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  • National Epilepsy Day: दूर करें मिर्गी से जुड़ी गलत धारणाएं, जानें लक्षण और बचाव

    National Epilepsy Day: दूर करें मिर्गी से जुड़ी गलत धारणाएं, जानें लक्षण और बचाव

    राष्ट्रीय मिर्गी दिवस यानी National Epilepsy Day हर साल 18 नवंबर को मनाया जाता है। डॉक्टरों की मानें तो मिर्गी एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, लेकिन बीमारी से जुड़ी गलत धारणाओं के कारण मिर्गी से पीड़ित सैकड़ों लोग सामाजिक रूप से बहिष्कृत हो जाते हैं। इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरूकता की कमी है। यहां जानें मिर्सी से जुड़े मिथकों, बीमारी के लक्षण और बचाव के बारे में…

    दूषित पानी और भोजन से होती है मिर्गी

    न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. मुनेश्वर सूर्यवंशी का कहना है कि दुनिया भर में मिर्गी के कुल मरीजों में से 16 प्रतिशत भारत में हैं। दुनियाभर में मिर्गी का एक सामान्य कारण सिर में चोट लगना है, जबकि भारत में इसका एक प्रमुख कारण न्यूरोकाइस्टिसरोसिस यानी तंत्रिका तंत्र का परजीवी रोग है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में मिर्गी के लिए 30 प्रतिशत तक जिम्मेदार है। डॉ. आर के गर्ग ने बताया कि मिर्गी टेपवॉर्म नाम के कीड़े से होती है, जो गंदे पानी या दूषित खाने के कारण शरीर में जाता है। वहां से यह खून में मिलकर दिमाग तक पहुंच जाता है और व्यक्ति को मिर्गी के दौरे आने लगते हैं।

    50 प्रतिशत मरीज सर्जरी से ठीक हो सकते हैं

    न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रवीण शर्मा ने बताया कि देश में करीब 1.25 करोड़ लोग मिर्गी से पीड़ित है। इनमें करीब 50% मरीज ऐसे हैं, जिनकी सर्जरी की जा सकती है। जांच और डायग्नॉसिस होने पर अमूमन 30% मरीज ही सर्जरी के लिए फिट पाए जाते हैं। कई मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें कई दवा के कॉम्बिनेशन देने के बाद भी मिर्गी कंट्रोल नहीं हो पाती। ऐसे मरीज सर्जरी के जरिए मिर्गी से छुटकारा पा सकते हैं।

    ​मिर्गी से जुड़े मिथक और उनकी हकीकत

    1. मिर्गी ठीक नहीं होती।मिर्गी का इलाज मुमकिन है। मोटे तौर पर करीब 80-85 फीसदी मरीज दवा से ठीक हो जाते हैं। बाकी भी सर्जरी से ठीक हो जाते हैं।2. दवाओं के भारी साइड इफेक्ट होते हैं।मिर्गी की दवाओं के कुछ साइड-इफेक्ट्स होते हैं, जैसे कि सुस्ती, नींद ज्यादा आना, मानसिक धीमापन, वजन बढ़ जाना आदि, लेकिन ये दिक्कतें बीमारी से बड़ी नहीं हैं। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवा बदल भी देते हैं।3. यह पागलपन है।मिर्गी पागलपन बिल्कुल नहीं है। यह न्यूरो से जुड़ी एक बीमारी है, जिसका सही इलाज मिलने पर मरीज सामान्य जिंदगी जी सकता है।4. सामान्य जिंदगी नहीं जी सकता मरीज।मरीज सामान्य जिंदगी जी सकता है। बस उसे ड्राइविंग, स्वीमिंग या एडवेंचर स्पोर्ट्स जैसी कुछ चीजों से परहेज करना होता है।

    ​मिर्गी के लक्षण

    – बात करते हुए दिमाग ब्लैंक हो जाना, मांसपेशियों का अचानक फड़कना- तेज रोशनी से आंखों में परेशानी होना, अचानक बेहोश हो जाना- अचानक से मांसपेशियों पर नियंत्रण खो देना

    ​दौरा पड़ने पर इन बातों का रखें ध्यान

    – दौरा पड़ने पर रोगी को सुरक्षित जगह पर एक करवट लेटा दें- कपड़े ढीले करें, खुली हवा में रखें और आसपास भीड़ न लगाएं- सिर के नीचे मुलायम कपड़ा रखें, दौरे के समय रोगी के मुंह में कुछ न डालें

