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  • National Epilepsy Day: दूर करें मिर्गी से जुड़ी गलत धारणाएं, जानें लक्षण और बचाव

    National Epilepsy Day: दूर करें मिर्गी से जुड़ी गलत धारणाएं, जानें लक्षण और बचाव

    राष्ट्रीय मिर्गी दिवस यानी National Epilepsy Day हर साल 18 नवंबर को मनाया जाता है। डॉक्टरों की मानें तो मिर्गी एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, लेकिन बीमारी से जुड़ी गलत धारणाओं के कारण मिर्गी से पीड़ित सैकड़ों लोग सामाजिक रूप से बहिष्कृत हो जाते हैं। इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरूकता की कमी है। यहां जानें मिर्सी से जुड़े मिथकों, बीमारी के लक्षण और बचाव के बारे में…

    दूषित पानी और भोजन से होती है मिर्गी

    न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. मुनेश्वर सूर्यवंशी का कहना है कि दुनिया भर में मिर्गी के कुल मरीजों में से 16 प्रतिशत भारत में हैं। दुनियाभर में मिर्गी का एक सामान्य कारण सिर में चोट लगना है, जबकि भारत में इसका एक प्रमुख कारण न्यूरोकाइस्टिसरोसिस यानी तंत्रिका तंत्र का परजीवी रोग है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में मिर्गी के लिए 30 प्रतिशत तक जिम्मेदार है। डॉ. आर के गर्ग ने बताया कि मिर्गी टेपवॉर्म नाम के कीड़े से होती है, जो गंदे पानी या दूषित खाने के कारण शरीर में जाता है। वहां से यह खून में मिलकर दिमाग तक पहुंच जाता है और व्यक्ति को मिर्गी के दौरे आने लगते हैं।

    50 प्रतिशत मरीज सर्जरी से ठीक हो सकते हैं

    न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रवीण शर्मा ने बताया कि देश में करीब 1.25 करोड़ लोग मिर्गी से पीड़ित है। इनमें करीब 50% मरीज ऐसे हैं, जिनकी सर्जरी की जा सकती है। जांच और डायग्नॉसिस होने पर अमूमन 30% मरीज ही सर्जरी के लिए फिट पाए जाते हैं। कई मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें कई दवा के कॉम्बिनेशन देने के बाद भी मिर्गी कंट्रोल नहीं हो पाती। ऐसे मरीज सर्जरी के जरिए मिर्गी से छुटकारा पा सकते हैं।

    ​मिर्गी से जुड़े मिथक और उनकी हकीकत

    1. मिर्गी ठीक नहीं होती।मिर्गी का इलाज मुमकिन है। मोटे तौर पर करीब 80-85 फीसदी मरीज दवा से ठीक हो जाते हैं। बाकी भी सर्जरी से ठीक हो जाते हैं।2. दवाओं के भारी साइड इफेक्ट होते हैं।मिर्गी की दवाओं के कुछ साइड-इफेक्ट्स होते हैं, जैसे कि सुस्ती, नींद ज्यादा आना, मानसिक धीमापन, वजन बढ़ जाना आदि, लेकिन ये दिक्कतें बीमारी से बड़ी नहीं हैं। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवा बदल भी देते हैं।3. यह पागलपन है।मिर्गी पागलपन बिल्कुल नहीं है। यह न्यूरो से जुड़ी एक बीमारी है, जिसका सही इलाज मिलने पर मरीज सामान्य जिंदगी जी सकता है।4. सामान्य जिंदगी नहीं जी सकता मरीज।मरीज सामान्य जिंदगी जी सकता है। बस उसे ड्राइविंग, स्वीमिंग या एडवेंचर स्पोर्ट्स जैसी कुछ चीजों से परहेज करना होता है।

    ​मिर्गी के लक्षण

    – बात करते हुए दिमाग ब्लैंक हो जाना, मांसपेशियों का अचानक फड़कना- तेज रोशनी से आंखों में परेशानी होना, अचानक बेहोश हो जाना- अचानक से मांसपेशियों पर नियंत्रण खो देना

