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  • विपक्ष एकता में राहुल स्वीकार नहीं

    भाजपा और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध करने वाली 15 पार्टियों को पटना में इकट्ठा हुए मुश्किल से एक सप्ताह ही हुआ था कि इनमें से शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी)  दो जुलाई को टूट गयी. शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने संकटमोचक माने जाने वाले प्रफुल्ल पटेल और पूर्व मंत्री छगन भुजबल जैसे  दिग्गजों के साथ मिलकर बीजेपी से हाथ मिला लिया.

    अजित, भुजबल और एनसीपी के सात अन्य नेता महाराष्ट्र सरकार में मंत्री बने. अजित के समर्थक इस बात से नाराज थे कि शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले 23 जून को विपक्षी नेताओं की बैठक में भाग लेने के लिए पटना गए थे. यहां पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी मौजूद थे. अजित और अजित समर्थक राहुल को विपक्ष का चेहरा और 2024 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद का संभावित उम्मीदवार बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे.

    सिर्फ अजित पवार ही नहीं, कम से कम चार दलों के शीर्ष नेताओं ने राहुल को विपक्ष के चेहरे के रूप में पेश करने को लेकर आपत्ति जताई है. इनमें शरद पवार भी शामिल रहे हैं. इसके अलावा ममता बनर्जी और अखिलेश यादव जैसे नेता राहुल के नेतृत्व कौशल को लेकर उन पर निशाना साध चुके हैं. 2020 में शरद पवार ने एक साक्षात्कार में कहा था कि राहुल के नेतृत्व में ‘कुछ समस्याएं थीं और उनमें निरंतरता की कमी है.

    हाल ही में जब राहुल और कांग्रेस ने अडानी समूह पर लगे आरोपों की संयुक्त संसदीय समिति से जांच की मांग थी, तो शरद पवार ने कहा कि उनकी मांग गलत है, उन्होंने ये भी कहा था कि अडानी समूह के खिलाफ जानबूझकर बदनाम करने का अभियान चलाया जा रहा है.

    दिसंबर 2021 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुंबई में राहुल की कार्यशैली का मजाक उड़ाया था. उन्होंने उनका नाम लिए बिना कहा, ‘अगर कोई कुछ नहीं करता और आधे समय विदेश में रहता है तो कोई राजनीति कैसे करेगा? राजनीति के लिए निरंतर प्रयास होना चाहिए’.

    हाल ही में जब समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया, तो उन्होंने राहुल को अपनी शुभकामनाएं भेजीं, लेकिन पैदल यात्रा का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया.

    पीएम मोदी से मुकाबला नहीं कर पाएंगे राहुल गांधी

    23 जून को पटना सम्मेलन के दौरान सभी ने पिछले मतभेदों को भुलाने की बात की. लेकिन निजी तौर पर कई विपक्षी नेता राहुल को एकजुट विपक्ष के चेहरे के रूप में पेश करने से सावधानी बरतते दिखे. उन्हें डर है कि प्रधानमंत्री मोदी और राहुल के बीच  मुकाबले में दूसरे नंबर पर रहेंगे. 

    हालांकि, कांग्रेस का मानना है कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल की छवि में काफी सुधार हुआ है. सोशल मीडिया पर उन्हें मिल रहा रिस्पॉन्स उनकी उभरती लोकप्रियता का एक संदेश माना जा रहा है. कांग्रेस नेताओं का दावा है कि पिछले कुछ महीनों में राहुल की पोस्ट पर प्रतिक्रियाएं पीएम मोदी के मुकाबले ज्यादा रही हैं.

    बता दें कि राहुल गांधी पर मानहानि के मुकदमे के बाद राहुल को संसद की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया गया. लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें कोई राहत मिलने की संभावना नहीं है. लोकसभा चुनावों से पहले कोई राहत न मिलना उन्हें पीएम बनने की दौड़ से बाहर कर देगा.

    राहुल के बयानों से विपक्ष को रहा है ऐतराज

    राहुल के सार्वजनिक बयानों से भी विपक्ष सहमत नहीं रहा है. शरद पवार अडानी पर बयानों से लेकर विनायक दामोदर सावरकर पर दिए गए  राहुल के बयानों से सहमत नहीं थे.

    राहुल गांधी ने दिल्ली के अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था, “मेरा नाम सावरकर नहीं है. मेरा नाम राहुल गांधी है और गांधी किसी से माफ़ी नहीं मांगता.”

    उद्धव ठाकरे ने भी विनायक दामोदर सावरकर  को लेकर राहुल के बयान से नाराजगी जताई थी. उद्धव ठाकरे ने राहुल को चेतावनी दी थी कि वह विनायक दामोदर सावरकर के बारे में अभद्र टिप्पणी न करें. बता दें कि इस बयान के बाद उद्धव ठाकरे विपक्षी दलों की मीटिंग में भी नहीं गए थे. इस मीटिंग में विपक्ष के कुल 18 दलों के प्रतिनिधि मौजूद थे. 

    शिवसेना ने दी थी राहुल को चेतावनी

    उद्धव ठाकरे ने राहुल गांधी के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “सावरकर अंडमान के काला पानी की जेल में 14 वर्षों तक अकल्पनीय तकलीफे झेलते रहे थे. सावरकर हमारे लिए भगवान तुल्य हैं और उनका अपमान हम सहन नहीं करेंगे.”

    उद्धव ठाकरे ने ये भी संकेत साफ शब्दों में दे दिए कि अगर राहुल गांधी सावरकर का अपमान करते रहे तो विपक्ष की एकता में दरार’ पड़ जाएगी.

