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  • सेना को बड़ा झटका, इजरायल से नहीं ली जाएगी एंटी टैंक मिसाइल

    सेना को बड़ा झटका, इजरायल से नहीं ली जाएगी एंटी टैंक मिसाइल

     

     

    सरकार ने सेना के लिए इस्राइल से टैंक रोधी निर्देशित मिसाइल (एटीजीएम) ‘स्पाइक’ हासिल करने की प्रक्रिया को वापस लेने का फैसला किया है. इसके साथ ही सरकार ने प्रमुख रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला डीआरडीओ को स्वदेशी प्रौद्योगिकी के साथ इसे विकसित करने के लिए कहा है. आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि सरकार ने एक इस्राइली कंपनी से स्पाइक मिसाइलें खरीदने के लिए प्रस्ताव के लिए अनुरोध (आरएफपी) वापस लेने का फैसला किया है.

    सूत्रों ने संकेत दिया कि मिसाइलें हासिल करने की प्रक्रिया में उस समय बाधाएं आयीं जब जाहिरा तौर पर इस्राइली पक्ष ने ‘मेक इन इंडिया’ पहल के प्रावधानों के अनुसार प्रौद्योगिकी का पूर्ण हस्तांतरण सुनिश्चित करने पर आपत्ति जताई.

    उन्होंने कहा कि डीआरडीओ द्वारा एटीजीएम तैयार करने का भरोसा जताने के बाद आरएफपी से हटने का फैसला किया गया. सूत्रों ने बताया कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को अब इस परियोजना पर काम करने को कहा गया है तथा मिसाइल विकसित करने के लिए चार साल का समय दिया गया है.

    इस मुद्दे पर रक्षा मंत्रालय की ओर से कोई औपचारिक बयान नहीं दिया गया है. भारत का कल्याणी समूह और इस्राइली सरकार की राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टस ने अगस्त में हैदराबाद के पास 70 करोड़ रूपए की लागत से एक उत्पादन इकाई की शुरुआत की थी. उसे उम्मीद थी कि इस्राइली कंपनी को ही यह ठेका मिलेगा.उधर यरूशलम में, राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टस ने कहा कि आरएफपी से हटने के बारे में उसे भारत की ओर से कोई सूचना नहीं मिली है.

    राफेल के उप प्रवक्ता इशय डेविड ने कहा कि स्पाइक मिसाइलें खरीदने के फैसले में परिवर्तन के बारे में राफेल को आधिकारिक रूप से कोई सूचना नहीं मिली है. दुनिया भर में 26 विभिन्न सेनाएं स्पाइक का इस्तेमाल कर रही हैं. उन्होंने कहा कि भारत द्वारा इसका चयन एक लंबी और कठोर प्रक्रिया के बाद किया गया था. उस प्रक्रिया में राफेल ने सभी जरूरतों को पूरा किया था.

  • प्रदूषण उनकी चिंता से कम है

    प्रदूषण उनकी चिंता से कम है

     

     

  • आतंक की राह पर गए युवाओं को साथ लेगी मोदी सरकार, बनाया ये प्लान

    आतंक की राह पर गए युवाओं को साथ लेगी मोदी सरकार, बनाया ये प्लान

     

     

    जम्मू कश्मीर में स्थायी सुधार लाने के लिए और आतंक से लड़ने के लिए केंद्र सरकार नई रणनीति पर काम कर रही है. ईटीवी के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार गृह मंत्रालय की प्राथमिकता उन कश्मीरी युवाओं की मदद करना और उनके कॅरियर को बेहतर बनाने में सहायक बनना है जो हाल में पैदा हुई स्थितियों की वजह से आतंकियों से जा मिले और फिर वापस घर लौट आए.

    इसके लिए गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर की मुफ्ती सरकार से बात की है और कहा है कि पहली बार आतंकियों से हाथ मिलाने के बाद घर वापसी करने वाले युवाओं को रिहा किया जाए और उनके खिलाफ दर्ज सभी मामलों को वापस ले लिया जाए. केंद्र सरकार चाहती है कि इन युवाओं को जीवन भर एक अपराधी के तौर पर आंकने के बजाए उन्हें अपने करियर के उत्थान के लिए मौका मिलना चाहिए.

    आतंकवाद से लड़ने के लिए, केन्द्र ने जम्मू-कश्मीर पुलिस और वहां तैनात केन्द्रीय बलों की अनुग्रह राशि राहत की हिस्सेदारी को बढ़ाने का फैसला किया है. आतंकवादियों का मुकाबला करते हुए अगर कोई जवान शहीद हो जाता है तो उसके परिवार को 30 लाख रुपए की अनुग्रह राशि दी जाएगी.