    ​दौरा पड़ने पर इन बातों का रखें ध्यान

    – दौरा पड़ने पर रोगी को सुरक्षित जगह पर एक करवट लेटा दें- कपड़े ढीले करें, खुली हवा में रखें और आसपास भीड़ न लगाएं- सिर के नीचे मुलायम कपड़ा रखें, दौरे के समय रोगी के मुंह में कुछ न डालें

    ​ऐसे करें बचाव

    न्यूरोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. रजनीश कुमार बताते हैं कि मिर्गी ज्यादातर युवाओं में देखी जाती है। पर्याप्त नींद, कच्ची सब्जियों से परहेज, साफ पानी से धुली सब्जियों को छीलकर खाने से मिर्गी से बचा जा सकता है।

  • ब्रेस्ट मिल्क प्रॉडक्शन बढ़ाने के नई मांओं के लिए टिप्स

    ब्रेस्ट मिल्क प्रॉडक्शन बढ़ाने के नई मांओं के लिए टिप्स

    डिलिवरी के तुरंत बाद ज्यादातर नई मांओं के मन में जिस एक बात को लेकर सबसे ज्यादा चिंता रहती है, वो ये है कि क्या अपने बच्चे के लिए उनकी ब्रेस्ट मिल्क सप्लाई सफिशंट होगी? क्या उन्हें ऊपर का दूध यानी फॉर्मुला मिल्क बच्चे को देना चाहिए? क्या सिर्फ मेरे दूध से बच्चे का पेट भर जाएगा? एक्सट्रा..एक्सट्रा…एक्सट्रा… अगर आप भी एक न्यू मॉम हैं और आपके मन में ब्रेस्ट मिल्क प्रॉडक्शन को लेकर इस तरह के सवाल हैं तो यहां जानिए इन सब सवालों का जवाब।

    नैचरल तरीकों से बढ़ाएं ब्रेस्ट मिल्क प्रॉडक्शनबच्चे के जन्म से लेकर शुरुआती 6 महीने तक उसे सिर्फ ब्रेस्टफीडिंग करवाना बेहद जरूरी है। मां के दूध में मौजूद पोषक तत्व नवजात शिशु की सेहत के लिए बेहद जरूरी होते हैं और ये बच्चे को सभी तरह के इंफेक्शन और जानलेवा बीमारियों से बचाते हैं। लेकिन कई बार मांएं इस समस्या का सामना करती हैं कि उनके ब्रेस्ट से सही मात्रा में दूध का उत्पादन नहीं होता और ऐसा लगता है कि मानो बच्चे का पेट नहीं भरा और वह भूखा है। ऐसे में इन 4 नैचरल तरीकों को अपनाकर आप भी बढ़ा सकती हैं ब्रेस्ट मिल्क का प्रॉडक्शन…

    Latching का रखें ध्यान
    latch का अर्थ है ब्रेस्टफीडिंग के दौरान बच्चा किस तरह से मां के ब्रेस्ट को अपने मुंह से जकड़ता है और फिर दूध खींचता है। अगर बच्चे की लैचिंग प्रक्रिया अच्छी है तो ब्रेस्ट मिल्क का फ्लो बढ़ता है और बच्चे की मां को निप्पल में किसी तरह की असहजता भी महसूस नहीं होती। ऐसे में बेहद जरूरी है कि बच्चे की लैचिंग की प्रक्रिया सही हो, तभी बच्चा पूरी तरह से और पेट भरकर दूध पिएगा।

    बच्चे को बार-बार ब्रेस्टफीड करवाएं
    याद रखें कि आपका शरीर डिमांग और सप्लाई के फंक्शन पर काम करता है। इसका मतलब है कि अगर आपका बच्चा बार-बार ब्रेस्टफीड होगा तो शरीर को इस बात के संकेत मिलेंगे कि उन्हें बच्चे की जरूरत के हिसाब से ज्यादा ब्रेस्ट मिल्क की सप्लाई करनी है। औसतन एक न्यूबॉर्न बेबी को दिन भर में हर 2 से 3 घंटे में ब्रेस्टफीड करवाना चाहिए।