    ​ऐसे करें बचाव

    न्यूरोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. रजनीश कुमार बताते हैं कि मिर्गी ज्यादातर युवाओं में देखी जाती है। पर्याप्त नींद, कच्ची सब्जियों से परहेज, साफ पानी से धुली सब्जियों को छीलकर खाने से मिर्गी से बचा जा सकता है।

  • ऑफिस में चल रहा है यदि आपका अफेयर तो हो जाएं सतर्क

    ऑफिस में चल रहा है यदि आपका अफेयर तो हो जाएं सतर्क

    अक्सर ऐसा कई लोगों के साथ होता है कि जहां पर हम काम कर रहे होते हैं वहीं हमे किसी से प्यार हो जाता है। यह बात हम सभी जानते है कि प्यार कहीं भी और कभी भी हो सकता है। मगर कई बार यह आपके लिए काफी नुकसानदायक साबित होता है।

    बता दें कि ऑफिस अफेयर के फायदे और नुकसान दोनों हैं। कई बार ऑफिस अफेयर आपके लिए बड़ी परेशानी बन जाता है। आइए आज हम आपको बताएंगे कि ऑफिस अफेयर से आपको क्या नुकसान हो सकते हैं।

    पर्सनल लाइफ ऑफिस वर्क पर हावी
    ऑफिस अफेयर के कारण से आपके काम पर भी बेहद प्रभाव पड़ता है। यदि आप दोनों के बीच मनमुटाव हो जाए तो आपका मन काम में नहीं लगेगा। इस दौरान ऑफिस में आपकी परफॉर्मेंस भी घटती चली जाएगी।

    रोक-टोक बढ़ जाना
    जब आपका अफेयर आपके ही ऑफिस में किसी से होता है। इस दौरान सबकी नजर आप दोनोें पर बनी रहती है, जिसकी वजह से आप दोनों पर ऑफिस में रोक-टोक बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में कई बार आप खुद को बदलने की भी सोच लेते हैं।

    पार्टनर को असुरक्षा की भावना


    अगर आप ऑफिस में किसी से ज्यादा हंस-बोल कर बातें करते हैं तो इससे आपके पार्टनर को असुरक्षा की भावना हो सकती है। इसके कारण ऑफिस में आपका दायरा सिमट भी सकता है।

  • 4.5 लाख हार्ट सर्जरी भारत में हर साल, जरूरत नहीं एक-तिहाई मरीजों को

    4.5 लाख हार्ट सर्जरी भारत में हर साल, जरूरत नहीं एक-तिहाई मरीजों को

    वैसे मरीज जिनकी हार्ट आर्टरी सिकुड़ जाती है लेकिन अगर उनमें हमेशा और बहुत ज्यादा तेज सीने में दर्द की शिकायत न हो तो ऐसे मरीजों को इन्वेसिव थेरपी यानी आक्रामक इलाज की जरूरत नहीं होती। ऐसे मरीज सिर्फ साधारण मेडिकल थेरपी से भी स्वस्थ हो सकते हैं। ISCHEMIA ट्रायल नाम की एक मेजर स्टडी जिसमें 5 हजार हार्ट पेशंट्स को शामिल किया गया था में इस बात की पुष्टि हुई है। अमेरिकन हार्ट असोसिएशन की वार्षिक मीटिंग में इस स्टडी के नतीजों को रिलीज किया गया।

    4.5 लाख ऐंजियोप्लास्टी होती है सालाना
    भारत में हर साल करीब साढ़े 4 लाख मरीजों की ऐंजियोप्लास्टी होती है और बड़ी संख्या में मरीज ब्लॉक्ड आर्टरी के इलाज के लिए बाइपास सर्जरी भी करवाते हैं। दिल्ली स्थित एम्स के प्रफेसर ऑफ कार्डियोलॉजी डॉ अंबुज रॉय कहते हैं, हर साल होने वाली ऐंजियोप्लास्टी और हार्ट सर्जरी में से एक तिहाई मरीज ऐसे होते हैं जिनमें बहुत ज्यादा गंभीर लक्षण नहीं दिखते, उनका Ischemic Heart Disease(IHD) स्टेबल होता है। ISCHEMIA Trial से पता चलता है कि ऐसे मरीजों को सर्जरी की जरूरत नहीं होती और वे मेडिकल थेरपी से ही बेहतर कर लेते हैं। IHD वैसे हार्ट प्रॉब्लम है जिसमें हार्ट आर्टरी यानी दिल की धमनी संकुचित हो जाती है जिससे आखिरकार हार्ट अटैक होता है।