    इस राशि में 18 लाख रुपए जम्मू-कश्मीर के राज्य बजट से दिए जाएंगे और अतिरिक्त 12 लाख रुपये केंद्र सरकार द्वारा दिए जाएंगे. एसपीओ के पूर्व अनुग्रह राशि को 2 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपए किया जा रहा है. केंद्र सरकार द्वारा अनुग्रह राशि की रकम बाद में दिया जाएगा.जम्मू-कश्मीर राज्य में भारी बिजली की कमी को देखते हुए, ऊर्जा मंत्रालय इस साल सर्दी के दौरान 800 मेगा वॉट की अतिरिक्त बिजली आवंटित करेगा.

    युद्ध विराम के उल्लंघन के कारण पीड़ित सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को राहत प्रदान करने के लिए किए गए खर्चों की प्रतिपूर्ति होगी. केंद्र सरकार एनडीआरएफ के दिशानिर्देशों के बराबर की रकम इन्हें प्रदान करेगी. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय गृह सचिव स्थिति की नियमित आधार पर समीक्षा कर रहे हैं.

    गौर हो कि हाल के दिनों में दो युवा कश्मीरी अपराधियों से मिले और फिर उनके चंगुल से वापस लौट आए. जम्मू-कश्मीर में कुछ दिन पहले आतंकी संगठ लश्कर-ए-तयैबा से जुड़ने के बाद आत्मसमर्पण करने वाले युवा फुटबॉलर माजिद खान को सरकार ने बड़ी राहत दी थी. भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर की मुफ्ती सरकार ने युवक के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला दर्ज न करने का फैसला किया.

     

  • पूर्व कांग्रेस नेता प्रियरंजन दासमुंशी का निधन, 8 साल से थे कोमा में

    पूर्व कांग्रेस नेता प्रियरंजन दासमुंशी का निधन, 8 साल से थे कोमा में

     

     

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी का निधन हो गया है. वह पिछले 9 साल से कोमा में थे. दिल्ली के अपोलो अस्पताल में कांग्रेसी नेता ने अपनी अंतिम सांसें ली. कांग्रेस और बीजेपी के कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया है.

    अक्टूबर, 2008 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. उसके बाद वह न तो बोल पा रहे थे और न ही किसी को पहचान पा रहे थे. उन्हें दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (AIIMS) में भर्ती कराया गया था, जहां से बाद में उन्हें अपोलो अस्पताल में ले जाया गया था.

    2014 में जब बीजेपी सत्ता में आई तो, स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था कि प्रियरंजन दासमुंशी के स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का वहन सरकार करेगी. वह 2008 से ही सपोर्टिव केयर पर चल रहे थे.

    प्रियरंजन दासमुंशी के निधन पर राहुल गांधी ने शोक जाहिर किया है. उन्होंने ट्वीट किया-‘एक नेता और अच्छे इंसान के तौर पर हम प्रियरंजन दासमुंशी को हमेशा याद करेंगे. बंगाल और कांग्रेस पार्टी ने एक अच्छा नेता खो दिया. हमारी संवेदना उनके परिवार के साथ है.’

    अपने राजनीतिक जीवन में प्रियरंजन दासमुंशी कई अहम पद संभाला. पहली बार वह 1971 में दक्षिणी कोलकाता लोकसभा सीट से सांसद चुने गए. 1985 में पहली बार राजीव गांधी कैबिनेट में शामिल किया गया.

    प्रियरंजन दासमुंशी अंतिम बार वर्ष 2004 में रायगंज सीट से ही लोकसभा चुनाव लड़ा था. यहां उन्हें जीत हासिल हुई थी.

    बता दें कि प्रियरंजन दासमुंशी के परिवार में उनकी पत्नी दीपा दासमुंशी और बेटी प्रियदीप दासमुंशी हैं. उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक आवास पर होगा.

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  • राहुल की ताजपोशी के बाद क्या होगी सोनिया गांधी की नई भूमिका?

    राहुल की ताजपोशी के बाद क्या होगी सोनिया गांधी की नई भूमिका?

     

     

    सोनिया गांधी के नाम भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की सबसे ज्यादा वक्त तक अध्यक्ष रहने का रिकार्ड है.कांग्रेस में राहुल गांधी को कमान सौंपने की तैयारी है. राहुल के अध्यक्ष बनने से पहले ही कांग्रेस दफ्तर के बाहर आतिशबाजी का नजारा देखने को मिला. कांग्रेस वर्किग कमेटी की बैठक में सोनिया गांधी ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को धन्यवाद कहा.