    मां का हाइड्रेटेड रहना जरूरी

    बच्चे को दूध पिलाने वाली मां को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि वह दिनभर में कितना पानी या लिक्विड डायट का सेवन करती है। अगर आपको लग रहा है कि आप बच्चे की जरूरत के हिसाब से ब्रेस्टमिल्क का उत्पादन नहीं कर पा रही हैं तो अपना वॉटर इनटेक बढ़ाएं। दिनभर में 8 से 10 गिलास पानी जरूर पिएं।

    दोनों ब्रेस्ट से बच्चे को पिलाएं दूध
    भले ही बच्चे को दूध पिलाने की आपकी कोई फेवरिट पोजिशन हो लेकिन बच्चे को दोनों ब्रेस्ट से दूध पिलाना बेहद जरूरी है। ऐसा करने से भी ब्रेस्ट मिल्क का उत्पादन बढ़ता है। अगर पहले ब्रेस्ट से दूध खींचते वक्त बच्चा स्लो हो जाए तो उसी दौरान उसे दूसरे ब्रेस्ट से दूध पिलाएं।

  • ऑफिस में चल रहा है यदि आपका अफेयर तो हो जाएं सतर्क

    ऑफिस में चल रहा है यदि आपका अफेयर तो हो जाएं सतर्क

    अक्सर ऐसा कई लोगों के साथ होता है कि जहां पर हम काम कर रहे होते हैं वहीं हमे किसी से प्यार हो जाता है। यह बात हम सभी जानते है कि प्यार कहीं भी और कभी भी हो सकता है। मगर कई बार यह आपके लिए काफी नुकसानदायक साबित होता है।

    बता दें कि ऑफिस अफेयर के फायदे और नुकसान दोनों हैं। कई बार ऑफिस अफेयर आपके लिए बड़ी परेशानी बन जाता है। आइए आज हम आपको बताएंगे कि ऑफिस अफेयर से आपको क्या नुकसान हो सकते हैं।

    पर्सनल लाइफ ऑफिस वर्क पर हावी
    ऑफिस अफेयर के कारण से आपके काम पर भी बेहद प्रभाव पड़ता है। यदि आप दोनों के बीच मनमुटाव हो जाए तो आपका मन काम में नहीं लगेगा। इस दौरान ऑफिस में आपकी परफॉर्मेंस भी घटती चली जाएगी।

    रोक-टोक बढ़ जाना
    जब आपका अफेयर आपके ही ऑफिस में किसी से होता है। इस दौरान सबकी नजर आप दोनोें पर बनी रहती है, जिसकी वजह से आप दोनों पर ऑफिस में रोक-टोक बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में कई बार आप खुद को बदलने की भी सोच लेते हैं।

    पार्टनर को असुरक्षा की भावना


    अगर आप ऑफिस में किसी से ज्यादा हंस-बोल कर बातें करते हैं तो इससे आपके पार्टनर को असुरक्षा की भावना हो सकती है। इसके कारण ऑफिस में आपका दायरा सिमट भी सकता है।

  • बना रहा है बीमार पानी को शुद्ध करने के लिए घरों में लगा RO

    बना रहा है बीमार पानी को शुद्ध करने के लिए घरों में लगा RO

    पानी शुद्ध करने के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) वॉटर प्यूरिफायर लगवाना अब एक आम चलन है। ऐसा इसलिए भी है कि महानगरों में या तो पानी पीने लायक नहीं है या फिर लोग ग्राउंड वॉटर पीने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में RO लगवाना अब एक मजबूरी बन चुका है लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पानी से भी कई बीमारियों का खतरा है? विशेषज्ञों के मुताबिक, आरओ से गंदगी के साथ वह मिनिरल्स भी निकल जाते हैं, जो हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी हैं। इनकी कमी से हड्डी, लिवर, किडनी, बीपी और दिल की बीमारी तक हो सकती है। यही वजह है कि नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूलन (एनजीटी) भी आरओ पर बैन लगाने की सिफारिश कर चुका है।