    5,179 मरीजों को स्टडी में किया गया शामिल
    ISCHEMIA Trial जिसकी शुरुआत जुलाई 2012 में हुई थी में दुनियाभर के टॉप मेडिकल इंस्टिट्यूट्स के अनुसंधानकर्ताओं को शामिल किया गया था और उन्होंने स्टेबल IHD वाले 5 हजार 179 मरीजों को इस स्टडी के लिए चुना। इन मरीजों को कभी हार्ट अटैक नहीं हुआ था और इनके लेफ्ट मेन कोरोनरी आर्टरी में भी किसी तरह का कोई ब्लॉकेज नहीं था। ज्यादातर मरीजों में संकुचित आर्टरीज की समस्या थी जिसके बारे में एक्सर्साइज स्ट्रेस टेस्ट के दौरान पता चला।

    एक ग्रुप को सिर्फ दवाइयां और दूसरे ग्रुप की हुई सर्जरी
    इन 5 हजार में से 2591 मरीजों को सामान्य मेडिकल थेरपी दी गई जिसमें खून को पतला करने वाली दवा, कलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा और हार्टबीट को स्लो करने वाली दवा शामिल थी। बाकी के 2588 मरीजों की या तो ऐंजियोप्लास्टी हुई या फिर बाईपास सर्जरी। ज्यादातर लोग यही सोच रहे होंगे कि दवाइयों की तुलना में ऐंजियोप्लास्टी के जरिए स्टेंट डाल देने से या बाईपास सर्जरी के जरिए ब्लॉकेज हटाने पर हार्ट अटैक का खतरा कम हो जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। करीब 3 साल 3 महीने तक चले फॉलोअप में अनुसंधानकर्ताओं ने दोनों ग्रुप में किसी तरह का खास अंतर नहीं देखा।

    3.3 साल बाद दोनों ग्रुप के मरीजों में नहीं दिखा कोई अंतर
    3.3 साल के बाद सर्जरी करवाने वाले 13.3 प्रतिशत मरीजों में ओवरऑल कॉम्प्लिकेशन्स दिखे तो वहीं दवाइयों के जरिए मेडिकल थेरपी करवाने वाले 15.5 प्रतिशत मरीजों में कॉम्प्लिकेशन्स दिखे। फॉर्टिस इस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट के चेयरमैन डॉ अशोक सेठ कहते हैं, इन दिनों ऐंजियोप्लास्टी जरूरत से ज्यादा की जा रही है। अगर किसी मरीज क्रॉनिक लेकिन स्टेबल चेस्ट पेन हो रहा है तो ऐसे मरीज को इमरजेंसी में ऐंजियोप्लास्टी करवाने की जरूरत नहीं होती। अडवांस्ड ड्रग थेरपी के डरिए भी ऐसे मरीजों की स्थिति में सुधार हो सकता है। सिर्फ वैसे मरीज जिनमें बीमारी के गंभीर लक्षण दिखें और जिनमें चेस्ट पेन बहुत ज्यादा और लंबे समय तक बना रहे उन्हें सर्जरी की जरूरत होती है।

    लाइफस्टाइल में बदलाव की जरूरत
    भारत में 4 से 5 करोड़ मरीज ऐसे हैं जो IHD यानी संकुचित हार्ट आर्टरी की समस्या से पीड़ित हैं। स्टडीज की मानें तो इस बीमारी की वजह से करीब 15 से 20 प्रतिशत मरीजों की मौत हो जाती है। ऐसे में मरीजों को अपने लाइफस्टाइल में काफी बदलाव करने की जरूरत होती है। कार्डियोलॉजिस्ट्स का सुझाव है कि हेल्दी खाना खाएं, रेग्युलर फीजिकल ऐक्टिविटी करें, सिगरेट-शराब से दूर रहें।

