चर ज्यादा है वह राजस्थान के मामले में रिस्क नहीं लेना चाहती है, क्योंकि वसुंधरा राजे अगर इस बार जीतती है तो वह काफी मजबूत हो जाएंगी. इसके अलावा गहलोत सरकार की योजनाओं के सामने पीएम मोदी की योजनाओं को खड़ा करना सियासी फायदे का सौदा हो सकता है.

    पहले भी सीएम फेस के बिना मैदान में उतर चुकी है कांग्रेस-
    इससे पहले साल 2018 में विधानसभा चुनाव हुए थे, कांग्रेस ने उस चुनाव में भी परिणाम से पहले सीएम के चेहरे का ऐलान नहीं किया था. जीत के बाद पार्टी ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी की तरफ से वसुंधरा राजे सिंधिया को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में पेश किया गया था.

    इससे पहले यानी साल 2013 में विधानसभा चुनाव हुए. उस वक्त चुनाव से पहले ही अशोक गहलोत सीएम के चेहरे के रूप में सामने थे, जबकि बीजेपी ने उस वक्त भी वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया था.

    उसके पहले भी लगभग हर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी की तरफ से कोई न कोई सीएम के चेहरे के रूप में पेश किया जाता रहा है. देखा जाए तो ये पहली बार होगा जब दोनों ही प्रमुख पार्टियां बिना चेहरे के मैदान में उतर रही हैं.  

  • Lok Sabha Election 2024: यूपी में जातिय राजनीति कितनी प्रबल

    Lok Sabha Election 2024: साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी बीजेपी लगातार अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है। यूपी पर  राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की खास नजर है।  राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) यूपी में 80 सींटो पर अपनी जीत का ध्वज लहराना चाहती है। कई छोटे दलों के साथ गठबंधन करके एनडीए स्वयं को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में लगी हुई है। वही राजनीति के जानकारों का कहना है कि  राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)  इस बार के चुनाव में जातिय रणनीति का पासा फेकने की कोशिश में है। बीजेपी को यह मालूम है कि उसका निजी वोट बैंक उसके प्रति कट्टर रूप से ईमानदार है। उसकी पकड़ यदि जातिय वोट बैंक पर बन जाती है तो विपक्ष उसके सामने धराशायी हो जाएगा। जातिय समीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण तब सामने आया जब बीजेपी के आलोचक बने ओम प्रकाश राजभर बीजेपी में शामिल हो गए और  राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)  के लिए शहद उगलने लगे। 

    हालाकि बीजेपी के लिए जातिय समीकरण का ताना-बाना बुनना और उसे जमीनी स्तर पर लागू करना आसान नहीं होगा। क्योंकि विपक्ष भी इस बार मजबूती के साथ बीजेपी को टक्कर दे रहा है। अब बीजेपी का मुकाबल अलग-अलग विपक्षी दलों के साथ नहीं है अपितु इंडिया के साथ है। बीजेपी स्वयं को जितना बेस्ट जनता के बीच दिखाने का प्रयास करेगी विपक्ष बीजेपी की रणनीति को फेल करने की कवायद में जुटेगा। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि कैसे जातिय रणनीति का फार्मूला बीजेपी के लिए यूपी में लाभकारी साबित होगा। 

    जानें यूपी में जाति की राजनीति कितनी प्रबल –

    उत्तरप्रदेश विविधताओं का शहर है। यूपी में अलग-अलग जाति और समुदाय के लोग रहते हैं। यूपी के लोगों के विचार और यहाँ की राजनीति अन्य राज्यों की तुलना में बिलकुल अलग। है यूपी में राजनीति का मुख्य आयाम जाति है। यहाँ राजनीति में कोई तभी ऊपर उठता है जब वह जातिय गठजोड़ बनाता है और जाति के नाम पर जनता को अपनी तरफ आकर्षित करता है। 