    लेकिन सवाल ये उठ रहा है कि सोनिया गांधी की क्या भूमिका रहेगी. विरोधी जब नरेंद्र मोदी जैसा ताकतवर राजनीतिक हो तो क्या राहुल को सोनिया अकेला छोड़ देगी. सोनिया गांधी के करीबी सूत्रों और एक सीनियर नेता ने बताया सोनिया गांधी राजनीति से संन्यास नहीं लेने जा रही है. 2019 के लोकसभा चुनाव तक वो यूपीए की चेयरपर्सन बनी रहेंगी.

    संभावना ये भी है कि कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष भी वही रहेंगी. इसके पीछे की वजह है गठबंधन. नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी को मात देने के लिए 2004 की तर्ज पर कांग्रेस को गठबंधन करना पड़ेगा. बहुत सारे कांग्रेस के सहयोगी राहुल गांधी के साथ सहज नहीं है. कांग्रेस को बिहार, यूपी, केरल, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर और बंगाल में गठबंधन के साथी की तलाश है. लेफ्ट पार्टियों का समर्थन कांग्रेस को चाहिए. इसलिए सोनिया गांधी यूपीए की चेयरपर्सन बनी रहेंगी. कांग्रेस को विपक्ष से सत्ता तक ले जाने वाली सोनिया गांधी का राजनीतिक सफर कैसा रहा- आइए नजर डालते है .

    शुरुआती दिन और सोनियासोनिया गांधी का जन्म इटली के लुज़ियाना में 9 दिसंबर 1946 को हुआ था. कैंब्रिज मे सोनिया की दोस्ती राजीव गांधी से हुई. 1968 में राजीव गांधी के साथ सोनिया की शादी हुई. बताया जाता है कि शुरुआती दिनों में सोनिया गांधी राजीव गांधी के राजनीति मे आने के सख्त खिलाफ रही. राजीव गांधी पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगा और 1989 के चुनाव में कांग्रेस हार गई. मई 1991 में राजीव गांधी की हत्या एक चुनावी रैली में हो गयी. लेकिन तब भी सोनिया गांधी ने राजनीति से गुरेज रखा. तमाम दबाव के बाद सोनिया गांधी के हिमायत से पी वी नरसिंहाराव प्रधानमंत्री बने. राजीव गांधी की मौत के बाद सोनिया गांधी ने सामाजिक कार्यो में अपना वक्त दिया. खासकर राजीव गांधी फाउंडेशन के कामों में.

    1996 के आम चुनाव में नरसिंहाराव की अगुवाई वाली कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद से नरसिंहाराव के खिलाफ कांग्रेस में बगावती सुर उठने लगे थे. इस सुर को ठंडा करने के लिए सीताराम केसरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन पार्टी के कई नेता कांग्रेस के अलग हो गए. जिसमें उत्तर भारत से नरायण द्त्त तिवारी और अर्जुन सिंह ने मिलकर तिवारी कांग्रेस का गठन किया. तमिलनाडु के कद्दावर नेता जी के मूपनार ने पी चिदंबरम के साथ तमिल मनीला कांग्रेस बना ली. मध्य प्रदेश में माधवराव सिंधिया ने भी अपना अलग दल बनाया.

    पार्टी का एक खेमा सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने के लिए कोशिश कर रहा था. जिसके अगुवा अर्जुन सिंह थे. सोनिया ने 1997 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सक्रिय राजनीति में कदम रखा. 1998 में कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष मनोनीत कर दिया. लेकिन राजनीति की राह इतनी आसान नहीं थी. 1999 में अटल की सरकार गिरने के बाद सरकार बनाने की कोशिश की गई लेकिन आखिरी समय में मुलायम सिंह ने विदेशी मूल का मुद्दा बना कर सोनिया गांधी को समर्थन देने से इनकार कर दिया. इस मुद्दे पर ही शरद पवार तारिक अनवर और पीए संगमा भी कांग्रेस से अलग हो गए.

    1999 के आम चुनाव में कांग्रेस को फिर हार का सामना करना पड़ा.1999 में सोनिया गांधी विपक्ष की नेता बनी. इस बीच साल 2000 में कांग्रेस में चुनाव हुए, यूपी के ब्राह्मण नेता जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया के खिलाफ चुनाव लड़ा लेकिन जीत सोनिया गांधी की हुई. 2003 में अटल सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लायी लेकिन कामयाबी नहीं मिली.

