Category: national

  • अमित शाह आज श्रीनगर के प्रताप पार्क में ‘बलिदान स्तंभ’ का करेंगे शिलान्यास

    दौरे पर आए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शनिवार को शहर के ऐतिहासिक केंद्र लाल चौक से सटे श्रीनगर के प्रताप पार्क में ‘बलिदान स्तंभ’ की नींव रखेंगे। सूत्रों के मुताबिक, शाह वरिष्ठ राजनेताओं से भी मुलाकात करेंगे। वह वरिष्ठ नेता डॉ. करण सिंह से श्रीनगर के उच्च सुरक्षा वाले गुपकर रोड स्थित उनके आवास ‘तलेह मंजिल’ पर शिष्टाचार मुलाकात करेंगे। इसके बाद केंद्रीय मंत्री पुलिस गोल्फ कोर्स जाएंगे, जहां वह शहीद गैलरी का उद्घाटन करेंगे। सूत्रों ने बताया कि उनका मारे गए पुलिस कर्मियों के परिजनों को नियुक्ति आदेश देने का भी कार्यक्रम है।

    वह जम्मू-कश्मीर की अपनी दो दिवसीय यात्रा समाप्त करके शनिवार दोपहर दिल्ली लौटेंगे। शुक्रवार देर शाम, शाह ने 1 जुलाई से शुरू हो रही वार्षिक अमरनाथ यात्रा की तैयारियों की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, इसमें वरिष्ठ नागरिक, पुलिस, अर्धसैनिक और खुफिया अधिकारी शामिल हुए।

    समीक्षा बैठक के दौरान, केंद्रीय गृह मंत्री ने 62-दिवसीय यात्रा के दौरान किसी भी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में न्यूनतम क्षति सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने का आदेश दिया।

  • आदिपुरुष’ से कई गुना बेहतर है ‘संकट मोचन महाबली हनुमान’ शो के डायलॉग्स : अरुण मंडोला

    टीवी एक्टर अरुण मंडोला का कहना है कि हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘आदिपुरुष’ देखना निराशाजनक अनुभव रहा है। उन्होंने आगे कहा कि फिल्म में गंभीर त्रुटियां हैं। उन्होंने कहा, ‘आदिपुरुष’ में बड़ी गलतियां हैं। कोई भी आम आदमी फिल्म में 100 गलतियां बता सकता है। लोग रामायण और भगवान राम, लक्ष्मण, माता सीता और हनुमान के प्रति बहुत सम्मान रखते हैं और जाहिर तौर पर यह देखकर नाराज हैं कि निर्माताओं ने आदिपुरुष में कई गलतियां की हैं। उन्होंने आगे कहा, आदिपुरुष में सबसे बड़ी समस्या ²ढ़ विश्वास की कमी है। यदि आपमें किसी भी चीज में ²ढ़ विश्वास की कमी है, तो परिणाम शून्य होंगे। मैं फिल्म के डायलॉग्स, वीएफएक्स, वेशभूषा आदि देखकर हैरान हूं। गलतियों की कोई सीमा नहीं है।

    मेरे टीवी शो, संकट मोचन महाबली हनुमान और विघ्नहर्ता गणेश के डायलॉग, वेशभूषा और वीएफएक्स, फिल्म की तुलना में दस गुना बेहतर हैं। यह देखना निराशाजनक है, क्योंकि हमारी भावनाएं श्री राम, लक्ष्मण, माता सीता और हनुमान जी से जुड़ी हैं। हालांकि, अगर कोई हमारे देवताओं के बारे में कुछ गलत करता है, तो हम चुप नहीं रह सकते।

    अभिनेता ने डायलॉग्स पर अपनी भावनाएं साझा कीं। फिल्म के डायलॉग्स हमारी नई पीढ़ी के लिए बेहद अनुपयुक्त हैं। उन्हें संस्कृत श्लोक सिखाने के बजाय, हम उन्हें बकवास बता रहे हैं। अगर आपमें ²ढ़ विश्वास की कमी है तो कुछ भी न बनाना बेहतर है। उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्मों को बहुत सावधानी से बनाने की जरूरत है।

  • समान नागरिक संहिता पर फंस सकती है बीजेपी?

