Category: health

  • बच्चे की शैतानियां न करें नजरअंदाज, बच्चे के व्यवहार पर दें ध्यान

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    शैतान बच्चे और उद्दंड बच्चे के बीच एक बारीक-सी रेखा होती है। आपका शैतान बच्चा इस रेखा को पार न करे, इसके लिए आपका सतर्क रहना जरूरी है, बता रही हैं स्वाति गौड़

    आठ साल का अनय शुरू से ही बहुत चंचल बच्चा था और हमेशा किसी न किसी शरारत में लगा रहता था। बड़े होने के साथ-साथ उसकी यही शरारतें, बदमाशी में तब्दील होने लगीं। उसे दूसरों पर रौब जमाना अच्छा लगता और धीरे-धीरे यह उसकी आदत बन गयी। शुरुआत में उसके माता-पिता ने बचपना समझकर नजरअंदाज करने की कोशिश की, लेकिन जब आये दिन स्कूल और पड़ोसियों से अनय की शिकायतें मिलने लगीं तो पेरेंट्स चिंतित होने लगे। क्या अपने बच्चे को लेकर आपके साथ भी कुछ ऐसा घटा है?
    दरअसल, गुस्सा आना मानव का एक स्वाभाविक भाव है। लेकिन कुछ बच्चे अपने इस भाव पर बिल्कुल काबू नहीं रख पाते और जरा-जरा सी बात पर अपनी नाराजगी बहुत कठोर ढंग से जाहिर करने लगते हैं। ऐसे बच्चे अपने से छोटे या अपने से कमजोर बच्चों या लोगों को चोट पहुंचाकर या उन्हें गलत शब्द बोलकर खुशी महसूस करने लगते हैं। पर बच्चे के इस व्यवहार का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि वह बच्चा अच्छा नहीं है। हो सकता है कि वह बच्चा किसी तरह की मानसिक परेशानी से जूझ रहा हो और आपके सामने सही ढंग से अपनी बात नहीं रख पा रहा हो। ऐसी स्थिति में वह अपनी सारी झल्लाहट गुस्से के रूप में दूसरों पर निकालने लगता है। बच्चे को सजा देने या सारा दोष उस पर थोप देने से पहले यह बहुत जरूरी है कि उसके ऐसे व्यवहार के संभावित कारणों के बारे में पता लगाया जाए।

    कहीं सारा प्यार छोटे के लिए तो नहीं
    यूं तो हर माता-पिता के लिए अपने सारे बच्चे बराबर होते हैं, लेकिन कभी-कभी अनजाने में किसी एक बच्चे के प्रति उनका प्यार कुछ ज्यादा ही उमड़ने लगता है। बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं और जब उन्हें लगता है कि उन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, तो वे चिड़चिड़े हो जाते हैं और अपना सारा गुस्सा घर में तोड़-फोड़ कर या छोटे भाई-बहनों के साथ मार-पिटाई करके निकालने लगते हैं।

    कहीं घर का माहौल तो खराब नहीं?
    यदि घर पर हमेशा तनाव का माहौल रहता है, तो उससे बच्चे के अंदर एक प्रकार की चिड़चिड़ाहट-सी पैदा होने लगती है। जिन घरों में हमेशा छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं, उन घरों में बच्चे खुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। नतीजतन, ऐसे घरों के बच्चे खुद को मोबाइल या टीवी में व्यस्त कर लेते हैं। और कई शोध इस बात को साबित कर चुके हैं कि जरूरत से ज्यादा टीवी और इंटरनेट का इस्तेमाल बच्चों को उग्र बना देता है।

    क्या आप अपने बच्चे की दोस्त हैं?
    अनुशासन एक बहुत अच्छी चीज है, लेकिन जो माता-पिता अपने बच्चों के साथ हमेशा ही कड़ाई से पेश आते हैं, वे अपने बच्चों के कभी दोस्त नहीं बन पाते। जरूरत से ज्यादा सख्ती अभिभावक को बच्चे से दूर कर देती है। ऐसे बच्चे अपनी कोई समस्या पेरेंट्स के साथ बांटना पसंद नहीं करते, बल्कि वे जान-बूझकर अपने पेरेंट्स के सामने बेहद शांत रहने की कोशिश करने लगते हैं। ऐसे बच्चे अकसर घर से बाहर निकलते ही दूसरे बच्चों पर अपना रौब दिखाने लगते हैं।

    गुस्से का स्रोत आप तो नहीं?
    बच्चे माता-पिता को अपने आदर्श के रूप में देखते हैं और वे वही सब सीखते हैं, जो आपको करते देखते हैं। फर्ज कीजिये, आप उसे दूसरों का सम्मान करने और प्यार करने की शिक्षा हमेशा देती हैं, लेकिन खुद हमेशा दूसरों से लड़ने के मूड में रहती हैं। तो बहुत हद तक संभव है कि वह भी आपको देख-देखकर हमेशा झल्लाहट से भरा रहने लगेगा और बात-बात पर दूसरों से लड़ाई-झगड़ा करने लगेगा।

    बातचीत किसी भी समस्या का पहला हल होता है। अपने बच्चे की बातों में पूरी दिलचस्पी लें और उसके स्कूल तथा दोस्तों के बारे में नियमित रूप से बात करें।

    किसी भी कारण से यदि बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करने लगता है तो उसके अंदर एक प्रकार का डर और अकेलापन भर जाता है, जिस पर काबू पाने के लिए वह दूसरों को सताने लगता है। बच्चे को हमेशा यह विश्वास दिलाएं कि हर परेशानी में आप उसके साथ हैं और आपके साथ वह पूरी तरह से सुरक्षित है।

    जब किसी के साथ वह बुरा व्यवहार करे तो सबके सामने उसे कतई न डांटें, बल्कि अकेले में उसे प्यार से समझाएं।

    जब कभी बच्चा किसी के साथ अच्छी तरह से पेश आये तो उसकी तारीफ जरूर करें और परिवार के अन्य सदस्यों को भी उसके इस अच्छे व्यवहार के बारे में बताएं।

    अंतरमुखी बच्चे अकसर बाहर निकलकर उत्तेजित हो जाते हैं, क्योंकि भीड़-भाड़ वाला माहौल उन्हें रास नहीं आता। शुरू से ही अपने बच्चे के अंदर बाकी बच्चों के साथ मिल-जुलकर रहने की आदत डालें।

    यदि बार-बार प्यार से समझाने पर भी बच्चा अपने व्यवहार को बदल नहीं पा रहा, तो उसके साथ थोड़ी सख्ती से पेश आएं और उसे बताएं कि उसका यह व्यवहार आपको तकलीफ पहुंचा रहा है। कभी-कभी बातचीत द्वारा भी किसी समस्या का हल नहीं निकल पाता। ऐसे में पेशेवर बाल मनोचिकित्सक या काउंसलर से मदद लेने में कतई न हिचकें। वो बातचीत के माध्यम से बच्चे की समस्या की जड़ को पहचानने में आपकी मदद करेंगे। याद रखिये कि आपके बच्चे को कोई मानसिक बीमारी नहीं है। वह सिर्फ अपने व्यवहार से उग्र है, जिसे सामान्य बनाने में विशेषज्ञ आपकी बहुत अच्छे से मदद कर सकते हैं।

