Category: health

  • कुछ ऐसा असर करती है अलार्म की आवाज दिमाग पर

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    सुबह की नींद ज्यादातर लोगों को प्यारी होती है लेकिन उनके लिए उठना उतना ही मुश्किल होता है। इस नींद को तोड़ने के लिए अलार्म सेट करते हैं। आपने नोटिस किया होगा कि भले ही आप अलार्म में अपनी फेवरिट ट्यून लगा लें लेकिन यह आपको इरिटेट कर देती है। अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि आखिर जब हम अलार्म का साउंड सुनते हैं तो हमारे दिमाग पर इसका क्या असर होता है। उनकी इस रिसर्च से स्किट्सफ्रीनिया जैसे मनोरोगों का पता लगाने में भी सहायता मिलेगी। इस तरह की बीमारियों में मरीज कुछ आवाजों के लिए अजीब सा रिस्पॉन्स देते हैं।

    नेचर कम्युनिकेशंस में छपी स्टडी में सामने आया कि अलार्म जैसे कार हॉर्न या किसी के चिल्लाने की आवाज रिपीटिव साउंड फ्लक्चुएशंस से बने होते हैं जिनकी फ्रीक्वेंसी 40 और 80 हर्ट्ज होती है।

    यह साउंड कुछ लोगों को क्यों नहीं पसंद आते इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने लोगों को रिऐक्शंस नोट किए। उन्होंने पता लगाने की कोशिश की कि किस हद तक ये आवाजें लोगों को पसंद नहीं आतीं।इन आवाजों से उत्तेजित हुए दिमाग के हिस्सों का अध्ययन किया। उन्होंने हिस्सा लेने वाले लोगों से पूछा कि कब उन्हें साउंड अच्छा लग रहा है और कब बुरा और इसके लिए उन्होंने अलग-अलग फ्रीक्वेंसीज का साउंड सुनाया। हिस्सा लेने वालों के जवाब के आधार पर पता लगा कि बुरे लगने वाले साउंड की अपर लिमिट 130 हर्ट्ज है। इसके ऊपर सुना जाने वाला साउंड सिर्फ एक लगातार चलने वाली आवाज की तरह सुनाई देता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक 40 से 80 हर्ट्ज का साउंड लोगों से बर्दाश्त नहीं होता यही फ्रीक्वेंसी अलार्म, इंसानों और बच्चों के चिल्लाने की होती है।

    अलार्म में यही रिपीटीटिव फ्रीक्वेंसीज होती हैं जो दर्शाती हैं कि अटेंशन की जरूरत है। वैज्ञानिकों ने बताया कि 40 से 80 हर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी में दिमाग का वह हिस्सा ऐक्टिवेट नहीं होता जो सामान्य आवाज में होता है बल्कि ज्यादा अडवांस्ड हिस्सा ऐक्टिवेट हो जाता है। यह बात भी इंट्रेस्टिंग है कि अलार्म में काफी पहले से यह फ्रीक्वेंसी इस्तेमाल होती आ रही है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन फ्रीक्वेंसीज पर जरूर कुछ होता है औऱ कई बीमारियों जैसे अल्जाइमर्स, ऑटिजम और स्किट्सफ्रीनिया में दिमाग 40 हर्ट्ज पर अजीब रिस्पॉन्स देता है।

  • फिट रहने के लिए करिये Intermittent Exercise

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    अच्छी हेल्थ के लिए आपने इंटरमिटेंट फास्टिंग के फायदे के बारे में पढ़ा होगा। इंटरमिटेंट फास्टिंग में कुछ वक्त के गैप के बाद खाना खाया जाता है। फास्टिंग के साथ नया टर्म इंटरमिटेंट एक्सर्साइज भी चर्चा में है। इंटरमिटेंट एक्सर्साइज का यह मतलब नहीं कि आप पूरे दिन जिम में गुजार दें बल्कि पूरे दिन वर्कआउट इंटरमिटेंट एक्सर्साइज का जस्ट ऑपोजिट होता है।

    ऐसे वर्कआउट जो शुरू किए जाते हैं और फिर बंद कर दिए जाते हैं इनके बजाय इंटरमिटेंट फास्टिंग इस वक्त काफी ट्रेंड में है। इसमें हम अपने डेली रूटीन के साथ कुछ वर्कआउट करते जाते हैं जैसे- सुबह के वक्त कुछ कोर एक्सर्साइज, लंच के बाद छोटी सी वॉक और शाम को घर पर ही 10 मिनट का बॉडीवेट वर्कआउट। इतना करके ही आप फिट रह सकते हैं।