    दूसरी तरफ कम से कम तीन विपक्षी नेताओं ने राहुल की हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान उनकी टिप्पणियों पर असंतोष व्यक्त किया था. तीन विपक्षी नेताओं ने पूछा था कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार देश में लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थानों को कैसे नष्ट कर रही है. वहीं  राहुल गांधी के बयान को बीजेपी ने इसे विदेशी धरती पर भारत की आलोचना करार दिया था.

    राहुल के बयान से शिवसेना में हो चुकी है घमासान

    हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने आरोप लगाया था कि संसद के बजट सत्र के दौरान ‘राहुल गांधी सावरकर का अपमान करते रहे और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के सांसद राहुल गांधी की सदस्यता के निरस्त होने के विरोध में काली पट्टी लगाकर बैठे हुए थे. जब सावरकर का अपमान हो रहा था तो उद्धव ठाकरे के सांसद चुप बैठे थे.

    जानकारों का मानना है कि विपक्ष का ये रुख चुनावों पर भी असर डाल सकता है. राहुल को विपक्षी दलों के बीच कांग्रेस को नेतृत्व तय करने के लिए सभी सहयोगियों का विश्वास जीतना होगा. खासतौर से राहुल को इस तरह की बयानबाजी से बचना होगा. क्योंकि बीजेपी को खुद राहुल ऐसा करके उनपर  निशाना साधने के लिए मसाला दे देते हैं.

    राहुल गांधी की भाषा पर भी सवाल

    बीबीसी में छपी एक खबर के मुताबिक वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने बताया कि राहुल गांधी पीएम मोदी पर निशाना साधने के लिए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं वो सही नहीं है. इससे उनकी पार्टी और विपक्षी एकता पर सवाल खड़ा होगा. 

    प्रदीप सिंह के मुताबिक ”नरेंद्र मोदी देश के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं एक संवैधानिक पद पर हैं. वो राहुल गांधी से उम्र भी बड़े हैं और तजुर्बे में भी बड़े हैं. इसलिए उनके बारे में इस तरह बोलना, यह भाषा हमारे समाज में लोग पसंद नहीं करते. चाहे अमीर हो या गरीब हो, अगर उम्र में या ओहदे में बड़ा है तो उससे इसके लिए ऐसी भाषा लोग पसंद नहीं करते. 

    ऐसे समय में जब चुनाव नजदीक है और विपक्ष एक होने की बात कर रहा है. कांग्रेस राहुल गांधी को पीएम मोदी से मुकाबला करना चाह रही है, ऐसे में विपक्ष जरूर सोचेगा, और राहुल के पक्ष में चीजें नहीं जाएगी. राहुल विपक्षी एकता में रोड़ा पैदा कर सकते हैं.

  • लोकसभा चुनाव: क्या राहुल गांधी की जगह प्रियंका गांधी दे सकती हैं पीएम मोदी को टक्कर

    कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस अब 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर मिशन मोड पर काम कर रही है. कर्नाटक में चुनाव से पहले प्रियंका गांधी ने कुछ रैलियां की थी. इन रैलियों ने कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना दिया. कांग्रेस के कई नेताओं ने भी कर्नाटक जीत का श्रेय राहुल से ज्यादा प्रियंका गांधी को ही दिया. कर्नाटक चुनाव के बाद कांग्रेस के अंदर ही नहीं कांग्रेस के बाहर भी प्रियंका गांधी की नेतृत्व क्षमता की खूब प्रशंसा हुई थी. 

    अब 2024 का लोकसभा चुनाव नजदीक है और विपक्षी एकता में शामिल कई नेता राहुल गांधी को नापसंद कर रहे हैं. इसकी वजह राहुल गांधी के कई बयान खासतौर से पीएम मोदी पर दिया गया बयान है. कई नेताओं को ये भी लगता है कि राहुल गांधी में नेतृत्व की कमी है. वहीं राहुल गांधी के मुकाबले प्रियंका गांधी पार्टी के अंदर सर्वमान्य नेता है. 

    कहीं न कहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी पर राहुल से ज्यादा भरोसा कर रहे हैं. यही वजह है कि पार्टी के कई नेता खुद प्रियंका गांधी को पीएम पद का उम्मीदवार के रूप में उतारने की बात कह चुके हैं.  2024 लोकसभा चुनाव में प्रियंका को कांग्रेस का प्रधानमंत्री फेस बनाने की मांग उठने लगी है. इसकी शुरुआत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने की है. उनका साफ-साफ कहना है कि कांग्रेस के लिए प्रियंका गांधी बहुत बड़ा चेहरा है जिसको नरेंद्र मोदी के सामने 2024 के लोकसभा चुनाव में लाना चाहिए. वहीं मोदी को सीधे टक्कर दे सकती हैं. 

    प्रियंका के नाम पर विचार करे विपक्ष

    आचार्य प्रमोद कृष्णम का कहना है कि 2024 लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को देने के लिए किसी मशहूर चेहरे की जरूरत है. विपक्ष को ऐसा चेहरा पेश करना होगा जो मोदी को टक्कर दे सके. अभी जितने क्षेत्रीय पार्टियों के नेता है वह अपने-अपने राज्यों के नेता है और राष्ट्रीय स्तर पर इन नेताओं की कोई लोकप्रियता नहीं है.’

    कृष्णम ने कहा कि 2024 का चुनाव मुद्दों से ज्यादा चेहरे का चुनाव है, और पीएम नरेंद्र मोदी इस देश का सबसे बड़ा चेहरा है . उन्होंने कहा ‘मुझे अपनी बात रखने का अधिकार है और फैसला विपक्ष को ही लेना होगा.  नरेंद्र मोदी के सामने प्रियंका गांधी बहुत बड़ा चेहरा है. प्रियंका ही पीएम मोदी को हरा सकती हैं’.  