    केंद्र सरकार के उपभोक्ता मंत्रालय की तरफ से पानी की गुणवत्ता को लेकर किए गए 21 शहरों की सर्वे रिपोर्ट में दिल्ली को 21वें नंबर पर रखा गया है। ग्रेटर नोएडा का हाल भी अच्छा नहीं हैं। लोगों का कहना है कि यहां के पानी का टीडीएस आमतौर पर 300 से अधिक रहता है। इसके चलते लोग घरों में RO लगवा रहे हैं। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि आरओ से निकला बेहद कम टीडीएस का पानी पीने से भी बीमारियां हो सकती हैं।

    RO के पानी में नहीं होते मिनरल्स
    ग्रेटर नोएडा के यथार्थ अस्पताल की डॉ. आशिमा रंजन ने बताया कि वर्तमान पानी शुद्ध न मिलने की वजह से भी काफी बीमारियां हो रही हैं। ऐसे में लोग घर में आरओ लगवा लेते हैं, जो फायदे का सौदा नहीं है। दरअसल, शरीर को फिट रखने के लिए मिनरल्स की जरूरत होती है। घरों में लगे आरओ के पानी से ये मिनरल्स पूरी तरह निकल जाते हैं। ऐसे में यह पानी शरीर के लिए बेहतर नहीं है। आरओ के पानी को सॉफ्ट वॉटर भी कहा जाता है, जो प्यास तो बुझा सकता है लेकिन आपके स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर सकता।

    किडनी, लिवर, हार्ट के लिए फिट नहीं RO का पानी
    डॉ. आशिमा के मुताबिक, आरओ का पानी पीने से किडनी, हार्ट और लिवर संबंधी समस्या हो सकती है। उनका कहना है कि पानी को उबालकर पीना सबसे अच्छा साबित होता है। उबालने से पानी शुद्ध हो जाता है साथ ही इसके मिनरल्स भी नष्ट नहीं होते हैं। अगर आपके घर में आरओ लगा है तो उसका टीडीएस जरूर चेक करते रहें। अगर आरओ के पानी का टीडीएस लेवल 120 से 200 के करीब है तो उसके पानी को पीया जा सकता है।

    75 से कम नहीं होना चाहिए टीडीएस
    डॉक्टरों के अनुसार, पीने के पानी में टीडीएस की मात्रा 75 से कम नहीं होनी चाहिए। इससे कम टीडीएस वाला पानी पीने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और शरीर को जरूरी मिनरल्स नहीं मिल पाते हैं। वहीं, 150 से ज्यादा टीडीएस वाला पानी पीने से बीमारियां हो सकती हैं। इससे सबसे ज्यादा पथरी होने का आशंका रहती है। 500 से ज्यादा टीडीएस वाला पानी पीने से जानलेवा बीमारियां भी हो सकती हैं। पानी में सोडियम, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम, आयरन, कॉपर, फॉस्फेट, सेलेनियम आदि की मात्रा एक सामान होनी चाहिए। इसके ज्यादा या कम होने से बीपी, ब्लड प्रेशर, हीमॉग्लोबिन आदि की बीमारियां होने का खतरा बना रहता है।

    मिनरल नहीं तो कई खतरे
    सोडियम: कमी से बीपी लो हो जाता है तो अधिक सोडियम होने पर हाई बीपी हो जाता है।

    कैलशियम: कमी से हड्डियां कमजोर हो जाती है। कई बार हड्डियां गलने लगती हैं। इससे ऑस्टियोपोरोसिस तक हो जाता है।

    पोटैशियम: शरीर में कमजोरी और पैरालिसिस तक हो जाता है। मांसपेशियां ठीक से काम नहीं कर पातीं, जिससे दिल पर असर पड़ता है।