  • आयुर्वेद कहता है बिलकुल न खाएं कच्चा खाना, ये है वजह

    आयुर्वेद कहता है बिलकुल न खाएं कच्चा खाना, ये है वजह

    इन दिनों रॉ फूड यानी कच्ची चीजें खाना सबसे पॉप्युलर डायट ट्रेंड में से एक हो गया है। फिर चाहे वजन घटाना हो या फिर फिट रहना हो ज्यादातर लोग कच्ची चीजें खाना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है इसमें फाइबर और पोषक तत्वों की मात्रा अधिक होती है और कैलरीज कम। लेकिन आयुर्वेद ऐसा नहीं मानता। आयुर्वेद के मुताबिक कच्चा खाना नहीं खाना चाहिए, यहां जाने इसके पीछे की वजह।

    ​क्या कहता है आयुर्वेद

    आयुर्वेद की मानें तो आपको सिर्फ फल, नट्स और सलाद ही कच्चा खाना चाहिए। इसके अलावा बाकी जितनी भी खाने की चीजे हैं और फूड आइटम्स हैं उन सभी को पकाकर ही खाना चाहिए। प्राचीन भारतीय मेडिकल सिस्टम की मानें तो खाने को पकाकर खाने से शरीर को 2 तरह से फायदा होता है।पहला- गर्म खाना आपके गट यानी आंत में ब्लड फ्लो को बढ़ाता है जिससे पाचन की प्रक्रिया बेहतर होती है।दूसरा- पका हुआ खाना पेट में आसानी से टूट जाता है जिससे भोजन के पोषक तत्व शरीर द्वारा आसानी से अब्जॉर्ब हो जाते हैं।

    ​साइंस इस बारे में क्या कहता है

    सिर्फ आयुर्वेद ही नहीं बल्कि साइंस भी इस दावे का समर्थन करता है। इस बारे में बहुत सी रिसर्च भी हो चुकी है जिसमें यह बात साबित हो चुकी है पका हुआ भोजन कच्चे भोजन से कहीं ज्यादा फायदेमंद होता है।

    ​पानी में पका भोजन है फायदेमंद

    एक स्टडी की मानें तो पानी में पके हुए भोजन में ऐंटीऑक्सिडेंट कॉन्टेंट अधिक होता है। इसके अलावा कच्ची सब्जियां अगर कोई खाए तो उसे पचाना बेहद मुश्किल होता है जिससे पेट में कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं।

    ​कच्चा सलाद खाने से पहले ये सावधानी बरतें

    इसका मतलब ये नहीं कि आप कच्ची चीजें खाना बिलकुल बंद कर दें। लेकिन सतर्कता बरतना जरूरी है। अगर आप स्प्राउट्स खा रहे हैं तो उन्हें कच्चा खाने की बजाए उबालकर खाएं। सलाद को कच्चा खाने से पहले हल्का से गुनगुना कर लें खासकर सर्दी के मौसम में। ऐसा इसलिए क्योंकि सर्दियों की तुलना में गर्मियों में हमारा पाचन तंत्र ज्यादा मजबूत रहता है।

    ​मॉनसून के सीजन में भूल से भी न खाएं

    बारिश के मौसम में तो कच्ची चीजें भूल से भी न खाएं। इस दौरान बैक्टीरियल और वायरल इफेक्शन्स ज्यादा फैला रहता है और आपके बीमार पड़ने की आशंका अधिक रहती है। सब्जियों को अच्छे से धोकर और पकाकर खाने से वे सेफ हो जाती हैं और बीमारियों का डर नहीं रहता।

  • बना रहा है बीमार पानी को शुद्ध करने के लिए घरों में लगा RO

    बना रहा है बीमार पानी को शुद्ध करने के लिए घरों में लगा RO

    पानी शुद्ध करने के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) वॉटर प्यूरिफायर लगवाना अब एक आम चलन है। ऐसा इसलिए भी है कि महानगरों में या तो पानी पीने लायक नहीं है या फिर लोग ग्राउंड वॉटर पीने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में RO लगवाना अब एक मजबूरी बन चुका है लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पानी से भी कई बीमारियों का खतरा है? विशेषज्ञों के मुताबिक, आरओ से गंदगी के साथ वह मिनिरल्स भी निकल जाते हैं, जो हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी हैं। इनकी कमी से हड्डी, लिवर, किडनी, बीपी और दिल की बीमारी तक हो सकती है। यही वजह है कि नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूलन (एनजीटी) भी आरओ पर बैन लगाने की सिफारिश कर चुका है।