     

  • आसान हुआ उपचार गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर का

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    लोगों को अनियमित जीवनशैली से होने वाले रोगों जैसे डायबिटीज, हाई ब्लडप्रेशर और हार्ट फेल जैसी बीमारियों के बारे में पता होगा, लेकिन बहुत से लोगों ने गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर (पेट की आंतों या पेट के कैंसर) के बारे में नहीं सुना होगा। नई तकनीकों से इसका उपचार आसान हो गया है।  गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल यानी जीआई कैंसर भारत में चौथा सबसे अधिक लोगों को होने वाला कैंसर बन गया है। यह महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज्यादा प्रभावित करता है। यह साइलेंट किलर के रूप में धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और शरीर के आंतरिक अंगों जैसे बड़ी आंत, मलाशय, भोजन नली, पेट, गुर्दे, पित्ताशय की थैली, पैनक्रियाज या पाचक ग्रंथि, छोटी आंत, अपेंडिक्स और गुदा को प्रभावित करता है। इससे पीड़ित लोगों को शुरू में पेट दर्द, अपच रहना, मलोत्सर्ग की आदत में गड़बड़ी आदि का सामना करना पड़ता है। इन्हें नजरअंदाज करने से स्थिति गंभीर हो जाती है।

    जागरूकता है जरूरी

    सबसे बड़ी जरूरत लोगों में इसके प्रति जागरूकता उत्पन्न करना और उन्हें स्वस्थ पाचन तंत्र के महत्व को समझाना है। अभी जीआई कैंसर के संबंध में लोगों में जागरूकता की कमी है। मरीजों की देखभाल का समूचा ईकोसिस्टम बनाने की जरूरत है। इस ईकोसिस्टम के तहत मरीजों की जल्द से जल्द जांच, आधुनिक तरीकों से मरीजों का इलाज और उनके दर्द को कम करने वाली बेहतर देखभाल को प्रोत्साहन देना चाहिए।

    जीवनशैली में बदलाव जरूरी

    रोग के प्रारंभिक लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए डॉक्टर जीवनशैली में बदलाव की सलाह देते हैं। इसके तहत पोषक आहार लेना, व्यायाम करना आदि शामिल हैं। इसमें मरीजों की समय से जांच को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    समय पर जांच से सही उपचार

    एक मरीज के तौर पर लक्षणों को गंभीरता से लेना चाहिए और गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट को समय पर दिखाना चाहिए। जांच सुविधाओं में फीकल अकल्ट ब्लड टेस्ट, नॉन-इनवेसिव विधियां जैसे पेट की अल्ट्रासोनोग्राफी, सीटी स्कैन और एमआरआई शामिल हैं। इससे उपचार काफी आसान हो जाता है।

    जांच के नए-नए तरीके 

    ये जीआई कैंसर रोग की स्थिति और लक्षणों के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। इनमें अंतर करने के लिए और कैंसर के खास प्रकार का पता लगाने के लिए मरीजों की जल्द से जल्द जांच करना बेहद आवश्यक है। कोलनगियोस्कोपी की मदद से डॉक्टर पित्ताशय की थैली को देख सकते हैं। इससे उन्हें खास तरह के कैंसर का पता लगाने में मदद मिलती है। इससे उपचार काफी आसान हो जाता है।

     

  • क्या यही है वो मिस्टर राइट जिसके साथ आप करना चाहते हैं सेक्स, जाने इन पॉइंट्स में

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    अगर आप किसी व्यक्ति को लंबे वक्त से डेट कर रहे हैं और अब आपके मन में उसके साथ फिजिकली इन्वॉल्व होने की बात आ रही है तो आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि सामने वाला व्यक्ति भी इसके लिए तैयार है या नहीं। लेकिन आखिर आपको पता कैसे चलेगा कि यही वो शख्स है जिसके साथ आप सेक्स करना चाहते हैं? हम आपको बता रहे हैं कुछ पॉइंट्स के बारे में जिन्हें आपको फर्स्ट टाइम सेक्स करने से पहले ध्यान में रखना चाहिए….

    कॉन्फिडेंट महसूस हो

    सेक्स की वजह कई बार आपके रिश्ते में कुछ इमोशनल कॉम्प्लिकेशन भी आ सकते हैं। ऐसे में अगर आपके अंदर से आवाज आ रही है कि आप इस तरह की चीजों को हैंडल करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं तो आपको आगे बढ़ना चाहिए। आसान शब्दों में कहें तो जब आपको लगे कि आप अपने रिश्ते को नेक्स्ट लेवल पर लेकर जा सकते हैं तो इसका मतलब है कि आप सेक्स के लिए तैयार हैं।

    जब लगे कि मिस्टर राइट मिल गया
    जब आप दोनों की फीलिंग्स एक दूसरे के लिए एक जैसी हो, आप दोनों कपल गोल्स शेयर करें और आपके बीच की म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग बेहद रोमांटिक हो तो इसका मतलब है कि आप सेक्स के लिए रेडी हैं। साथ ही जब आप उस व्यक्ति के साथ सेफ और कंफर्टेबल फील करें तो इसका मतलब है कि आपको आपका मिस्टर राइट मिल गया है और आप रिश्ते में आगे बढ़ सकती हैं।

    ​सेक्स के लिए कौन सा दिन है बेस्ट?

    वैसे तो सेक्स करने का कोई सही समय नहीं होता। जब भी आप सेक्शुअली उत्तेजित महसूस करें और पार्टनर इसके लिए तैयार हो आप इसके जरिए अपनी urge को पूरा कर सकते हैं। लेकिन क्या कभी आपके मन में ये सवाल उठा है कि आखिर सेक्स करने के लिए हफ्ते का कौन सा दिन या समय सेक्स के लिए सबसे बेस्ट है? अगर हां तो हमारे पास है आपके इस सवाल का जवाब….