    समान नागरिक संहिता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पैरवी के बाद माना जा रहा है कि केंद्र सरकार इसे जल्द लागू कर सकती है. मोदी सरकार मानसून सत्र में ही यूसीसी विधेयक ला सकती है. विधि आयोग ने हाल ही में लोगों से नागरिक संहिता पर राय मांगी थी. देश भर से अब तक 8.5 लाख लोगों ने इस पर अपना विचार भी साझा किया है. 

    समान नागरिक संहिता बीजेपी का कोर मुद्दा रहा है और स्थापना के वक्त से ही पार्टी इसे उठाती रही है. जानकारों का मानना है कि मंडल की राजनीति में घिरी बीजेपी 2024 से पहले यूसीसी को लागू कर ब्रांड हिंदुत्व को और मजबूत करना चाहती है, जिससे चुनाव 80 (हिंदू) वर्सेज 20 (मुसलमान) का हो जाए.

    हालांकि, आदिवासियों और पूर्वोत्तर के लोगों के विरोध ने बीजेपी की एक देश-एक विधान के नारों की मुश्किलें खड़ी कर दी है. झारखंड के 30 आदिवासी संगठनों ने बयान जारी कर कहा है कि विधि आयोग से इसे वापस लेने के लिए कहेंगे.  आदिवासियों नेताओं का कहना है कि समान नागरिक संहिता अगर लागू होती है, तो इससे उनकी प्रथागत परंपराएं खत्म हो जाएगी. साथ ही जमीन से जुड़े छोटानगपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट पर भी इसका असर होगा. 

    आदिवासी संगठनों के विरोध पर बीजेपी के बड़े नेताओं ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर आदिवासी समाज इसका विरोध करता है, तो बीजेपी को नफा से ज्यादा सियासी नुकसान हो सकता है.

    नागरिक संहिता के विरोध में आदिवासी, क्यों?

    1. शादी, बच्चा गोद लेना, दहेज आदि प्रथागत परंपराओं पर असर होगा. आदिवासी समाज पर हिंदू मैरिज एक्ट लागू नहीं होता है. 

    2. आदिवासी समाज में महिलाओं को संपत्ति का सामान अधिकार नहीं है. इसे लागू होने से यह पूरी तरह खत्म हो जाएगा.

    3. आदिवासियों को ग्राम स्तर पर पेसा अधिनियम के तहत कई अधिकार मिले हैं, जो नागरिक संहिता लागू होने से खत्म हो सकता है.

    4. जल, जंगल और जमीन सुरक्षित रखने के लिए आदिवासियों को सीएनटी और एसपीटी एक्ट के तहत विशेष अधिकार मिले हैं.

    सियासी तौर पर आदिवासी कितने मजबूत?
    भारत में 10 करोड़ से अधिक आदिवासी हैं, जिनके लिए लोकसभा की 47 सीटें आरक्षित की गई है. मध्य प्रदेश में 6, ओडिशा-झारखंड में 5-5, छत्तीसगढ़-गुजरात और महाराष्ट्र में 4-4, राजस्थान में 3, कर्नाटक-आंध्र और मेघालय में 2-2, जबकि त्रिपुरा में लोकसभा की एक सीट आदिवासियों के लिए आरक्षित है. 

    लोकसभा की कुल सीटों का यह करीब 9 प्रतिशत है, जो गठबंधन पॉलिटिक्स के लिहाज से काफी अहम भी है. आरक्षित सीटों के अलावा मध्य प्रदेश की 3, ओडिशा की 2 और झारखंड की 5 सीटों का समीकरण ही आदिवासी ही तय करते हैं. 

    साथ ही करीब 15 लोकसभा सीटों पर आदिवासी समुदाय की आबादी 10-20 प्रतिशत के आसपास है, जो जीत-हार में अहम भूमिका निभाती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो लोकसभा की करीब 70 सीटों का गुणा-गणित आदिवासी ही सेट करते हैं. 

    2019 में बीजेपी को आदिवासियों के लिए रिजर्व 47 में से करीब 28 सीटों पर जीत मिली थी. मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और त्रिपुरा में बीजेपी को आदिवासियों के लिए आरक्षित सभी सीटों पर जीत मिली थी. 

    2014 के चुनाव में भी बीजेपी को 26 सीटों पर जीत मिली थी. राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात की आदिवासी रिजर्व सीटों पर पार्टी ने क्लीन स्वीप किया था. 