    विपक्ष राहुल के नाम को लेकर क्यों नहीं है सहमत

    भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी की लोकप्रियता काफी बढ़ी है. इसके बावजूद राहुल गांधी अब पीएम फेस की रेस से धीरे-धीरे बाहर होते जा रहे हैं.  इसकी वजह ये है कि कांग्रेस के अंदर ही प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने की मांग लगी है. राहुल गांधी की सदस्यता का रद्द होना इसकी सबसे बड़ी वजह है. 

    राहुल गांधी केरल के वायनाड से सांसद थे. जनप्रतिनिधि कानून के मुताबिक अगर सांसदों और विधायकों को किसी भी मामले में 2 साल से ज्यादा की सजा हुई हो तो ऐसे में उनकी सदस्यता रद्द हो जाती है. सजा की अवधि पूरी करने के बाद 6 साल तक वो चुनाव भी नहीं लड़ सकते हैं. 

    कई विपक्षी नेता राहुल को विपक्ष के चेहरे के रूप में पेश करने पर जता चुके हैं आपत्ति 

    हाल ही में अजित पवार के साथ कम से कम चार दलों के शीर्ष नेताओं ने राहुल को विपक्ष के चेहरे के रूप में पेश करने को लेकर आपत्ति जताई है. इस लिस्ट में शरद पवार का नाम भी शामिल रहा है. 2020 में शरद पवार ने एक साक्षात्कार में कहा था कि राहुल के नेतृत्व में ‘कुछ समस्याएं थीं और उनमें निरंतरता की कमी है.

    दिसंबर 2021 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुंबई में राहुल की कार्यशैली का मजाक उड़ाया था. उन्होंने उनका नाम लिए बिना कहा, ‘अगर कोई कुछ नहीं करता और आधे समय विदेश में रहता है तो कोई राजनीति कैसे करेगा? राजनीति के लिए निरंतर प्रयास होना चाहिए’.

    समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया, तो उन्होंने राहुल को अपनी शुभकामनाएं भेजीं, लेकिन पैदल यात्रा का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया. 

    23 जून को पटना सम्मेलन के दौरान कई विपक्षी दल निजी तौर पर राहुल को एकजुट विपक्ष के चेहरे के रूप में पेश करने से सावधानी बरतते दिखे. उन्हें डर है कि प्रधानमंत्री मोदी और राहुल के बीच  मुकाबले में दूसरे नंबर पर रहेंगे. 

    क्या वाकई प्रियंका गांधी राहुल के मुकाबले अच्छा चेहरा बन सकती हैं

    जानकार ये मानते हैं कि भारत का चुनाव दुनिया में सबसे बड़ा है, इसलिए भी कोई भी भविष्यवाणी करना सबसे मुश्किल काम है. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक और सर्वेक्षणकर्ता इस बात से सहमत हैं कि पीएम मोदी की लोकप्रियता उनके शुरुआती दिनों के मुकाबले कम हुई है.आंशिक रूप से अर्थव्यवस्था, नौकरियां और देश की विशाल ग्रामीण आबादी के लिए अनेकों वादों को पूरा नहीं किया गया है, जिसका असर चुनावों पर पड़ सकता है. 

    राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी ने एबीपी न्यूज को फोन पर बताया ‘अगर राहुल के मुकाबले प्रियंका को मैदान में उतारा जाएगा तो आने वाले समय में नतीजे बेहतर हो सकते हैं. प्रियंका गांधी के झलक उनकी दादी इंदिरा गांधी में मिलती है. वहीं उनके भाषणों में भी इंदिरा गांधी की तरह ही जनता को आकर्षित करने की एक कला है. उनके भाई की सबसे बड़ी कमजोरियों ये है कि कई मौकों पर उन्हें सुस्त माना गया है. कर्नाटक चुनाव में पीएम मोदी ने भी रैलियां की थी और प्रियंका गांधी ने भी नतीजे कांग्रेस के पक्ष में आए. 

    ओम सैनी ने बताया कि लंबे समय से प्रियंका गांधी अपने बड़े भाई की छाया में रहीं हैं. प्रियंका को अपने भाई के बहुत करीब माना जाता है और पार्टी के भीतर भी प्रियंका की इज्जत राहुल से ज्यादा है. प्रियंका गांधी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी मां और भाई के अभियानों का प्रबंधन किया, लोगों के साथ अपने परिवार के ऐतिहासिक बंधन का आह्वान किया. प्रियंका ने राजनीतिक रैलियों में उग्र भाषण दिए थे. 

    सैनी ने कहा कि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश को 2014 में पूर्वी हिस्से में चुनाव का प्रभारी बनाया गया था, जो 20 करोड़ लोगों का राज्य है जो भारत का सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रांत है. 

    वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश अश्क ने एबीपी न्यूज से फोन पर बातचीत में बताया ‘गांधी और राहुल गांधी में यकीनन राहुल अधिक अनुभवी हैं. लेकिन राहुल एक दशक से आजमाए जा रहे हैं. कोई करिश्मा नहीं कर पाए. उल्टे दर्जन भर के करीब मानहानि के मुकदमे खड़े कर लिए. बोलने के कौशल का उनमें नितांत अभाव है.  इन तमाम गुणों में प्रियंका बराबर ही नहीं कुछ मामलों में राहुल से आगे दिखती हैं. राहुल सांसद चुने जाते रहे, इससे उनको संसदीय मामलों की जानकारी अधिक हो सकती है और इसकी कमी प्रियंका में जरूर महसूस होगी. महिला होकर भी मेहनत में प्रियंका राहुल से पीछे नहीं. 