    बैठे रहना है खतरनाक
    जर्नल ऑफ द अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियॉलजी में जनवरी 2011 में छपी एक स्टडी के मुताबिक आप कितने भी फिजिकली ऐक्टिव हों, अगर आप टीवी या कंप्यूटर के सामने 2 घंटे भी बैठे रहते हैं तो आप अपनी हेल्थ गंभीर रूप से खराब कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हफ्ते में कुछ दिन आप भले ही जिम चले जाएं लेकिन दिन में ज्यादातर वक्त बैठे रहना आपकी हेल्थ के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है।

    इस लिहाज से देखा जाए तो इंटरमिटेंट एक्सर्साइज काफी आसान है और यह आपकी बैठे रहने वाले टाइम का पर्फेक्ट यूज है। यह उन लोगों के लिए बहुत सही है जिनका वजन बढ़ता जा रहा है और वे जिम जाना भी पसंद नहीं करते।

    टुकड़ों में एक्सर्साइज के हैं ज्यादा फायदे
    रिसर्च कहती है कि छोटे-छोटे हिस्सों में एक्सर्साइज करना ज्यादा बेहतर बजाय लंबे वक्त तक जिम में रहने के। खासतौर पर मोटे और आरामतलब लोगों के लिए। इसे करना भी आसान होता है।

    अगर जनरल एक्सर्साइज गाइडलाइन को देखें तो किसी भी इंसान को हफ्ते में 150 मिनट एक्सर्साइज करनी चाहिए। अगर आप इसे 5 दिन में बांटें तो हर दिन सिर्फ आधे घंटा होता है।

    जिन लोगों को एक साथ आधे घंटे का टाइम निकालने में मुश्किल होते है वे दिन में 3 बार 10 मिनट निकाल सकते हैं। आपको बस अपनी दिनभर की ऐक्टिविटीज के साथ कुछ न कुछ फिजिकल ऐक्टिविटी जोड़नी है और आप हेल्दी लाइफ की ओर कदम बढ़ा सकते हैं।

  • Dengue वायरस से बचने के लिए काम नहीं आ रहे सभी वैक्सीन, जाने कारण

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    डेंगू के लिए नई वैक्सीन बनाते वक्त एक नए दृष्टिकोण की खोज की गई है जिसके तहत अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि डेंगू वायरस म्यूटेशन यानी परिवर्तन के जरिए अपना शेप बदल लेता है और प्रोटीन का आवरण ओढ़ लेता है जिससे डेंगू वायरस, कई तरह के वैक्सीन और थेरपीज से बच जाता है। डेंगू वायरस DENV2, मच्छर के शरीर के तापमान 29 डिग्री सेल्सियस पर स्मूथ गोलाकार सतह पर जिंदा रहता और विकसित होता रहता है। लेकिन जब इंसान के शरीर के तापमान 37 डिग्री सेल्सियस पर आता है तो वह गोलाकर से बदलकर उबड़-खाबड़ सतह में बदल जाता है।

    डेंगू के वायरस में होने वाला स्ट्रक्चरल बदलाव

    शेप में चेंज करने की इस क्षमता की वजह से ही डेंगू का वायरस इंसानों के इम्यून सिस्टम से आसानी से बच जाता है। लिहाजा डेंगू के वायरस के इस मेकेनिज्म को समझना बेहद जरूरी है तभी एक बेहतर वैक्सीन और थेरपी को विकसित किया जा सकता है। PLOS पैथोजन्स नाम के जर्नल में प्रकाशित स्टडी में यह बात कही गई है। स्टडी के लीड ऑथर शि नी लिम कहते हैं, डेंगू के वायरस में होने वाले इस स्ट्रक्चरल बदलाव की वजह से वायरस के खिलाफ वैक्सीन और दूसरी चिकित्सा पद्धति बेअसर साबित होने लगती है।

