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  • Love story: पद्मजा नायडू से शादी करने वाले थे नेहरू!

    Love story: पद्मजा नायडू से शादी करने वाले थे नेहरू!

     

     

    13 नवंबर 1962 को अमेरिका के भारत स्थित राजदूत जॉन कैनेथ गालब्रेथ ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को एक पत्र लिखा. भारत और चीन के बीच युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. पत्र में गालब्रेथ ने ये लाइन भी लिखी, यहां नेहरू को छोड़कर कोई एेसा नेता नहीं है, जो बहुत लोकप्रिय हो. लेकिन उनके लचीले चरित्र और नेतृत्व को लेकर ढेर सारी बातें प्रचारित हैंं.

    ये वो दौर था जब प्रधानमंत्री हाउस की कहानियां राजनयिक सर्कल में काफी रस लेकर सुनाई जाती थीं. जवाहर लाल नेहरू की तमाम प्रेम कथाएं चर्चा का विषय थीं. उनके जीवन में एक नहीं कई महिलाएं थीं. नेहरू को लेकर महिलाओं में गजब का क्रेज भी था. वो उनकी ओर खींची चली आती थीं.

    ऐसी ही एक कहानी मुझे 50 के दशक तक देश के शीर्ष उद्योगपति रहे रामकृष्ण डालमिया की बेटी नीलिमा डालमिया अधर ने सुनाई. उन्होंने बताया कि उनकी मां दिनेश नंदिनी राजस्थान की उभरती हुई कवियित्री थीं. तब तक उनकी डालमिया से शादी नहीं हुई थी. वह नेहरू के प्यार में पागल थीं. हालांकि ये एकतरफा प्यार था.

    उन्हें पता चला कि नेहरू वर्धा में गांधी आश्रम आए हुए हैं. वह उनसे मिलने अकेली ही नागपुर से वर्धा पहुंच गईं. उन्होंने सीधे-सीधे नेहरू से प्यार का इजहार कर डाला. वह अपना घर तक छोड़ने को तैयार थीं. उन्होंने नेहरू से अनुरोध किया कि वह उनके साथ रहकर काम करना चाहती हैं. नेहरू तैयार नहीं हुए. ये लिखने का तात्पर्य केवल इतना है कि बताया जा सके कि उस समय शिक्षित और अभिजात्य महिलाओं में नेहरू का किस कदर क्रेज था. यही कारण भी है कि उनके जीवन में कई प्रेम कथाएं हैं, कई नायिकाएं, जो उन पर अधिकार जताती रहीं. उनके करीब रहीं.मृदुला साराभाई से निकटता
    मृदुला गुजरात के प्रसिद्ध उद्योगपति और धनाढ्य साराभाई परिवार की बेटी थीं. वह कांग्रेस की समर्पित कार्यकर्ता थीं. नेहरू के बहुत करीब थीं. हालांकि 1946 तक नेहरू उनमें दिलचस्पी खो चुके थे. एम ओ मथाई ने अपनी किताब रिमिनिसेंस ऑफ द नेहरू एज में उन्हें अजीबोगरीब महिला बताया. बाद में वह कश्मीर में शेख अब्दुल्ला के साथ काम करने लगीं. उन्हें कथित देशविरोधी गतिविधियों के लिए गिरफ्तार करके जेल में भी डाला गया.

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    सरोजिनी नायडू की बड़ी बेटी थीं पद्मजा नायडू.

    पद्मजा नायडू से रिश्ते
    पद्मजा देश की स्वर कोकिला कही जाने वाली सरोजिनी नायडू की बड़ी बेटी थीं. वह पहले हैदराबाद के नवाब सालार जंग के प्यार में दीवानी हुईं. फिर नेहरू के करीब आ गईं. मथाई लिखते हैं, 1946 जब मैं उनसे इलाहाबाद में मिला, तब वह नेहरू के घर को संभालने में लगी हुईं थीं. फिर दिल्ली में उन्होंने यही किया. वह हमेशा नेहरू के बगल के कमरे में रहने पर जोर देती थीं. नवंबर के पहले हफ्ते में वह हमेशा हैदराबाद से नेहरू के आवास पर आ जाती थीं. ताकि नेहरू (14नवंबर), इंदिरा (19 नवंबर) और अपना (17 नवंबर) बर्थ-डे साथ मना सकें. इंदिरा को उनका आना अच्छा नहीं लगता था. न ही उनका वहां लंबा ठहरना. ये वो समय भी था, जब नेहरू की करीबी लेडी माउंटबेटन से भी बनी हुई थी.

    खबरें थीं कि नेहरू शादी के लिए प्रोपोज करेंगे
    1947 के जाड़ों में नेहरू को लखनऊ जाना था. सरोजिनी नायडू उत्तर प्रदेश की राज्यपाल थीं. खबरें फैलने लगीं कि नेहरूजी पद्मजा को शादी के लिए प्रोपोज करेंगे. नेहरू लखनऊ आए लेकिन लेडी माउंटबेटन के साथ. ये बात वहां पहले से मौजूद पद्मजा को खराब लगी. एक साल बाद जब उन्होंने नेहरू के बेडरूम में एडविना के दो फोटोग्राफ देखे तो खासी नाराज और आहत हुईं कि वहां उनकी कोई फोटो क्यों नहीं है. उन्होंने तुरंत वहां अपनी एक छोटी सी फोटो लगा दी.

    वह नेहरू से शादी करना चाहती थीं
    1948 में पद्मजा जब हैदराबाद से सांसद चुनी गईं तो दिल्ली में प्रधानमंत्री हाउस में ठहरीं, वो भी नेहरू के बगल के कमरे में. बाद में उन्हें किसी तरह से वहां से भेजा गया. मथाई का मानना था कि वह नेहरू से शादी करना चाहती थीं लेकिन जब उन्हें लगा कि नेहरू के जीवन में केवल वही नहीं बल्कि कई स्त्रियां हैं. तो वह काफी उदास भी हुईं. हालांकि बाद में पद्मजा को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया. उन्होंने इस पद पर खुद को बेहतर भी साबित किया. हालांकि कहा जाता है कि अगर इंदिरा बीच में नहीं होतीं तो नेहरू उनसे शादी कर सकते थे. यह बात खुद नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने इंदिरा की करीबी दोस्त पुपुल जयकर को बताई थी.

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    नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने पुपुल जयकर को बताया था कि नेहरू अपनी बेटी इंदिरा को दुखी नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने पद्मजा से शादी नहीं की.