    मैग्नीशियम: यह सेल के भीतर मिनरल्स को मेंटेन करता है। इसकी कमी से ब्लड फ्लो में कमी आ जाती है।

    आयरन: यह हीमोग्लोबिन के लिए बहुत जरूरी है। इसकी कमी से एनीमिया हो जाता है।

    माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी जरूरी

    कॉपर: यह सेल साइकल को मेंटेंन करता है।

    फॉस्फेट: शरीर में एनर्जी मेंटेन करता है।

    सेलेनियम: शरीर में एंटी ऑक्सिडेंट का काम करता है।

  • इन 5 संकेतों से जानें, आपको ऑर्गैज्म हासिल हुआ या नहीं

    इन 5 संकेतों से जानें, आपको ऑर्गैज्म हासिल हुआ या नहीं

    फिल्में हों या फिर रियल लाइफ- मेल ऑर्गैज्म और क्लाइमैक्स पर तो सभी का फोकस रहता है लेकिन फीमेल ऑर्गैज्म के बारे में कम ही बात की जाती है। लेकिन अब बदलते वक्त के साथ लोगों की इस मेंटैलिटी में भी बदलाव हो रहा है। फिल्मों के साथ-साथ रियल लाइफ में भी सेक्स और ऑर्गैज्म की बात होने लगी है। लेकिन सिर्फ तेज कराहने की आवाज ही ऑर्गैज्म का संकेत नहीं है। हम आपको बता रहे हैं शरीर में होने वाले उन बदलावों के संकेतों के बारे में जिससे आप जान सकती हैं कि आपको क्लाइमैक्स हासिल हुआ या नहीं…

    ​आपकी स्किन लाल और उत्तेजित (flushed) हो जाती है

    जब आप सेक्शुअली स्टिमुलेटेड होती हैं और उत्तेजना महसूस होती है तो सिर्फ वजाइना में ही नहीं बल्कि शरीर के कई अंगों में ब्लड का फ्लो बढ़ जाता है जिससे आपकी स्किन, फेस, जांघ और ब्रेस्ट लाल होने के साथ-साथ हल्का गर्म भी हो जाता है। इस प्रक्रिया को सेक्स फ्लश भी कहते हैं।

    ​आपके जननांग बेहद सेंसेटिव हो जाते हैं

    अगर आपको ऑर्गैज्म हासिल हो गया है तो आपकी वजाइना यानी जननांग बेहद सेंसेटिव हो जाते हैं और उस वक्त उन्हें छूने का भी दिल नहीं करता। ऐसा इसलिए होता है कि क्योंकि क्लिटरिस में सैंकड़ों नर्व्स होते हैं और हर महिला क्लिटरिस स्टिमुलेशन पर अलग-अलग तरह से रिऐक्ट करती है।

    कंपकंपी या थरथराहट महसूस होना

    जब आप सेक्स करती हैं या फिर जब मास्टरबेशन के बाद ऑर्गैज्म हासिल करती हैं तो आपकी पेल्विक वॉल्स एक्सपैंड हो जाती हैं। इस दौरान रिलीज हुई सेक्शुअल एनर्जी की वजह से बहुत सी महिलाओं को कंपकंपी या थरथराहट भी महसूस होती है। हालांकि इसकी वजह से आपको किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं।

    ​सांस फूलना, हार्टबीट तेज होना

    अगर आप जिम सेशन करती हैं तो आपको पता होगा कि ऑर्गैज्म हासिल करना किसी कार्डियो सेशन जैसा ही है। जहां क्लाइमैक्स हासिल करते ही आपकी सांसे फूलने लगती हैं और दिल की धड़कन तेज हो जाती है।

    ​खुशी महसूस होना

    आखिरकार इतनी मेहनत के बाद जब आप क्लाइमैक्स हासिल कर लेती हैं तो इस दौरान ऑक्सिटोसिन जिसे लव हॉर्मोन भी कहते हैं नाम का एक हॉर्मोन रिलीज होता है जिससे आपको खुशी महसूस होती है।