    गलत इलाज से जानलेवा साबित हो सकता है डेंगू

    • डेंगू अपने पांव पसार चुका है। दिल्ली में अक्टूबर के 6 दिनों में ही अब तक 169 नए मामलों की पुष्टि हो चुकी है। डॉक्टरों का कहना है कि जिस तरह से आंकड़ों में तेजी आई उससे लगता है कि अभी डेंगू और फैलेगा। शुरुआत में सामान्य-सा लगने वाला डेंगू बुखार देरी या गलत इलाज से जानलेवा साबित हो सकता है। डेंगू बरसात के मौसम और उसके फौरन बाद के महीनों यानी जुलाई से अक्टूबर में सबसे ज्यादा फैलता है क्योंकि इस मौसम में मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां होती हैं। लिहाजा सबसे जरूरी है कि खुद को और परिवार के सदस्यों को मच्छरों के काटने से बचाया जाए। अगर किसी को डेंगू हो जाए तो घबराने की बजाए उचित इलाज और घरेलू नुस्खों के जरिए बीमारी को दूर किया जा सकता है…
    • एडीज इजिप्टी मच्छर के काटे जाने के करीब 3-5 दिनों के बाद मरीज में डेंगू बुखार के लक्षण दिखने लगते हैं। साधारण डेंगू बुखार के लक्षण- ठंड लगने के बाद अचानक तेज बुखार चढ़ना, सिर, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना, आंखों के पिछले हिस्से में दर्द होना, जो आंखों को दबाने या हिलाने से और बढ़ जाता है, बहुत ज्यादा कमजोरी लगना, भूख न लगना और जी मितलाना और मुंह का स्वाद खराब होना, गले में हल्का-सा दर्द होना, शरीर खासकर चेहरे, गर्दन और छाती पर लाल-गुलाबी रंग के रैशेज होना।

    • आयुर्वेद में गिलोय का बहुत महत्व है। 1 कप पानी में 1 चम्मच गिलोय का रस मिलाएं। अगर गिलोय की डंडी मिलती है तो 4 इंच की डंडी लें। उस बेल से लें, जो नीम के पेड़ पर चढ़ी हो। आप चाहें तो इसमें अदरक को मिलाकर पानी को उबालें और काढ़ा बनाएं और 5 दिन तक पिएं। आप चाहें तो इसमें थोड़ा-सा नमक मिलाकर दिन में 2 बार, सुबह नाश्ते के बाद और रात में डिनर से पहले लें।

    • पपीते के पत्ते का रस डेंगू फीवर के ड्यूरेशन को कम करता है, अस्पताल में मरीज के ठहराव को कम करता है, बॉडी से फ्लूइड लीक नहीं होने देता और वाइट ब्लड सेल्स (WBC) और प्लेटलेट्स की संख्या को बढ़ाता है। डेंगू का बुखार कन्फर्म होने के पहले दिन से ही पपीते के पत्ते का रस मरीज को दिया जा सकता है क्योंकि अभी तक इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं देखा गया है।

    • आयुर्वेदाचार्य सुशीला दहिया का कहना है कि ‘बकरी का दूध सुपाच्य होता है। आयुर्वेद की किताबों में यह बताया गया है कि बकरी का दूध डेंगू के बुखार से निकलने में काफी कारगर होता है।’

    • खाने में हल्दी का इस्तेमाल ज्यादा करें। सुबह आधा चम्मच हल्दी पानी के साथ या रात को आधा चम्मच हल्दी एक गिलास दूध या पानी के साथ लें। लेकिन अगर आपको- नजला, जुकाम या कफ आदि हो तो दूध न लें। तब आप हल्दी को पानी के साथ ले सकते हैं। ऐंटिऑक्सिडेंट्स से भरपूर हल्दी शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ाती है।

    • 8 से 10 तुलसी के पत्तों का रस शहद के साथ मिलाकर लें या तुलसी के 10 पत्तों को पौने गिलास पानी में उबालें। इसमें 2 काली मिर्च और अदरक भी डाल सकती हैं। जब यह पानी आधा रह जाए तब गैस बंद कर दें और तुलसी के काढ़े को सुबह-शाम पिएं। शरीर की इम्यूनिटी स्ट्रॉन्ग होगी और बीमारी दूर।(नोट: डॉक्टर की सलाह के बिना इन घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल अपने मन से न करें)

    मच्छर के रूप बदलने पर भी असरदार साबित हो सके वैक्सीन
    अनुसंधानकर्ताओं की टीम ने डेंगू के मरीजों से लिए गए DENV2 के 4 स्ट्रेन्स की भी जांच की और पाया लैबोरेट्री में अडाप्ट किए गए वायरस की तुलना में ज्यादातर क्लिनिकल स्ट्रेन्स ने 37 डिग्री सेल्सियस पर भी स्मूथ सतह का स्ट्रक्चर ही बनाए रखा। लेकिन बुखार के तापमान 40 डिग्री पर पहुंचते ही इन डेंगू वायरस स्ट्रेन्स का रूप बदल गया और वे उबड़-खाबड़ सतह में चेंज हो गए। लिहाजा अगर वैक्सीन के जरिए बीमारी को रोकने की कोशिश की जा रही है तो मरीजों को ऐसी वैक्सीन दिए जाने की जरूरत है जो स्मूथ सतह के वायरस के खिलाफ भी असरदार साबित हो सके।