    विधानसभा चुनाव में भी आदिवासी वोटर्स असरदार
    देश के 10 राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में भी आदिवासी वोटर्स निर्णायक भूमिका में होते हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में 5 महीने बाद चुनाव होने हैं.

    मध्य प्रदेश में 21 प्रतिशत आदिवासी हैं, जिनके लिए 230 में से 47 सीटें आरक्षित है. आदिवासी इसके अलावा भी 25-30 सीटों पर असरदार हैं. मध्य प्रदेश में बीजेपी और कांग्रेस के बीच पिछले चुनाव में सीटों का फासला काफी कम था. ऐसे में आदिवासी रिजर्व सीट इस बार दोनों पार्टियों के लिए काफी महत्वपूर्ण है.

    इसी तरह राजस्थान में आदिवासियों की संख्या 14 प्रतिशत के आसपास है. यहां 200 में से 25 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित है. सत्ता बदलने की रिवाज वाले राजस्थान में ये 25 सीटें काफी अहम है. छत्तीसगढ़ की 34 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है.

    यहां 90 में से 34 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित है. यहां भी कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है. तेलंगाना में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भले कम है, लेकिन बीजेपी-बीआरएस और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय मुकाबले में यह काफी अहम है.

    आदिवासियों का विरोध सियासी नुकसान पहुंचा सकता है?

    आदिवासी नेता लक्ष्मी नारायण मुंडा कहते हैं- आदिवासियों के बीच पलायन का मुद्दा सबसे बड़ा है और 2014 में बीजेपी ने इसे खत्म करने की बात कही थी, लेकिन मूल मुद्दा छोड़ नागरिक संहिता की बात कर रही है. हमारे पास जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए कुछ विशेष कानून हैं. अगर वो भी छीन जाएंगे तो क्या करेंगे?

    मुंडा आगे कहते हैं- सरकार की मंशा सही नहीं है और एक विशेष एजेंडा के तहत इसे लागू किया जा रहा है. 5 जुलाई को झारखंड के आदिवासी समुदाय राजभवन के सामने धरना पर बैठेंगे. 

    मध्य प्रदेश के आदिवासी के लिए काम कर रहे सोशल एक्टिविस्ट परमजीत बताते हैं, ‘आदिवासियों के बीच धीरे-धीरे यह मुद्दा पहुंच रहा है और लोग इसके विरोध में उतर रहे हैं. परंपरा के साथ-साथ जमीन का मामला सबसे महत्वपूर्ण है. 

    परमजीत के मुताबिक आदिवासियों को डर है कि छोटा नागपुर टेंनेसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट को समान नागरिक संहिता के जरिए खत्म किया जा सकता है. इन दोनों कानून के मुताबिक आदिवासियों के जमीन को गैर-आदिवासी नहीं खरीद सकते हैं.

    आदिवासियों के लिए काम करने वालीं झाबुआ की दुर्गा दीदी कहती हैं- आदिवासी जमीन को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं और नागरिक संहिता के मसले पर उनके भीतर सरकार के खिलाफ निगेटिव नैरेटिव बना हुआ है. इसे अगर सरकार खत्म नहीं कर पाई तो नुकसान संभव है.

    परमजीत झारखंड का उदाहरण देते हैं, जहां सीएनटी कानून में संशोधन की कोशिशों की वजह से रघुबर सरकार चुनाव हार गई. 

    पूर्वोत्तर में विरोध तेज, वजह- संसद का सभी कानून मानना होगा
    समान नागरिक संहिता का विरोध पूर्वोत्तर में भी शुरू हो गया है. पूर्वोत्तर के नेताओं का कहना है कि नागरिक संहिता समाजों के लिए खतरा पैदा करेगा. संविधान के अनुच्छेद 371 (ए) और 371 (जी) के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों की जनजातियों को विशेष प्रावधानों की गारंटी दी गई है जो संसद को किसी भी कानून को लागू करने से रोकते हैं.

    अब जानिए समान नागरिक संहिता क्या है, लागू होने से क्या बदलेगा?
    शादी, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में भारत में अलग-अलग समुदायों में उनके धर्म, आस्था और विश्वास के आधार पर अलग-अलग कानून हैं. यूसीसी का मतलब प्रभावी रूप से विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार, विरासत वगैरह से संबंधित कानूनों को सुव्यवस्थित करना होगा.