    क्यों नहीं की शादी
    पुपुल ने अपनी किताब में लिखा, आधी सदी बाद मैंने विजयलक्ष्मी पंडित से नेहरू और पद्मजा के संबंधों के बारे में पूछा. उनका जवाब था, ‘तुम्हें क्या पता नहीं पुपुल कि वे वर्षों तक साथ रहे?’ यह पूछने पर कि उन्होंने पद्मजा से शादी क्यों नहीं की, उन्होंने जवाब दिया, ‘उन्हें लगा कि इंदु पहले ही बहुत सदमा झेल चुकी है, वे उसे और चोट नहीं पहुंचाना चाहते थे.’

    जब पद्मजा को गुस्सा आया
    नेहरू के महिलाओं के प्रति अनुराग को लेकर भी काफी कुछ लिखा और कहा गया. प्रधानमंत्री हाउस के चीफ सेक्यूरिटी अफसर रूस्तम जी ने अपनी किताब में लिखा कि नेहरू को महिलाओं का साथ यकीनन भाता था. लेकिन आमतौर पर वो महिलाएं प्रखर औऱ मेघा वाली थीं. ‘इंडियन समरः द सीक्रेट हिस्ट्री ऑन एंड ऑफ एन एम्पायर’ के लेखक अलेक्स वॉन टेजमन ने कुछ समय पहले एक इंटरव्यू में कहा, एक बार पद्मजा ने गुस्से में एडविना की तस्वीर फेंक दी.

    ये श्रृद्धा माता कौन थीं
    ये 1948 की बात है. एक युवा संन्यासिन बनारस से नई दिल्ली आई. उसका नाम श्रृद्धा माता था. वह संस्कृत में विद्वान थीं. कई सांसद उनके शिष्य़ थे. वह आकर्षक काया वाली सुंदर महिला थीं. पहले तो नेहरू ने उनसे मिलने से इन्कार कर दिया. फिर जब उनकी नेहरू से पहली मुलाकात हुई तो ये लंबी चली. फिर तो मुलाकातें लगातार ही होने लगीं. कहा जाता है कि उनका नेहरू पर प्रभाव भी दिखने लगा. वह सीधे प्रधानमंत्री हाउस में आती थीं. अक्सर रात में तब आती थीं जब नेहरू अपना काम खत्म कर चुके होते थे. बाद में वह गायब हो गईं. इसके कुछ दिनों बाद फिर बेंगलुरु से प्रधानमंत्री हाउस में उनके पत्रों का एक बंडल भेजा गया, जो नेहरू ने उन्हें लिखे थे. साथ में एक डॉक्टर का पत्र आया कि ये पत्र उन्हें उस महिला से मिले हैं, जो यहां चर्च अस्पताल में एक बच्चे को जन्म देने आई थी.

    नेहरू से थे रोमांटिक रिश्ते
    बाद में कुछ समय गायब रहने के बाद उत्तर भारत लौटीं. उन्होंने जयपुर में अपना स्थायी ठिकाना बना लिया. वहां सवाई मानसिंह ने उन्हें रहने के लिए आलीशान किला दिया. बाद में जब इंडिया टुडे की एक रिपोर्टर ने उनसे मुलाकात करने में सफलता हासिल की. तब उन्होंने संकेतों में जाहिर किया कि उनके और नेहरू के बीच प्रगाढ़ रोमांटिक रिश्ते थे. बाद में कुछ लोगों ने साजिश रचकर उनके और नेहरू के बीच दूरियां बनाने की कोशिश की. हालांकि उनके जयपुर में रहने के दौरान नेहरू एक बार उनसे मिलने गए. श्रृद्धा माता का जिक्र बाद में खुशवंत सिंह ने भी अपनी किताब में किया. वह उनसे जब मिले तो श्रृद्धा माता ने उनसे नेहरू के करीबी का दावा किया.

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    पंडित जवाहर लाल नेहरु और ए़़डविना माउंटबेटन (getty)

    कैसे थे एडविना माउंटबेटन से रिश्ते
    इसमें कोई शक नहीं कि नेहरू और लेडी एडविना माउंटबेटन एक दूसरे से प्यार करते थे। हां, इन रिश्तों को कहां तक आगे ले जाकर देखा जाए, उसे लेकर जरूर भ्रम हैं. नेहरू और एडविना के बीच जो एक आत्मीयता पनपी, वो तब तक कायम रही, जब तक एडविना जिंदा रहीं. केएफ रूस्तमजी की डायरी के संपादित अंश किताब के रूप में प्रकाशित हुए. उसमें उन्होंने भी एडविना और नेहरू के प्यार पर चर्चा करते हुए लिखा, दोनों अभिजात्य थे. दोनों की रुचियां परिष्कृत थीं. दोनों एक दूसरे को काफी पसंद करते थे.

    उस अध्याय को क्यों रोका गया
    जब मथाई ने रिमिनिसेंस ऑफ नेहरू लिखी तो उसमें उन्होंने एक अध्याय खासतौर पर नेहरू के जीवन में आई महिलाओं पर था. बाद ये अध्याय उन्होंने खुद ही प्रकाशित होने से रोक दिया. इस अध्याय की जगह प्रकाशक ने एक टिप्पणी लिखी कि चूंकि ये अध्याय लेखक का नितांत व्यक्तिगत अनुभव था और इसे उन्होंने बिना किसी निरोध के डीएच लारेंस शैली में लिखा था, जिसे लेखक ने खुद ही आखिरी समय में प्रकाशन से रोक लिया.

  • 80 बार जेल जाने वाले राजनारायण, जिनसे डर गईं थीं इंदिरा

    80 बार जेल जाने वाले राजनारायण, जिनसे डर गईं थीं इंदिरा

     

     

    उम्र 69 साल. जेल गए 80 बार. जेल में बिताए कुल 17 साल, जिसमें तीन साल आजादी से पहले और 14 साल आजादी के बाद. इतने साल तो गांधीजी ने भी जेल में नहीं बिताए होंगे. वही शख्स, जिससे लौह महिला इंदिरा गांधी बुरी तरह डर गईं थीं. इतनी आतंकित हो गईं कि इमरजेंसी लगा दी. वो राजनारायण थे. जिनकी इस साल जन्मशती है. इसी महीने में जन्मदिन लेकिन किसी को वो याद नहीं. वो ऐसी शख्सियत भी हैं, जिसके कारण केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकारें बननीं शुरू हुई.