  • सीरियल्स से बेहतर है पिज्जा नाश्ता के लिए, स्वाद के साथ है सेहत भी

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    सुबह का नाश्ता काफी सोच-समझकर करना चाहिए। यह आपको पूरे दिन के लिए एनर्जी देता है इसके साथ रात में हुई न्यूट्रिशन की कमी को भी पूरा करता है। ब्रेकफस्ट के लिए एक्सपर्ट्स कम ऑइली और ज्याद न्यूट्रिशस नाश्ता सजेस्ट करते हैं जैसे इडली, पोहा, सीरियल्स वगैरह। वहीं हाल ही में एक खबर सामने आई है जिसमें अमेरिकन डायटीशन का दावा है कि नाश्ते में सीरियल्स से ज्यादा पिज्जा बेहतर है। जानें क्या है पूरा मामला…

    क्या है डायटीशन का दावा

    एक अमेरिकन डायटीशन का दावा है कि ब्रेकफस्ट में पिज्जा खाना सीरियल्स (अनाज) खाने से बेहतर ऑप्शन है। कई लोग सुबह के वक्त पिज्जा हैंगओवर उतारने के लिए या रात में बचे खाने को ठिकाने लगाने के चक्कर में पिज्जा खा लेते हैं। लेकिन डायटीशन चेल्सी के मुताबिक यह दिन की शुरुआत करने का बेहतरीन तरीका है।

    इसलिए बेहतर है पिज्जा

    न्यूयॉर्क बेस्ड चेल्सी ने एक न्यूज पोर्टल को बताया, दूसरे शुगर से भरे सीरियल्स की अपेक्षा पिज्जा ज्यादा बैलेंस्ड ब्रेकफस्ट है। वह बताती हैं कि प्लेन चीज पिज्जा की एक स्लाइस में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और फैट का बैलेंस होता है।

    सीरियल्स में शुगर होती है ज्यादा

    वह बताती हैं, चीनी वाले सीरियल्स और लो फैट मिल्क में शुगर ज्यादा होती है औऱ कार्बोहाइड्रेट काफी हेवी होता है। हालांकि वह यह नहीं कहती हैं कि रोजाना सुबह की कॉफी के साथ पिज्जा खाया जाए।

    सोच-समझकर करें नाश्ता

    चेल्सी का कहना है कि अगर आपको सीरियल और पिज्जा में से किसी एक को चुनना है तो पिज्जा बेहतर ऑप्शन हो सकता है। इसके पीछे उनका तर्क है कि नाश्ते में कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, हेल्दी फैट्स और प्रोटीन का हेल्दी कॉम्बिनेशन होना चाहिए क्योंकि यह दिन का काफी अहम भोजन होता है।

    ये भी हो सकता है नाश्ते का विकल्प
    आप होल ग्रेन टोस्ट पर अंडा और पालक डालकर भी खा सकते हैं या फिर यॉगर्ट में फ्रूट्स, नट्स और सीड्स मिलाकर। अगर आप सीरियल्स ले रहे हैं तो शुगर कॉन्टेंट का ध्यान रखें, इससे आपको गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।

    लें बैलेंस्ड नाश्ता

    डायटीशन चेल्सी के मुताबिक रात का बच्चा खाना अगर सब्जियों से भरपूर और बैलेंस्ड है तो यह भी सुबह के नाश्ते का अच्छा विकल्प हो सकता है।

  • Style Etiquette: स्लीव्स फोल्ड करने का सही तरीका लगा देगा आपके लुक्क में चार चाँद

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    शर्ट की आस्तीनें मोड़ना एक नॉर्मल काम लगता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि आप स्लीव्स कैसे मोड़ते हैं यह आपके आउटफिट के लुक, इमेज पर काफी असर डालता है। अब ऐसा करने से पहले जान लें ये बातें…

    फोल्डेड स्लीव्स देती हैं कैजुअल लुक

    फोल्ड की हुई आस्तीनें आपके फॉर्मल आउटफिट का लुक बदलकर कैजुअल कर देती हैं और आपकी बाहें भी आकर्षक हो जाती हैं। आस्तीनें मोड़ने के कई तरीके हैं और आपको अपने ऊपर सूट करने वाला सही तरीका पता करने के लिए सबको ट्राई कर लेना चाहिए। आस्तीन मोड़ने से पहले सबसे पहले इसके बटन खोल लें।