    यानी समान नागरिक संहिता लागू हुआ तो शादी और संपत्ति बंटावरे पर सबसे अधिक फर्क पड़ेगा.

    वर्तमान में भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872, नागरिक प्रक्रिया संहिता, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882, भागीदारी अधिनियम, 1932, साक्ष्य अधिनियम, 1872 जैसे मामलो में सभी नागरिकों के लिए एक समान नियम लागू हैं, लेकिन धार्मिक मामलों में सबके लिए अलग-अलग कानून लागू हैं और इनमें बहुत विविधता भी है. देश में सिर्फ गोवा एक ऐसा राज्य जहां पर समान नागरिक कानून लागू है. 

  • Maharashtra NCP Crisis: ‘शिंदे को हटाकर अजित पवार को मुख्यमंत्री बनाने की हुई है डील

    Maharashtra NCP Crisis: महाराष्ट्र में शिवसेना के बाद एनसीपी में दो फाड़ हो चुके हैं और अजित पवार डिप्टी सीएम बनाए गए हैं. अब इस फूट को लेकर तमाम नेता अपने-अपने दावे कर रहे हैं. कांग्रेस के सीनियर नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने दावा किया है कि उन्हें मिली सूचना के मुताबिक, बीजेपी ने अजित पवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का पद देने का वादा किया है. अजित पवार के सत्तारूढ़ एकनाथ शिंदे-बीजेपी गठबंधन में शामिल हो जाने से महाराष्ट्र में राजनीतिक स्थिति बदल गई है, चव्हाण से पहले शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने भी दावा किया था कि शिंदे मुख्यमंत्री की कुर्सी खो देंगे. 

    अजित पवार के साथ 8 नेता बने मंत्री
    2 जुलाई को अजित पवार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में विभाजन का नेतृत्व करते हुए उप मुख्यमंत्री बन गए. इससे उनके चाचा शरद पवार को बड़ा झटका लगा जिन्होंने 24 साल पहले एनसीपी की स्थापना की थी. अजित पवार के साथ एनसीपी के आठ नेताओं ने भी एकनाथ शिंदे-भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री पद की शपथ ली. 

    चव्हाण ने सौदेबाजी को लेकर किया दावा
    इसे लेकर कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने एक सवाल पर कहा, ”मैंने पहले ही सार्वजनिक तौर पर कहा था कि (अजित पवार भाजपा के साथ जा सकते हैं) लेकिन मुझे आलोचना का सामना करना पड़ा था.” कांग्रेस नेता ने कहा कि उन्हें पहले ही पता था कि यह होगा. पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया, ”इसमें सिर्फ सौदेबाजी चल रही थी कि अजित पवार को क्या मिलेगा. हमारी जानकारी के अनुसार, विधानसभा अध्यक्ष के फैसले, (यानी एकनाथ शिंदे समेत 16 शिवसेना के विधायकों को अयोग्य घोषित करने) की मदद से (शिंदे को) मुख्यमंत्री पद से हटाकर पवार को यह पद देने का वादा किया गया है.

    ”चव्हाण महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण के स्मारक ‘प्रीतिसंगम’ में थे. एनसीपी प्रमुख शरद पवार कराड में स्मारक पर पहुंचे और दिवंगत नेता को पुष्पांजलि अर्पित की. पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा, ”वह (शरद पवार) महा विकास आघाड़ी (एमवीए) के घटकों में से एक हैं और मैं उन्हें समर्थन देने के लिए यहां हूं.”उन्होंने कहा, ”राष्ट्रीय स्तर पर पवार साहब विपक्ष की एकता के साथ मजबूती से खड़े हैं और वह बेंगलुरु में होने वाली विपक्ष की बैठक में हिस्सा लेंगे.

    हाईकोर्ट जा सकता है एमवीए
    ‘कांग्रेस नेता ने बताया कि अगर एमवीए एकजुटता और मजबूती से खड़ा रहता है तो एकनाथ शिंदे-बीजेपी गठबंधन को चुनाव में कोई मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के साथ लोगों की ”सहानुभूति” है और कांग्रेस और एनसीपी उनके साथ आ रही है. अगले साल लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव होने हैं. चव्हाण ने अजित पवार के कदम पर कहा, ”हमें तोड़ने की सारी कोशिश की जाएंगी और ऐसा ही हुआ है.”उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर को 11 अगस्त तक मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे समेत शिवसेना के 16 विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेना है. ऐसा ना करने पर एमवीए हाईकोर्ट जाएगा. 