    2004-2014 सोनिया की राजनीति
    2004 में एनडीए का इंडिया शाइनिंग शबाब पर था.कांग्रेस को एक साथ रखने की चुनौती सोनिया गांधी पर थी. सोनिया गांधी ने कांग्रेस के साथ नए दलों को इकट्ठा करना शुरू किया. बिहार से लेकर केरल तक कई दलों के साथ गठबंधन हुआ. चुनाव नतीजों से सोनिया ने सबको चौंका दिया. 15 दलों के गठबंधन की सरकार बनी जिसको वामंपथी दलों ने बाहर से समर्थन दिया. संसद के सेंट्रल हॉल में हंगामे के बीच सोनिया गांधी ने पीएम बनने से इनकार कर दिया.

    मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो सोनिया गांधी नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की अध्यक्ष. जो सरकार को सलाह मशविरा देने का काम करती रही. 23 मार्च 2006 को सोनिया गांधी ने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. ऑफिस ऑफ प्राफिट को लेकर हंगामा चल रहा था. जिसकी वजह से सोनिया गांधी ने ये कदम उठाया. साल 2008 में अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील के मसले पर लेफ्ट ने समर्थन वापिस ले लिया. लेकिन समाजवादी पार्टी के समर्थन और क्रास वोटिंग से यूपीए की सरकार बच गयी.
    यूपीए की इस कार्यकाल में मनरेगा और आरटीआई जैसे कानून लाए गए. किसानों को कर्ज माफ किए गए. 2009 के आम चुनाव में विपक्ष की तरफ से कालेधन का मुददा बनाया गया. लेकिन कांग्रेस को और ज्यादा सीट लोकसभा में मिली खासकर यूपी में जहां 23 सांसद जीतकर आए. 2009 के बाद सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. 2जी घोटाले का आरोप कोयला में घोटाले का आरोप और काले धन को लेकर सरकार की सुस्ती पर सवाल खड़ा किया गया.अन्ना रामदेव और अरविन्द केजरीवाल के आंदोलन की वजह से यूपीए की साख गिर गयी. 2014 में बीजेपी को भारी बहुमत मिला.

    विपक्ष में सोनिया
    2014 में कांग्रेस की हार का सिलसिला जो शुरू हुआ तो रूकने का नाम नहीं ले रहा था. मोदी का जादू चल रहा था. कांग्रेस की हरियाणा महाराष्ट्र में सरकार गई. असम, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश हर जगह चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हारी. सिवाय बिहार में जहां गठबंधन ने लाज बचाई.

    2017 के चुनाव में पंजाब को छोड़कर हर जगह कांग्रेस का सफाया हो गया. नेशनल हेराल्ड के मामले में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर कोर्ट में सोनिया राहुल के खिलाफ मामला भी दर्ज कर लिया.

    (सैय्यद मोजिज़ इमाम, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

  • खून में उंगलियां डुबोकर नज़्म लिखने वाले शायर!

    खून में उंगलियां डुबोकर नज़्म लिखने वाले शायर!

     

     

    तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात, तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है… मुझसे पहले सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग, के मिसरे से शुरू और खत्म होने वाली ये नज़्म बेहतरीन तरीके से फैज़ अहमद फैज़ की शायरी और उनके ज़िंदगी जीने के सलीक़े को बताती है.

    फैज़ अहमद खान के नाम से पैदा हुए और फैज़ के नाम से दुनिया भर में मशहूर हुए इस शायर की जिंदगी किसी तिलिस्म से भरे उपन्यास की तरह ही रोमांच और उतार चढ़ाव से भरी रही. मगर फैज़ जीवन और शायरी दोनों में वस्ल की राहत (मिलन के सुख) के अलावा दुनिया जहान की तकलीफों को दूर करने की राहत तलाशते रहे.

    छिपा हुआ इश्क़
    फैज़ अपने बारे में बात करना पसंद नहीं करते थे. यहां तक की शायरी में जब अपनी बात कहने का मौका आया है तो उन्होंने हम शब्द का ही इस्तेमाल किया है. मगर वो शायर ही क्या जिसका दिल न टूटा हो. आजादी के पहले के हिंदुस्तान में 17 साल के फैज को इश्क हुआ. शहर था लाहौर. उसके तुरंत बाद वो अमृतसर आ गए. दोनों शहरों के बीच यूं तो कुछ ही देर का फासला है. मगर 18 की उम्र में जब फैज़ वापस लाहौर पहुंचे तो टूटे दिल के साथ लौटे.ऐसा था दोनों का प्यार
    फैज़ के दोस्तों ने लिखा है कि उन्होंने किसी को ‘उसके’ बारे में नहीं बताया. सिर्फ इतना जिक्र किया कि गरीब लड़की थी और उसकी शादी हो गई. इसके बाद उन्हें ब्रिटेन से आईं एलिस मिलीं. जिनके साथ निकाह रचाकर वो जीवन भर साथ रहे. शादी के बाद एलिस को अक्सर ये पूछा जाता कि क्या वो फैज की शायरी समझती हैं. एलिस कहतीं, शायरी का पता नहीं मगर वो शायर को समझती हैं.