    ओमप्रकाश अश्क ने आगे कहा कि राहुल जब अपने घराने की पारंपरिक सीट नहीं बचा सके तो कोई दैवीय करिश्मा ही अब उन्हें चुनाव में अचानक कामयाब करेगा. राहुल के नाम पर कांग्रेस दूर दूर तक कामयाब होती नहीं दिखती. प्रियंका के चेहरे पर कांग्रेस दांव लगाती है तो अभी भले बहुत लाभ न मिले, पर आगे वह ऊंचाई तक जा सकती है. सवा सौ साल से अधिक पुरानी कांग्रेस की जड़ें इतनी गहरी जा चुकी हैं कि उसे अभी कई दशकों तक उखाड़ना असंभव है. 

  • Maharashtra NCP Crisis: फिर साथ आएंगे शरद पवार और अजित

    Maharashtra Politics Crisis: महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार और अजित पवार गुटों के बीच एनसीपी पर दावा ठोंकने को लेकर खींचतान जारी है. दोनों ही गुटों ने चुनाव आयोग में चुनाव चिन्ह और एनसीपी पर अपने हक को लेकर याचिका दाखिल कर दी है. इस बीच खबर है कि शरद पवार और अजित पवार एक बार फिर से साथ आ सकते हैं. दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महाराष्ट्र के पुणे में 1 अगस्त को लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा. इस कार्यक्रम में एनसीपी चीफ शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार के आने की संभावना है.

    लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार देने वाले ट्रस्ट की ओर से पीटीआई को बताया गया कि पीएम नरेंद्र मोदी को ये पुरस्कार उनके अनुकरणीय नेतृत्व और नागरिकों में देशभक्ति की भावना पैदा करने के उनके प्रयासों के लिए दिया जा रहा है. ट्रस्ट की ओर से बताया गया कि इस पुरस्कार में एक स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति पत्र शामिल है. वहीं, दो गुटों में बंट चुकी एनसीपी के शरद पवार और अजित पवार भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बन सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो ये एनसीपी में हुई टूट के बाद पहला ऐसा मौका होगा, जब चाचा-भतीजा एक ही मंच पर नजर आएंगे.

    चुनाव आयोग कैसे करेगा ‘पावर’ का फैसला?
    इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व चुनाव आयुक्त सुनील अरोरा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से सुझाए गए थ्री टेस्ट फॉर्मूले से एनसीपी पर किए जा रहे दावों का निस्तारण किया जाएगा. उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग इन्हीं  मानदंडों के आधार पर अपना फैसला सुनाएगा. हालांकि, ये जल्द होता नहीं दिख रहा है. 

    क्या हैं ये मौलिक मानदंड?
    पार्टी के लक्ष्यों और उद्देश्यों की जांच, पार्टी के संविधान की जांच और बहुमत की जांच, इन तीन मानदंडों पर दोनों गुटों के दावों को खरा उतरना होगा. जो इन मानदंडों को पूरा करेगा, एनसीपी पर उसी का कब्जा होगा. इसके बारे में सुनील अरोरा बताते हैं, ”पहले मानदंड के अनुसार चुनाव आयोग ये देखता है कि क्या कोई गुट पार्टी के लक्ष्यों और उद्देश्यों से भटका तो नहीं, जो उनके बीच मतभेदों के उभरने की मूल वजह है. दूसरे मानदंड में आयोग तय करता है कि क्या पार्टी उसके संविधान के हिसाब से चलाई जा रही है. तीसरे में ये देखता है कि गुटों के बीच विधायिका और पार्टी संगठनात्मक ढांचे में किसकी पकड़ ज्यादा मजबूत है.

  • बिहार पुलिस की लाठियों से महामंत्री विजय कुमार सिंह की मौत

    देश: बिहार में बीजेपी लगातार गठबंधन की सरकार का विरोध कर रही है.  महंगाई,बेरोजगारी,भ्रष्टाचार को लेकर बीजेपी नेताओं ने विधानसभा का घेराव किया. पुलिस ने बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर जमकर लाठियां बरसाईं. लाठीचार्ज में जहानाबाद जिला के महामंत्री विजय कुमार सिंह की मौत हो गई है. मंत्री की मौत के बाद हडकंप मच गया .भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष राधा मोहन शर्मा ने मौत की पुष्टि की है.

    सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जहानाबाद जिला के महामंत्री विजय कुमार सिंह के सर पर पुलिस ने लाठी मारी, वह बुरी तरह से घायल हुए. बीजेपी के लोग उनको लेकर अस्पताल गए जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. जानकारी के मुताबिक, भाजपा कार्यकर्ताओं ने गांधी मैदान से विधानसभा तक विरोध मार्च निकाला। इस रोकने के लिए जिला प्रशासन ने शहर में हजारों की संख्या में पुलिस बल को तैनात कर दिया। गुरुवार की दोपहर एक बजे के बाद जैसे मार्च में शामिल भाजपा नेता गांधी मैदान से विधानसभा की ओर बढ़े। तभी डाकबंगला चौराहे के पास पुलिस ने आक्रोशित भीड़ को आगे बढ़ने से रोका। इसी दौरान दोनों के बीच झड़प की स्थिति बन गई।

    क्या बोले बीजेपी नेता- 

    मंत्री की मौत पर जेपी नड्डा ने ट्वीट कर कहा भाजपा कार्यकर्ताओं पर पटना में हुई लाठीचार्ज राज्य सरकार की विफलता और बौखलाहट का नतीजा है। महागठबंधन की सरकार भ्रष्टाचार के किले को बचाने के लिए लोकतंत्र पर हमला कर रही है। जिस व्यक्ति पर चार्जशीट दायर हुई है, उसको बचाने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री अपनी नैतिकता तक भूल गए हैं।’

    बता दें कि विजय कुमार सिंह साल 2013 से 2016 तक भाजपा के जिला उपाध्यक्ष थे। साल 2023 में उन्‍हें जिला महामंत्री बनाया गया था।

  • Navbharat Times Survey: महाराष्ट्र से लोकसभा चुनाव में किसको कितनी सीटों का अनुमान

    Lok Sabha Election Survey: महाराष्ट्र में मचे सियासी बवाल का आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी पर कोई असर नहीं होने वाला है. ताजा सर्वे के जो आंकड़े सामने आए हैं, वो इसी ओर इशारा कर रहे हैं. सर्वे के मुताबिक, बीजेपी इस बार के आम चुनाव में पिछली बार की तुलना में ज्यादा सीटें जीत सकती है. वहीं, पिछली बार शिवसेना ने 18 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार पार्टी दो गुटों में बंट चुकी है. ऐसे में देखने वाली बात यह होगी की उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे में किसका पलड़ा भारी रहने वाला है.