  • Canada: भारतीय उच्चायोग के सामने खालिस्तानी समर्थकों का फ्रीडम रैली का एलान

    Canada Khalistan poster कनाडा की विदेश मंत्री मेलानी जोली ने 8 जुलाई को होने वाले खालिस्तान फ्रीडम रैली को लेकर ट्वीट किया है। उन्होंने कहा कि कनाडा राजनयिकों की सुरक्षा के संबंध में वियना कन्वेंशन के तहत अपने दायित्वों को बहुत गंभीरता से लेता है। बता दें कि खालिस्तान समर्थक संगठनों ने ओटावा स्थित भारतीय उच्चायोग के समक्ष आठ जुलाई 2023 को खालिस्तान फ्रीडम रैली निकालने का एलान किया है।

    कनाडा में खालिस्तान समर्थकों की भारत विरोधी हरकतें थम नहीं रही हैं। कनाडा में एक बार फिर ऐसे पोस्टर्स देखने को मिले है, जिसमें लिखा गया है ‘Kill India’। इसके अलावा इन पोस्टर्स में भारतीय उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा और टोरंटो में भारत के महावाणिज्य दूत अपूर्वा श्रीवास्तव पर खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप लगाया है।

    पोस्टर में काफी आपत्तिजनक बातें भी लिखी गई हैं। इसके अलावा खालिस्तान समर्थक संगठनों ने ओटावा स्थित भारतीय उच्चायोग के समक्ष आठ जुलाई, 2023 को खालिस्तान फ्रीडम रैली निकालने का एलान किया है। इसी के लिए खालिस्तान समर्थकों ने पोस्टर जारी किए है।

    8 जुलाई को होने वाले प्रदर्शन पर कनाडा विदेश मंत्री की प्रतिक्रिया

    कनाडा की विदेश मंत्री मेलानी जोली ने 8 जुलाई को होने वाले खालिस्तान फ्रीडम रैली को लेकर ट्वीट किया है। उन्होंने कहा, ‘कनाडा राजनयिकों की सुरक्षा के संबंध में वियना कन्वेंशन के तहत अपने दायित्वों को बहुत गंभीरता से लेता है। 8 जुलाई को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन के संबंध में ऑनलाइन प्रसारित हो रही कुछ प्रचार सामग्री को लेकर कनाडा भारतीय अधिकारियों के साथ निकट संपर्क में है। यह बिल्कुल अस्वीकार्य हैं।’

    विदेश मंत्री जयशंकर ने दिया था बयान

    इससे पहले विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा था कि कट्टर खालिस्तान समर्थक ना तो भारत के लिए सही है और ना ही अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया के हितों के लिए ठीक है।

    एक कार्यक्रम में जयशंकर ने कहा कि कनाडा में खालिस्तान समर्थकों की तरफ से जो पोस्टर जारी किए गए हैं, उन्हें उसकी जानकारी है। जल्द ही इस मुद्दे को कनाडा सरकार के समक्ष उठाया जाएगा। उन्होंने कहा कि हमने कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन व आस्ट्रेलिया जैसे अपने साझेदार देशों से आग्रह किया है कि वे खालिस्तान समर्थकों को कोई जगह नहीं दें क्योंकि यह किसी भी देश के लिए ठीक नहीं है।

  • Uniform Civil Code Bill: संसद के मानसून सत्र में पेश हो सकता है यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल

    Uniform Civil Code Bill: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से यूनिफॉर्म सिविल कोड का जिक्र किए जाने के बाद से ही इसे लेकर बहस जारी है. इन सबके बीच सूत्रों के हवाले से जानकारी सामने आई है कि मोदी सरकार मानसून सत्र में यूनिफॉर्म सिविल कोड का प्रस्ताव पेश कर सकती है. मानसून सत्र जुलाई में बुलाया जाएगा और इसको लेकर अंतिम फैसला कैबिनेट कमेटी ऑन पार्लियामेंट्री अफेयर्स की बैठक में होगा.

    सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, यूनिफॉर्म सिविल कोड का बिल केंद्र सरकार की ओर से संसदीय स्थायी समिति को भेजा जा सकता है. जो इस पर तमाम हितधारकों से उनके विचार मांगेगी. समान नागरिक संहिता (UCC) के मानसून सत्र में पेश होने पर संसद में सियासी घमासान मचना तय है. पीएम मोदी के यूसीसी का जिक्र किए जाने के बाद से ही बीजेपी पर कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल लगातार हमलावर है.

  • UCC Issue: यूनिफॉर्म सिविल कोड पर उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने साफ किया रुख

    Uddhav Thackeray On Uniform Civil Code: महाराष्ट्र के पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (यूबीटी) यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का समर्थन कर सकती है. सूत्रों ने ये जानकारी दी. औपचारिक तौर पर भले ही उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की पार्टी के किसी नेता ने यूनिफॉर्म सिविल कोड पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया हो, लेकिन सूत्र बताते हैं कि अगर बिल संसद में लाया जाता है तो इसे उद्धव ठाकरे की पार्टी समर्थन देगी. 

    बालासाहेब ठाकरे के तीन महत्वपूर्ण सपने रहे हैं- अयोध्या में राम मंदिर, कश्मीर से 370 हटाना और देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना. उद्धव ठाकरे ने बीती 20 जून को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यूसीसी का समर्थन करने की बात कही थी. साथ ही उन्होंने सवाल भी उठाए थे. 

    संजय राउत का क्या कहना है?

    शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत का कहना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड का ड्राफ्ट नहीं आया है. ऐसे में यह कहना गलत है कि हम उसके विरोध में है. ड्राफ्ट आने के बाद शिवसेना उद्धव बालासाहेब पार्टी अपनी भूमिका स्पष्ट करेगी. 

    मानसून सत्र में लाया जा सकता है बिल

    सरकार संसद के मानसून सत्र में यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल ला सकती है. संसद की एक स्थायी समिति ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मुद्दे पर विभिन्न हितधारकों के विचार लेने के लिए विधि आयोग की ओर से हाल में जारी नोटिस पर तीन जुलाई को (विधि) आयोग और कानून मंत्रालय के प्रतिनिधियों को बुलाया है. 

    एनसीपी ने भी साफ किया रुख

    शिवसेना (यूबीटी) की सहयोगी पार्टी एनसीपी के प्रमुख शरद पवार भी यूसीसी के समर्थन को लेकर बयान दे चुके हैं. उन्होंने गुरुवार को कहा था कि सरकार की ओर से कुछ चीजें स्पष्ट करने के बाद उनकी पार्टी समान नागरिक संहिता पर अपना रुख तय करेगी. 

    महाराष्ट्र कांग्रेस ने समिति का किया गठन

    पवार ने कहा कि वे यूसीसी का समर्थन करने के इच्छुक नहीं हैं. इसलिए सिख समुदाय की राय पर गौर किये बिना यूसीसी पर फैसला करना उचित नहीं होगा. इसके अलावा महाराष्ट्र कांग्रेस ने समान नागरिक संहिता के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति बालचंद्र मुंगेकर के नेतृत्व में नौ-सदस्यीय समिति का गठन किया है. 

  • Gujarat High Court: तीस्ता सीतलवाड़ को गुजरात हाईकोर्ट से झटका, तुरंत आत्मसमर्पण

    Gujarat High Court: गुजरात हाई कोर्ट ने शनिवार को सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को बड़ा झटका दिया। कोर्ट ने सीतलवाड़ की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने उन्हें 2002 के गोधरा कांड के बाद हुए दंगों के मामलों में निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए कथित तौर पर सबूत गढ़ने से संबंधित मामले में तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

    कोर्ट ने सरेंडर करने का दिया निर्देश

    जस्टिस निर्जर देसाई की पीठ ने सीतलवाड़ की जमानत याचिका खारिज कर दी। जस्टिस देसाई ने उन्हें तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। मालूम हो कि तीस्ता सीतलवाड़ अंतरिम जमानत हासिल करने के बाद जेल से बाहर हैं।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आवेदक सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम जमानत पर बाहर है, इसलिए उसे तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है।

    क्या है मामला?

    बता दें कि सीतलवाड़ और सह-अभियुक्त और पूर्व पुलिस महानिदेशक आर बी श्रीकुमार को पिछले साल 25 जून को गुजरात पुलिस ने हिरासत में लिया था। इसके बाद एक अदालत ने उनकी पुलिस रिमांड समाप्त होने के बाद 2 जुलाई को उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।

    क्या थी एसआईटी की रिपोर्ट?