    ब्रिटेन के एक ब्यूटी रिटेलर सुपरड्रग्स ने एक करीब 2 हजार लोगों पर एक सर्वे किया। सर्वे के नतीजों से पता चला कि सर्वे में शामिल ज्यादातर प्रतिभागी, रविवार को सुबह 9 बजे सेक्स करना पसंद करते हैं। दूसरे नंबर पर शनिवार का दिन था जिसे लोगों ने सेक्स के लिए सेकंड बेस्ट डे चुना।

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    अब जाहिर सी बात है वीकेंड है, छुट्टी का दिन है, आपका माइंड काम के स्ट्रेस से दूर है तो पार्टनर संग इंटिमेट होने का यह बेस्ट टाइम है। हालांकि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस दिन और किस समय सेक्स करते हैं। सेक्स दोनों पार्टनर की सहमति से औऱ दोनों के लिए प्लेजरेबल हो ये जरूरी है। लिहाजा आप कुछ बातों का ध्यान रखें तो आपका सेक्शुअल एक्सपीरियंस होगा बेहतरीन।

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    जब बात सेक्स की आती है तो ज्यादातर लोग खासकर पुरुष सीधे इंटरकोर्स पर पहुंच जाते हैं। ऐक्चुअल ऐक्ट से पहले फोरप्ले में लगाया गया समय दोनों पार्टनर को ऑर्गैज्म तक पहुंचने में मदद करता है। लिहाजा फोरप्ले की अहमियत को नजरअंदाज न करें। फोरप्ले इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके जरिए आप मेन ऐक्ट के लिए मोमेनटम तैयार करते हैं।

    सेक्स के दौरान प्रोटेक्शन इस्तेमाल करना सबसे जरूरी है। बात सिर्फ अनचाहे गर्भ की नहीं बल्कि सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज की भी है। लिहाजा कॉन्डम के बिना सेक्स न करें। साथ ही लुब्रिकेंट का इस्तेमाल भी फायदेमंद साबित हो सकता है। कई बार नैचरल लुब्रिकेंट की कमी की वजह से सेक्स रफ हो सकता है और बाद में दिक्कतें हो सकती हैं। लिहाजा ल्यूब ट्यूब का इस्तेमाल जरूर करें।

    जब STD के बारे में कर सकें बात
    ये भी एक बेहद जरूरी पॉइंट है। जब आपको लगे कि आप पार्टनर संग सेफ सेक्स और सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज std के बारे में बात करने के लिए तैयार हैं तो इसका मतलब है कि आप अपने रिलेशन में आगे बढ़कर सेक्स कर सकते हैं।

    इसमें सिर्फ पार्टनर की नहीं आपकी भी खुशी हो
    आप सेक्स के लिए उस वक्त रेडी हैं जब आपका भी दिल करे पार्टनर संग सेक्स करने का। सिर्फ पार्टनर को खुश करने के लिए और वो आपसे नाराज ना हो जाए ये सोचकर सेक्स करने के लिए हामी ना भर दें। आप इसके लिए इसलिए तैयार हैं क्योंकि आप भी अपने रिश्ते को नेक्स्ट लेवल पर लेकर जाना चाहती हैं।

    ​सेक्स के दौरान पुरुषों को नहीं भाएंगी आपकी ये हरकतें

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    माना कि सेक्स के जरिए दोनों पार्टनर्स को बेहतर ऑर्गेजम और प्लेजर मिलता है। लेकिन इस प्रोसेस के दौरान पार्टनर द्वारा की गई कुछ हरकतें भारी पड़ सकती हैं। हो सकता है कि फीमेल पार्टनर का कोई मूव मेल पार्टनर को न भाए और उसका मूड ही ऑफ हो जाए। आज हम आपको 4 ऐसी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका फीमेल पार्टनर को खास ध्यान रखना चाहिए।

  • ज्यादा पानी पीना भी पंहुचा सकता है आपकी सेहत को नुक्सान

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    जिस तरह कम पानी पीना हेल्थ के लिए नुकसानदायक होता है और डिहाइड्रेशन की समस्या हो सकती है। ठीक उसी तरह बहुत ज्यादा पानी पीना भी सेहत के लिए हानिकारक होता है। कई बार डिहाइड्रेशन से बचने के लिए बहुत सारे लोग दिनभर पानी पीते रहते हैं। लेकिन लेटेस्ट स्टडीज की मानें तो बहुत ज्यादा पानी पीने से सेहत को कोई फायदा नहीं होता। एक्सपर्ट्स की मानें तो हर दिन 2 से ढाई लीटर फ्लूइड का इनटेक शरीर के लिए काफी है जिसमें पानी भी शामिल है।

    2 से ढाई लीटर फ्लूइड इनटेक है काफी-पहले जहां लोगों के बीच यह मान्यता थी कि हर दिन 8 से 10 गिलास पानी पीना अच्छी सेहत के लिए बेहद जरूरी है वहीं, अब इसमें बदलाव आया है। हर दिन 2 से ढाई लीटर फ्लूइड जिसमें चाय, कॉफी, जूस जैसी चीजें शामिल हैं, शरीर के लिए काफी है। हालांकि जिन लोगों को दिनभर आउटडोर में काम करना होता है उन्हें ज्यादा फ्लूइड की जरूरत हो सकती है।

    जितनी प्यास लगे उतना ही पानी पिएं
    प्रिवेंटिव कार्डियॉल्जिस्ट डॉ आशीष कॉन्ट्रैक्टर कहते हैं, बहुत ज्यादा मात्रा में पानी पीने का कोई फायदा नहीं है। कोई व्यक्ति कितना ज्यादा शारीरिक परिश्रम कर रहा है और वह जित वातावरण में रह रहा वह कैसा है, इन सब बातों पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति को कितना पानी पीना चाहिए। वैसे तो हर दिन 2 लीटर पानी काफी है। लेकिन थंब रूल ये है कि आप अपनी प्यास के हिसाब से पानी का इनटेक करें। जितनी प्यास लगे उतना पानी पिएं।

    सादे पानी का हाइड्रेशन इंडेक्स है कम
    सबसे अहम बात ये है कि सादे पानी का हाइड्रेशन इंडेक्स HI दूध, ऑरेंज जूस और ओआरएस की तुलना में काफी कम है। दरअसल, हाइड्रेशन इंडेक्स का मतलब है कि पानी या किसी लिक्विड को पीने के बाद वह शरीर में कितनी देर तक रहता है। अगर पानी पीने के 1 घंटे के अंदर आपका यूरीन आउटपुट क्लियर है तो इसका मतलब है कि पानी आपके शरीर में ठहर नहीं रहा। नए साइंटिफिक फैक्ट की मानें तो सादा पानी शरीर में ठहरता नहीं है और तुरंत बाहर निकल जाता है। लिहाजा बहुत ज्यादा प्लेन वॉटर की जगह नारियल पानी, नींबू पानी, जूस आदि का सेवन करना चाहिए।

    वॉटर वेट गेन से ऐसे पाएं छुटकारा

    शरीर में पानी जमा हो जाने के कारण भी आपका वजन बढ़ सकता है। अक्सर सुबह आंखों के नीचे सूजन, फूला हुआ पेट, शरीर में पानी जमा होने के संकेत हैं। पानी से बढ़ने वाले वजन से छुटकारा पाना आसान नहीं है लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कारकों पर ध्यान देकर आप इसे कम जरूर कर सकते हैं…