    आजाद भारत में समता, बंधुत्व, और सदभाव की खातिर कम लोगों ने जीवन में इतनी प्रताड़ना सही होगी. जो राजनीति के फक्कड़ नेता थे. वह राममनोहर लोहिया के साथ सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में थे. हर किसी के लिए उपलब्ध और हर किसी के मददगार. हालांकि बाद के बरसों में उन्हीं के सियासी साथियों ने उनसे दूरी बना ली और उन्हें भारतीय राजनीति का विदूषक भी कहा जाने लगा.

    विपक्ष कमजोर हाल में था
    60 के दशक के खत्म होते होते इंदिरा मजबूत प्रधानमंत्री बन चुकी थीं. कांग्रेस के ताकतवर नेता उनके सामने पानी मांग रहे थे. विपक्ष बहुत कमजोर स्थिति में था. ऐसे में जब इंदिरा गांधी ने वर्ष 1971 में दोबारा चुनाव जीतकर आईं तो किसी बड़े नेता में उनसे टकराने की हिम्मत नहीं थी.ऐसे में राजनारायण ना केवल उनसे भिड़े बल्कि विपक्ष को एक करने की जमीन भी बनाई. अगर वह इंदिरा को मुकदमे में टक्कर नहीं देते तो ना जयप्रकाश नारायण संपूर्ण क्रांति का आंदोलन कर पाते, ना आपातकाल लगता और ना ही 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ता.

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    राजनारायण, जिनसे घबरा उठी थीं इंदिरा गांधी

    जन्म राजसी परिवार में
    राजनारायण का जन्म बनारस के उस जमींदार परिवार में हुआ था, जो वहां के राजघराने से जुड़ा माना जाता था. बहुतायत में जमीनें थीं. लंबी चौड़ी खेती. रसूख और रूतबा. वह अलग मिट्टी के बने थे.

    समाजवाद में तपे और ढले हुए. उनके खास सहयोगी रहे क्रांति प्रकाश कहते हैं कि उन्होंने अपने हिस्से की सारी जमीन गरीबों को दे दी. उनके खुद के परिवार में बहुत विरोध हुआ. भाइयों ने बुरा माना. वह टस से मस नहींं हुए. यहां तक कि अपने बेटों के लिए कोई संपत्ति नहीं छोड़ी.

    इंदिरा के खिलाफ हर जगह लड़े
    बहुत पहले डॉ. युगेश्वर कल्हण की किताब छपी थी, ‘आपातकाल का धूमकेतु: राजनारायण.’ तब राजनारायण और इंदिरा गांधी दोनों जीवित थे. वो किताब कुछ सालों पहले फिर प्रकाशित हुई. किताब में कहा गया, राजनारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ लड़ाई हर जगह लड़ी. संसद में और सड़क पर भी.

    चुनाव के मैदान में और अदालत में भी. कोई मोर्चा छोड़ा नहीं. 1969 में जिन समाजवादियों को लगता था कि इंदिरा सही काम कर रही हैं, उनका मोहभंग हो चुका था. 1971 के चुनावों में रायबरेली से इंदिरा के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार खड़ा किया जाना था. कोई तैयार नहीं था. न चंद्रभानु गुप्ता तैयार हुए और न चंद्रशेखर की हिम्मत हुई . न किसी अन्य दिग्गज नेता की. ऐसे में राजनारायण सिंह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार बने.

    चुनाव हारे और अदालत में चुनौती
    राजनारायण 1971 का चुनाव हार गए. चुनाव जीतीं इंदिरा गांधी. राजनारायण ने चुनाव जीतने के लिए इंदिरा के सारे गलत हथकंडों पर नजर रखी. उसे संवैधानिक और असंवैधानिक रूप दिया. उनके एक–एक भ्रष्टाचार को गिनते रहे. चुनाव खत्म होते ही न्यायालय पहुंचे. उन्होंने सात आरोप लगाए. मुकदमा शुरू हुआ. लंबा चला. एक समय ऐसा भी आया जब इंदिरा गांधी को खुद अदालत में हाजिर होना पड़ा. सफाई देनी पड़ी. उनसे छह घंटे तक पूछताछ हुई.

    इंदिरा के खिलाफ फैसला
    आखिरकार पांच साल बाद फैसला आया. इंदिरा गांधी ने उस दौरान जजों को भयभीत कर रखा था. इसके बाद भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा के प्रभाव की कोई परवाह नहीं की. खुफिया ब्यूरो (आइबी) के एक अफसर को इलाहाबाद में इस काम में लगाया गया था कि वह बता सके कि फैसला क्या आने वाला है.

    जज ने टाइपिस्ट को घर बुलाया. फैसला लिखवाया. उसे तभी जाने दिया, जब फैसला सुना दिया गया. उन्होंने इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव को अवैध घोषित कर दिया. उन पर छह सालों तक चुनाव लड़ने पर रोक लग गई. पुपुल जयकर ने इंदिरा की जीवनी में लिखा कि इंदिरा को आशंका थी कि फैसला उनके खिलाफ आ सकता है. 12 जून 1975 को फैसला आया. इसके 14वें दिन इंदिरा ने देशभर में आपातकाल लगा दिया.

    सबसे पहले राजनारायण की गिरफ्तारी
    आपातकाल लगने के कुछ ही घंटों के अंदर सबसे पहले राजनारायण को गिरफ्तार किया गया. उसी दिन जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और अटलबिहारी वाजपेयी की गिरफ्तारी हुई. देशभर में हजारों लोग जेलों में डाले गए. यकीनन राजनारायण वो शख्स थे, जिन्होंने इंदिरा को बुरी तरह आतंकित कर दिया था कि उन्होंने ये कदम उठाना पड़ा. लेकिन इसने विपक्ष को साथ आने का मौका दिया.

    वर्ष 1977 में पहली बार केंद्र में कांग्रेस के अलावा दूसरी पार्टी सत्तारुढ़ हुई. बेशक जनता पार्टी की सरकार अपने अंतरविरोधों की वजह से जल्दी ढह गई लेकिन देश में गैरकांग्रेसी आंदोलन को नई ऑक्सीजन मिली. 1977 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटाकर चुनाव कराया तो रायबरेली पर उनके खिलाफ फिर राजनारायण सामने थे. इस बार उन्होंने इंदिरा को बुरी शिकस्त दी. अपने पूरे राजनीतिक करियर में इंदिरा ने सही मायनों में एक ही शख्स से शिकस्त पाई. वो राजनारायण थे.