    इसे बदलेगा स्टाइल

    आपको आस्तीन कोहनी से ऊपर तक मोड़नी है या नीचे यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका प्लान क्या है। अगर आप कुछ करने जा रहे है तो इसे ऊपर तक मोड़ सकते है। अगर रिलैक्सेशन के मूड में हैं तो कोहनी के नीचे तक। अगर ज्यादा स्टायलिश दिखना चाहते हैं तो इतना ऊपर तक मोड़ें कि आपकी आर्म दिखे जैसे आप जिम जा रहे हों।

    क्लीन लुक

    क्लीन लुक के लिए दोनों आस्तीन को बराबरी पर थोड़ा-थोड़ा मोड़ लें। आपकी आस्तीनों की लंबाई कितनी है यह भी बड़ा फैक्टर है।

    टाई के साथ रखें यह बात ध्यान

    अगर स्टाइल एटिकेट रूल की बात करें तो मुड़ी हुआ आस्तीनें और टाई एक साथ नहीं पहने जाते क्योंकि दोनों कॉन्ट्रास्टिंग स्टाइल्स हैं- कैजुअल और फॉर्मल। अगर आप फिर भी ऐसा करना चाहते हैं तो टाई ढीली कर लें।

    हिट एक्सपेरिमेंट
    सूट और स्पोर्ट्स जैकेट को सामान्य तौर पर नहीं रोल किया जाता लेकिन आजकल सब लुक पर डिपेंड करता है। फॉर्मल सूट की आस्तीन कभी नहीं फोल्ड करनी चाहिए लेकिन टीशर्ट के साथ है तो एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं।

  • दिखना है सिंपल और स्टाइलिश तो ट्राई करे आलिया का nude makeup look

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    हाल ही में हुए एक अवॉर्ड शो के दौरान आलिया भट्ट का रेड कार्पेट लुक इंटरनेट पर छाया हुआ है। आलिया ने न्यूड गाउन पहना था और इसके साथ उनका ब्रॉन्ज टच के साथ न्यूड मेकअप लुक बेहद खूबसूरत दिख रहा था। अगर आप भी ऐसा लुक पाना चाहती हैं तो ये स्टेप्स फॉलो करें…

    -चेहरे पर हाइड्रेटिंग मास्क लगाएं और इसे 15 मिनट बाद हटा दें।

    -इसके बाद इस पर गोल्ड इन्फ्यूज्ड फेस सीरम लगाएं।
    -होठों पर लिप बाम लगाएं।
    -स्किन पर फेस प्राइमर लगाएं।
    -हाइलाइटर की कुछ बूंदे चेहरे और गर्दन पर लगाएं।
    -अब चेहरे और गर्दन पर हाइड्रेटिंग फाउंडेशन लगाएं।

    -अब कंसीलर से दाग-धब्बे छिपा लें।
    -आइब्रो पेंसिल से आइब्रोज को शेप दें।
    -रोज और गोल्ड पाउडर हाइलाइटर से चीकबोन्स, टेंपल्स, ब्रो बोन और नोज ब्रिच को हाइलाइट करें।
    -अब पलकों पर मटैलिक सिल्वर आइशैडो लगाएं।
    -अपर और लोअर आईलैशेज पर मस्कारा लगाएं।
    -होठों पर लाइट कोरल कलर की लिपस्टिक लगाएं।
    -अब सेटिंग स्प्रे से मेकअप सेट कर लें।

  • सांस लेने का सही तरीका कर सकता है तनाव को दूर, जानें कैसे

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    आजकल की जिंदगी में बड़ों से लेकर बच्चे तक तनाव झेल रहे हैं। तनाव से निपटने में योग काफी मददगार साबित होता है। योग के जरिए कैसे तनाव कम कर सकते हैं, बता रही हैं प्रियंका सिंह….

    हमारे लिए सबसे जरूरी है सांस। सांस बंद तो जिंदगी खत्म। दरअसल, हमारे शरीर के सेल्स को काम करने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है जो सांस के जरिए हमें मिलती है। यह ऑक्सीजन शरीर में जाकर कार्बन डाइऑक्साइड में बदल जाती है और इस कार्बन डाइऑक्साइड का थोड़ा भी हिस्सा हमारे शरीर में रहे तो हमारे सेल्स को नुकसान होता है। इसलिए सही मात्रा में ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइऑक्सइड निकालने के लिए सही तरीके से सांस लेना जरूरी है।