    मार्कवादी शायर थे फैज़
    शायर फैज़ को समझना बड़ा आसान है. फैज बराबरी वाले समाज की कल्पना करने वाले मार्क्सवादी शायर थे. फासीवाद और चरमपंथ के खिलाफ लड़ने का इतना जुनून था कि 1942 में अपनी लेक्चरर की नौकरी छोड़कर जर्मनी से लड़ने के लिए ब्रिटिश सेना में भर्ती हो गए. 1944 में लेफ्टिनेंट कर्नल बने. कलम थामने वाले हाथों को हथियार नहीं भाए तो 1947 में वापस लिखने पढ़ने की दुनिया में आ गए.

    नए स्कूल की शुरुआत है फैज़ की शायरी
    अगर फैज़ की शायरी को समझने की बात करें तो अली सरदार जाफरी लिखते हैं कि फैज के साथ उर्दू शायरी में एक नए स्कूल की शुरुआत होती है. सही बात है, उर्दू में तमाम शायर दिल टूटने के ग़म में तमाम तरह के शेर कहते रहते हैं. फैज़ की कविता क्रांति की बात करती है. दुष्यंत कुमार अगर विद्रोह के गज़लगो हैं तो फैज़ ऐसे इन्कलाबी शायर हैं जिनकी कविता में सर्वे भवंतु सुखिनः वाला समाज बनने के बाद प्रेम करने की उम्मीद रखी गई है.

    इसीलिए फैज़ कहते हैं, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले, गुलों में रंगभरे बाद-ए-नौ-बहार चले. क्रांति की बातों में भी फैज़ सुकून भरे दिनों की तलाश में मास्को में लिखते हैं कि आपकी याद आती रही रात भर, चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर.

    रावलपिंडी केस और विद्रोह
    फैज़ घोषित वामपंथी थे. रूस में उनकी कविताओं का अनुवाद हुआ. उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया. मगर राजनीतिक विचारधारा उनकी परेशानियों का सबब बनीं. 1951 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के तख्तापलट की साजिश सामने आई. रालवपिंडी के नाम से मशहूर इस केस में फैज़ का नाम भी आया. उन्हें जेल में डाल दिया गया.

    फैज़ खुद इसमें शामिल होने से इन्कार करते रहे मगर उनसे डायरी और कलम छीन ली गई. ऐसे में फैज़ जेल से रिहा होने वाले कैदियों को विदाई के समय मिलते और उनके जरिए एक-एक शेर जेल से बाहर आता. इसी दौर में फैज़ ने लिखा, मता-ए-लौहो कलम छिन गई तो क्या ग़म है, कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने.

    चार साल बाद हुए रिहा
    चार साल बाद 1955 में फैज़ को बाइज्ज़त रिहा कर दिया गया. मगर इस बीच उनके लिए एक नई मुश्किल की शुरुआत हो चुकी थी. पाकिस्तान में वो दौर शुरू हो चुका था जिसमें कहा जाता था कि पाकिस्तान को अल्लाह, आर्मी और अमेरिका चलाते हैं. अमेरिका की सरपरस्ती वाले पाकिस्तान में रूस के लाड़ले फैज़ के लिए मुश्किलें बढ़ती रहीं. फैज़ भी खुलकर फिलिस्तीन के समर्थन में आए और यासिर अराफात के करीबी दोस्त बने.

    इन सबके नतीजे में उन्हें पाकिस्तान से लंबे समय तक निर्वासन भी झेलना पड़ा. हालांकि, इस दौर में फैज़ ने काफी कुछ लिखा मगर तेवर वैसे ही बरकरार रखे.

    शबाना आज़मी ने बताया वो किस्सा
    फैज़ से जुड़ा हुआ एक किस्सा शबाना आज़मी सुनाती हैं. रूस में शबाना फैज़ से मिलने गईं. फैज़ ने अपने ताजा लिखे कुछ शेर शबाना को पढ़ने को दिए. शबाना ने डरते हुए कहा कि वो उर्दू समझ लेती हैं मगर पढ़ नहीं पाती. फैज़ नाराज हो गए. शबाना ने उन्हें इंप्रेस करने के लिए पहले मीर और फिर बहादुर शाह ज़फर का एक शेर सुनाया.

    फैज़ ने इसपर कहा कि मीर तक तो ठीक है, ज़फर को तो मैं शायर ही नहीं मानता. पता नहीं उनका ये गुस्सा शबाना आज़मी पर था या ज़फर के बादशाह होने पर मगर फैज़ ऐसे ही थे. अपनी शर्तों पर जीने वाले. लोगों ने उन्हें अपने हिसाब से समझा और इस्तेमाल किया.