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    राजनारायण

    वो काम किए जो किसी ने नहीं किए थे
    हाल ही में राजनारायण की स्मृति में उनके समर्थकों ने दिल्ली में एक सेमीनार कराया. जिसमें सभी लोगों ने लोकबंधु को याद किया. उनके व्यक्तित्व और काम पर चर्चा हुई. क्रांति प्रकाश बताते हैं कि जब जनता पार्टी के शासनकाल में राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने तुरंत गरीबों को इलाज और ऑपरेशन के लिए आर्थिक मदद शुरू कराई. दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के नाम बदल दिए गए.

    लोहिया से संबंध बिगड़े
    वह ताजिंदगी समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के करीबी रहे. उनके प्रिय पात्र. एक बार संबंधों में खटास आई. उसे राजनारायण ने खास अंदाज में दूर किया. राजनारायण 1962 में विधानसभा के चुनावों में हार गए. वर्ष 52 से पहली बार वह विधानसभा से बाहर थे. पांच साल ये स्थिति बनी रहनी थी.

    ऐसे में लोहिया के नहीं चाहने के बाद भी वह 62 में राज्यसभा चुनाव के लिए लड़े. जीत भी गए. लोहिया को ये अच्छा नहीं लगा. उन्होंने माना कि राजनारायण ने सिद्धांतों के खिलाफ गलत काम किया है. उनसे बातचीत बंद कर दी. घर आना बंद करा दिया. ये जगजाहिर था कि लोहिया अगर किसी से एक बार संबंध तोड़ लेते हैं तो फिर जोड़ते नहीं.

    इस तरह लोहिया को मनाया
    राजनारायण ने भरसक कोशिश की लेकिन लोहिया टस से मस नहीं हुए. उन्होंने खास तरीका निकाला. वह अगले कुछ महीनों तक राज्यसभा से निकलकर उस गेट पर धरना देकर बैठ जाते थे, जिससे लोहिया जी निकलते थे.

    जब वह लगातार ये करते रहे तो लोहिया जी को झुकना पड़ा. संबंध फिर बहाल हो गए. लोहिया पर रामकमल राय ने अपनी किताब ‘राम मनोहर लोहियाः आचरण की भाषा’ में कहा है कि लोहिया जी अक्सर कहते थे जब तक राजनारायण जिंदा हैं, देश में लोकतंत्र मर नहीं सकता.

    काशी विश्वनाथ मंदिर का दरवाजा दलितों के लिए खुलवाया
    लोकनीति अभियान से जुड़े और अधिवक्ता संजीव उपाध्याय याद करते हैं कि किस तरह नेताजी यानि राजनारायण दलितों के प्रेमी थे. उनकी अगुवाई में बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों औऱ अनुसूचित जाति के प्रवेश के लिए आंदोलन हुआ. उनके दरवाजे हमेशा जरूरतमंदों के लिए खुले होते थे.

    वह दिल्ली में जब रहते थे तो कोई खाली हाथ नहीं लौटता था. किसी के पास किराया नहीं होता था तो किसी के पास भोजन-हर किसी की वह मदद करते थे. क्रांति प्रकाश कहते हैं, उनका जीवन हमेशा सादगी से भरा रहा.साधारण कपड़ा पहनते थे. जीवन में कोई लग्जरी नहीं थी. हां, बस वह खाने के शौकीन थे. उनके पास जो भी पैसा आता था, वो जरूरतमंदों में बंट जाता था. कभी अपने लिए एक पैसा नहीं जुटाया.

    पासवान को खुद टिकट देने गए
    राजनारायण को लेकर और भी कुछ कहा जाता है. अगर 1977 के चुनावों में वह रामविलास पासवान समेत तीन नेताओं का टिकट कटने पर उन्हें खुद विमान से टिकट देने गए तो जनता पार्टी की टूट के लिए भी उन्हें कसूरवार ठहराया जाता है.

    जनता पार्टी टूटने पर वह पहले चरण सिंह के मददगार बने और बाद में उन्हीं के खिलाफ ताल ठोंककर चुनावों में कूद पड़े. बाद में उन्हीं के सियासी साथी उनसे परहेज करने लगे.

    उन्हीं साथियों ने उन्हें भारतीय राजनीति का विदूषक भी करार दिया. लेकिन ये बात सही है कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए उन्होंने कभी कोई समझौता किया ही नहीं. राजनारायण फकीर की भांति दुनिया से विदा हुए. 31 दिसंबर 1986 को उनका निधन हो गया. न मकान, न जमीन, न बैंक–बैलेंस.

  • ASEAN : सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये फिलीपीन रवाना हुए PM

    ASEAN : सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये फिलीपीन रवाना हुए PM

     

     

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज फिलीपीन के लिये रवाना हुए जहां वह भारत-आसियान शिखर सम्मेलन समेत विभिन्न द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे.

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने ट्वीट किया, रचनात्मक प्रतिबद्धताओं के दौरे की शुरुआत. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मनीला में आयोजित आसियान और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए फिलीपींस रवाना हो रहे हैं.

    पिछले 36 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली फिलीपींस यात्रा है. इससे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1981 में फिलीपींस का दौरा किया था. मोदी मनीला में मंगलवार को 15वें भारत-आसियान शिखर सम्मेलन और 12वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे.

    यह दौरा इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस साल भारत-आसियान संवाद साझेदारी की 25वीं वर्षगांठ है और आसियान (दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन) के गठन की स्वर्ण जयंती है.

    ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम आसियान के सदस्य हैं. मोदी दोनों सम्मेलनों में भाग लेने से पहले सोमवार को फिलीपींस के राष्ट्रपति रॉबटरे दुतेर्ते से द्विपक्षीय वार्ता करेंगे.

  • प्रद्युम्‍न मर्डर : फिंगरप्रिंट्स मिटाना सीख चुका था आरोपी छात्र

    प्रद्युम्‍न मर्डर : फिंगरप्रिंट्स मिटाना सीख चुका था आरोपी छात्र

     

     

    रायन इंटरनेशनल मर्डर मामले में सीबीआई ने बड़ा खुलासा किया है. सीबीआई ने कहा है कि आरोपी छात्र ने जहर की किस्मों के साथ ही हथियार से अंगुलियों के निशान मिटाने के बारे में काफी जानकारी इकठ्ठा की थी.

    फर्स्‍टपोस्‍ट की खबर के मुताबिक, सितंबर में हुई प्रद्युम्‍न ठाकुर की हत्‍या की जांच कर रही सीबीआई का कहना है आरोपी के लैपटॉप और मोबाइल फोन की इंटरनेट सर्च हिस्ट्री से ये पता चला है.