    2019 के मुकाबले इस बार स्थिति काफी ज्यादा अलग है. 2024 के आम चुनाव में शिवसेना के दो गुट चुनाव लड़ेंगे. पिछली बार बीजेपी और शिवसेना ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन 2022 में शिवसेना के दो गुटों में बंटने के बाद इस बार एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट चुनावी मैदान में उतरेंगे. सर्वे के मुताबिक, इस बार का आंकड़ा भी पिछली बार के नतीजों के इर्द-गिर्द ही रहने की उम्मीद है. बीजेपी को इसमें कोई खतरा नजर नहीं आ रहा है, उल्टा उसे पिछली बार की तुलना में ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है.

    क्या कहते हैं आंकड़े?
    नवभारत टाइम्स की ओर से किए गए सर्वे के मुताबिक, बीजेपी महाराष्ट्र की 22 से 28 लोकसभा सीटें जीत सकती है, जबकि शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के महाविकास अघाड़ी (MVA) को 18 से 22 सीटें मिलने की उम्मीद है. महाराष्ट्र में कुल 48 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से बीजेपी ने 2019 में 23 सीटें जीती थीं और शिवसेना को 18 पर जीत मिली थी. वहीं, एनसीपी ने 4 और कांग्रेस ने 1 सीट जीती थी. 2014 के चुनाव में कांग्रेस और शिवसेना गठबंधन को 42 सीटों पर जीत मिली थी.

    महाराष्ट्र में सियासी बवाल जारी
    2 जुलाई को अजित पवार समेत 9 विधायकों के बीजेपी-शिवसेना सरकार में शामिल होने के बाद महाराष्ट्र में सियासी बवाल मचा हुआ है. पार्टी दो गुटों में बंट गई है और अजित पवार व शरद पवार के बीच पार्टी पर कब्जे की लड़ाई शुरू हो गई है. पिछले साल एकनाथ शिंदे समेत 40 बागी विधायकों के बीजेपी के साथ हाथ मिलाने के बाद शिवसेना दो गुटों में बंट गई थी. 

  • जानें किस पार्टी में हैं कितने क्रिमिनल विधायक

    भारत की राजनीति में किसी नेता का अपराधी होना कोई बड़ी बात नहीं है, बल्कि ये मान लिया गया है कि कोई भी सिद्धांतवादी शख्स राजनीति कर ही नहीं सकता. इस देश में कई ऐसे बड़े नेता हैं जिन पर किडनैपिंग से लेकर, मर्डर तक के मामले चल रहे हैं. 

    दरअसल सुप्रीम कोर्ट की एक शर्त के मुताबिक किसी भी नेता को विधायक बनने से पहले एक स्वघोषित हलफनामा फाइल करना होता है, जिसमें उस पर कितने आपराधिक मामले दर्ज हो चुके हैं इसकी डिटेल जानकारी दी जाती है. इसी हलफनामे के अनुसार भारत के कुल विधायकों में से 44 प्रतिशत विधायकों पर क्रिमिनल केस हैं. 

    नेताओं पर लगे कुछ आरोप तो मामूली या राजनीतिक हैं, लेकिन ज्यादातर विधायकों के खिलाफ हत्या की कोशिश, सरकारी अधिकारियों पर हमला, और चोरी जैसे गंभीर आरोप थे.

    हमारे देश में वर्तमान में कुल 4001 विधायक हैं. जिसमें से 1,777 यानी 44 फीसदी नेता हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे अपराधों में लिप्त रहे हैं. वहीं वर्तमान लोकसभा में भी 43 फीसदी सांसद आपराधिक मामलों में घिरे हैं. 

    आज से 23 साल पहले यानी 2004 में यही संख्या 22 फीसदी थी, जो कि अब दोगुनी हो गई है. ये आंकड़ा बताता हैं कि राजनीति को अपराध मुक्त बनाने की लाखों कोशिशों के बावजूद ऐसे विधायकों, सांसदों की संख्या बढ़ती ही जा रही है जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं.  

    जांच पूरी लेकिन फैसला नहीं सुनाया गया 

    यहां ध्यान देने की बात ये है कि क्रिमिनल केस के मामलों का सामना कर रहे इन 1,777 नेताओं पर कोई छोटे-मोटे आरोप नही हैं. ये ऐसे मामले हैं जिनकी जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस कोर्ट में चार्जशीट भी दायर कर चुकी है, लेकिन बावजूद इसके इन मामलों पर अब तक कोई फैसला नहीं सुनाया गया है. 

    क्रिमिनल केस वाले ज्यादातर नेताओं को न्यायालयों के फैसलों की चिंता इसलिए भी नहीं है, क्योंकि जब तक कोर्ट दोषी पाए जाने का फैसला नहीं सुनाता है तब तक इन नेताओं को चुनाव लड़ने से कोई नहीं रोक सकता है, यहां तक की जेल में रहते हुए भी चुनाव लड़ा जा सकता है. 

    सरकारी रिपोर्ट की मानें तो नेताओं के क्रिमिनल केस निपटाने के मामले में मध्यप्रदेश के साथ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ऐसे तीन राज्य हैं जिनमें पिछले 5 सालों में एक भी मामले का निपटारा नहीं किया गया है.