    सांस लेने की क्षमता का 70-75 फीसदी जरूर यूज करें
    हम लोग आमतौर पर अपनी सांस लेने की क्षमता का 15-20 फीसदी तक ही इस्तेमाल करते हैं जबकि हमें इसका 70-75 फीसदी तक इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। हम तेज-तेज सांस लेते हैं तो हार्ट को भी ज्यादा काम करना पड़ता है। योग गुरु अरुण के मुताबिक सांस लेने का सही फॉर्म्युला है SSLD यानी Smooth, Slow, Long और Deep यानी गहरी, लंबी और धीमी सांस लेना। हम लोग एक मिनट में करीब 15-17 बार सांस लेते हैं। जो जीव जितना कम यानी लंबी और गहरी सांस लेता है, वह उतना लंबा जीवन जीता है। सही तरीके से सांस लेना दिल और फेफड़ों के लिए अच्छा है। इससे ब्लड प्रेशर कम होता है। सही तरीके से सांस लेने से शरीर को बेहतर ऑक्सीजन मिलती है। इससे कॉन्संट्रेशन और मेमरी अच्छी होती है। साथ ही, गुस्सा और एंग्जाइटी भी कम होने लगती है। यहां तक कि इससे एंडॉर्फिन हॉर्मोंस निकलता है, जो तनाव कम करता है।

    गहरी सांस (डीप ब्रीदिंग)
    रोजाना दिन में दो बार 5-10 मिनट के लिए डीप ब्रीदिंग करें यानी गहरी सांस लें। इस दौरान आराम से बैठ जाएं और आराम से गहरी-गहरी सांस लें। आप ऑफिस में सीट पर बैठकर भी कर सकते हैं। इससे हमारे शरीर में डोपामाइन हॉर्मोन निकलता है जो हमारे नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है। यह हॉर्मोन इंसान को खुश रखने में मदद करता है।

    अनुलोम-विलोम प्राणायाम
    इस प्राणायाम से तनाव और एंग्जाइटी कम होती है। योगी अमृत राज के मुताबिक यह प्राणायाम मन को शांत कर कॉन्संट्रेशन बढ़ाता है। साथ ही खून का दौरा भी सही रखता है। यह दिल और फेफड़ों को दुरुस्त रखता है। इसके लिए पहले सुखासन में सीधे बैठ जाएं और आंखें बंद कर लें। बाएं हाथ की हथेली को ज्ञान मुद्रा में बाएं घुटने पर रख लें। दाएं हाथ की अनामिका और सबसे छोटी उंगली को बाएं नॉस्ट्रिल पर रखें और दाएं नॉस्ट्रिल को अंगूठे से बंद कर लें। अब बाएं नॉस्ट्रिल से सांस भरें और फिर अनामिका और सबसे छोटी उंगली को मिलाकर बंद कर लें। फौरन दाएं नॉस्ट्रिल से अंगूठे को हटाकर सांस बाहर निकाल दें। ऐसा ही दाईं तरफ से भी करें। इसे कुल 5 राउंड दोहराएं।

    भ्रामरी प्राणायाम
    यह तनाव कम करता है। गुस्से एवं बेचैनी को भी कंट्रोल करता है। इसे करने के लिए पलथी मारकर सुखासन में बैठ जाएं और आंखें बंद कर लें। दोनों हाथों को चेहरे पर ले जाकर दोनों अंगूठों से कान बंद कर लें। तर्जनी उंगली आंखों के ऊपर रखें, मध्यमा उंगली नाक के पास, अनामिका होंठ के ऊपर और सबसे छोटी उंगली होंठ के नीचे रहेगी। फिर नाक से गहरा और लंबा सांस लें। फिर सांस को भंवरे के गूंजने की आवाज करते हुए बाहर निकालें। ऐसे 5 राउंड कर लें।

    ओम् का उच्चारण
    सीधे बैठ जाएं और मुंह से ओम् की आवाज निकालें। चाहें तो अ… ओ… म… तीनों को अलग-अलग करके भी कर सकते हैं यानी पहले अ.. फिर ओ.. फिर म… और आखिर में ओम् की आवाज के साथ ओम् का जाप करें। जितना लंबा खींच सकें, करें। 10 बार कर लें। यह मन को शांत करने में बहुत कारगर है।

    मेडिटेशन करें
    रोजाना 15 मिनट मेडिटेशन करने से तनाव से मुक्ति मिलती है। माइंडफुल मेडिटिशन करना आसान भी है और असरदार भी। यह आपमें मौजूदा लम्हे को जीने और स्वीकार करने की क्षमता देता है। सुखासन में सीधे बैठें और दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा में घुटनों पर रख लें। आंखें बंद कर लें। और अपनी सांसों पर पूरा ध्यान लगाएं। शरीर के अंदर जाते सांस और बाहर निकालते हुए दोनों बार सांस पर ध्यान दें। अपने आसपास की चीजों को महसूस करें। उन्हें स्वीकार करें।