    हत्या से पहले की थी तैयारी
    आरोपी छात्र को रिमांड पर लेने के बाद सीबीआई ने कहा है कि उसने प्रद्युम्‍न की हत्‍या से पहले काफी तैयारी की थी. सीबीआई के अधिकारियों को संदेह है कि प्रद्युम्‍न का गला काटने के बाद आरोपी छात्र ने चाकू को टॉयलेट के कमोड में फेंक दिया था.बता दें कि शनिवार को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने आरोपी छात्र को 22 नवंबर तक निगरानी-गृह में रखा है. यह छात्र रायन इंटरनेशनल गुरुग्राम में 11 वीं का छात्र है. सीबीआई का दावा है कि छात्र ने पिता और एक स्‍वतंत्र गवाह के सामने अपराध कुबूल किया है.

    पूछताछ पूरी
    इससे पहले सीबीआई ने स्‍कूल में क्राइम सीन तैयार किया था. एक डमी के माध्‍यम से मर्डर सीन को दोबारा प्रस्‍तुत किया गया. फर्स्‍टपोस्‍ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि सीबीआई ने आरोपी को हिरासत में लेने के बाद सवाल-जवाब की कार्रवाई पूरी कर ली है.

    ऐसे में जेजेबी को दी गई एप्‍लीकेशन में स्‍पष्‍ट है कि सीबीआई छात्र की अब और कस्‍टडी नहीं चाहती है. फिलहाल वह निगरानी-गृह में है. हालांकि सीबीआई की इस रिपोर्ट पर आरोपी छात्र के पिता ने विरोध दर्ज कराया है.

    पिता ने कहा – बेटे को टॉर्चर किया
    आरोपी के पिता का कहना है कि सीबीआई ने उनके बेटे को टॉर्चर किया है. जबकि वह निर्दोष है. हालांकि पिता के इन आरोपों पर जुवेनाइल कोर्ट ने एक वेलफेयर ऑफिसर नियुक्‍त किया है जो आरोपी छात्र से किसी भी प्रकार के सवाल-जवाब के दौरान हमेशा मौजूद रहेगा और पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगा.

    हालांकि इस पूरे मामले में सीबीआई ने हरियाणा पुलिस पर लापरवाही बरतने और सबूत मिटाने का आरोप लगाया है. वहीं दवाब बनाने पर हरियाणा पुलिस ने अपनी गलतियां स्‍वीकार भी की हैं.

  • टीडीपी सरकार नहीं दे रही आंध्र विधानमंडल के सदस्यों के सवालों के जवाब

    टीडीपी सरकार नहीं दे रही आंध्र विधानमंडल के सदस्यों के सवालों के जवाब

     

     

    आंध्र प्रदेश विधानमंडल के सदस्य आजकल काफी व्यथित नजर आ रहे हैं और सत्ता पक्ष और विपक्षी पार्टियों के विधायक मौजूदा स्थिति के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

    एक तरफ विधानमंडल के सत्र साल के कुछ ही दिन आयोजित किए जा रहे हैं और दूसरी तरफ विधानसभा और विधान परिषद में सदस्यों की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दों पर सरकार एक तरह से कोई जवाब नहीं दे रही. साल 2014 से अब तक 14वीं विधानसभा के नौ सत्रों में सदन की कार्यवाही महज 80 दिन चली है. 10वां सत्र अभी जारी है और यह 10 दिनों के लिए होगा.

    सत्ताधारी तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) विपक्षी वाईएसआर कांग्रेस पर आरोप लगा रही है कि वह नियमित तौर पर सदन की कार्यवाही बाधित करती है, जबकि वाईएसआर कांग्रेस का कहना है कि तेदेपा सरकार अपनी जिम्मेदारियों से भाग रही है. बहरहाल, मौजूदा सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही बाधित नहीं होगी, क्योंकि जगनमोहन रेड्डी की अगुवाई वाली विपक्षी पार्टी ने सदन से दूरी बना ली है.

    पिछले कुछ सत्रों से दोनों सदनों के सदस्यों की ओर से उठाए गए सवालों के जवाब कई कारणों से नहीं मिल पा रहे हैं. विधानमंडल के सूत्रों ने बताया कि विधानसभा में सदस्यों की ओर से किए गए करीब 296 सवालों पर सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया.विधान परिषद में अनुत्तरित सवालों की संख्या करीब 603 है जबकि उच्च सदन की कार्यवाही तुलनात्मक रूप से सुचारू ढंग से चलती है. लोक लेखा समिति के अध्यक्ष बुग्गना राजेंद्रनाथ रेड्डी ने आरोप लगाया, ‘इस सरकार में कोई जवाबदेही नहीं है और जैसे सदन को चलाया जाना चाहिए, वैसे नहीं चलाया जा रहा है. सरकार नियमों एवं जिम्मेदारियों से भाग रही है.

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  • रयान मामले: किशोर को 22 नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया

    रयान मामले: किशोर को 22 नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया

     

     

    यहां भोंडीसी में रयान इंटरनेशनल स्कूल के सात साल के स्कूल के शौकीन की कथित हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार किशोर को शनिवार को 22 नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। उसे एक अवलोकन गृह में रखा जाएगा।

    सीबीआई ने 16 साल की उम्र में जुवेनाइल जस्टिस (जेजे) बोर्ड के न्यायिक मजिस्ट्रेट (फर्स्ट क्लास) से पहले देवेंद्र सिंह को पेश किया था।

    अभियुक्त के वकील संदीप अनेजा ने कहा, “जे जे बोर्ड ने 22 नवंबर तक फरीदाबाद में एक अवलोकन गृह को किशोर भेजने का आदेश दिया”। श्री अनीजा ने कहा कि सीबीआई को आगे की हिरासत की मांग के लिए जे जे बोर्ड से पहले आवेदन लेना होगा और उन्हें इसके बारे में सूचित किया जाएगा।

    ‘सीबीआई ने आदेश का उल्लंघन किया’

    इस बीच, किशोर के पिता, बीच में, जे जे बोर्ड के साथ एक आवेदन ले गए, जांच अधिकारी और सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने बोर्ड के आदेश का उल्लंघन किया है कि पूछताछ केवल 10 बजे और 6 बजे के बीच आयोजित की जाती है। तीन दिनों के लिए।

    बाद में, मीडिया से बात करते हुए, पिता ने आरोप लगाया कि सीबीआई ने अपने बेटे को यातना के द्वारा स्वीकार कर लिया है।

    उन्होंने कहा कि परिवार ने एक दिन से सीबीआई से सहयोग किया था, लेकिन एजेंसी ने अपने बेटे को फंसाया था।