    पिछले साल उनकी एक लाइन को फैशन कंपनी ने इस्तेमाल किया. हैदर और बुद्धा इन द ट्रैफिक जाम जैसी फिल्मों ने उनकी शायरी को अपने कथानक में पिरोया. ये कितना सही है और कितना गलत इसका फैसला कभी और करेंगे फिलहाल, ज़ोहरा सहगल की आवाज़ में फैज़ की एक नज़्म सुनते हैं.

    (hindi.firstpost.com के लिए Animesh Mukharjee)

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  • राहुल गांधी की ताजपोशी पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी आज लेगी फैसला

    राहुल गांधी की ताजपोशी पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी आज लेगी फैसला

     

     

    राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष कब बनेंगे, इसका ऐलान आज हो सकता है. कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने आज सुबह 10.30 बजे अहम मीटिंग बुलाई है. मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के 10 जनपथ स्थित आवास पर ये मीटिंग होगी. संभावना है कि मीटिंग में राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने पर मुहर लग सकती है.

    बता दें कि कांग्रेस सेंट्रल इलेक्शन कमेटी ने सोनिया गांधी को चुनाव का प्रस्तावित शेड्यूल दे दिया था. इसपर उन्होंने विचार कर लिया है. अब कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में इसपर मुहर लगाई जाएगी. इसके बाद आज की मीटिंग में तय हो जाएगा कि राहुल गांधी की ताजपोशी कब होगी. सूत्रों का कहना है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले ही राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं.

    आज होगा चुनाव के शेड्यूल का ऐलान
    कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग के बाद पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के शेड्यूल का ऐलान होगा, जो करीब 10 से 15 दिन का होगा. सूत्रों के मुताबिक, पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के लिए किसी अन्य नेता ने नॉमिनेशन फाइल नहीं किया, तो राहुल गांधी का अध्यक्ष बनना तय है.9 दिसंबर के पहले ही हो सकते हैं चुनाव
    संभावना ये ही जताई जा रही है कि राहुल के खिलाफ कोई भी नेता पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में खड़ा नहीं होगा. सूत्रों के मुताबिक, चुनाव 9 दिसंबर यानी गुजरात चुनाव के पहले ही कराए जा सकते हैं. बता दें कि 9 दिसंबर को गुजरात में पहले चरण के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे.

    पार्टी अध्यक्ष बनने पर राहुल के लिए चुनौती होगा गुजरात चुनाव
    कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद गुजरात चुनाव राहुल गांधी की साख का सवाल हो जाएगा. ‘घर घर कांग्रेस’ कैंपेन के साथ कांग्रेस गुजरात चुनाव में भावनात्मक रूप से लोगों के साथ जुड़ने की पूरी कोशिश कर रही है. हालिया रैलियों में उन्होंने गुजरात में काफी माहौल बनाया है. उनकी छवि दिनोंदिन और बेहतर होती जा रही है. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी इन चुनौतियों का सामना कैसे करते हैं.

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  • आदी महोत्सव दिल्लीवासियों को जीवन के सरल तरीकों में झांकना देता है

    आदी महोत्सव दिल्लीवासियों को जीवन के सरल तरीकों में झांकना देता है

     

     

  • इस मामले में सोनिया से पीछे हैं उनकी सास इंदिरा गांधी

    इस मामले में सोनिया से पीछे हैं उनकी सास इंदिरा गांधी

     

     

    सास तो सास होती है. सास अक्‍सर बहुओं को सुनाती हैं कि उन्‍होंने जिंदगी में क्‍या-क्‍या पापड़ नहीं बेले, उन्‍होंने बहुओं से ज्‍यादा दुनिया देखी हैं. उन्‍होंने जिंदगी में जो झेला है, बहुए तो वो कर ही नहीं सकतीं. उलाहनों की इस रेस में शायद ही कोई बहू अपनी सास से आगे निकले, लेकिन देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी में से एक इंडियन नेशनल कांग्रेस (आईएनसी) की अध्‍यक्ष सोनिया गांधी एक मामले में अपनी सास इंदिरा गांधी से काफी आगे निकल गई हैं.

    4 दिसंबर को आईएनसी के अध्‍यक्ष पद पर होने जा रही राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद सोनिया गांधी अध्‍यक्ष का पद छोड़ देंगी. सोनिया गांधी इस पद पर सबसे लंबे समय तक काबिज रहने वाली शख्सियत हैं.