    केंद्र सरकार के उपभोक्ता मंत्रालय की तरफ से पानी की गुणवत्ता को लेकर किए गए 21 शहरों की सर्वे रिपोर्ट में दिल्ली को 21वें नंबर पर रखा गया है। ग्रेटर नोएडा का हाल भी अच्छा नहीं हैं। लोगों का कहना है कि यहां के पानी का टीडीएस आमतौर पर 300 से अधिक रहता है। इसके चलते लोग घरों में RO लगवा रहे हैं। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि आरओ से निकला बेहद कम टीडीएस का पानी पीने से भी बीमारियां हो सकती हैं।

    RO के पानी में नहीं होते मिनरल्स
    ग्रेटर नोएडा के यथार्थ अस्पताल की डॉ. आशिमा रंजन ने बताया कि वर्तमान पानी शुद्ध न मिलने की वजह से भी काफी बीमारियां हो रही हैं। ऐसे में लोग घर में आरओ लगवा लेते हैं, जो फायदे का सौदा नहीं है। दरअसल, शरीर को फिट रखने के लिए मिनरल्स की जरूरत होती है। घरों में लगे आरओ के पानी से ये मिनरल्स पूरी तरह निकल जाते हैं। ऐसे में यह पानी शरीर के लिए बेहतर नहीं है। आरओ के पानी को सॉफ्ट वॉटर भी कहा जाता है, जो प्यास तो बुझा सकता है लेकिन आपके स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर सकता।

    किडनी, लिवर, हार्ट के लिए फिट नहीं RO का पानी
    डॉ. आशिमा के मुताबिक, आरओ का पानी पीने से किडनी, हार्ट और लिवर संबंधी समस्या हो सकती है। उनका कहना है कि पानी को उबालकर पीना सबसे अच्छा साबित होता है। उबालने से पानी शुद्ध हो जाता है साथ ही इसके मिनरल्स भी नष्ट नहीं होते हैं। अगर आपके घर में आरओ लगा है तो उसका टीडीएस जरूर चेक करते रहें। अगर आरओ के पानी का टीडीएस लेवल 120 से 200 के करीब है तो उसके पानी को पीया जा सकता है।

    75 से कम नहीं होना चाहिए टीडीएस
    डॉक्टरों के अनुसार, पीने के पानी में टीडीएस की मात्रा 75 से कम नहीं होनी चाहिए। इससे कम टीडीएस वाला पानी पीने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और शरीर को जरूरी मिनरल्स नहीं मिल पाते हैं। वहीं, 150 से ज्यादा टीडीएस वाला पानी पीने से बीमारियां हो सकती हैं। इससे सबसे ज्यादा पथरी होने का आशंका रहती है। 500 से ज्यादा टीडीएस वाला पानी पीने से जानलेवा बीमारियां भी हो सकती हैं। पानी में सोडियम, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम, आयरन, कॉपर, फॉस्फेट, सेलेनियम आदि की मात्रा एक सामान होनी चाहिए। इसके ज्यादा या कम होने से बीपी, ब्लड प्रेशर, हीमॉग्लोबिन आदि की बीमारियां होने का खतरा बना रहता है।

    मिनरल नहीं तो कई खतरे
    सोडियम: कमी से बीपी लो हो जाता है तो अधिक सोडियम होने पर हाई बीपी हो जाता है।

    कैलशियम: कमी से हड्डियां कमजोर हो जाती है। कई बार हड्डियां गलने लगती हैं। इससे ऑस्टियोपोरोसिस तक हो जाता है।

    पोटैशियम: शरीर में कमजोरी और पैरालिसिस तक हो जाता है। मांसपेशियां ठीक से काम नहीं कर पातीं, जिससे दिल पर असर पड़ता है।

    मैग्नीशियम: यह सेल के भीतर मिनरल्स को मेंटेन करता है। इसकी कमी से ब्लड फ्लो में कमी आ जाती है।