    “सीबीआई ने हमें 24 सितंबर को पहली बार बुलाया। हम जब भी हमें फोन करते थे, हम उनसे गए। लेकिन अंत में, उन्होंने हमारे पर पूरे दोष लगा दिया और मेरे बेटे को तैयार किया, “पिता ने कहा।

    उन्होंने आरोप लगाया कि एजेंसी ने उन्हें फोन करने के बाद 8 नवंबर को अपने बेटे के साथ सीबीआई मुख्यालय तक पहुंचे।

    “उन्होंने मेरे बेटे को लगभग 3 बजे अंदर ले लिया। और उसने मुझे लगभग छह घंटे तक उससे मिलने नहीं दिया जब मुझे 9 बजे अंदर की अनुमति दी गई, मुझे पता चला कि उसकी आँखें और चेहरे लाल थे उन्होंने उसे मार डाला, “पिता ने न्याय की मांग करते हुए कहा उन्होंने कहा कि सीबीआई ने अपने बेटे को उल्टा लगा दिया और उसे मार दिया।

    वीडियो रिकॉर्डिंग

    पिता, अपने आवेदन में सलाहकार सी के माध्यम से चले गए। शर्मा और विशाल गुप्ता ने कहा कि यह गंभीरता से गिरफ्तार किया गया था कि जांच एजेंसी “किशोरों को गलत तरीके से फंसाने और गिरफ्तार करने की उनकी कार्रवाई का औचित्य साबित करने के लिए” कच्चे पैडिंग / गलत साक्ष्य बना रही थी। ”

    आवेदन ने कहा कि 9 नवंबर को सोहना के कई दर्शकों द्वारा वीडियो रिकॉर्डिंग ने दिखाया कि किशोर वहाँ 6:15 बजे उपस्थित थे। यह कहा गया है कि सेवा कुटीर, नई दिल्ली के किंग्सवे कैंप का रजिस्टर भी इस तथ्य की पुष्टि करता है।

    इससे पहले दिन में, किशोर को रयान इंटरनेशनल स्कूल के पास दोपहर के पास ले जाया गया था ताकि अपराध स्थल को पुनः बनाया जा सके। उसे एक दुकान पर ले जाया गया जहां से उसने कथित लड़के को मारने के लिए चाकू खरीदी थी। जांच के सिलसिले में सीबीआई टीम भी अपने घर गई।

  • बड़ा खुलासा: डेढ़ करोड़ में प्रश्नपत्र खरीदकर बन गई जज एग्जाम की टॉपर

    जरा सोचिए, अगर देश में इस तरह से जजों की नियुक्ति की जाती रही तो यहां की न्याय व्यवस्था की क्या स्थिति होगी। करोड़ों में बिक रहे पेपर खरीदकर जज बनने वाले लोग फरियादियों के साथ कैसा न्याय करेंगे, यह बड़ा सवाल उठता है ?

    (हरियाणा ब्यूरो )
    नई दिल्ली। देश में जजों की भर्ती कराने में बड़े रैकेट का खुलासा हुआ है। इस रैकेट का संचालन परीक्षा संचालन की जिम्मेदारी उठाने वाले रजिस्ट्रार ही जब करने लगें तो फिर इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा। एचसीएस जैसी बड़ी परीक्षा में भी रैकेट की सेंधमारी का बड़ा खुलासा हुआ है। सिविल सर्विसेस ज्यूडिशियल ब्रांच पेपर लीक मामले में पुलिस ने टॉपर रही सुनीता को दिल्ली के नजफगढ़ से अरेस्ट कर लिया। कोर्ट ने उसे 3 दिन की रिमांड पर भेजा है। आरोप है कि रैकेट ने पेपर लीक किया, फिर उसे डेढ़-डेढ़ करोड़ में अभ्यर्थियों को बेचा। सुनीता को पहले ही प्रश्नपत्र मिल गया तो अच्छे से तैयारी कर वह टॉपर बन गईं। कुछ अभ्यर्थियों की शिकायत पर संदेह के घेरे में आई इस परीक्षा को पहले ही हरियाणा हाईकोर्ट रद्द कर चुका है।
    परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक करने में रिक्रूटमेंट रजिस्ट्रार डॉ. बलविंदर शर्मा की भूमिका सामने आ रही है। पुलिस जांच में पता चला कि रजिस्ट्रार से सुनीता का 760 बार संपर्क हुआ। अब पुलिस सुबूत के तौर पर सुनीता के मोबाइल फोन और हार्ड डिस्क रिकवर करने की कोशिश में जुटी है। पुलिस ने कोर्ट में बताया कि सुनीता को क्वेश्चन पेपर पहले ही मिल गया था, इसलिए वह टॉप कर पाई।
    हाईकोर्ट तक पहुंची शिकायत पर पेपर लीक का खुलासा हुआ। पिंजौर की वकील सुमन ने हाईकोर्ट में पिटीशन दायर कर कहा था कि परीक्षा का पेपर डेढ़ करोड़ में बिका। उसे भी गिरोह ने पेशकश की थी। सुमन के मुताबिक उसने परीक्षा में बैठने वाली सुशीला नाम की एक लड़की से लेक्चर की ऑडियो क्लिप मंगाई थी। लेकिन सुशीला ने गलती से सुनीता से अपनी बातचीत की ऑडियो क्लिप सेंड कर दी। जिसमें पेपर में आने वाले प्रश्नों पर हुई बातचीत रिकॉर्ड थी। सुशीला वही लड़की है, जिसने जज एग्जाम में रिजर्व कैटेगरी में टॉप किया। पिटीशन पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अपने लेवल पर जांच शुरू की, जिसमें सामने आया कि हाईकोर्ट के ही रिक्रूटमेंट रजिस्ट्रार डॉ. बलविंदर शर्मा के मोबाइल फोन से सुनीता के फोन पर सालभर में 760 बार कॉन्टैक्ट हुआ था। बाद में सुनीता ही एक्जाम में टॉपर रही।
    पुलिस ने सुनीता को कोर्ट में पेश किया। यहां सुनीता ने बिना किसी वकील के खुद जिरह की। पुलिस ने मेडिकल कराने के बाद सुनीता की पेशी की तो बात कही तो उसने कहा-पुलिस झूठ बोल रही है। फर्जी ढंग से मेडिकल कराकर उसे कोर्ट में पेश किया गया। सुनीता ने कहा कि मेरी पीठ की हड्डी में प्रॉब्लम है। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए कहा था, लेकिन इस मामले की वजह से मैं अपना ऑपरेशन भी नहीं करवा पाई।
    मैं तीन-चार घंटे से ज्यादा बैठ या खड़ी नहीं रह सकती। मैं अकेली रहती हूं। पुलिस ने कोर्ट से रिमांड मांगा। कोर्ट ने कहा-रिमांड क्यों चाहिए। पुलिस ने कहा-ताकि मोबाइल और हार्ड डिस्क बरामद हो सके। इस पर सुनीता ने कहा कि- मैं तो काफी समय पहले ही मोबाइल फोन नष्ट कर चुकी हूं। मुझे गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया। इसके बाद जज ने तीन दिन की पुलिस रिमांड देते हुए कहा, ‘अगर सुनीता को इलाज की जरूरत हो तो उसे तुरंत मुहैया कराया जाए। ऑर्थोपेडिक के बड़े डॉक्टरों से भी बात की जाए।’