    क्या कहते हैं आंकड़े 

    अगर हम इन विधायकों के ऊपर लगे गंभीर आपराधिक मामलों को देखें तो कुल आपराधिक मामले वाले विधायकों में से 1,136 या 28% मामले ऐसे हैं जिनमें दोषी पाए जाने पर आरोपी को पांच साल या उससे ज्यादा की जेल की सजा हो सकती है.

    एडीआर से मिले आंकड़ों के मुताबिक 47 विधायकों पर हत्या के मामले, 181 पर हत्या के प्रयास के मामले और 114 पर महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित मामले दर्ज हैं. 14 विधायकों पर बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं. 

    इन राज्यों के विधायकों पर गंभीर अपराध वाले मामले दर्ज 

    • दिल्ली के 53 फीसदी विधायकों पर गंभीर अपराध वाले मामले दर्ज हैं
    • बिहार के 59 फीसदी विधायकों पर गंभीर अपराध का क्रिमिनल केस दर्ज हैं.  
    • महाराष्ट्र, झारखंड और तेलंगाना में 39 फीसदी पर ऐसे ही मामले दर्ज हैं.
    • उत्तर प्रदेश में 38 प्रतिशत सिटिंग विधायकों पर गंभीर अपराध वाले मामले दर्ज हैं. 

    किस पार्टी में हैं कितने ऐसे माननीय 

    भारतीय जनता पार्टी – भारत के 15 राज्यों में बीजेपी की सरकार है. इनमें बीजेपी बहुमत के साथ 6 राज्यों में और सहयोगी पार्टियों के साथ 9 राज्यों में सरकार चला रही है. इन राज्यों में बीजेपी में कुल 479 विधायक हैं जिनमें से 337 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. फिलहाल बीजेपी के सबसे ज्यादा विधायकों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं. 

    कांग्रेस- आपराधिक मामले वाले विधायकों की लिस्ट में दूसरा स्थान कांग्रेस का है. कांग्रेस के 334 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें से 194 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं.

    अन्य पार्टियां- अन्य पार्टियों में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके), तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, भारत राष्ट्र समिति (पूर्व में तेलंगाना राष्ट्र समिति), राष्ट्रीय जनता दल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और बीजू जनता शामिल हैं. इन दलों में ऐसे तो विधायकों की संख्या कम है, लेकिन अपराध का प्रतिशत ज्यादा है. 

    साल दर साल बढ़ रहे हैं लंबित मामले 

    • साल 2018 के दिसंबर महीने जारी किए गए डाटा के अनुसार सांसदों और विधायकों के खिलाफ 4122 क्रिमिनल केस पेंडिंग चल रहे थे. जिनमें से 1675 सांसद (पूर्व और वर्तमान) और 2324 विधायक (पूर्व और वर्तमान) हैं. 
    • दिसंबर के साल 2021 में जारी किए गए डाटा के अनुसार इस साल लंबित मामले 4984 थे. इसका मतलब है कि नेताओं के खिलाफ मामले बढ़ते ही जा रहे हैं. दिसंबर 2021 में पिछले पांच साल से पेंडिंग मामलों की कुल संख्या 1899 थी. 
    • नवंबर 2022 के आंकड़ों के अनुसार 5 साल से ज्यादा पेंडिंग मामलों की संख्या 962 थी, हालांकि इस डाटा में देश के 9 उच्च न्यायालयों का आंकड़ा शामिल नहीं किया गया था. 
    • 12 नवंबर 2022 को देश के 16 उच्च न्यायालयों से मिले आंकड़ों के अनुसार विधायकों और सांसदों के खिलाफ 3069 केस पेंडिंग चल रहे थे. यानी कि यूपी बिहार सहि देश के अन्य 9 हाईकोर्ट का आंकड़ा इसमें शामिल नहीं है. 

    अपराधी नेताओं को मिलता है ज्यादा वोट

    बीबीसी की एक रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए कार्नेगी एंडोमेंट में वरिष्ठ फेलो डॉ. वैष्णव ने अपने रिसर्च के बारे में बताया है. उन्होंने तीन आम चुनावों में खड़े सभी उम्मीदवारों का अध्ययन किया. जिसके बाद उन्होंने साफ़-सुथरे रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों और आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को अलग अलग बांटा और पाया कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रत्याशियों की अगले चुनाव जीतने की उम्मीद 18 प्रतिशत है. जबकि “साफ-सुथरे इमेज वाले प्रत्याशियों की चुनाव जीतने की उम्मीद सिर्फ 6 फीसदी है.

    उन्होंने साल 2003 से लेकर 2009 के बीच होने वाले विधानसभा चुनाव में मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों की भी इसी तरह की एक गणना की थी, जिसके अनुसार “जिन उम्मीदवारों के खिलाफ केस लंबित हैं उन्हें जीत का ज्यादा फायदा मिला”.

  • NDA Meeting: NDA की बैठक में शिवसेना-एनसीपी समेत 38 पार्टियां होंगी शामिल

    NDA Meeting: विपक्षी दलों की बैठक के जवाब में बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए ने भी अपने सहयोगी दलों की बैठक बुलाई है, जिसमें तमाम दलों को आने का न्योता दिया गया. इस बार बीजेपी के साथ कई ऐसे दल भी एनडीए की बैठक में शामिल हो रहे हैं, जो पहले इसका हिस्सा नहीं थे. बीजेपी ने दावा किया है कि कुल 38 दल इस बैठक में हिस्सा ले रहे हैं. इन तमाम राजनीतिक दलों की लिस्ट भी सामने आ चुकी है. जिसमें एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना और अजित पवार वाली एनसीपी का नाम भी शामिल है. 