    आयरन: यह हीमोग्लोबिन के लिए बहुत जरूरी है। इसकी कमी से एनीमिया हो जाता है।

    माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी जरूरी

    कॉपर: यह सेल साइकल को मेंटेंन करता है।

    फॉस्फेट: शरीर में एनर्जी मेंटेन करता है।

    सेलेनियम: शरीर में एंटी ऑक्सिडेंट का काम करता है।

  • यूं मिलेगा ब्रेस्ट से बेस्ट ऑर्गैज्म, जान लें ट्रिक्स और टिप्स

    यूं मिलेगा ब्रेस्ट से बेस्ट ऑर्गैज्म, जान लें ट्रिक्स और टिप्स

    जेनाइटल्स की उत्तेजना से मिलने वाले ऑर्गैज्म के बारे में ज्यादातर लोग जानते हैं लेकिन क्या आपने कभी निप्पल ऑर्गैज्म के बारे में सुना है? जी हां, ब्रेस्ट ऑर्गैज्म पॉसिबल है और इसके पीछे साइंटिफिक वजहें भी हैं। यहां जानें इसके बारे में डीटेल में…

    ट्राई करने से पहले जान लें कुछ बातें

    जब ब्रेस्ट प्ले की बात आती है तो हर महिला की अपनी प्रिफरेंस होती है। कुछ लोगों को पिंचिंग, ट्विस्टिंग वगैरह पसंद आती है वहीं कुछ को इसमें दर्द हो सकता है। इसलिए ऐसा कुछ ट्राई करने से पहले जान लें कि आपके लिए बेस्ट क्या है।

    बदलती रहती है ब्रेस्ट सेंसिटिविटी

    बता दें कि महिलाओं की ब्रेस्ट्स की सेंसिटिविटी वक्त के साथ बदलती रहती है। जैसे मेंस्ट्रुअल साइकल के पहले यह काफी सेंसिटिव हो जाते हैं और इनमें स्वेलिंग होती है। ऐसे में इनमें दर्द हो सकता है।

    बेस्ट क्लाइमेक्स की गारंटी

    वहीं इंट्रेस्टिंग बात यह है कि ब्रेस्ट को उत्तेजित करने से दिमाग का वही पार्ट ऐक्टिवेट होता है जो कि जननांगों को उत्तेजित करने से। फाइनली यह ऐक्ट क्लाइमेक्स तक भी ले जा सकता है लेकिन कई लोगों को यह बात पता नहीं होती।

    ब्रेस्ट हैं सेंसिटिव पार्ट

    इस बात को सपोर्ट करने के लिए और भी फैक्ट्स हैं जैसे ब्रेस्ट काफी सेंसिटिव बॉडी पार्ट होता है और जब महिलाएं उत्तेजित होती हैं तो इनका साइज 25 फीसदी तक बढ़ सकता है। इसमें काफी नर्व एंडिंग्स होती हैं जिनकी वजह से महिलाओं के अराउज्ड होने पर इनका रंग गहरा हो जाता है।

    मिलेगा बेस्ट ऑर्गैज्म

    हालांकि ब्रेस्ट ऑर्गैज्म इतना आसान नहीं होता लेकिन अगर आप यह समझने लगें कि आपके लिए कौन से टिप्स और ट्रिक्स बेस्ट हैं तो यह बेस्ट ऑर्गैज्म दे सकता है।

  • कम करना चाहते हैं तोंद तो सबसे पहले बंद करें ये चीजें खाना

    कम करना चाहते हैं तोंद तो सबसे पहले बंद करें ये चीजें खाना

    मोटापे और बाहर निकली तोंद से परेशान लोग वेट लॉस के स्ट्रिक्ट डायट से लेकर एक्सर्साइज तक, हर संभव प्रयास करते हैं। हालांकि ज्यादातर लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं होती कि अगर वे वजन घटाना चाहते हैं तो इसके लिए किन-किन फूड आइटम्स से दूर रहें। यहां उन्हीं फूड आइटम्स के बारे में हम बता रहे हैं…

    सोयाबीन ऑइल

    सोयाबीन ऑइल भी वजन बढ़ा देता है। इस ऑइल को सैचुरेटेड फैट्स का एक बेहतर विकल्प माना जाता था। लेकिन साल 2016 में आई एक स्टडी के अनुसार, वजन को बढ़ाने के मामले में सोयाबीन ऑइल शुगर से भी अव्वल है। माना जाता है कि सोयाबीन ऑइल में ओमेगा-6 फैटी ऐसिड्स की मात्रा अधिक होती है। हालांकि इन ऐसिड्स की कुछ मात्रा सेहत के लिहाज से सही मानी जाती है। लेकिन ज्यादा मात्रा से वजन बढ़ सकता है।

    एक्स्ट्रा शुगर और क्रीम वाली कॉफी

    कॉफी वजन कम करने में तो मदद करती है। लेकिन अगर इसमें आप एक्स्ट्रा शुगर और कॉफी क्रीम डालकर पीना पसंद करते हैं तो अपनी इस आदत को बदलिए क्योंकि इससे आपका वजन ही बढ़ेगा।

    सफेद ब्रेड

    जो लोग वेट लॉस करना चाहते हैं उन्हें सफेद ब्रेड खाने से बचना चाहिए। यह रिफाइन्ड मैदा और शुगर की बनी होती है। इस ब्रेड के अत्यधिक सेवन से ब्लड में शुगर का स्तर तो बढ़ ही सकता है, साथ ही वजन भी बढ़ने लगता है। वैसे यहां भी ‘किसी चीज की अति’ वाला फॉर्म्युला लागू होता है। यानी सफेद ब्रेड को कभी-कभी खाने से कोई नुकसान नहीं है, लेकिन अगर डेली डायट में यह शामिल हो चुकी है तो फिर आपको अलर्ट होने की जरूरत है।

    बियर

    कई लोग मानते हैं कि शराब पीने से वजन नहीं बढ़ता है, जबकि ऐसा नहीं है। शराब, खासकर बियर पीने से वजन तेजी से बढ़ता है और तोंद भी निकल आती है।

    डिब्बाबंद चीजें, बिस्किट

    पैक हुए फूड्स, बिस्किट और कुकीज भी वजन को बढ़ाने में मदद करते हैं। इसके अलावा सोडा, कोल्ड ड्रिंक्स और अन्य स्वीट बेवरेज से दूरी बनाकर रखें। इनका सेवन सेहत को सिर्फ नुकसान ही नहीं पहुंचाता बल्कि बहुत तेजी से वजन भी बढ़ता है।

  • बिगाड़ सकती है आपकी सेहत का हाल YO-YO डायटिंग

    बिगाड़ सकती है आपकी सेहत का हाल YO-YO डायटिंग

    वेट गेन करने पर डायटिंग शुरू करना और वेट लूज हो जाने पर फिर से अनियमित लाइफस्टाइल फॉलो करना, आपके शरीर के लिए बहुत अधिक नुकसानदायक हो सकता है। वेट गेन और वेट लूज के अनियमित प्लान का जिक्र एक बार फिर काफी तेजी से हो रहा है तो इसका श्रेय जाता है बॉलिवुड ऐक्टर राणा दग्गुबाती को।

    ऐक्टर राणा दग्गुबाती ने बहुत ही तेजी से अपना वेट लॉस किया है। इस पर हेल्थ एक्टपर्ट्स का कहना है कि ऐसा करना सेहत के लिए इतना नुकसानदायक है कि आप किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ सकते हैं या आपको जान का भी खतरा हो सकता है।

    इस तरह का वेट गेन और वेट लॉस रूटीन अपनाने से पहले जरूरी है कि मेटाबॉलिक मेथ को समझा जाए। लोग जब अपनी डायट और एक्सर्साइज को लेकर लापरवाही बरतते हैं तो बड़ी मात्रा में कैलरी स्टोर करते हैं और जब उन्हें अपना वेट घटाना होता है तो डायटिंग करने लगते हैं, इसे yo-yo Dieting पैटर्न कहा जाता है।

    अगर आप वजन में थोड़ा बहुत अंतर करते हैं तब तो फिर भी बॉडी आसानी से झेल लेती है लेकिन अगर आप बार-बार अपने वजन को लेकर एक्सपेरिमेंट्स करते रहते हैं और कभी मोटी तो कभी पतले अवतार में आते रहते हैं तो इसके लिए आपको सेहत और डायट की डीप नॉलेज होना बहुत जरूरी है। क्योंकि युवा बड़ी संख्या में सिलेब्रिटीज को फॉलो करते हैं, ऐसे में उन्हें जागरूक रहना चाहिए। कहीं सेहत की अनदेखी भारी ना पड़ जाए।