    यूपी की किसी भी बड़ी पार्टी की बात करें तो उसका संबंध जातिय राजनीति से जुड़ा हुआ है। बीएसपी जो दलित हितैसी पार्टी के रूप में जानी जाती है उसने यूपी में अपनी पैख़ दलित वोट बैंक के बलबूते जमाई। बीएसपी को जनता दलितों की पार्टी कहती है। वही बीजेपी ने यूपी में दलितों के बलबूते स्वयं को सत्ता में स्थापित किया। 

    समाजवादी पार्टी जो ओबीसी के बड़े दल यादवों की पार्टी मानी जाती है। समाजवादी को लोग यादव और मुस्लिम  हितैसी पार्टी कहते हैं। समाजवादी पार्टी ने यूपी में कई वर्ष सत्ता में राज किया। सपा जातिय राजनीति के बलबूते यूपी में छाई हुई है। जनता का मानना है कि सपा ओबीसी हित में काम करती है वही यदि समाजवादी की सरकार बनती है तो यह उनके हित में होगा। सपा एक ऐसा दल है जो मुस्लिम और यादव दोनों की पहली पसंद बना हुआ है। यादव सपा को अपने घर की पार्टी कहते हैं। 

    हालाकि वर्तमान में सपा की छवि यूपी में बिगड़ी है। यादव अभी भी सपा के पक्ष में है लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी की जमीनी राजनीति ने जनता को खूब आकर्षित किया है। अब जनता राहुल गांधी की तरफ आस भरी निगाहों से देखने लगी है। मुस्लिम कांग्रेस को सपा का बेहतर विकल्प मानने लगी है। इसका जीता जाता उदाहरण तब सामने आया जब यूपी में हुए उपचुनाव में सपा से अधिक कांग्रेस को वोट मिले। 

    वही बीजेपी ने जब यूपी की राजनीति में दखल दिया तो उसने पूरा प्रयास किया कि वह  यूपी में धर्म की राजनीति प्रबल कर सकें। ऐसा हुआ भी बीजेपी ने दो बार धर्म के नाम पर यूपी में अपनी जीत दर्ज की। जनता का बीजेपी को भरपूर समर्थन मिला। हर तमगे के व्यक्ति ने बीजेपी को अपना प्यार दिया। लेकिन समय बदल गया और अब बीजेपी भी  जाति की राजनीति में अपना हाथ आजमाना चाहती है। 

    जाति की राजनीति में बीजेपी के लिए क्या समस्या –

    बीजेपी यूपी में जाति की राजनीति करना चाहती है लेकिन यह राह बीजेपी के लिए आसान नहीं है। बीजेपी को जाति और धर्म के लोग अलग-अलग तरह की पार्टी के रूप में देखते हैं। अगर मुस्लिम समाज की बात करें तो यह लोग बीजेपी को हिन्दू हितैषी पार्टी कहते हैं। पीएम मोदी बार-बार मुस्लिम वोट बैंक को अपनी तरफ करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। लेकिन मुस्लिम समाज बीजेपी पर विश्वास करने को तैयार नहीं। 

    अब बीजेपी के लिए दूसरी सबसे बड़ी समस्या है जाति – बीजेपी को ओबीसी, एससी और एसटी समाज सवर्ण समाज की पार्टी मानता है। इस जाति के लोगो का मत है बीजेपी जो भी कार्य करती है वह इनके हित में करती है। बीजेपी के पास कोई भी नीति दलितों और पिछड़ों के हित हेतु नहीं है। बीजेपी के सत्ता में रहते दलित,पिछड़ों का शोषण हुआ है। 

    हालाकि बीजेपी स्वयं को मजबूत करने के लिए जातिय रणनीति का ताना-बाना मजबूत करने में जुटी हुई है। लगातार अलग-अलग जाति के दलों के नेताओं के साथ मिलकर उनका गठबंधन एनडीए से कर रही है। बीजेपी प्रत्येक जाति के नेता के साथ मिलकर स्वयं को मजबूत करने और जातिय स्तर पर बेहतर बनाने में जुटी हुई है।