    शवासन करें
    आसन और प्राणायाम के बाद शवासन जरूर करें। आराम से जमीन पर लेट जाएं और आंखें बंद कर लें। शरीर को ढीला छोड़ दें। फिर एक-एक कर बारी-बारी से शरीर के हर अंग पर ध्यान लगाएं। उस अंग को महसूस करें। उसे लाड़ करें। कुल 5 मिनट करें।

    कुदरत के पास रहें
    प्रकृति के 5 तत्वों के करीब रहने से तनाव कम होता है और मन प्रसन्न रहता है। आकाश, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी के करीब रहें। घास पर नंगे पैर चलें। दोनों हाथ फैलाकर आसमान की ओर देखें। घर से बाहर निकलकर ताजी हवा लें। सूरज की रोशनी में कुछ वक्त जरूर बिताएं और साफ पानी पिएं।

    प्रार्थना करें
    ईश्वर की प्रार्थना जरूर करें। इस प्रार्थना में आपको ईश्वर के साथ अपने माता-पिता का आभार व्यक्त करना है। उन्होंने जो भी आपको दिया, आपके लिए किया, उसका शुक्रिया अदा करना है। ईश्वर से खुद को सदबुद्धि देने, अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना की प्रार्थना करें और सही दिशा दिखाने का आशीर्वाद लें।

  • खतरनाक है सेक्स से जुड़ी ये सलाह, भूल से भी न करें फॉलो

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    कई बार हमारी सेक्स लाइफ बेहद बोरिंग हो जाती है और उसे फिर से स्पाइसी और रोमांचक बनाने के लिए हम अपने दोस्त, इरॉटिक मैग्जीन या इंटरनेट पर भरोसा करके उनके द्वारा जाकर दी गई सेक्स से जुड़ी सलाह को मान लेते हैं। हैं ना? लेकिन इस फ्री की सलाह, सेक्स ट्रिक्स और सेक्स टिप्स पर आंख बंद करके भरोसा करना किसी के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है। लिहाजा इन्हें भूल से भी फॉलो न करें….

    ​सेक्स और फूड को मिक्स करना

    पिघली हुई चॉकलेट, विप्ड क्रीम, फ्रूट जूस जैसी चीजों को पार्टनर के सेंसेटिव और कामोत्तेजक बॉडी पार्ट्स पर डालना और फिर उसे चाटना… ये सुनने में भले ही इरॉटिक और बेहद सेक्सी लगे लेकिन यकीन मानिए सेक्स और खाने-पीने की चीजों को भूल से भी मिक्स नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से न इंफेक्शन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

    ​पार्टनर को नोंचना और काटना

    बहुत सी इरॉटिक फिल्मों में आपने देखा होगा कि जब बात सेक्स की आती है तो उसे और ज्यादा सेक्सी और स्टीमी बनाने के लिए फीमेल पार्टनर, मेल पार्टनर को अपने लंबे-लंबे नाखूनों से नोंचती हुई दिखती है। हालांकि इस तरह पार्टनर को नोंचने और काटने से पार्टनर की उत्तेजना बढ़ेगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। हालांकि आपकी यह हरकत पार्टनर को तकलीफ जरूर पहुंचा सकती है जिससे उनकी सेक्स करने की इच्छा खत्म हो सकती है।

    ​कार में सेक्स करना

    भले ही पॉर्न फिल्म्स या हॉलिवुड फिल्मों में कार सेक्स को बेहद प्लेजरेबल और इंजॉयबेल दिखाया जाता हो लेकिन जब तक की आप बहुत ज्यादा फ्लेक्सिबल और ऐक्रोबैटिक स्किल्स वाले न हों, तब तक कार में सेक्स करना रिस्की हो सकता है और आप इसे इंजॉय भी नहीं कर पाएंगे। इतना ही नहीं, चलती कार में सेक्स करना तो बेहद रिस्की भी हो सकता है। लिहाजा जरूरी सावधानियां बरतें।

    ​सेक्स के दौरान डर्टी टॉक

    आप सोच रहे होंगे कि सेक्स के दौरान पार्टनर संग डर्टी टॉक करना बेहद आसान है और इस सेक्स टिप को आप बिना किसी तरह की टेंशन के आसानी से फॉलो कर सकते हैं। तो आपको बता दें कि डर्टी टॉक भी एक तरह की स्किल है जिसमें एक्सपर्ट बनने की जरूरत होती है। हो सकता है आप पार्टनर से डर्टी टॉक के नाम पर कुछ ऐसा कह दें जिससे उन्हें इरॉटिक फील होने की बजाए घिन आने लगे। लिहाजा डर्टी टॉक में कंफर्टेबल बनने के लिए बहुत प्रैक्टिस की जरूरत है।