    शरीर में पानी की अधिकता के सबसे बड़े और सामान्य कारणों में से एक नमक की अधिकता है। सोडियम पानी के साथ जुड़ा है और इसे शरीर में रखता है। सोडियम के ज्यादा सेवन से शरीर में द्रव बढ़ने और एकत्र होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी तरह, अगर आप बहुत ज्यादा कार्ब्स युक्त आहार का सेवन करते हैं, तो यह टीशूज में द्रव पर प्रभाव डाल सकता है।

    बर्थ कंट्रोल हार्मोन्स भी कभी-कभी शरीर में पानी के वजन को बढ़ा सकता है। बर्थ कंट्रोल पिल्स में ऐस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टिन वजन के पैमाने में उतार-चढ़ाव को जन्म दे सकते हैं।

    कोर्टिसोल, जिसे ‘तनाव हॉर्मोन’ के रूप में जाना जाता है, कई बार यह आपके पानी के वजन बढ़ने के पीछे का मुख्य कारण हो सकता है। यह हॉर्मोन ब्लड शुगर लेवल को स्थिर रखने, मेटाबॉलिज्म को संतुलित करने और सूजन को कम करने के लिए जिम्मेदार है।

    कुछ दवाएं, जो आप पहले से लेते आ रहे हैं या फिर लेना शुरू किया है, वह भी शरीर में पानी से होने वाले वजन के लिए जिम्मेदार हो सकती हैं।

    एक स्वस्थ व्यक्ति को रोज 8 गिलास पानी पीना चाहिए। गर्मियों में पानी पीने की आदत को बढ़ा देना चाहिए। जो लोग हाई-फाइबर डायट पर हों उन्हें 8 गिलास से ज्यादा पानी पीना चाहिए।

    – ड्राई, मसालेदार और वसायुक्त चीजें खाने के बाद उसे पचाने के लिए ज्यादा पानी पीने की जरूरत होती है।- नमकीन भोजन खाने के बाद ज्यादा पानी पीना चाहिए क्योंकि अतिरिक्त नमक को शरीर से बाहर निकालने के लिए पानी की जरूरत होती है।- अगर आप लगातार तनाव में रहते हैं, तो भी आपको ज्यादा मात्रा में पानी पीना चाहिए। – जितना ज्यादा आपका वजन है, आपको उतना ही ज्यादा पानी पीने की जरूरत होती है, ताकि डाइजेशन, ब्लड सर्कुलेशन और दूसरे फंक्शन सही से काम करें।- एक्सरसाइज/वर्कआउट करते समय आपको ज्यादा पानी पीना चाहिए।

    – नमक के ज्यादा सेवन से बचें।- ज्यादा चाय, कॉफी और शराब के सेवन से बचें।- नियमित रूप से एक्सर्साइज करें, जिससे आपका वजन कम होगा।- हाइड्रेटिंग खाद्य पदार्थ खाएं।

    हो सकती हैं कई बीमारियां
    ज्यादा पानी से आपकी किडनी में सूजन आ सकती है। इसके अलावा बिना प्यास लगे पानी पीने से आपका ध्यान खराब होता है, नींद कम आने लगती है और कई बार तो इससे किडनी खराब होने का भी चांस रहता है। ज्यादा पानी से हाइपोएटरोमिया हो सकता है जिसमें शरीर में मौजूद सॉल्ट लेवल कम हो जाता है और ब्रेन में सूजन आ जाती है। ज्यादा पानी से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, हार्ट पूरा काम नहीं कर पाता।

  • एक्स संग सेक्स ब्रेकअप के बाद, नहीं है कोई बुराई: स्टडी

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    रिश्ता टूटने के बाद आपके दोस्त और शुभचिंतक अक्सर आपको यही सलाह देते हैं कि आपको अपने एक्स से दूर रहना चाहिए तभी आप इस ब्रेकअप से उबर पाएंगे। लेकिन कई बार आपके अंदर एक ऐसी फीलिंग रहती है जो आपको बार-बार एक्स से फिर से कनेक्ट होने के लिए कहती है। ऐसे में अगर आप कभी किसी पार्टी या बार में अपने एक्स से टकरा जाएं तो क्या आपको एक्स संग सेक्स करना चाहिए, यहां जानें…

    इसमें कोई बुराई नहीं

    एक नई स्टडी की मानें तो एक्स के साथ सेक्स उतना ही कॉमन जितना कि कॉमन कोल्ड यानी सर्दी-जुकाम। हालांकि ऐसा करने के बाद अगले दिन या तो आपको खुद पर बहुत गुस्सा आएगा या फिर शर्मिंदगी महसूस होगी। लेकिन एक्स संग सेक्स करने में कोई बुराई नहीं है।

    आगे बढ़ने की प्रक्रिया में रुकावट नहीं

    वायने स्टेट यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक एक्स संग सेक्स करना एक अच्छा आइडिया है। स्टडी के नतीजे बताते हैं कि एक्स संग सेक्स करने की वजह से आपके ब्रेकअप की प्रक्रिया से उबरने और आगे बढ़ने के प्रोसेस में कोई रुकावट नहीं आती। साथ ही एक्स संग हूकअप की वजह से हर दिन पॉजिटिव महसूस होता है।

    उन्हें कैसा महसूस हुआ

    इस स्टडी को 2 हिस्से में पूरा किया गया। पहले हिस्से में 113 वैसे लोगों को शामिल किया गया जिनका हाल ही में ब्रेकअप हुआ था और ब्रेकअप के 2 महीने बाद उन्हें सवाल-जवाब का एक क्वेश्नेयर दिया गया। इसमें उनसे पूछा गया कि अगर वे पार्टनर संग इमोशनली अटैच्ड थे तो उन्हें हर दिन कैसा महसूस हुआ और क्या उन्होंने एक्स संग शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की। 

    इमोशनल लेवल पर कोई दिक्कत नहीं

    स्टडी के दूसरे हिस्से में 327 पार्टिसिपेंट्स को एक सर्वे में शामिल किया गया और उनसे मिलते जुलते सवाल पूछे गए कि क्या उन्होंने एक्स संग फिजिकल कॉन्टैक्ट बनाने की कोशिश की और अगर हां तो उनके अटैचमेंट का लेवल क्या था। स्टडी में शामिल पार्टिसिपेंट्स जिन्होंने एक्स संग सेक्स किया उन्हें हार्टब्रोकन या इमोशनल लेवल पर किसी तरह की कमजोरी भी महसूस नहीं हुई। 