    एनडीए बैठक में शामिल होने वाले दल

    1. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
    2. शिवसेना  (एकनाथ शिंदे गुट)
    3. एनसीपी (अजित पवार गुट)
    4. राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (पशुपति कुमार पारस)
    5. ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम
    6. अपना दल (सोनेलाल)
    7. नेशनल पीपुल्स पार्टी
    8. नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी
    9. ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन
    10. सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा 
    11. मिजो नेशनल फ्रंट
    12. इंडीजीनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा
    13. नगा पीपुल्स फ्रंट, नगालैंड
    14. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले)
    15. असम गण परिषद
    16. पत्तली मक्कल कची 
    17. तमिल मानिला कांग्रेस
    18. यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल 
    19. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी
    20. शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त)
    21. महाराष्ट्रवादी गोमंटक पार्टी
    22. जननायक जनता पार्टी
    23. प्रहर जनशक्ति पार्टी
    24. राष्ट्रीय समाज पक्ष 
    25. जन सुराज्य शक्ति पार्टी
    26. कुकी पीपुल्स आलायंस 
    27. यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (मेघालय)
    28. हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी
    29. निषाद पार्टी 
    30. ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस
    31. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM)
    32. जन सेना पार्टी
    33. हरियाणा लोकहित पार्टी
    34. भारत धर्म जन सेना
    35. केरल कामराज कांग्रेस
    36. पुथिया तमिलागम
    37. लोक जन शक्ति पार्टी (राम विलास पासवान)
    38. गोरखा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट

  • Opposition Meet News: नीतीश के लिए लगे अनस्टेबल पीएम कैंडिडेट के पोस्टर

    Opposition Meet News: विपक्ष एकता के सूत्रधार नीतीश कुमार एक पोस्टर को लेकर सुर्ख़ियों में बने हुए हैं। कल एक तरफ विपक्ष एकता की मीटिंग चल रही थी, 26 दलों के नेताओं ने एकजुट होकर बीजेपी को मात देने का संकल्प लिया। वही दूसरी तरफ बेंगलुरु की सड़क पर अनस्टेबल पीएम कैंडिडेट लिखे हुए पोस्टर लगे दिखाई दिए। बात यही तक सीमित नहीं रही पोस्टर में बिहार में गिरे ब्रिज का भी जिक्र किया गया। 

    बता दें बेंगलुरु के चालुक्य सर्कल, विंडसर मैनर ब्रिज और हेब्बल के पास एयरपोर्ट रोड पर लगाए गए थे पुलिस ने तत्काल प्रभाव से इन बैनर को हटवा दिया है। बता दें बीते दिन बेंगलुरु में विपक्ष की मीटिंग हुई, मीटिंग में अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, महबूबा मुफ्ती, सोनिया गांधी समेत कई बड़े नेता शामिल हुए। 

     

  • Maharashtra Politics:अजित पवार को मिला ये मंत्रालय, देखें पूरी लिस्ट

    Maharashtra Politics: महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हुई बगावत के बाद से मंत्रियों के विभागों के बंटवारे को लेकर जारी गतिरोध शुक्रवार (14 जुलाई) को खत्म हो गया. मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने विभागों का बंटवारा कर दिया है.डिप्टी सीएम अजित पवार को वित्त विभाग और नियोजन, छगन भुजबल को अन्न नागरिक आपूर्ति, दिलीप वलसे पाटील को सहकारी मंत्री और हसन मुश्रीफ को वैद्यकिय शिक्षा विभाग मिला है.इसी बीच ये गतिरोध खत्म होता दिख रहा है क्योंकि महाराष्ट्र सरकार में मंत्री के तौर पर शामिल हुए अजित पवार और उनके साथ के अन्य आठ एनसीपी विधायकों के विभागों का बंटवारा शुक्रवार (14 जुलाई) को हो गया. 

  • Indira Gandhi: टूटी नाक, रक्त की बहने लगी धार, लेकिन इंदिरा का नहीं टूटा विश्वास

    Indira Gandhi:: इंदिरा गांधी अपने समय की सबसे शक्तिशाली महिला मानी जाती हैं। लोग उन्हें आयरन लेडी के नाम से जानते हैं। जनता के बीच आज  छवि जन नेता के रूप में बनी हुई है। इंदिरा की भाषा में इतनी सौम्यता थी कि वह जिससे बात करती वह उनके पक्ष में आ जाता। लेकिन इंदिरा को यह लोकप्रियता मिलना आसान नहीं था। क्या इंदिरा शुरुआत से ही जननेता थी या राजनीतिक समझ विकसित होने के बाद जन नेता बनीं। क्या इंदिरा गांधी को लेकप्रियता विरासत में मिली थी या उन्होंने स्वयं के बलबूते भारत की मजबूत महिला के रूप में खुद को स्थापित किया। तो आइये जानते हैं – 

    कैसे मिली इंदिरा को लोक्रप्रियता –

    इंदिरा गांधी जवाहर लाल नेहरू की बेटी थीं। वह पढ़ने के काफी अच्छी और भावनात्मक महिला थी। बचपन से ही उन्होंने आपने पिता को राजनीति में देखा। कई बार घर पर बड़े-बड़े नेता आते तो इंदिरा थोड़ा असमंजस में पड़ जाती। इंदिरा ने सोच रखा था वह स्वयं को राजनीति से दूर रखेंगी। क्योंकि यह उनके लिए नहीं है वह कभी भी राजनीति में नहीं आना चाहती थी। लेकिन शायद किस्मत को इंदिरा की इस कमिटमेंट से एतराज था। नेहरू की मौत हुई और इंदिरा पर राजनीतिक विरासत संभालने की जिम्मेदारी आ गई। इंदिरा का मन पहले से काफी दुखी थी कि पिता की मृत्यु ने उन्हें उस राह पर चलने को मजबूर किया जिससे वह हमेशा दूर भागती थीं। 