  • हेल्थ के जादूगर सुपरसीड्स

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    कुछ बीज ऐसे होते हैं जो हमारी सेहत के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। ये न केवल सेहत को दुरुस्त रखते हैं बल्कि विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में भी मदद करते हैं। इन बीजों को आप रोज के खाने में आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। आइए, आपको बताते हैं ऐसे ही सुपर सीड्स के बारे में।

    सूजरमुखी के बीज

    सूरजमुखी के बीज शरीर की इम्यूनिटी को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। ये विटमिन-ई से भरपूर होते हैं। इसके बीज वर्कआउट के कारण होने वाले ऑक्सिडेटिव तनाव को भी कम करते हैं।

    तिल के बीज

    तिल के बीज कैल्शियम के अच्छे स्त्रोत के रूप में जाने जाते हैं। इससे हड्डियों को भी मजबूती मिलती है। इतना ही नहीं तिल के बीज मांसपेशियों के सुचारू रूप से काम करने के लिए भी बेहद जरूरी हैं। इससे शरीर को भी ऊर्जा मिलती है।

    कद्दू

    कद्दू के बीज में मैग्नीशियम, जिंक और पौधे से मिलने वाला ओमेगा-3 फैटी ऐसिड अच्छी मात्रा में पाया जाता है। कद्दू के बीज टाइप 2 डायबीटीज से बचाने में भी मदद करते हैं और दिल, लीवर के स्वास्थ्य के लिए अच्छे होते हैं। यह अनिद्रा की समस्या को रोकने का भी काम करते हैं।

    अलसी

    अलसी के बीज फाइबर का एक समृद्ध स्रोत हैं। इनमें बहुत ज्यादा मात्रा में घुलनशील फाइबर होता है, जो पाचन की प्रक्रिया में मदद करता है। अलसी के बीज भूख और ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में भी मदद करते हैं।

    चिया सीड्स
    चिया बीज कार्बोहाइड्रेट और फाइबर से समृद्ध होते हैं। ये शरीर के ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इससे पाचन भी बेहतर रहता है। चिया बीज प्रोटीन और ओमेगा-3 फैटी ऐसिड के अच्छे स्रोत हैं। चिया बीज में ऐंटीऑक्सिडेंट होते हैं जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत में मदद करते हैं।

  • हड्डियां को करना है मजबूत तो अपनाये ये टिप्स, होगा फायदा

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    एक रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिसर्च के मुताबिक भारत में करीब 70 प्रतिशत लोग विटमिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। विटमिन डी की कमी होने पर हड्डियों का कमजोर होना और हड्डियों से संबंधित बीमारियां, इम्यून सिस्टम कमजोर होना और डिप्रेशन की स्थिति शामिल है। ऐसे में अगर आप जिम में जाकर पसीना भी बहा रहे हैं, तो कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए आपको अपनी डायट में कुछ ऐसी चीजों को शामिल करना चाहिए जिन्हें पीने से आपके शरीर को भरपूर विटमिन डी मिलेगा। हालांकि इस मामले में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

    ​ऑरेंज जूस

    ऑरेंज जूस विटमिन सी रिच तो होता ही है साथ ही में यह विटमिन डी की कमी को दूर करने में भी मदद करता है। पैक्ड जूस की जगह घर पर ही इस फ्रूट का जूस निकालें और रोज पिएं, इससे आपको फायदा होगा।

    ​गाय का दूध

    गाय का दूध विटमिन डी का रिच सोर्स है। हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो लो फैट मिल्क की जगह लोगों को फुल क्रीम मिल्क पीना चाहिए जिसमें ज्यादा विटमिन डी और कैल्शियम होता है।

    दही का करें सेवन

    दूध से बनने वाला दही भी विटमिन डी रिच होता है। रोज-रोज अगर दही न खाया जा सके तो इसकी लस्सी या छाछ बनाई जा सकती है जो टेस्टी तो होगी ही साथ ही में दही के पूरे फायदे भी आपको मिलेंगे।

    ​सोया मिल्क

    सोया मिल्क में भी गाय के दूध की तरह विटमिन डी की भरपूर मात्रा होती है। इस दूध को चाहे तो आप यूं ही पी सकते हैं या फिर डॉक्टर की सलाह से इसमें ऐसा फ्लेवर पाउडर मिला सकते हैं जिसमें विटमिन डी हो।