    यही वजह है कि 19 साल तक पार्टी नेतृत्‍व करने वाली सोनिया गांधी ने कुल 6 साल आइएनसी का अध्‍यक्ष पद संभालने वाली अपनी सास और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पीछे छोड़ दिया है.

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    सोनिया गांधी और उनकी सास इंदिरा गांधी PHOTO_PTI

    इंदिरा गांधी ने अपने जीवन में तीन बार आईएनसी के अध्‍यक्ष का पदभार संभाला था. 1959 में एक साल विशेष सत्र में आईएनसी की अध्‍यक्ष रहने के साथ ही इंदिरा गांधी ने 1978-83 और फिर 1883-84 तक पदभार संभाला.

    जबकि इंदिरा गांधी से तीन गुना से ज्‍यादा समय तक उनकी बहू सोनिया गांधी ने कांग्रेस को एक सूत्र में पिरोने में योगदान दिया है.

     

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    बर्लिन में इंदिरा गांधी, Photo- PTI

    बता दें कि सोनिया गांधी 1998 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की अध्‍यक्ष बनीं. तब से लेकर अब तक इं‍डियन  नेशनल कांग्रेस  के अध्‍यक्ष पद पर सोनिया गांधी को 19 साल हो गए हैं. सोनिया ने अपने अध्‍यक्षीय कार्यकाल के दौरान पार्टी को दो बार केंद्र की सत्‍ता तक पहुंचाने में अहम रोल निभाया है.

    पंडित नेहरू और महात्‍मा गांधी भी हैं सोनिया से पीछे

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    देश के पहले प्रधानमंत्री रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू और राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी. Photo_PTI

    सोनिया गांधी ने नाना ससुर और राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी ने भी कांग्रेस की कमान संभाली. यहां तक कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कुल 8 साल तक इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्‍यक्ष पद की जिम्‍मेदारी संभाली. पंडित नेहरू 1929-30 के बाद 1936, 37, 51-52, 53, 54 तक 6 बार अध्‍यक्ष बनाए गए. हालांकि उनका कार्यकाल एक-दो साल का ही रहा. वहीं महात्‍मा गांधी ने भी 1924 में इंडियन नेशनल कांग्रेस में अध्‍यक्ष रहते हुए सेवा की.

    सोनिया गांधी से ज्‍यादा लंबे समय तक कोई भी नेता अध्‍यक्ष पद पर नहीं रहा. ऐसे में इंदिरा गांधी, सरोजिनी नायडू, एनी बेसेंट महिला अध्‍यक्षों के अलावा पुरुषों में भी सोनिया ने ही सबसे ज्‍यादा समय तक जिम्मेदारी संभाली है.

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    सोनिया गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह, PHOTO- PTI

    सोनिया के नेतृत्‍व में दो बार केंद्र की सत्‍ता पर रहा कब्‍जा

    सोनिया गांधी के नेतृत्‍व में आम चुनाव लड़ने वाली इंडियन नेशनल कांग्रेस का दो बार केंद्र की सत्‍ता पर कब्‍जा हुआ. 2004-2014 तक केंद्र में दो बार कांग्रेस के नेतृत्‍व वाला गठबंधन, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) सत्‍ता में रही. इसके साथ ही कई राज्‍यों में भी कांग्रेस ने कुर्सी पर कब्‍जा जमाया. अक्‍सर ही यह बात उठती है कि उस दौरान सोनिया गांधी चाहती तो पीएम की कुर्सी पर बैठ सकती थीं, लेकिन उन्‍होंने डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया. वहीं खुद गठबंधन और पार्टी को मजबूती देने के साथ ही राजनीति में अहम भूमिका निभाती रहीं.

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    राहुल गांधी, अपनी मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका बाड्रा के साथ. PHOTO_PTI

    अब तक 59 रहे हैं कांग्रेस के अध्‍यक्ष

    बता दें कि 1885 से लेकर 2017 तक कांग्रेस के कुल 59 अध्‍यक्ष रहे हैं. लेकिन सोनिया के अलावा किसी ने 10 साल से अधिक कांग्रेस का नेतृत्‍व नहीं किया. आजादी से पहले इंडियन नेशनल कांग्रेस के सबसे पहले अध्‍यक्ष डब्‍ल्‍यू सी बनर्जी बने. वहीं अन्‍य लोगों के कुर्सी संभालने के कई सालों बाद सुभाष चंद्र बोस, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, राजीव गांधी आदि ने भी कांग्रेस के अध्‍यक्ष पद की जिम्मेदारी ली. अब राहुल यह जिम्‍मेदारी उठाने वाले हैं.