  • Rectal Cancer का खतरा बढ़ा रहे ऐंटीबायॉटिक्स

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    सर्दी-खांसी, बुखार या फिर किसी छोटी-मोटी बीमारी के लिए भी अगर आप ऐलोपैथिक डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर सबसे पहले 3 या 5 दिन की ऐंटीबायॉटिक दवा का कोर्स लिख देते हैं ताकि मरीज जल्दी ठीक हो जाए। कई बात तो बिना डॉक्टर से पूछे भी बहुत से लोग बीमार होने पर ऐंटीबायॉटिक खा लेते हैं। अगर आप भी ऐसा करते हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि इससे कोलोन या रेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

    ऐंटीबायॉटिक्स का हो रहा है ज्यादा इस्तेमाल

    एक नई स्टडी में यह बात सामने आयी है कि सिंगल कोर्स ऐंटीबायॉटिक के सेवन से भी कोलोन यानी मलाशय का कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। Gut नाम के जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे ऐंटीबायॉटिक- दवा की इस कैटिगरी का समझदारी से इस्तेमाल करने की जरूरत है क्योंकि डॉक्टर्स भी इसे जरूरत से ज्यादा प्रिस्क्राइब कर रहे हैं और इसका बहुत ज्यादा यूज हो रहा है।

    ऐंटीबायॉटिक के इस्तेमाल की हमारी लापरवाही से यह लाइलाज महामारी

    अमेरिका में भारतीय सुपरबग के कारण एक महिला की मौत हो गई है। पता चला है कि दुनिया की कोई भी ऐंटीबायॉटिक इस संक्रमण का इलाज नहीं कर सकती है।साल 2008 में भारतीय मूल की एक स्वीडिश महिला के अंदर पहली बार यह सुपरबग पाया गया था। डॉक्टरों ने इसे न्यू डेली मेटालो-बीटा-लेक्टामेस (NDM) का नाम दिया है। इस खबर से अगर आपको डर लग रहा है, तो बिल्कुल सही लग रहा है। इसके नतीजे इतने भयानक हो सकते हैं, जिसका शायद आप ठीक-ठीक अनुमान भी ना लगा सकें। यह सुपरबग हम भारतीयों की लापरवाही के कारण पैदा होता है। एक ऐसी लापरवाही जो अगर तत्काल ना रोकी गई, तो आने वाले समय में एक भयंकर लाइलाज महामारी का रूप ले लेगी। इसकी चपेट में ना केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया आ सकती है। आगे की स्लाइड्स में इसके बारे में विस्तार से जानिए…
    भारत में यह बीमारी दिनोंदिन अपने पैर फैला रही है। न्यू यॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2013 में करीब 58,000 नवजात और छोटे बच्चे इसके कारण मारे गए। ये नवजात ऐसी बीमारी के साथ पैदा होते हैं, जिसपर कोई भी ऐंटीबायॉटिक असर नहीं करती।ऐसा नहीं कि मरने वालों में सिर्फ नवजात हैं। नवजातों को यह बीमारी मां के गर्भ में मिल रही है। इसका मतलब, बड़ी संख्या में वयस्क भी इस जानलेवा स्थिति के शिकार हो रहे हैं।सोचिए, बीमार पड़ने पर दवाओं से इलाज कर लेते हैं, लेकिन अगर आपकी बीमारी का दुनिया भर में कोई इलाज ही ना हो, तो? सोचिए कि एक छोटा सा घाव भरने की जगह आपकी जान ही ले ले?

    पिछली बार जब आप बीमार पड़े थे, तब आपने जो दवा खाई वह क्या डॉक्टर की सलाह लेकर खाई? बिना डॉक्टर के पास गए कितनी बार आपने खुद ही दवा की दुकान से ऐंटीबायॉटिक खरीदकर अपना इलाज किया?आपको लगा कि आप डॉक्टर के पास नहीं जाकर अपने पैसे बचा रहे हैं, लेकिन असल में आपकी यह आदत एक वैश्विक महामारी का रूप ले सकती है। बिना जरूरत के और बिना चिकित्सीय सलाह के दवा लेना आपको बहुत बहुत बहुत ज्यादा बीमार कर सकता है।इसके कारण आपके शरीर की रोग से लड़ने की क्षमता खत्म हो सकती है। इसके कारण आपके शरीर में ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जहां कोई भी ऐंटीबायॉटिक आपकी बीमारी का इलाज नहीं कर सकेगी। सर्दी और न्यूमोनिया जैसी साधारण बीमारियां आपकी जान ले सकती हैं। एक छोटा सा घाव बढ़कर आपके मौत की वजह बन सकता है।

    न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 के बाद भारतीय अस्पतालों में मल्टीड्रग रेज़िस्टेंट इंफेक्शन्स से ग्रस्त मरीजों की संख्या अप्रत्याशित तौर पर बढ़ रही है।शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में ऐसे जीवाणु बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जिनपर किसी भी ऐंटीबायॉटिक का कोई असर नहीं होता। यहां के पानी, नालों, जानवरों, मिट्टी और बड़ी तादाद में इंसानों के अंदर ऐसे जीवाणु पाए गए हैं, जिनका इलाज दुनिया की कोई भी ऐंटीबायॉटिक दवा नहीं कर सकती है।

    भारत में ऐंटीबायॉटिक के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता का इतना अभाव है कि लोग सर्दी और जुकाम जैसी स्थिति में भी ऐंटीबायॉटिक खा लेते हैं। याद रखिए, केवल जीवाणुओं के संक्रमण में ऐंटीबायॉटिक असर करता है, फंगल और वायरल संक्रमण पर नहीं।बिना डॉक्टरी सलाह के ऐंटीबायॉटिक खाना ऐसा ही है जैसे कि आप जहर खाकर बीमारी का इलाज कर रहे हैं।

    भारत के मशहूर संगीतज्ञ यू. श्रीनिवास का 45 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्हें ऐसा संक्रमण हुआ था, जिसका इलाज दुनिया के किसी भी डॉक्टर के पास नहीं था। भारतीय अस्पताल तो ऐसे लाइलाज संक्रमणों का कारखाना ही बन गए हैं।​भारतीय अस्पतालों में कितनी भीड़ होती है, यह किसी से नहीं छुपा। यहां साफ-सफाई के इंतजाम भी सही नहीं होते हैं। शौचालय गंदे होते हैं, हाथ धोने का साबुन मौजूद नहीं होता और पानी गंदा होता है। ऐसे में इस तरह के लाइलाज जीवाणुओं के संक्रमण का खतरा और भी बढ़ जाता है। इनके फैलने की संभावना और मजबूत हो जाती है।

    भारत में साफ-सफाई को लेकर जागरूकता बहुत कम है। यहां ऐंटीबायॉटिक्स के बिकने पर लंबे समय तक कोई पाबंदी नहीं थी।अभी भी, आप बिना डॉक्टर की पर्ची के आसानी से किसी दवा दुकान में जाकर ऐंटीबायॉटिक खरीद सकते हैं। इसके कारण ऐंटीबायॉटिक्स के बेअसर होने के मामलों की सुनामी आ गई है। ऐसा नहीं कि इसके कारण केवल भारत पर ही संकट है, बल्कि भारत की सीमाओं से निकलकर यह संक्रमण दुनिया के कोने-कोने तक फैल रहा है।