    पंडित नेहरू की मौत के बाद उत्तराधिकारी के लिस्ट में इंदिरा का नाम सबसे आगे था। लेकिन इंदिरा के इंकार के बाद लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। लेकिन कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई और पुनः पद की लड़ाई आरम्भ हुई। इस बार प्रधानमंत्री पद की रेस में  मोरारजी देसाई, गुलजारी लाल नंदा, एसके पाटिल, संजीव रेड्डी, के कामराज, वाईवी चव्हाण और इंदिरा गांधी शामिल थे। सभी चाहते थे इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बन जाएं क्योंकि इंदिरा को वह अपने मुताबिक़ ढाल सकते हैं। लेकिन मोरारजी देसाई ने इंदिरा का प्रतिद्वंदी बनना चुना। 19 जनवरी 1966 को एक पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया में 169 के मुक़ाबले 355 वोट हासिल करके इंदिरा ने राजनीति में महिला का ध्वज लहराया। 

    इंदिरा ने भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इंदिरा के लिए यह सफर आसान नहीं था क्योंकि उस दौर में पुरुष प्रधान समाज था। सदन में लोग इंदिरा को इतने ऊँचे पद पर नहीं देख पा रहे थे। राम मनोहर लोहिया ने उन्हें गूंगी गुड़िया कहना शुरू कर दिया था लेकिन इंदिरा अडिग रही। 

    इंदिरा राजनीति को धीरे – धीरे समझने लगीं। जिन लोगों ने उन्हें अपने स्वार्थ के लिए समर्थन दिया उनको यह महसूस होने लगा वह अब स्वतंत्रता का मूल जानती हैं हम उन्हें अपने हिसाब से नहीं चलाया जा सकता है। इंदिरा धीरे-धीरे जनता से जुड़ने का प्रयास करने लगीं, छोटी -छोटी सभाओं को सम्बोधित करने लगीं और 1967 में उन्होंने एक चुनावी सभा को सम्बोधित किया। 

    1967 यह वह दौर था जब इंदिरा की लोकप्रियता जीरो थी और वह जनता के बीच स्वयं को स्थापित करने के प्रयास में जुटी थीं। उस समय जमीनी स्तर पर उड़ीसा स्वतंत्र पार्टी का बोलबाला था। इंदिरा ने बोलना शुरू किया और और उनका विरोध शुरू हो गया। उनके ऊपर पत्थर फेंके गये। उनके समर्थको ने कहा चलिए सभा बंद कीजिये यहां आपको खतरा है। लेकिन उन्होंने बोलना बंद नहीं किया वह लगातार जनता को सम्बोधित करते रहीं। 

    इंदिरा जनता से कहती रहीं क्या ऐसे ही आप देश को बनाएंगे। क्या आप इस तरह ही वोट देंगे। लेकिन भीड़ नहीं रुकी और एक पत्थर सीधे आकर इंदिरा गांधी की नाक पर लगता है और खून की धार बहने लगती है। इंदिरा की नाक की हड्डी टूट गई इंदिरा ने विनम्रता के साथ नाक का खून पोछ लिया और पुनः जनता को सम्बोधित करना शुरू किया। इंदिरा का जज्बा देख विपक्ष और षड्यंत्रकारी भयभीत थे क्योंकि  यह दिख रहा था अब इंदिरा एक ज्वाला बन चुकी हैं जो  ह्रदय जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। 

    टूटी नाक फिर भी इंदिरा का नहीं टुटा विश्वास –

    इंदिरा गांधी ने मानों जनता का दिल जीतने की कसम खा ली थी। भरी सभा में उनपर पत्थर बरसे। नाक की हड्डी टूट गई, रक्त की धार बहने लगी लेकिन वह नहीं रुकीं उन्होंने जनता को सम्बोधित किया और बिना आराम किए दूसरे दिन नाम पर प्लास्टर चढ़वाए चुनाव प्रचार किया। विपक्षी नेताओं ने उनका मजाक बनाया उनकी नाम पर कटाक्ष किया। कई लोगों ने कहा उनकी शक्ल बैटमैन जैसी लग रही है। लेकिन इंदिरा ने सभी को नकार दिया और अपने संकल्प से आगे बढ़ती रहीं। कहीं जाती तो जनता के बीच बैठ जातीं। किसी के भी साथ भोजन करने लगना, किसी को भी गले लगा लेना, अचानक से किसी के खेत में पहुंच जाना, महिलाओं से मिलकर उनसे बात करना इंदिरा का स्वाभाव बन चुका था। 

    इंदिरा का यह बदला रूप विपक्ष के नेताओं को कांटे की भांति चुभता था। क्योंकि अब जनता इंदिरा का गुणगान करती और उन्हें अपना नेता कहती थी। इंदिरा का सफर यदि देखें तो उन्होंने स्वयं को स्थापित करने के लिए सबकुछ दांव पर लगा दिया। स्वयं को राजनीति में झोंकने वाली इंदिरा गांधी आज भी जन नेता के रूप में जानी जाती हैं। एक ऐसी नेता जिन्होंने पितृ सत्ता में महिला के विश्वास और जीत के संकल्प का विजय पताका लहराया। 

    1969 में इंदिरा की बढ़ती लोकप्रियता पुरुषों को खटकने लगी और कांग्रेस पार्टी दो भागों में विभक्त हो गई। सबको लगा यह इंदिरा के विश्वास को तोड़ देगा और इंदिरा गांधी राजनीति से बाहर हो जाएंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ 1971 में चुनाव की घोषणा हुई और इंदिरा गांधी को भरपूर जनसमर्थन मिला और भारी मतों से जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया।