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  • खेल प्रदर्शन में कॉफी पीने से होता है सुधार : सर्वे

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    लंदन। शोधकर्ताओं ने पाया है कि कॉफी पीना पुरुषों और महिलाओं दोनों के खेल प्रदर्शन में सुधार के साथ जुड़ा हुआ है। जर्नल न्यूट्रिएंट्स में प्रकाशित अध्ययन के लिए ब्रिटेन में कोवेंट्री विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 38 प्रतिभागियों (19 पुरुष, 19 महिलाएं) को चुना और पाया कि कैफीनयुक्त कॉफी पीने से साइकिल चलाने की गति में सुधार होता है।

    अध्ययन के दौरान पाया गया कि कॉफी पीने के बाद पांच कि. मी. साइकलिंग के समय में पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रदर्शन में क्रमश: लगभग नौ सेकंड और छह सेकंड का सुधार देखने को मिला।

    अध्ययन के निष्कर्षो से पता चलता है कि पुरुष और महिलाएं दोनों कॉफी के सेवन के बाद समान प्रतिक्रिया करते हैं। इस तरह से प्रदर्शन में सुधार के लिए व्यायाम करने से पहले कैफीन का सेवन एक व्यावहारिक स्रोत हो सकता है।

    शोध में कॉफी के लाभों पर प्रकाश डालते हुए यह भी कहा गया है कि इसका सेवन बढ़ते शरीर में योगदान देता है।

    शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी तक इस विषय पर किए गए अधिकांश शोध केवल निर्जल कैफीन और पुरुषों पर केंद्रित रहे हैं।

  • अपनी त्वचा की खूबसूरती सर्दियों में ऐसे रखें बरकरार

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    सर्दी के सीजन में त्वचा संबंधी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे वक्त में त्वचा की चमक बरकरार रखने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। आइए हम आपको बता रहे हैं कि सर्दियों के सीजन में आप अपनी त्वचा का ख्याल कैसे रखें।

    (1) इस सीजन में देर तक नहाने से बचना चाहिए। इसके अलावा साबुन के इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए और स्क्रब का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

    (2) इस सीजन में त्वचा की चमक बरकरार रखने के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करें।

    (3) यदि त्वचा ज्यादा रूखी है तो साबुन रहित क्लींजर का इस्तेमाल करें।

    (4) साबुन की जगह मॉयश्चराइजिंग क्लींजर का इस्तेमाल करें। यह त्वचा को रूखा नहीं बनाते और नुकसान नहीं पहुंचाते।

    त्वचा की खूबसूरत रखने के घरेलु उपाय

    त्वचा की देखभाल कुछ कुदरती चीजों के इस्तेमाल से भी कर सकते हैं। घरेलू उपायों से भी आपकी त्वचा की ब्यूटी बरकरार रह सकती है।

    इस सीजन में नहाने के लिए गर्म पानी की बजाय गुनगुने पानी का प्रयोग करें। नहाने वाले पानी में एक कप कच्चे दूध के इस्तेमाल से त्वचा कोमल रहती है। सर्दी के सीजन में जहां एक ओर बाजार का स्क्रब हानिकारक हो सकता है तो वहीं दूसरी ओर नेचुरल स्क्रब लाभकारी।

    नेचुरल क्लींजर फेस वॉश करने से पहले रुई के फाहे को दूध में डुबोएं और पूरे फेस को क्लीन कर लें। थोड़ी देर तक चेहरे को प्राकृतिक हवा में सूखने दें और फिर गुनगुने पानी से फेस वॉश कर लें। क्योंकि कच्चा दूध भी एक नेचुरल क्लींजर है, इसके इस्तेमाल से त्वचा निखर जाती है, साथ ही सॉफ्ट भी हो जाती है।

    इस उबटन को पूरे शरीर पर लगाकर हल्के-हल्के हाथ से 3-4 मिनट तक मालिंस करें और कुछ देर बाद पानी से धो दें। ऐसा करने से भी अपनी त्वचा मुलायम रहेगी। इसके अलावा गर्म दूध में सूजी मिक्स करके पेस्ट भी स्क्रब का काम कर सकता है।

  • न करें पैरों में सूजन और दर्द को नजरअंदाज, हो सकता है डीप वेन थ्रॉम्बोसिस

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    कई बार ऐसा होता है कि हमारी टांगों में मौजूद काफ मसल्स (टांगों का पिछला हिस्सा) की धमनियों में ब्लड क्लॉट बन जाता है। इसकी वजह से टांग सूजकर हाथी पांव जैसी हो जाती है और उसमें दर्द होता है। कैलाश हॉस्पिटल स्थित कार्डियॉलजिस्ट और वस्कुलर सर्जन डॉ. डी. एस गंभीर ने हमसे इस बीमारी पर विस्तार से बात की और बताया कि इससे क्या असर पड़ता है, क्या रिस्क है और इससे कैसे बचा जा सकता है।

    केस स्टडी 1: प्रेग्नेंसी के दौरान कविता ने पांव की सूजन को सामान्य समझा। घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाओं ने भी उन्हें यही कहा कि इस दौरान वेट बढ़ने से पैरों में सूजन आना आम है और गुनगुने पानी में पैरों को सेंक देने से आराम मिल जाता है। लेकिन डिलीवरी के बाद पैरों की भी कविता के पैरों की सूजन कम होने की बजाए बढ़ने लगी और दर्द असहनीय हो गया और हॉस्पिटल में ऐडमिट होने की नौबत आ गई। डॉक्टरों ने बताया कि पैरों की सूजन सामान्य नहीं है बल्कि डीवीटी यानी बल्ड क्लॉट की बनने की वजह से है। कविता को कई दिन हॉस्पिटल में आईसीयू में रहना पड़ा।

    केस स्टडी 2: 65 वर्षीय बुजुर्ग शांति देवी को कई दिनों तक पैरों में दर्द महसूस हुआ तो उन्हें लगा कि ज्यादा टहलने की वजह से उन्हें ऐसा हो रहा है। टहलना बंद करने के बाद भी पैरों का दर्द बंद नहीं हुआ और सूजन लगातार बढ़ती रही। गर्म पानी के सेक से भी आराम नहीं हुआ और नौबत यहां तक पहुंच गई कि दर्द के चलते रात को नींद आना भी बंद हो गया। जब सूजन काफ से लेकर जांघ तक पहुंच गई और एक पैर हाथी के पैर की तरह सूज गया तो उन्हें चेकअप के लिए हॉस्पिटल ले जाया गया जहां डॉक्टर ने उनका पैर देखते ही उन्हें तुरंत इमर्जेंसी में हॉस्पिटल में एडमिट करने के लिए कहा। वजह थी डीवीटी की गंभीर स्टेज जिसमें ब्लड क्लॉट किसी भी वक्त टूटकर हार्ट तक पहुंच सकते थे और ऐसे में मरीज के साथ कोई भी अनहोनी हो सकती थी।

    क्या होता है डीवीटी?
    हमारी टांगों में मौजूद धमनियां बॉडी के सभी हिस्सों से सारा गंदा खून इकट्ठा कर वापस दिल यानी हृदय में ले जाती हैं। जो धमनियां हृदय से शरीर के अन्य हिस्सों में खून ले जाती हैं उन्हें आर्टरी कहा जाता है। टांगों में मौजूद काफ मसल्स में धमनिया काफी अंदर होती हैं और उनमें कई बार ब्लड क्लॉट यानी खून का थक्का बन जाता है। इसी स्थिति को डीप वेन थ्रॉम्बोसिस यानी डीवीटी कहा जाता है।

    3 मुख्य लक्षण जिनसे डीवीटी का पता चलता है

    डीवीटी की वजह से चलने-फिरने में पैरों और टांगों में खिंचाव महसूस होने लगता है और तेज दर्द होता है। डॉक्टर के मुताबिक, दो-तीन ऐसे मुख्य लक्षण हैं जिनसे पता चलता है कि मरीज को डीप वेन थ्रॉम्बोसिस की बीमारी हो सकती है।

    1- काफ मसल्स में दर्द
    यह जरूरी नहीं कि दर्द चलने पर ही हो। कई बार रेस्टिंग स्टेज में भी होता है। यानी जब आप आराम कर रहे हो और जरा भी मूवमेंट नहीं हो। यह दर्द वक्त के साथ और भी खतरनाक हो जाता है।

    2- काफ मसल्स में सूजन
    टांगों में मौजूद काफ मसल्स में सूजन आ जाती है और अगर क्लॉट ऊपरी हिस्से में चले जाएं तो वहां भी सूजन आ सकती है।

    3- लो ब्लड प्रेशर
    अगर किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर लो हो जाता है, बेहोशी आती है तो और ज्यादा लो रहता है तो उस स्थिति में हार्ट को ब्लड पंप करने में अत्यधिक मशक्कत करनी पड़ती है। इससे भी वेन्स में ब्लड क्लॉट बन सकता है।

    किस वजह से डीवीटी होता है?
    ब्लड क्लॉट यानी खून का थक्का तभी बनता है जब खून धमनियों को किसी तरह का नुकसान पहुंचता है। यह नुकसान सर्जरी की वजह से भी हो सकता है, हड्डी टूटने या फिर किसी अन्य ऐक्सिडेंट की वजह से भी।

    किन लोगों को और किन परिस्थितियों में डीवीटी हो सकता है?
    1- हमारा वर्क एन्वायरनमेंट ऐसा है कि सारे दिन बैठकर काम करते हैं। ओवरवेट भी हैं। पूरे दिन दिन टांग लटकाकर रहने से टांग में क्लॉट बनने लगते हैं। घंटों तक बैठे रहने और बिल्कुल भी टांग न हिलाने से डीवीटी हो सकता है।

    2- अगर कोई बीमार है और लंबे समय से बिस्तर पर है तो उसे भी डीवीटी हो सकता है।

    3- जो महिलाएं बर्थ कंट्रोल थेरपी या मेनॉपोज के दौरान हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थेरपी लेती हैं उनमें भी टांगो में खून का थक्का बनने लगता है जो डीवीटी की ओर इशारा करता है।

    4- लेकिन ऐसे लोगों में दोबारा भी खून का थक्का बन सकता है जो या तो कैंसर के मरीज रहे हैं, लकवा से पीड़ित हैं या फिर बेड पर ही रहते हैं और चल-फिर नहीं सकते। अगर परिवार में किसी को कभी भी ब्लड क्लॉट रहा हो तो भी अन्य सदस्यों में यह अनुवांशिक तौर पर आ सकता है।

    वृद्धावस्था और प्रेग्नेंसी में आम है डीवीटी
    डीवीटी वृद्धावस्था में काफी आम होता है। 70-80 साल की आयु में व्यक्ति का वेन्स सिस्टम कमजोर हो जाता है। जब आदमी खड़ा होता है तो उसकी बॉडी का ग्रेविटी सिस्टम नीचे की तरफ होता है जबकि वेन्स ऊपर की तरफ ब्लड को प्रोपेल करती हैं। वृद्धावस्था में वेन्स कमजोर होने की वजह से उनका प्रोपेलिंग ऐक्शन कम हो जाता है और ब्लड एक ही जगह स्टेगनेट होकर क्लॉट बन जाता है।

    प्रेगनेंट महिलाओं, खासकर मोटी महिलाओं में जब भ्रूण का विकास होता है तो उसका प्रेशर बढ़ता है जिससे यूटरस की वेन्स में ब्लड का फ्लो कम होने लगता है और वह स्थिर (स्टैग्नेंट) होने लगता है जिससे टांगों में क्लॉट होने लगते हैं।

    क्रॉनिक स्मोकर्स में डीवीटी का ज्यादा खतरा
    डॉक्टर के अनुसार, डीवीटी यानी डीप वेन थ्रॉम्बोसिस आदतों की वजह से भी हो सकता है जैसे कि स्मोकिंग, खासकर क्रॉनिक स्मोकर्स। ऐसे लोगों में डीवीटी का खतरा ज्यादा होता है।

    कुछ ऐसी स्थितियां भी हैं जिनमें व्यक्ति को डीवीटी होने का चांस बढ़ जाता है। जैसे कि फ्रैक्चर और कैंसर। कैंसर में वैसे ही ब्लड प्रॉपर्टीज बदलने लगती हैं इसकी वजह से ब्लड क्लॉट हो सकता है। दिल के मरीजों में भी ब्लड क्लॉट होने का खतरा अधिक होता है।

    डीवीटी कितने पर्सेंट लोगों को प्रभावित करता है?
    डीवीटी बहुत ही असामान्य बीमारी है। लेकिन यह बीमारी किसी को भी और कभी भी गिरफ्त में ले सकती है। उन लोगों ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है जो बूढ़े हैं। वृद्धावस्था में फ्रैक्चर होने के चांस अधिक बढ़ जाते हैं इससे व्यक्ति के एक ही जगह पर पड़े रहने की नौबत आ जाती है। इस स्थिति की वजह से उन्हें डीवीटी होने के चांस बढ़ जाते हैं। ओवरऑल देखा जाए तो यह बीमारी ज्यादा आम नहीं है लेकिन बुजुर्ग और प्रेगनेंट महिलाओं को खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है।

    कॉम्पलिकेशन्स
    इसका सबसे बड़ा कॉम्पलिकेशन यही है कि इसमें असहनीय दर्द होता है और सूजन आ जाती है। मरीज कोई काम नहीं कर सकता। उसे पूरा रेस्ट चाहिए होता है और इसलिए उसे ऐडमिट करना जरूरी हो जाता है।

    पल्मोनरी थ्रॉम्बोसिस-डीवीटी का खतरनाक रूप
    क्लॉट कई बार छूटकर शरीर के अन्य हिस्सों और फेफड़ों में जा सकते हैं। अगर यह क्लॉट जाकर हार्ट के दाएं हिस्से में चला जाए तो वह हिस्सा डिस्लॉज होकर अलग हो जाता है। अगर क्लॉट बड़ा है तो यह पलमोनरी एम्बोलस पैदा कर सकता है। जो क्लॉट बनने के बाद छूट जाता है उसे एम्बोलस कहा जाता है और वह जब और भी टूटकर अन्य टुकड़ों में बंट जाता है तो उसे एम्बोलाई कहते हैं।

    अगर क्लॉट बड़ा है और फेफड़े की मुख्य धमनी को ब्लॉक कर दे तो स्थिति खतरनाक हो सकती है। उस स्थिति को पल्मोनरी थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है।

    पलमोनरी एम्बोलस के लक्षण
    लो ब्लड प्रेशर
    हार्ट रेट बढ़ जाता है
    मरीज को पसीना आता है और फिर वह बेहोश हो जाता है।
    अगर ब्लड व्यक्ति के फेफड़े में जा ही नहीं रहा है और कोई बड़ा क्लॉट धमनियों के जरिए वहां जाकर बैठ गया, तो ब्लड फेफड़ों में जाएगा ही नहीं और उसका ऑक्सिजिनेशन नहीं होगा और जब ब्लड ऑक्सिजिनेट नहीं होगा तो व्यक्ति बेहोश हो जाएगा।

    इलाज
    जब तक डीवीटी टांग में है तब तक पूरा बेड रेस्ट। पहले 2-3 हफ्ते तक ऐडमिट करते हैं। इंट्राविनस ब्लड थिनर हिपैरिन दिया जाता है। यह एक बेहद स्ट्रॉन्ग ब्लड थिनर है जिससे क्लॉट घुल जाते हैं और धीरे-धीरे निकल जाते हैं। साथ में ऐंटीबायॉटिक और सूजन कम करने वाले ड्रग्स दिए जाते हैं।

    डायग्नॉज के लिए वीनस डॉपलर टेस्ट किया जाता है उसी के बाद दवाई शुरू की जाती है। 2-3 हफ्ते बाद फिर से टेस्ट किया जाता है जिसमें देखा जाता है कि क्लॉट घुल रहे हैं या नहीं। अगर घुल जाते हैं तो फिर मरीज को छुट्टी दे दी जाती है और फिर उसके बाद उसे ओरल ब्लड थिनर दिया जाता है।

    आजकल कुछ ऐसे ब्लड थिनर आ गए हैं जो एकदम सुरक्षित हैं और ये 6 महीने तक दिए जाते हैं। इन्हें NOACs (Novel oral anticoagulants) कहा जाता है। पुराने जमाने में कुछ ऐसे NOACs दिए जाते थे। वे अभी भी दिए जाते हैं पर वे थोड़े सस्ते हैं लेकिन इसमें कुछ पैरामीटर्स का ध्यान रखना होता है जैसे कि ब्लड ज्यादा पतला न हो और न ही कम। अगर ब्लड का पतला कम हो रहा है ज्यादा पतला नहीं हुआ है तो फिर यह प्रभावी नहीं है। इसे मॉनिटर करने के लिए दो टेस्ट होते हैं पीटी और आईएमआर…

    6 महीने से 1 साल के अंदर ठीक हो जाता है डीवीटी
    6 महीने से 1 साल के अंदर डीवीटी ठीक हो जात है। एकाध क्लॉट रह भी जाता है तो वह वक्त के साथ ऑर्गेनाइज हो जाते हैं और उनका छूटने का डर भी नहीं होता और दवाइयों से ठीक हो जाता है।

    डीवीटी के लिए डायट
    ऐसी कोई चीज नहीं जिसे खाने या ना खाने से नुकसान होगा। कई खास डायट नहीं। अगर मोटापे के शिकार हैं तो ऐसी चीजें ना खाएं जिससे मोटापा न बढ़े। हॉरमोन रिप्लेसमेंट थेरपी न लो, ओरल कॉन्ट्रैसेप्टिव न लें, डेस्क जॉब है तो घूमें…लॉन्ग जर्नी है तो अपने पैरों को हर दो घंटे में हिलाते रहिए।

  • अपनाए ये आसान उपाय बचाएंगे आपको हार्ट अटैक से

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    आजकल व्यस्त जीवनशैली और खान-पान में अनियमितता ने आज लोगों को कई बीमारियों की ओर धकेल दिया है। हार्ट अटैक एक ऐसी बीमारी है जो बहुत ही तेजी से बढ़ी है। हार्ट अटैक एक ऐसी स्थिति है, जिसमें ज्यादातर लोग इसके लक्षणों को नहीं पहचान पाते और इस बीमारी की चपेट में आ जाते है।

    लेकिन आप अपनी जीवनशैली कुछ बदलाव कर इस जानलेवा बीमारी से बच सकते हैं। आइए आज हम आपको 3 ऐसे घरेलू उपायों के बारे में बताने जा रहे है जिन्हें आजमाकर आप हार्ट अटैक की बीमारी से बच सकते है।

    ब्लडप्रेशर
    रक्तचाप यानी कि ब्लडप्रेशर का बढ़ना और घटना दोनों ही हमारे शरीर के लिए हानिकारक है। ब्लडप्रेशर के हाई हो जाने से हृदय को नुकसान पहुंचाता है। हाई ब्लडप्रेशर धड़कन को बढ़ा देता है, जिसके कारण दिल सही तरीके से काम नहीं कर पाता है। आपको इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है कि आपके ब्लड प्रेशर का स्तर हमेशा 120 और 80 के अंदर ही रहे। हृदय स्वस्थ्य के लिए ब्लड प्रेशर पर नियंत्रण बेहद जरूरी है।

    नियमित वॉकिंग करना
    हृदय के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आपको नियमित वॉक करनी चाहिए। अगर आपको पहले से ही सांस से जुड़ी कोई बीमारी है तो इतनी तेज गति से न टहलें कि आपकी सांस फूलने लग जाए। आपको सामान्य गति से ही टहलना चाहिए। ऐसा करने से आपका दिल हमेशा स्वस्थ रहेगा और आप हार्ट अटैक जैसी गंभीर स्थिति से दूर रहेंगे।

    कोलेस्ट्रॉल
    यह एक केमिकल कंपाउंड है जो हमारे लिवर में मौजूद होता है। यह हमारे शरीर में नई कोशिकाओं और हॉर्मोंस को व्यवस्थित रखने में मदद करता है। बता दें कि जब हमारे शरीर को कोलेस्ट्रॉल की जरूरत होती है तो लिवर इसे निकाल देता है और शरीर अपनी जरूरत को पूरा कर लेता है। लेकिन जो भी अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल हमारे शरीर में जमा होता है वह शरीर के लिए हानिकारक हो जाता है। कोलेस्ट्रॉल को एलडीएल कहते हैं। एलडीएल हमारे शरीर के रक्त प्रवाह को बाधित कर देता है, जिससे दिल और दिमाग पर बुरा प्रभाव पड़ता है। एलडीएल जानलेवा भी हो सकता है। इसलिए फैट युक्त चीजों के इस्तेमाल से बचना चाहिए, जिससे कोलेस्ट्रॉल का स्तर नियंत्रित रहे।

  • बेहद सुरक्षित मानी जाने वाली दवाई है घातक, अब देनी होगी एंटासिड पर ‘Kidney Injury’वॉर्निंग

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    एसिडिटी से बचने के लिए हमारे देश में बड़ी मात्रा में एंटासिड का सेवन किया जाता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए एंटासिड की बिक्री से जुड़ा नया नियम लागू किया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य रोगियों की सुरक्षा को बढ़ावा देना है। नए नियम के तहत एंटासिड के रैपर पर यह वॉर्निंग देना जरूरी होगा कि इसका उपयोग किडनी के लिए अत्यधिक हानिकारक हो सकता है।

    भारत के ड्रग्स कंट्रोलर जनरल द्वारा मंगलवार को एक निर्देश जारी किया गया, जिसमें सभी राज्य नियामक अधिकारियों और प्रोटॉन पंप इनहेबिटर्स (पीपीआई) के प्रत्यक्ष निर्माताओं से पूछा गया कि एंटासिड बाजार का एक बड़ा हिस्सा है और काफी बड़ी मात्रा में लोग इस दवाई का सेवन करते हैं। लेकिन इस दवाई का एक प्रतिकूल प्रभाव गुर्दे के लिए बहुत अधिक घातक हो सकता है, इससे जुड़ी चेतावनी इस दवाई की पैकेजिंग में दी जानी चाहिए। जो इस दवाई का एडवर्स ड्रग रिऐक्शन (ADR) है। इसके साथ ही जिन दवाइयों में पैंटोप्राज़ोल, ओमेप्राज़ोल, लांसोप्राज़ोल, एसोमप्राज़ोल और उनके संयोजन शामिल हैं, उनकी पैकेजिंग के अंदर भी इस तरह की चेतावनी दी जाएगी। इसके लिए दवाई की पैकेजिंग में इस बारे में वॉर्निंग लिखा एक पेपर इंसर्ट किया जाएगा या प्रिस्क्रिप्शन ड्रग लेबल पर इस बारे में जानकारी को प्रमुखता से दिया जाएगा। हालांकि अभी तक इस पर दवाई के सुरक्षित और प्रभावी उपयोग के बारे में जानकारी दी जाती है।

    आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में कई विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकन और केस स्टडी की गई, जिसमें नैशनल को-ऑर्डिनेशन सेंटर फॉर फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम भी शामिल है। पिछले दिनों ऐंटिएसिडिटी पिल्स पर हुई ग्लोबल स्टडीज में यह बात सामने आई कि गैस और जलन जैसी दिक्कतों से बचने के लिए यूज की जाने वाली टैबलेट्स का लंबे समय तक सेवन करने पर किडनी डैमेज, एक्यूट रेनल डिजीज, क्रोनिक किडनी डिजीज और गैस्ट्रिक कैंसर जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हावी हो सकती हैं। लेकिन यह स्टडी नेफ्रॉलजी जर्नल में ही पब्लिश हुई है, इस कारण हो सकता है कि बहुत सारे चिकित्सकों को इन दवाइयों के साइडइफेक्ट्स के बारे में ना पता हो।

    एंटासिड के नुकसान

    प्रोटॉन पंप इनहेबिटर (PPI) दुनियाभर के टॉप 10 प्रिस्क्राइब्ड ड्रग्स की क्लास में शामिल है, जिन्हें एसिड और अपच की समस्या को दूर करने के लिए उपयोग में लाया जात है। लेकिन ऑर्थोपेडिक्स, कार्डियोलॉजी, आंतरिक चिकित्सा और सर्जरी जैसी विशेष स्थितियों में भी नियमित रूप से इसका उपयोग किया जाता है। जानकारी के मुताबिक इसका बाजार 4 हजार 5 सौ करोड़ रुपए से अधिक का है।

    एसिडिटी से निपटने के लिए पीपीआई का इस्तेमाल करीब 20 साल पहले शुरू हुआ। तभी से इन दवाइयों को लेकर इस तरह की धारणा है कि ये बहुत ही सुरक्षित दवाइयां हैं। पीपीआई अभी तक गैस्ट्रोएंटेरॉलजिस्ट, चिकित्सकों और अन्य विशेषज्ञों के एक बड़े वर्ग के बीच खासी लोकप्रिय रहीं लेकिन मरीजों को इससे नुकसान उठाना पड़ा। यही वजह है कि अब इन दवाइयों की खपत में कमी आने लगी है।

    इससे पहले, यूएस-आधारित नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ प्रदीप अरोड़ा ने बीएमसी नेफ्रोलॉजी में वैश्विक शोध प्रकाशित किया है, जिसके बारे में उन्होंने हमारे सहयोगी अखवार टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि पीपीआई को कुछ दिशा निर्देशों के साथ ही प्रिस्क्राइब्ड किया जाना चाहिए और यह अवधि मात्र 8 सप्ताह तक ही होनी चाहिए। अगर इससे अधिक समय के लिए पेशंट को पीपीआई लेने की जरूरत पड़ रही है तो उसके किडनी फंक्शन और मैग्निशियम लेवल पर लगातार ध्यान देने की जरूरत है।

  • ये है सबसे बढिया फार्मूला खुशहाल शादीशुदा जिदंगी जीने का

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    अगर आपकी शादीशुदा जिंदगी पहले जैसा रोमांस नहीं है। शादी के कई सालों बाद आप अपनी शादीशुदा लाइफ से खुश नही है तो परेशान ना हो। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा फॉर्मूला खोज निकाला है जो आपकी नीरस जिंदगी में खुशियों के ढेर सारे रंग भर देगा।

    अमेरिका के टेनेसी विश्वविद्यालय ने 30-40 साल की उम्र वाले जोड़ों के बीच ईष्र्या, धर्म और परिवार झगड़े जैसे मुख्य मुद्दों पर शोध किया और इससे जो फॉर्मूला बनाया उसे जीवन में लागू करना बहुत ही आसान है। वैज्ञानिकों का कहना है जो कपल छोटी-छोटी बातों पर लडऩे की जगह शांति से बैठकर बातचीत से हल निकालते है वे खुशहाल जीवन बिताते हैं। संबंध उलझ रहे हैं तो बात करें, बहस करें लेकिन झगड़ा न करें तभी समाधान संभव है।

    वैज्ञानिकों का यह शोध फैमिली प्रोसेस जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक दो उम्र वर्ग के जोड़ों पर रिसर्च किया गया। पहले ग्रुप में 57 ऐसे जोड़े थे, जिनकी उम्र 30 से 40 साल के बीच की की थी। इन जोड़ों की सबसे खास बात थी उनकी शादी 9 साल पुरानी थी। इस ग्रुप के जोड़ों के बीच ईष्र्या, धर्म और परिवार झगड़े के मुख्य मुद्दे थे।

    दूसरा ग्रुप 42 साल पुरानी हो चुकी शादी वाले 64 ऐसे कपल का था, जिनकी उम्र 70 साल के आस-पास थी। 70 साल से अधिक उम्र वाले जोड़ों में अंतरंगता, फुर्सत के पल, घरेलू समस्याएं, हेल्थ, कम्युनिकेशन और पैसे से जुड़े मुद्दों पर बहस होती थी।

    शोधकर्ताओं ने पाया जो जोड़े मुद्दों पर बहस के दौरान झगड़ा करने से बचते हैं वे समाधान जल्दी ढूंढ लेते हैं। जैसे वे घरेलू कामकाज का बंटवारा करते हैं और एक-दूसरे के साथ रहने के लिए समय कैसे निकालता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जोड़ों का यह व्यवहार ही उनकी खुशहाल जिंदगी की वजह है।

    शोध का निष्कर्ष…

    बड़ा सोचें…
    यदि आप शादीशुदा जीवन में हैं तो चाहे आप कितना ही अच्छी तरह से एक दूसरे को समझते हों छोटे-बड़े झगड़े तो होते ही हैं। लेकिन जब आप छोटी-छोटी बेकार की बातों पर लड़ रहे हैं तो यह भी ध्यान रखिए की यह छोटी-छोटी बातों की लड़ाई बड़ी भी बन सकती है। रिश्ते को मजबूत बनाए रखने के लिए छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करें।

    जो लंबे वक्त से शादीशुदा थे उनके जीवन में बेहद कम ऐसे मुद्दे थे जिनकी वजह उनके बीच झगड़ा हुआ हो।

    परेशानी पर ज्यादा जोर देने से मुद्दे को सुलझाना मुश्किल हो जाता है और कपल्स के बीच विश्वास भी घटता है।

    जो कपल्स जल्द और आसानी से हल होने वाले मुद्दों चर्चा से दूर रखते हैं वे भी लंबा और खुशहाल जीवन बिताते हैं।

  • गट-गट नहीं, सिप-सिप कर पिएं पानी, Weight Loss में है मददगार

    गट-गट नहीं, सिप-सिप कर पिएं पानी, Weight Loss में है मददगार

    एक स्टडी के मुताबिक, अगर आप रोजाना पानी पर्याप्त मात्रा में पीते हैं, तो आपका वजन तेजी से कम होता है। 1200 लोगों पर की गई इस स्टडी में पर्याप्त मात्रा में पानी पीने वाले लोगों में 3 महीने में 44 फीसदी वजन में कमी पायी गई। दरअसल, पानी बॉडी में थर्मोजेनेसिस की मात्रा को बढ़ाता है, जो पाचन तंत्र को फिट रखने में मदद करता है। यही नहीं, यह बॉडी में फैट भी इकट्ठा नहीं होने देता। तो आखिर कैसे पानी पीकर आप घटा सकते हैं वजन, यहां जानें…

    ​पानी कैसे घटाता है वजन?

    पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर का मेटाबॉलिज्म भी अच्छा रहता है, जिससे आपका पाचन सही तरीके से होता रहता है। साथ ही, इससे आपके शरीर में फैट जमा नहीं होता इसलिए अगर आप पानी पीकर वजन कम करना चाहते हैं तो ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं। कम पानी पीने से आपका पाचन खराब होता है और सेहत संबंधी कई दिक्कतें होती है। पानी हमारे बेहतर स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है लेकिन पानी 2 तरह से वजन कम करने में मदद करता है। पहला- यह शरीर को बर्न करने वाली ऊर्जा या कैलरी की मात्रा को बढ़ाता है। दूसरा- पानी पीते रहने से आप ज्यादा खाने की आदत से खुद को दूर रख सकते है। पानी कम पीने से फैट बर्न करने की क्षमता कम हो जाती है।

    ​खाने से पहले पिएं पानी

    खाना खाने से पहले पानी पीने से पेट भरा हुआ महसूस होता है, जिससे आप खाना कम इनटेक करते हैं। यह भी वजन कम करने में मदद करता है। आमतौर पर ये कहा जाता है कि रोजाना 2 लीटर पानी पीना चाहिए। लेकिन रिसर्च के अनुसार, कुछ लोगों के लिए ये संख्या प्रतिदिन 5 लीटर भी हो सकती है। यह निर्भर करता है आपके फिटनेस के लेवल, बॉडी के प्रकार व आपके रुटीन पर।

    ​लिपोलिसिस और थर्मोजेनेसिस को बढ़ाता है पानी

    पानी लिपोलिसिस की प्रोसेस को तेज कर देता है। लिपोलिसिस एक चयापचय प्रक्रिया है जिसके माध्यम से लिपिड ट्राइग्लिसराइड्स को ग्लिसरॉल और फैटी एसिड में हाइड्रोलाइज किया जाता है। ऐसा फूड, जिसमें पानी अधिक हो का सेवन करने से बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) कम हो जाता है। बीएमआई व्यक्तियों में कम वजन, अधिक वजन या मोटापा की स्थिति को तय करता है। पानी बॉडी में थर्मोजेनेसिस की मात्रा को बढ़ाता है। थर्मोजेनेसिस एक ऐसी प्रोसेस है, जो कैलरी को जलाने में मदद करती है।

    ​पानी कम कैलरी डायट में शामिल

    पानी नैचरल तौर पर कैलरी-मुक्त होता है, इसलिए इसे आमतौर पर कम कैलरी डायट में शामिल किया जाता है। खाने से पहले पानी पीने से मध्यम आयु वर्ग और वृद्ध व्यक्तियों को भूख कम लगती है, जिसके फलस्वरूप कैलरी की मात्रा घटती है और वजन में कमी आती है। रोजाना खाना खाने से पहले पानी पीने से भूख में कमी आती है और 12 सप्ताह की अवधि में 2 किलो वजन कम हो सकता है। लिहाजा वेट लॉस की सोच रहे हैं तो खाने से 20 से 30 मिनट पहले पानी पिएं। नाश्ते से पहले पानी का सेवन करने से भोजन के दौरान कैलरी की खपत 13% तक कम हो जाती है।

    ​पानी पीने का सही तरीका क्या है

    आयुर्वेद के अनुसार पानी पीने का सही तरीका बैठकर पानी पीना है। अगर आप खड़े होकर पानी पीते हैं, तो पानी तेजी से पेट के निचले हिस्‍से में चला जाता है। खड़े होकर पानी पीने से ये पोषक तत्‍व शरीर को पर्याप्‍त मात्रा में नहीं मिल पाते हैं। साथ ही साथ पानी को एक बार गट-गट करके पीने की बजाए सिप-सिप कर धीरे-धीरे पीना चाहिए। इसका कारण यह है कि जब हम पानी पीते हैं, तो हमारी लार भी पानी में मिलकर अंदर जाती है। पानी को धीरे-धीरे पीने से पाचन तंत्र को मजबूत करने में मदद मिलती है।

    ​पर्याप्त मात्रा में पानी पीने के फायदे

    – कई बीमारियों से आप बच जाते हैं- पानी शरीर में विषाक्तता को कम करने में मदद करता है- पर्याप्त पानी का सेवन तनाव की स्थिति को कम करने में मदद करता है- पानी मस्तिष्क के कार्य में सुधार करके मूड को बेहतर बनाने में मदद करता है- पानी त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद करता है-फाइबर आहार के साथ अधिक पानी का सेवन, मल त्याग को बेहतर बनाने में मदद करता है

  • जानें, पुरुष किन जगहों को छूने से हो जाते हैं सेक्स के लिए उत्तेजित

    जानें, पुरुष किन जगहों को छूने से हो जाते हैं सेक्स के लिए उत्तेजित

    सेड्यूस करना सिर्फ लड़कों का काम ही नहीं बल्कि वे भी इसके हकदार होते हैं। उनकी की बॉडी में भी कुछ ऐसे जोन होते हैं जो उन्हें तुरंत उत्तेजित कर सकते हैं। इनमें काफी सारी नर्व एंडिंग्स होती हैं जो तुरंत उनका मूड बना सकती हैं। आपको बस वहां तक टच या किस से पहुंचने की जरूरत है। इसके बाद ऐसा स्टीमी सेशन शुरू हो सकता है जिसकी आपने कल्पना नहीं की होगी। यहां जानें कौन से हैं लड़कों को अराउज करने वाले ये शरीर के हिस्से…

    कान और इसके पीछे का हिस्सा

    लड़के और लड़कियों दोनों के लिए यह हिस्सा काफी प्लैजर देने वाला होता है। मूड बनाने के लिए उनके कान के पीछ आहिस्ता से किस करें। आप उनके कान में धीरे से कुछ सेक्सी सा बोलने के बाद प्यार से किस कर सकती हैं।

    नेक के पीछे का हिस्सा

    लड़कों की गर्दन का पिछला हिस्सा काफी सेंसिटिव होता है, यहां आप उन्हें वेट किस का सरप्राइज दें तो वे एकदम से आपके लिए क्रेजी हो जाएंगे। अगली बार से पहले शोल्डर पर हल्की मसाज दें फिर उनकी गर्दन के पिछले हिस्से पर ऐसे किस करें कि उन्हें आपकी सांसें महसूस हों।

    बैक टच

    आप चाहें तो उनके बट्स पर हल्के से हाथ मार सकती हैं या छूते हुए पीछे से हग कर लें। चाहें तो ऐसी जगह भी टच कर सकती हैं जहां उन्हें जरा भी उम्मीद न हो।

    निप्पल्स

    निप्पल टच आपका मूड बना सकता है तो क्यों न उन पर ट्राई किया जाए! अगर थोड़ी शैतानी करना चाहती हैं तो नटेला या चॉकले सॉस के साथ भी एक्सपेरिमेंट कर सकती हैं।

    जांघ के निचले हिस्से पर

    यह हिस्सा काफी इग्नोर किया जाता है। उनकी जांघ के निचले हिस्से को सहलाना काफी अच्छा असर कर सकता है। ऐसा करते वक्त थोड़ा प्यार जताएं और स्ट्रोक्स की स्पीड बदल दें।

    पैर

    अगर आपको पता न हो तो बता दें कि पैर और पैर की छोटी उंगली महिलाओं और पुरुषों दोनों को उत्तेजित करती है। आप उन्हें डिनर के बाद सरप्राइज फुट मसाज दे सकती हैं, खासतौर पर उनके पैर की उंगलियों पर फोकस रखें। ये काफी रोमांटिक फीलिंग होती है और अच्छी रात की सही शुरुआत। छोटी उंगली पर किस भी करके देखें, महिलाओं पर भी इसका जबरदस्त असर होता है।

  • लोग सोशल मीडिया की ले रहे मदद सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज के डायग्नोसिस में!

    लोग सोशल मीडिया की ले रहे मदद सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज के डायग्नोसिस में!

    लोगों का सोशल मीडिया में इंगेजमेंट इतना बढ़ता जा रहा है कि वे Reddit पर अजनबियों से सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज को डायग्नोज तक करने में मदद मांग रहे हैं। यह बात यूएस जर्नल ट्यूज्डे में छपी एक नई स्टडी में सामने आई है। इस प्रक्रिया को ‘क्राउड डायग्नोसिस’ का नाम दिया गया।

    यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया ने Reddit थ्रेड के 17000 पोस्ट देखे जो कि STD (सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज) पर ही थे। इसके बाद उन्होंने 500 पोस्ट्स के रैंडम सैंपल लिए। अट्ठावन फीसदी मेसेजज में खुलेआम क्राउड डायग्नोसिस की रिक्वेस्ट की गई थी वहीं 31 फीसदी ने लक्षणों की फोटो डाली थी।

    पांच में से एक रिक्वेस्ट ऐसी थी, जिसमें यूजर्स डॉक्टर्स से बात करने के बाद सेकंड ओपेनियन चाहते थे। इनमें एक ऐसा व्यक्ति भी शामिल था जो कि HIV पॉजिटिव था, लेकिन यह जानना चाहता था कि Reddit यूजर्स क्या सोचते हैं।

    STD पर पार्टनर से ऐसे करें बात

    • फर्स्ट टाइम सेक्स आपके अंदर जितना उत्साह लेकर आता है उतने ही सवाल भी। सेक्स आपके रिलेशनशिप का एक हिस्सा है और आपके रिश्ते को एक कदम आगे लेकर जाता है। हालांकि, फर्स्ट टाइम सेक्स के बाद इसे लेकर कई तरह के सवाल उठते हैं। क्या इससे आपकी सेहत को नुकसान पहुंचेगा, क्या सही है क्या नहीं जैसे कई सवाल आपके मन में चलते हैं। ऐसा ही एक अहम सवाल है कि क्या यह सेक्स सुरक्षित है। कहीं आपके पार्टनर को कोई सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज (STD) तो नहीं।

    • ऐसे में कई बार आप चाहते हैं कि आप दोनों इसकी जांच करवा लें। लेकिन इस बारे में बात करना आपको काफी अजीब लगता है। आपको कुछ टिप्स बताते हैं जिससे आप अपने पार्टनर को टेस्ट के लिए आसानी से मना सकते हैं।

    • ध्यान रहे कि इस बातचीत में आप भी एक हिस्सेदार हों। आपको अपने पार्टनर को टेस्ट के लिए निर्देश नहीं देना है बल्कि खुद भी इसमें शामिल होना है। आप उनसे यह कहें कि आप भी अपने बारे में श्योर नहीं है। अगर आपने पहले टेस्ट करा लिया है तो उन्हें बताएं कि आप स्वस्थ हैं और अब उन्हें भी इसके लिए श्योर होने में मदद करना चाहते हैं।

    • अपने लॉन्ग टाइम पार्टनर से इस बारे में बात करना थोड़ा आसान है फिर भी आप पहले से नहीं जान सकते हैं कि वह कैसे रिऐक्ट करेंगे। हो सकता है कि वह इसका जवाब स्मार्टली दें या उखड़ कर बात करें या फिर आपपर हंस दें। ऐसे में आपको तैयार रहना चाहिए। आपके पास सही लॉजिक होना चाहिए कि आप ऐसा क्यों चाहते हैं। उन्हें बताएं कि आजकल STD कितने कॉमन हैं और टेस्ट कराना एक सामान्य बात है। अपने लॉन्ग टाइम पार्टनर से इस बारे में बात करना थोड़ा आसान है फिर भी आप पहले से नहीं जान सकते हैं कि वह कैसे रिऐक्ट करेंगे। हो सकता है कि वह इसका जवाब स्मार्टली दें या उखड़ कर बात करें या फिर आपपर हंस दें। ऐसे में आपको तैयार रहना चाहिए। आपके पास सही लॉजिक होना चाहिए कि आप ऐसा क्यों चाहते हैं। उन्हें बताएं कि आजकल STD कितने कॉमन हैं और टेस्ट कराना एक सामान्य बात है।

    • लोग सोशल मीडिया की ले रहे मदद सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज के डायग्नोसिस में!

      इस तरह बात न करें जिससे लगे कि आप उन्हें दोष दे रहे हों। उनके लिए अपना सम्मान और फिक्र जताएं। उन्हें समझाएं कि अगर वे किसी बीमारी से पीड़ित हुए तो कम से कम इस टेस्ट से उन्हें पता तो चल जाएगा।

    8-7 फीसदी बार ऐसी रिक्वेस्ट को जवाब भी मिले और इनको पहला जवाब मिलने में औसतन वक्त 3 घंटे लगा और किसी-किसी को यह जवाब एक मिनट से भी कम वक्त में मिला था।

    यूसी सैन डिएगो के एपिडेमियॉलजिस्ट जॉन कहता हैं कि हर कोई हर वक्त डॉक्टर गूगल के बारे में बात करता रहता है। लेकिन सच है कि लोग ऑनलाइन सिर्फ इन्फॉर्मेशन ही सर्च नहीं करते बल्कि असली लोगों से इस बारे में इंटरैक्शन भी करना चाहते हैं।

  • BREAKUP OF RELATIONSHIP : कहीं ये कारण तो नहीं रिलेशनशिप में आ रही दरार का…

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    रोजाना के व्यस्त व तनाव से भरी दिनचर्या के वजह से आपके रिलेशनशिप में अगर काफी दिक्कतें आ रही हैं या फिर आपका रिलेशनशिप टूट गया है, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। दरअसल, कई बार ऐसा होता है कि नौकरी, स्वास्थ्य या वित्तीय समस्याओं के कारण आपके व्यक्तिगत जीवन की भी समस्या बढ़ जाती है।

    जिनके चलते पहली बार में आपको अपने अंदर छिपी गलतियां नजर नहीं आती, इस वजह से समय रहते आप उन्हें सुधार नहीं पाते हैं।

    आज हम आपको इसके बारे में ही बताएंगे। आइए आपको बताते हैं कि वे कौन से कारण हो सकते हैं जिनकी वजह से आपका रिलेशनशिप ब्रेकअप के परवान पर चढ़ सकता है।

    • अक्सर काफी लोग अपने पार्टनर को बिजी शेड्यूल की वजह से पर्याप्त टाइम नहीं दे पाते, लेकिन जब वो अपने किसी दोस्त या करीबी के साथ समय बांटने लगता है तो ये बात आपको चुभने लगती है। इसके बाद आप हर बात के लिए उन्हें काउंटर करने लगते हैं, जिससे जल्दी ही ब्रेकअप हो जाता है।

    • नई नौकरी, प्रमोशन या किसी दूसरी अच्छी खबर पर अगर आप अपने पार्टनर को अच्छा रिस्पॉन्स नहीं दे रहे हैं, तो समझ लीजिए आपका रिश्ता खतरे में है। ध्यान रखें कि पार्टनर की हर बात पर उन्हें सही प्रतिक्रिया देने से रिश्तों की डोर मजबूत होती है।

    • पहली डेट पर जब आप उनसे मिले थे तब आपका आई कॉन्टेक्ट बहुत जबरदस्त था, लेकिन धीरे-धीरे वो खत्म होने लगता है। आप उनसे नजरें मिलाकर बात करने की बजाए इधर-उधर देखकर बातें करते है। यह भी आपका रिश्ता खराब होने की एक निशानी है।

    • आपका पार्टनर आपकी हर एक्टिविटी पर नजर रखता है। अगर आप सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हुए भी उन्हें रिस्पॉन्स नहीं करते हैं तो ये आपके रिश्ते के लिए काफी खराब हो सकता है। ऐसे में आखिर में तंग आकर लोग रिश्ता खत्म कर लेना ही बेहतर समझते हैं।