    जानकारी के अनुसार, तीस्ता सीतलवाड़ सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद सितंबर 2022 में जेल से बाहर आईं। पिछले साल एसआईटी ने कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल कर कहा था कि तीस्ता सीतलवाड़ गुजरात दंगों से जुड़े मामलों में फर्जी दस्तावेज बनाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक पारी खत्म करने और उन्हें फांसी तक की सजा दिलाना चाहती थीं।

  • पाकिस्तान में कराची को अलग प्रांत बनाने की मांग

    पाकिस्तान सीनेट के उपाध्यक्ष मिर्जा मुहम्मद अफरीदी ने बेहतर प्रशासन के लिए कराची सहित नौ और प्रांत बनाने का सुझाव दिया है। एक इंटरव्यू में सीनेटर ने बलूचिस्तान और पंजाब में तीन-तीन, खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में दो और सिंध में एक प्रांत बनाने की सिफारिश की। जियो न्यूज ने यह जानकारी दी है।

    अफरीदी ने कहा कि केपी के हजारा जिले और आदिवासी क्षेत्रों (पूर्व में फाटा) को अलग प्रशासनिक इकाइयां बनाया जाना चाहिए। जियो न्यूज ने मिर्जा अफरीदी के हवाले से कहा,

    सरकार ने एफएटीए के साथ किए गए वादों को पूरा नहीं किया’

    संसाधनों के बंटवारे पर बात करते हुए सीनेटर अफरीदी ने कहा कि 18वें संशोधन के बाद प्रांतों को उनका हिस्सा मिलता रहेगा। उन्होंने कहा कि यदि नए प्रांत बनते हैं तो उन्हें एनएफसी (राष्ट्रीय वित्त आयोग) पुरस्कार के तहत हिस्सा मिलता रहेगा। सीनेटर ने अफसोस जताया कि सरकार ने एफएटीए के साथ किए गए वादों को पूरा नहीं किया है।

    एफएटीए को लोगों को करना पड़ा रहा कठिनाइयों का सामना

    जियो न्यूज ने अफरीदी के हवाले से कहा, “आज भी एफएटीए के लोगों को कई चिंताएं हैं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।” अफरीदी ने आगे कहा कि उन्होंने फंड का मुद्दा वित्त मंत्री इशाक डार के सामने भी उठाया है।

  • पाकिस्तान में कराची को अलग प्रांत बनाने की मांग

    पाकिस्तान सीनेट के उपाध्यक्ष मिर्जा मुहम्मद अफरीदी ने बेहतर प्रशासन के लिए कराची सहित नौ और प्रांत बनाने का सुझाव दिया है। एक इंटरव्यू में सीनेटर ने बलूचिस्तान और पंजाब में तीन-तीन, खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में दो और सिंध में एक प्रांत बनाने की सिफारिश की। जियो न्यूज ने यह जानकारी दी है।

    अफरीदी ने कहा कि केपी के हजारा जिले और आदिवासी क्षेत्रों (पूर्व में फाटा) को अलग प्रशासनिक इकाइयां बनाया जाना चाहिए। जियो न्यूज ने मिर्जा अफरीदी के हवाले से कहा,

    सरकार ने एफएटीए के साथ किए गए वादों को पूरा नहीं किया’

    संसाधनों के बंटवारे पर बात करते हुए सीनेटर अफरीदी ने कहा कि 18वें संशोधन के बाद प्रांतों को उनका हिस्सा मिलता रहेगा। उन्होंने कहा कि यदि नए प्रांत बनते हैं तो उन्हें एनएफसी (राष्ट्रीय वित्त आयोग) पुरस्कार के तहत हिस्सा मिलता रहेगा। सीनेटर ने अफसोस जताया कि सरकार ने एफएटीए के साथ किए गए वादों को पूरा नहीं किया है।

    एफएटीए को लोगों को करना पड़ा रहा कठिनाइयों का सामना

    जियो न्यूज ने अफरीदी के हवाले से कहा, “आज भी एफएटीए के लोगों को कई चिंताएं हैं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।” अफरीदी ने आगे कहा कि उन्होंने फंड का मुद्दा वित्त मंत्री इशाक डार के सामने भी उठाया है।