  • न्यूरॉलजिस्ट समझ सकेंगे इस तकनीक से मरीजों का कॉम्प्लैक्स विहेवियर

    न्यूरॉलजिस्ट समझ सकेंगे इस तकनीक से मरीजों का कॉम्प्लैक्स विहेवियर

    सूत्रों की मानें तो न्यूरॉलजिकल डिसऑर्डर से जूझ रहे मरीजों के लिए जल्द ही अपनी बीमारी का सही-सही इलाज पाना संभव हो सकेगा क्योंकि उन्हें अपनी बीमारी डॉक्टर को बतानी नहीं पड़ेगी बल्कि दिखानी होगी…जी हां, मानसिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को अक्सर इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ता है, जब वे अपनी समस्या के बारे में चाहकर भी डॉक्टर को सही तरीके से नहीं बता पाते। क्योंकि उन्हें खुद ही पता नहीं होता कि उनके साथ हो क्या रहा है।

    खास बात यह है कि अब अपनी बीमारी के बारे में बताने के लिए उन्हें खुद डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं होगी बल्कि घर बैठे अपनी बीमारी और स्ट्रोक टाइम का विडियो डॉक्टर को भेजकर वे कहीं से अपनी बीमारी और इलाज के बारे में सही जानकारी पा सकेंगे। इस खबर से उन लोगों को खास खुशी मिल रही है, जो टेक्नॉलजी के शौकीन हैं और अपनों का इलाज अपनी पसंद के डॉक्टर से कराना चाहते हैं लेकिन दूरी की वजह से इलाज नहीं करा पा रहे हैं। यह स्टडी डॉक्टर हरदीप और उनके सहयोगियों द्वारा CCBN-यूनिवर्सिटी लेथब्रिज, अलबर्टा, कनाडा में की गई।

    इस स्टडी को ओपन ऐक्सेस जर्नल PLOS Biology में प्रकाशित किया गया। स्टडी में कहा गया है कि शोध के बाद हमें उम्मीद जगी है कि एक दिन ऐसा कर पाना जरूर संभव होगा। शोधकर्ताओं का कहना है कि आर्टिफिशल न्यूरल नेटवर्क का इस्तेमाल अभी कार ड्राइविंग, सर्विलांस और ट्रैफिक मॉनिटरिंग में किया जा रहा है। इसी से प्रभावित होकर हमने मेडिकल फील्ड में इसके उपयोग के बारे में विचार किया। यह तकनीक न्यूरॉलजिस्ट को कॉम्प्लैक्स विहेवियर वाले मरीजों के केस सुलझाने में मदद करेगी।

  • ये घरेलू उपाय दिलाएंंगे पीरियड्स के दर्द से छुटकारा

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    पीरियड के दौरान होने वाली परेशानियां और दर्द कई बार बहुत गम्भीर होता है। इससे महिलाओं को थकान और इरिटेशन भी महसूस होती है। इसके अलावा कई बार पीरियड पेन के साथ बुखार और उल्टी जैसी परेशानियां भी होती हैं। पीरियड के वक्त बहुत मुश्किल और तकलीफ भरा हो जाता है। आइए आज हम आपकाे पांच उपाय बताते है जिनको अपनाने से पीरियड पेन में राहत मिलेगी।

    पीरियड्स शुरू होने के एक सप्ताल पहले से किशमिश और केसर दूध का सेवन शुरु करें। किशमिश और केसर को रातभर पानी में भिगोकर रखें और अगले दिन खाएं। अपने खाने में दाल और साबुत अनाज साबित करें। रोजाना नहीं तो हर दूसरे दिन राजमा, बीन्स, चने और लोबिया जैसे अनाज का सेवन करें।

    सप्ताह में दो दिन ट्यूबर सब्ज़ियां खाएं। सूरन, शकरकंद और आरा रूट ऐसी ही सब्ज़ियां हैं। रात्रि में सोने से पहले कैल्शियम सप्लीमेंट्स ज़रूर लें। इसके अलावा, कैल्शियम वाला भोजन जैसे डेयरी और फिश खाने से नैचुरल कैल्शियम प्राप्त होता है।

    योगा जरूर करें। लड़कियों को रोजाना कम से कम 15 मिनट की योगा जरूर करनी चाहिए।