  • देश में 7 फीसदी, दिल्‍ली में दिवाली के बाद दोगुना बढ़ा डेंगू

    देश में 7 फीसदी, दिल्‍ली में दिवाली के बाद दोगुना बढ़ा डेंगू

     

     

    डेंगू का डंक देशभर में बढ़ता ही जा रहा है. ताजा आंकड़ों में देश में डेंगू के मरीजों की संख्‍या पिछले साल के मुकाबले 7 फीसदी ज्‍यादा हो गई है. वहीं देश की राजधानी में डेंगू के मामले पिछले साल की तुलना में दोगुने हो गए हैं.

    डायरेक्‍ट्रेट जनरल ऑफ पब्लिक हेल्‍थ, मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेयर के नेशनल वेक्‍टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक देशभर में इस साल कुल 140910 मामले सामने आए हैं. जबकि पिछले साल 129166 मरीजों में डेंगू की पुष्टि हुई थी.

    बता दें कि दिल्ली में हर साल होने वाले डेंगू के विस्‍फोट के बावजूद हालात और भी खराब हैं. आंकड़े बताते हैं कि दिल्‍ली में इस बार 8549 रोगियों में डेंगू की पुष्टि हुई है. यह संख्‍या पिछले साल के 4431 मामलों से लगभग दोगुनी है. हालांकि मौतों का आंकड़ा पिछले साल के 10 के मुकाबले इस साल 4 है.

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    फाइल फोटो.

    दिल्‍ली सरकार की ओर से दिए गए स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के आश्‍वासन के बावजूद हालात संभलने का नाम नहीं ले रहे. हालांकि डेंगू से होने वाली मौतों में कुछ कमी आई है. इस साल देशभर में डेंगू से कुल 216 मौतें हुई हैं. जिनकी संख्‍या पिछले साल 245 थी.

    लगातार बढ़ रहे मामलों के बावजूद दिल्‍ली सरकार के स्‍वास्‍थ्‍य विभाग का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है. दिल्‍ली सरकार में एडिशनल डायरेक्‍टर जनरल पब्लिक हेल्‍थ एस एम रहेजा से दिल्‍ली में डेंगू के मरीजों की संख्‍या के आंकड़ों के बारे में बात की गई तो वे नाराज हो गए. उनका कहना था कि दिल्‍ली में चिकनगुनिया के आंकड़े क्‍यों नहीं दिखाए जा रहे जो कम हुए हैं. पिछले साल के डेंगू के 4431 मामलों के मुकाबले इस साल बढ़कर हुए 8549 मामलों पर उन्‍होंने कहा कि इनमें ज्‍यादातर बाहर के मरीज हैं. उनका कहना था कि दिल्‍ली के सिर्फ 4375 मरीज हैं तो फिर सभी मरीजों को दिल्‍ली का क्‍यों कहा जा रहा है.

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    दिल्‍ली में डेंगू से मौत

    रहेजा ने जोर देकर कहा कि दिल्‍ली में डेंगू के मरीजों की संख्‍या पिछले साल के मुकाबले कम हुई है. हालांकि दिल्‍ली सरकार के प्रतिनिधि की ओर से कही जा रही बात दिल्‍ली नगर निगम और नेशनल वेक्‍टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेयर) की ओर से जारी आंकड़ों से इत्‍तेफाक नहीं रखती.

    एमसीडी के स्‍वामी दयानंद अस्‍पताल के डॉ. ग्‍लैडविन त्‍यागी का कहना है कि डेंगू का जो समय होता था वो सितंबर होता था और दिवाली आते-आते डेंगू खत्‍म हो जाता था. लेकिन इस बार मौसम की वजह से और बारिश न होने से दिवाली के बाद का मौसम डेंगू के लिए अनुकूल रहा.

    इसके साथ ही जुलाई से सितंबर तक तो लोगों ने भी सफाई का ध्‍यान रखा, ब्रीडिंग नहीं होने दी. लार्वा नहीं पनपने दिया और सफाई रखी, लेकिन उसके बाद दिवाली आई और ये सफाई अभियान आदि बंद हो गए. तापमान कुछ ठंडा लेकिन मच्‍छरों के अनुकूल हो गया. यही वजह रही कि डेंगू ने बैक किया और दिवाली के बाद अचानक डेंगू का प्रकोप बढ़ गया. हालांकि चार-पांच दिन पहले फिर तापमान गिरने से डेंगू के मरीजों में कमी आई है.

    बता दें कि देशभर में इस साल डेंगू  के कुल 1 लाख 40 हजार 910 मामले सामने आए हैं.  इनमें सबसे ज्‍यादा मामले तमिलनाडू में 20141 मामले हैं, जबकि केरल में 19543, कर्नाटक में 15570 और पंजाब में 14049 डेंगू  के केस मिले हैं.