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  • मेट्रो ट्रैक पर चली बिना ड्राइवर वाली ट्रेन

    मेट्रो ट्रैक पर चली बिना ड्राइवर वाली ट्रेन

     

     

    आपने बिना ड्राइवर की कारों के बारे में सुना है. पर किसी ऐसी ट्रेन के बारे में सुना है जो ड्राइवर के बगैर चल रही हो. राजधानी दिल्ली में पिछले एक साल से एक ट्रेन ड्राइवर बिना दौड़ रही थी.

    इस ट्रेन को भारतीय रेलवे नहीं बल्कि दिल्ली मेट्रो चला रहा है. यह मेट्रो ट्रेन दिन में कई बार कालकाजी से बॉटेनिकल गार्डन रूट पर आती-जाती थी. उसमें ड्राइवर तो होता था, पर वह कुछ करता नहीं था.

    यह है देश की पहली ड्राइवरलेस मेट्रो. इसकी सुरक्षा से जुड़ी आखिरी परीक्षा 13 से 15 नवंबर तक चलेगी. सब कुछ सही चला तो पहले बॉटेनिकल गार्डन नोएडा (यूपी) से कालकाजी मंदिर (दिल्ली) तक का रूट खोला जाएगा. ट्रेन के रूट पर सीएमआरएस (कमिश्नर ऑफ मेट्रो रेल सेफ्टी) तीन दिन तक इंस्पेक्शन करेंगे.

    सामान्य मेट्रो ट्रेनों का सेफ्टी ट्रायल ज्यादातर 4 माह में पूरा होता है पर इसका एक साल तक चला.दिल्ली मेट्रो के पीआरओ मोहिंदर यादव के मुताबिक़ देश में पहली बार ड्राइवरलेस (अनअटैंडेड ट्रेन ऑपरेशन) मेट्रो का ट्रायल पूरा हो गया है.

    बिना ड्राइवर इसे चलाने में कम से कम एक साल और लगेगा. टेक्नोलॉजी नई है इसलिए शुरू में ट्रेन में ड्राइवर रहेगा फिर धीरे-धीरे इसे ऑटोमेशन की ओर ले जाया जाएगा.

    बताया गया है कि लंदन में जब पहली बार ऐसी मेट्रो चली तो यात्रियों के दबाव में उसे वापस लेना पड़ा था. धीरे-धीरे वह ऑटोमेशन मोड में आई. फिलहाल दिल्ली में मेट्रो फेज तीन की दो प्रमुख लाइनों, 58.59 किलोमीटर लंबी पिंक लाइन (मजलिस पार्क से शिव विहार) और 34.27 किलोमीटर की मजेंटा लाइन (जनकपुरी पश्चिम से बॉटेनिकल गार्डन) पर ऐसी ट्रेनें चलेंगी.

    ड्राइवरलेस ट्रेन की खासियत

    इन ट्रेनों के स्टार्ट, स्टॉप और डोर ओपन-क्लोज करने में किसी भी ड्राइवर के मौजूद रहने की जरूरत नहीं है. इमरजेंसी सर्विस समेत हर तरह के ऑपरेशन को रिमोट कंट्रोल से ऑपरेट किया जा सकता है. 50 मीटर दूर ट्रैक पर कोई वस्तु है तो इसमें ब्रेक लग जाएगा. यानी पहले से सुरक्षित होगी.

    जिन स्टेशनों से यह ट्रेन गुजरेगी उन प्लेटफॉर्म पर स्क्रीन डोर मिलेंगे. सुरक्षा के लिहाज से ये स्क्रीन डोर लगाए गए हैं ताकि कोई ट्रैक पर न जा सके. यह डोर तभी खुलेंगे जब प्लेटफॉर्म पर मेट्रो ट्रेन आकर खड़ी हो जाएगी.

    यात्रियों के लिए खास

    इसमें ड्राइवर केबिन निकाल देने के बाद ज्यादा यात्री सफर कर पाएंगे. छह डिब्बों वाली ट्रेन में पहले की तुलना में 240 यात्री ज्यादा (कुल 2280 पैसेंजर) आएंगे. 20 फीसदी ऊर्जा कम खपेगी और 10 फीसदी स्पीड बढ़ जाएगी.

    ड्राइवरलेस ट्रेन का कंट्रोल रूम बाराखंभा रोड स्थित मेट्रो भवन में होगा. परेशानी के वक़्त यात्री अलार्म बटन दबाकर ऑपरेशंस कंट्रोल सेंटर से जुड़ सकते हैं. इसके अंदर-बाहर दोनों ओर सीसीटीवी कैमरे हैं. अलग-अलग जगह पांच कैमरे ट्रेन के बाहर होंगे. यात्रियों को वाई-फाई सुविधा मिलेगी.

    विकलांगता के शिकार लोगों के लिए यह मेट्रो ज्यादा आरामदायक होगी. व्हीलचेयर वाले हिस्से में पीठ को सहारा देने के लिए विशेष बैकरेस्ट है. खड़े होकर यात्रा करने वालों के लिए पोल व ग्रैब रेल को दोबारा डिजाइन किया गया है.

    महिलाओं एवं बुजुर्गों की सीटों को अलग रंग में रखा गया है. कुल 81 (486 कोच) ड्राइवरलेस मेट्रो ट्रेनें दिल्ली मेट्रो ने खरीदी हैं. इसमें 20 ट्रेनें दक्षिण कोरिया में बनी हैं.

  • नाम में से यूनिवसिर्टी शब्‍द हटाएं ‘डीम्‍ड यूनिवर्सिटीज’: यूजीसी

    नाम में से यूनिवसिर्टी शब्‍द हटाएं ‘डीम्‍ड यूनिवर्सिटीज’: यूजीसी

     

     

    देशभर में ‘डीम्‍ड टू बी यूनि‍वर्सिटीज’ के बजाय ‘डीम्‍ड यूनिवर्सिटी’ शब्‍द का उपयोग कर रहे उच्‍च शिक्षण संस्‍थानों को अपने नाम के आगे से यूनिवर्सिटी शब्‍द हटाना होगा. इसके लिए यूजीसी ने हाल ही में सर्कुलर जारी कर निर्देश दिए हैं.

    बता दें कि देशभर के 123 उच्‍च शिक्षण संस्‍थान अपने नाम में डीम्‍ड यूनिवर्सिटी शब्‍द का उपयोग कर रहे थे, जबकि उन्‍हें डीम्‍ड टू बी यूनिवर्सिटी (डीम्‍ड होने वाली या प्रस्‍तावति यूनिवर्सिटी) शब्‍दों का उपयोग करना चाहिए था. ऐसे में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने 10 नवंबर को सर्कुलर जारी कर निर्देश दिए हैं.

    सर्कुलर में कहा गया है कि 3 नवंबर को आए सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर का हवाला देते हुए यूजीसी के सचिव पी के ठाकुर ने कहा है कि ऐसे शिक्षण संस्थान एक महीने के भीतर अपने नाम से विश्वविद्यालय शब्‍द हटा लें.  इसके स्‍थान पर ये शिक्षण संस्थान ‘डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी’ का उपयोग कर सकते हैं.

    सर्कुलर के अनुसार इस निर्देशों का पालन न  करने वाले शिक्षण संस्‍थानों के खिलाफ यूजीसी (इंस्टिट्यूशन्स डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटीज) रेगुलेशन्स, 2016 के तहत कार्यवाई करेगी.इसके साथ ही कुछ संस्‍थानों को हिदायत भी भेजी गई है. इनमें दिल्ली स्थित इंडियन ऐग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (पूसा), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरन ट्रेड, इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर ऐंड बिलियरी साइंस, जामिया हमदर्द, नैशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, करनाल, फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, देहरादून, बीआईटी मेसरा, रांची, क्राइस्ट युनीवर्सिटी, बेंगलुरु, सिंबायसिस युनीवर्सिटी, पुणे, BITS पिलानी, देहरादून एंड गुरुकुल विश्‍वविद्यालय, हरिद्वार आदि शिक्षण संस्थान शामिल हैं.

    हालांकि इस सर्कुलर के जवाब में कई शिक्षण संस्‍थानाें की ओर से कहा गया है कि वे  पहले से ही ‘डीम्स टू बी यूनिवर्सिटी’ शब्‍द का उपयोग कर रहे थे.

  • क्यों अजीब-यहां तक ​​कि जब 99 अन्य दिशानिर्देश हैं: एनजीटी

    क्यों अजीब-यहां तक ​​कि जब 99 अन्य दिशानिर्देश हैं: एनजीटी

     

     

    राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने शनिवार को पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) द्वारा प्रदान किए गए कई दिशानिर्देशों में से एक को चुनने और कार-राशन योजना के कार्यान्वयन की घोषणा करने के लिए दिल्ली सरकार को फटकार दिया।

    एनजीटी के अध्यक्ष स्वतंत्र कुमार कुमार की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने कहा, “ईपीसीए द्वारा जारी 99 अन्य दिशानिर्देश थे, लेकिन आपने एक का चयन करने का निर्णय लिया है? क्या यह सरकार के एक विशेष अधिकारी की लहर होगी या क्या हम यह मानते हैं कि एनसीटी दिल्ली सरकार ने भी अजीब योजना को लागू करने का फैसला किया है? ”

    आपातकालीन उपाय

    ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा था कि शहर की खराब परिवेश वायु गुणवत्ता के सामने आने के 48 घंटे पहले आकस्मिक उपायों को अपनाया जाता है एक व्यवहार्य विकल्प नहीं था। “हम यह निर्देश देते हैं कि औसत प्रदूषक मूल्यों को निर्धारित करने के लिए 48 घंटों प्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन विशेष रूप से जब यह 700 घन मीटर प्रति घन मीटर पार हो जाए तो आकस्मिक उपायों के लिए नहीं।”

    केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अधिकारियों ने कहा कि पर्यावरणीय आपात स्थिति के मामलों में प्रदूषक को कम करने में पानी छिड़काव प्रभावी होगा, बेंच ने कहा, “हम यह निर्देश देते हैं कि भविष्य में बिना किसी डिफ़ॉल्ट और बिना देरी के भी लागू किया जाएगा मौसम विज्ञान विभाग की रिपोर्टों के अनुसार आने वाले हफ्ते के दौरान जब तक कि कल या दिन बाद तक बारिश नहीं होती है। ”

    ‘कोई आधार नहीं’

    “लेकिन हम इसे स्पष्ट करते हैं कि यदि पानी की छिड़काव के लिए कोई आर्थिक बाधाएं या जमीन का बचाव नहीं किया जाता है, तो प्रदूषण का स्तर प्रधानमंत्री के लिए 700 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर और पीई 2.5 के लिए 400 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक बढ़ जाता है।” ।

    हरी पैनल ने यह भी पाया कि उचित दिशा-निर्देश पारित होने के बावजूद राजधानी में “बड़े पैमाने पर निर्माण” किया जा रहा था।

    “राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) अक्षरधाम के पास सीडब्ल्यूजी परिसर के पार होने पर भारी धरती और निर्माण कार्य कर रहा है। किडवाई नगर में एनबीसीसी परियोजना पर निर्माण कार्य चल रहा है। हम इन दोनों संगठनों के लिए शो-कारण बताते हैं कि उन पर अनुकरणीय ठीक क्यों लगाया जाना चाहिए। ”

    पार्किंग की कीमतें

    इसके अलावा, दिल्ली सरकार को पार्किंग की कीमतों में वृद्धि के बारे में अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का निर्देश देते हुए, ट्राइब्यूनल ने नागरिक निकायों और अन्य अधिकारियों से कहा कि पार्किंग में विसंगतियों को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जो अक्सर प्रमुख ट्रैफिक ब्लॉकों के लिए आगे बढ़ते हैं।

    हरी पैनल ने एक समिति का गठन भी किया है, जो अगले 10 दिनों के लिए पीक घंटों के दौरान परिवेश वायु की गुणवत्ता के लिए डेटा एकत्र करता है।