    कई शोधों में पाया गया है कि विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों में ऐसे जीवाणुओं की मौजूदगी ज्यादा है, जो कि ऐंटीबायॉटिक्स के प्रतिरोधक होते हैं। भारत इस मामले में पहले नंबर पर है।विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में जीवाणुओं का प्रसार बेहद आसान है। बड़ी संख्या में अब भी भारतीय खुले में शौच करते हैं। इसके अलावा जो लोग शौचालयों का इस्तेमाल करते भी हैं, उनके यहां से निकलने वाला मल बिना किसी उपचार के नालों और नदियों-तालाबों में बहा दिया जाता है। दुनिया में जीवाणुओं से संक्रमित होने में भारतीय सबसे आगे हैं। किसी भी अन्य देश के मुकाबले भारतीय कहीं ज्यादा ऐंटीबायॉटिक इस्तेमाल करते हैं।

    स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े लोग दशकों से ऐंटीबायॉटिक्स के बेतहाशा इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दे रहे थे। 20वीं सदी में ऐंटीबायॉटिक्स की खोज एक चमत्कार जैसी थी।​इसके कारण इंसानों की जिंदगी काफी बेहतर हुई। अब ऐंटीबायॉटिक के अनियंत्रित और बेतहाशा इस्तेमाल के कारण ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जहां जीवाणु बेहद मजबूत हो जाते हैं। जीवाणु इतने प्रबल हो जाते हैं कि उनपर कोई ऐंटीबायॉटिक असर नहीं करती। सितंबर 2014 में ओबामा प्रशासन ने इस समस्या से निपटे के लिए उपायों की घोषणा की। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया।

    डॉक्टर्स का कहना है कि भारत में स्वच्छता और साफ-सफाई की बेहतर मौजूदगी नहीं होने के कारण संक्रमण के खतरों को कम करने के लिए ऐंटीबायॉटिक्स पर निर्भरता काफी बढ़ जाती है।नतीजन, ऐंटीबायॉटिक्स बेअसर हो रहे हैं और सबसे ज्यादा असर नवजात बच्चों पर पड़ रहा है। भारत के टॉप शिशु रोग विशेषज्ञों का मानना है कि तुरंत पैदा होने वाले नवजातों के अंदर इस तरह के संक्रमणों की मौजूदगी बताती है कि समाज और गर्भवती महिलाओं के अंदर बड़ी संख्या में ऐसे जीवाणु मौजूद हैं।

    न्यू यॉर्क टाइम्स ने साल 2014 में भारत भर के कई अस्पतालों में डॉक्टर्स से बात की थी। पाया गया कि ज्यादातर नवजात शिशु ऐसे संक्रमण के साथ पैदा हो रहे हैं, जिनपर कोई ऐंटीबायॉटिक असर नहीं करती।​भारत में हर साल बड़ी संख्या में विदेशों से लोग इलाज कराने आते हैं। सुपरबग की खोज भारत के इस फलते-फूलते कारोबार को भी खत्म कर सकती है। टीबी का इलाज कराने वालों, ऑपरेशन कराने वालों, कैंसर के मरीजों या फिर ऑर्गन-हड्डी ट्रांसप्लांट कराने वाले लोगों को सुपरबग के संक्रमण का खतरा काफी ज्यादा होता है।

    भारत में टीबी के सबसे ज्यादा मरीज पाए जाते हैं। हाल में हुए कई शोधों में जनेटिक्स जांच से पता चला कि टीबी के जिन मरीजों का इलाज नहीं हुआ, उनमें से करीब 10 फीसद रोगी ऐसे हैं, जिनके अंदर सुपरबग पाया गया। उनके संक्रमण का किसी भी ऐंटीबायॉटिक से इलाज नहीं हो सकता है।

    सबसे डरावनी बात यह है कि इन मरीजों को अस्पतालों में नहीं, बल्कि अपने घरों पर यह संक्रमण हो रहा है। ऐसे में इस महामारी को रोकना काफी मुश्किल है।नैशनल इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च इन टीबी की निदेशक डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन ने एक विदेशी अखबार को दिए गए अपने इंटरव्यू में बताया था कि अगर सरकार गंभीर और तत्काल कार्रवाई नहीं करती है, तो जल्द ही भारत में टीबी लाइलाज बीमारी हो जाएगी। इसके मरीजों को किसी भी ऐंटीबायॉटिक से ठीक नहीं किया जा सकेगा।

    हाल के वर्षों तक डॉक्टर्स बच्चों को संक्रमण के खतरे से बचाने के लिए हाथ खोलकर ऐंटीबायॉटिक के टीके लगाया करते थे। कई जगहों पर तो यह बदस्तूर चालू है। ये संक्रमण ज्यादातर साफ-सफाई के अभाव में होते हैं। अब इस बारे में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया गंभीरता दिखा रही है।

    डॉक्टर्स के बीच जागरूकता बढ़ तो रही है, लेकिन स्थिति अब भी बेहद गंभीर है। और तो और, वैज्ञानिकों ने पशुपालन पर एक शोध किया।इसमें जिन मुर्गे-मुर्गियों की जांच की गई, उनमें से 40 फीसद के अंदर ऐसे जीवाणु पाए गए जिनपर कोई भी ऐंटीबायॉटिक्स असर नहीं करती। ऐसे मुर्गों को जब लोग खाते हैं, तो ये जीवाणु उनके अंदर भी चले जाते हैं।

    क्यों करते हैं ऐंटीबायॉटिक्स का इस्तेमाल- जो अक्सर गंभीर नहीं होते, लेकिन ठीक नहीं होने पर बाकी लोगों में फैल सकते हैं।- ऐसी बीमारियों में जहां ऐंटीबायॉटिक लेने से ठीक होने की रफ्तार तेज हो जाती है।- स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी परेशानी, जिसके ठीक ना होने पर कई और तरह की दिक्कतें हो सकती हैं।- जीवाणुओं से होने वाले संक्रमण के मामलों में।- कई बार ऐंटीबायॉटिक इलाज के लिए नहीं, बल्कि बचाव के लिए दिया जाता है।- फंगल और वायरल संक्रमण में ऐंटीबायॉटिक से कोई फायदा नहीं मिलता।

    अब क्यों नहीं होता ऐंटीबायॉटिक्स का ज्यादा इस्तेमाल- ज्यादातर संक्रमण विषाणुओं के कारण होता है, जिनपर ऐंटीबायॉटिक का असर नहीं होता- ऐंटीबायॉटिक के इस्तेमाल से ठीक होने की प्रक्रिया तेज तो हो जाती है, लेकिन इसके कई साइड इफेक्ट भी हैं- छोटी-मोटी परेशानियों में ऐंटीबायॉटिक लेने पर गंभीर बीमारियों के संक्रमण को ठीक करने का उनका असर कम हो जाता है

    किन्हें है जीवाणुओं के संक्रमण का ज्यादा खतरा- 75 से अधिक उम्र के लोग- नवजात बच्चे, खासतौर पर जन्म लेने के पहले 72 घंटों के दौरान- दिल की बीमारी के मरीज- डायबीटीज़ के ऐसे मरीज, जिन्हें इंसुलिन लेना पड़ता है- ऐसे लोग जिनके शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता कमजोर है

    और कब हो सकता है इस्तेमाल- अगर आपका ऑपरेशन होने वाला है- जोड़ों का रिप्लेसमेंट होने वाला है- ब्रेस्ट इंप्लांट सर्जरी करा रही हैं- पेसमेकर लगाया जा रहा है- पित्ताशय निकाला जा रहा है- अपेंडिक्स निकाला जा रहा है- घाव होने या फिर जानवरों द्वारा काटे जानेपरचेतावनी: किसी भी स्थिति में बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न खाएं। ऐंटीबायॉटिक का इस्तेमाल बिना डॉक्टरी सलाह के न करें। बिना डॉक्टर की पर्ची के अगर कोई दुकानदार ऐंटीबायॉटिक बेच रहा है, तो यह गैरकानूनी है। इसकी शिकायत करें।

    साइड इफेक्ट की वजह से क्रॉनिक बीमारियों का खतरा
    इस स्टडी की लीड ऑथर सिंथिया सियर्स कहती हैं, हमारी रिसर्च इस बात पर जोर देती है कि इस तरह की दवाइयों का शरीर पर कितना बुरा असर होता है और इनसे कई तरह की क्रॉनिक बीमारियां भी हो सकती हैं। इस स्टडी में यूके के 1 करोड़ 10 लाख मरीजों के डेटा की जांच की गई जिसमें जनवरी 1989 से दिसंबर 2012 यानी 23 साल के पीरियड की जांच हुई। इसमें करीब 28 हजार 890 मरीजों को कोलोरेक्टल कैंसर होने की बात सामने आयी।

    ऐंटीबायॉटिक एक्सपोजर से मलाशय के कैंसर का खतरा
    इन मेडिकल रिकॉर्ड्स का इस्तेमाल हर एक केस हिस्ट्री की जांच करने के लिए किया गया जिसमें कोलोन कैंसर के रिस्क फैक्टर्स जैसे- मोटापे का इतिहास, धूम्रपान, ऐल्कॉहॉल का सेवन, डायबीटीज और ऐंटीबायॉटिक के यूज पर भी ध्यान दिया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों को कोलोन कैंसर हुआ वे ऐंटीबायॉटिक्स के प्रति ज्यादा एक्सपोज्ड थे।

    धूम्रपान से ज्यादा खतरनाक है मोटापा

    हाल ही में हुई एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि मोटे लोगों में कैंसर होने का खतरा, धूम्रपान यानी स्मोकिंग करने वालों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। यूके के कैंसर रिसर्च की तरफ से यह स्टडी करवायी गई थी। स्टडी के मुताबिक, यूके के करीब एक तिहाई लोग मोटापे का शिकार हैं जबकि स्मोकिंग अब भी कैंसर के उन कारकों में शामिल हैं जिन्हें रोका जा सकता है।

  • KISS करने का तरीका बताता है आपकी आपके पार्टनर की लाइफ में अहमियत

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    प्यार जताने का सबसे पहला स्टेप होता है किस। बस एक किस लाखों शब्दों की बात आपके पार्टनर तक पहुंचा देती है। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि आपका पार्टनर आपको सबसे अधिक किस कहां करता है? खासकर अगर यह किस सडन किस हो तो? आप सोचिए और हम आपको बताते हैं कि उसके कहां किस करने का मतलब क्या होता है…
    गाल पर किस करना

    अगर आपका पार्टनर आपको अचानक से गाल पर किस करता है और ऐसा अक्सर होता है। तो उसका ऐसा करना इस बात का इशारा है कि वह आपको अपनी दोस्त, अपनी पार्टनर और हमराज के रूप में पाकर बहुत खुश है।

    उसका आपके फोरहेड पर किस करना

    अगर आपका पार्टन आपको अक्सर फोरहेड यानी माथे पर किस करता है तो इसका मतलब होता है वो आपको लेकर बहुत प्रोटेक्टिव है। वो आपको प्यार करने के साथ ही आपका सम्मान भी करता है। उसे हर पल आपका खयाल रहता है।

    वो आपके हाथों पर किस करता है

    अगर वो अक्सर आपका हाथ पकड़कर चूम लेता है तो यह इस बात का संकेत है कि आप न केवल उसका प्यार हैं बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त भी हैं। इस तरह वो बिना शब्दों के आपकी तारीफ भी करता है और हमेशा आपके साथ रहने की चाहत भी जताता है।

    सिंगल लिप किस

    आपका पार्टनर आपको सिंगल लिप किस करता है यानी बस अचानक से आकर आपके होठों को हल्के से एक बार चूम लेता है। तो यह इस बात का इंडिकेशन है कि वह आपके प्रति दिल से आकर्षित है। उसके मन में आपके लिए लव, लस्ट, केयर। वह आपको लेकर क्रेजी है।

  • जिंदगी की भागदौड़ के बीच रोमांस को जिंदा रखने वाले लोग ही होते है असली चैंपियन

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    जिंदगी का एक खूबसूरत हिस्सा है रोमांस। लेकिन लाइफ की व्यस्तता के चलते हम अपनी फीलिंग्स के लिए वक्त ही नहीं निकाल पाते। अब यही तो असली चैलेंज हैं। इन सभी जिम्मेदारियों के बीच रोमांस को जिंदा रखने वाले लोग ही असली चैंपियन हैं। चेक कीजिए क्या आप अपने पार्टनर से इन तरीकों से कनेक्ट हैं? अगर आपकी लाइफ में हैं ये 5 बातें तो बेहद रोमांटिक हैं आप…

    बिना ऑकेज़न गिफ्ट ले जाना

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    गिफ्ट मिलने पर हम सभी को खुशी होती है। हमारे जीवन का कोई महत्वपूर्ण दिन जैसे, बर्थडे, एनिवर्सरी या कोई त्योहार हो तो गिफ्ट मिलना उस दिन की खुशी को बढ़ा देता है। लेकिन यूं ही बिना किसी ऑकेज़न के गिफ्ट मिलना हमें बेहद खुशी देता है। अगर आप अपने पार्टनर को इस तरह के सरप्राइज गिफ्ट देते रहते हैं तो आप वाकई रोमांटिक हैं।

    तुरंत प्लान बना लेना

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    वक्त न होने की दिक्कत तो हर किसी के साथ है। असली हीरो वही है जो व्यस्तता में से वक्त चुरा ले। आप बिज़ी शेड्यूल में से टाइम निकालकर मूवी टिकट बुक करते हैं और पार्टनर को अचानक कॉल करके सभी काम छोड़कर मूवी चलने के लिए कहते हैं। कभी-कभी ऐसे सडन प्लान बहुत खुशी देते हैं और लाइफ में रोमांस को बढ़ाते हैं।

    तुम्हारा साथ मुझे कंप्लीट करता है

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    आप अपने पार्टनर को यदा-कदा इस बात का अहसास दिलाते रहते हैं कि आपकी लाइफ में उसकी क्या अहमियत है। जब आप अपने पार्टनर को यह बात कहते हैं कि ‘तुम्हारा साथ मुझे कंप्लीट करता है’ तो ये शब्द आपके पार्टनर को प्यार और रोमांस से भर देते हैं। आपका ऐसा करना उसे बहुत अच्छा फील कराता है।

    दिनभर में कॉल और मैसेज

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    दिनभर में व्यस्त शेड्यूल से वक्त निकालकर अपने पार्टनर को फोन करना, प्यार भरा मैसेज कर देना या कोई रोमांटिक फोटो सेंड करना, आपकी बॉडिंग को मजबूत करता है। आपके भावनात्मक जुड़ाव को बढ़ाता है। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप बहुत रोमांटिक और केयरिंग हैं।

  • आइये जानते है क्या पी सकते है व्रत के दौरान चाय और कॉफी?

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    कॉफी और चाय दो ऐसे ड्रिंक्स हैं, जो पूरी दुनिया में बड़े शौक से पिए जाते हैं। लोग अपने दिन की शुरुआत इनसे करते हैं और कुछ लोग पूरे दिन चाय, कॉफी पीते रहते हैं। इतना ही नहीं व्रत के दौरान भी आराम से पीते रहते हैं लेकिन क्या ऐसा करना सही है?

    व्रत के अलग-अलग नियम

    व्रत करने के लिए हर किसी के अलग नियम होते हैं जैसे नवरात्र व्रत के दौरान कई लोग चाय और कॉफी पीते हैं लेकिन पैकेज्ड ड्रिंक नहीं लेते। वहीं कुछ लोग 9 दिन तक सिर्फ पानी पीकर व्रत रहते हैं।

    ऋतुएं बदलने पर व्रत का महत्व

    भारत में ज्यादातर व्रत जैसे सावन और नवरात्र में व्रत का काफी महत्व होता है कि क्योंकि ये ऋतुएं बदलने के हिसाब से होते हैं। इन्हीं मौसमों में शरीर बैक्टीरियल और वायरल इन्फेक्शंस के लिए सेंसिटिव होता है। इस दौरान हाई साल्ट, शुगर, ऑइल और पैकेज्ड फूड खाना मना होता है क्योंकि ये नुकसान करते हैं। इसके साथ ही ड्रिंकिंग और स्मोकिंग पर भी प्रतिबंध होता है।

    पानी है जरूरी

    व्रत के दौरान ऐसे फूड्स ही लिए जाते हैं जो भूख को कंट्रोल करें और मेटाबॉलिजम बढ़ाएं। ज्यादातर लोग सिंपल डायट लेते हैं जिसमें सब्जियां और फल वगैरह शामिल होते हैं। व्रत के दौरान पानी का रोल काफी अहम होता है। इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस के लिए नारियल पानी या दूसरे ड्रिंक्स भी लेने चाहिए। आगे स्लाइड्स में जानें क्या होता है चाय और कॉफी का असर…

    हो सकती है बेचैनी

    अगर वैज्ञानिक तौर पर देखा जाए तो व्रत के दौरान कॉफी और चाय पीने के भी अलग कॉन्सेप्ट हैं। कॉफी और चाय दोनों में कैफीन होता है जिन्हें सीमित मात्रा में लिया जाए तो सिस्टम के लिए ठीक होते हैं लेकिन ओवरडोज नुकसान कर सकती है। ज्यादा कैफीन से नींद न आने की समस्या, ऐंग्जाइटी और डिप्रेशन तक हो सकता है। वहीं शुगर से ब्लड ग्लोकोज लेवल बढ़ता है, वजन बढ़ता है और दिल के लिए भी बुरा होता है।

  • हेल्थ के लिए अच्छा उबासी लेना है, होते हैं ये 5 फायदे

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    उबासी लेना बॉडी का एक नैचरल प्रॉसेस है जिसे कंट्रोल नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि उबासी या जम्हाई पर लोग ज्यादा ध्यान भी नहीं देते। वैसे तो अक्सर इसे आलस या नींद के साथ जोड़ा जाता है लेकिन क्या आपको पता है कि उबासी लेना हमारे शरीर को 5 तरह से फायदा पहुंचाता है।

    ब्रेन होता है कूल

    उबासी लेने के दौरान व्यक्ति मुंह खोलकर कूल एयर सांस के साथ अंदर लेता है। इससे ज्यादा ऑक्सिजन ब्रेन तक जाती है जिससे ब्रेन के हॉट ब्लड को नीचे की ओर फ्लो होने और उसकी जगह कूल ब्लड के पहुंचने में मदद मिलती है। यह दिमाग के ओवरऑल तापमान को कम करने में मदद करता है।

    शरीर में बढ़ता है ऑक्सिजन का फ्लो

    उबासी लेने के दौरान हम गहरी सांस लेते हैं जिससे ऑक्सिजन की मात्रा शरीर में ज्यादा जाती है और इससे बॉडी में जमा हुई कार्बन डाइऑक्साइड को शरीर से बाहर निकालने में मदद मिलती है। यह लंग्स के साथ ही दिमाग के लिए भी अच्छा होता है।

    अलर्ट रहने में मदद

    आमतौर पर उबासी को नींद के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि यह व्यक्ति को अलर्ट रहने में मदद करती है। दरअसल, उबासी शारीरिक क्रिया की श्रेणी में आती है और जब तक किसी भी तरह की फिजिकल ऐक्टिविटी होती रहती है तब तक व्यक्ति सो नहीं सकता, जो उसे अपने आसपास की चीजों के प्रति सजग बने रहने में मदद करता है।

    कान के दर्द को करता है दूर

    आपने भी ध्यान दिया होगा कि फ्लाइट में अक्सर एयर प्रेशर के कारण कान बंद हो जाते हैं जिससे दर्द होता है, इस स्थिति में अगर उबासी ली जाए तो कान खुल जाते हैं और दर्द से तुरंत राहत मिलती है। दरअसल, उबासी कान में बनने वाले एयर प्रेशर को रिलीज करने लगता है जिससे पर्दे पर दबाव नहीं बनता और दर्द चला जाता है।