  • आयुर्वेद कहता है बिलकुल न खाएं कच्चा खाना, ये है वजह

    आयुर्वेद कहता है बिलकुल न खाएं कच्चा खाना, ये है वजह

    इन दिनों रॉ फूड यानी कच्ची चीजें खाना सबसे पॉप्युलर डायट ट्रेंड में से एक हो गया है। फिर चाहे वजन घटाना हो या फिर फिट रहना हो ज्यादातर लोग कच्ची चीजें खाना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है इसमें फाइबर और पोषक तत्वों की मात्रा अधिक होती है और कैलरीज कम। लेकिन आयुर्वेद ऐसा नहीं मानता। आयुर्वेद के मुताबिक कच्चा खाना नहीं खाना चाहिए, यहां जाने इसके पीछे की वजह।

    ​क्या कहता है आयुर्वेद

    आयुर्वेद की मानें तो आपको सिर्फ फल, नट्स और सलाद ही कच्चा खाना चाहिए। इसके अलावा बाकी जितनी भी खाने की चीजे हैं और फूड आइटम्स हैं उन सभी को पकाकर ही खाना चाहिए। प्राचीन भारतीय मेडिकल सिस्टम की मानें तो खाने को पकाकर खाने से शरीर को 2 तरह से फायदा होता है।पहला- गर्म खाना आपके गट यानी आंत में ब्लड फ्लो को बढ़ाता है जिससे पाचन की प्रक्रिया बेहतर होती है।दूसरा- पका हुआ खाना पेट में आसानी से टूट जाता है जिससे भोजन के पोषक तत्व शरीर द्वारा आसानी से अब्जॉर्ब हो जाते हैं।

    ​साइंस इस बारे में क्या कहता है

    सिर्फ आयुर्वेद ही नहीं बल्कि साइंस भी इस दावे का समर्थन करता है। इस बारे में बहुत सी रिसर्च भी हो चुकी है जिसमें यह बात साबित हो चुकी है पका हुआ भोजन कच्चे भोजन से कहीं ज्यादा फायदेमंद होता है।

    ​पानी में पका भोजन है फायदेमंद

    एक स्टडी की मानें तो पानी में पके हुए भोजन में ऐंटीऑक्सिडेंट कॉन्टेंट अधिक होता है। इसके अलावा कच्ची सब्जियां अगर कोई खाए तो उसे पचाना बेहद मुश्किल होता है जिससे पेट में कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं।

    ​कच्चा सलाद खाने से पहले ये सावधानी बरतें

    इसका मतलब ये नहीं कि आप कच्ची चीजें खाना बिलकुल बंद कर दें। लेकिन सतर्कता बरतना जरूरी है। अगर आप स्प्राउट्स खा रहे हैं तो उन्हें कच्चा खाने की बजाए उबालकर खाएं। सलाद को कच्चा खाने से पहले हल्का से गुनगुना कर लें खासकर सर्दी के मौसम में। ऐसा इसलिए क्योंकि सर्दियों की तुलना में गर्मियों में हमारा पाचन तंत्र ज्यादा मजबूत रहता है।

    ​मॉनसून के सीजन में भूल से भी न खाएं

    बारिश के मौसम में तो कच्ची चीजें भूल से भी न खाएं। इस दौरान बैक्टीरियल और वायरल इफेक्शन्स ज्यादा फैला रहता है और आपके बीमार पड़ने की आशंका अधिक रहती है। सब्जियों को अच्छे से धोकर और पकाकर खाने से वे सेफ हो जाती हैं और बीमारियों का डर नहीं रहता।

  • यूं मिलेगा ब्रेस्ट से बेस्ट ऑर्गैज्म, जान लें ट्रिक्स और टिप्स

    यूं मिलेगा ब्रेस्ट से बेस्ट ऑर्गैज्म, जान लें ट्रिक्स और टिप्स

    जेनाइटल्स की उत्तेजना से मिलने वाले ऑर्गैज्म के बारे में ज्यादातर लोग जानते हैं लेकिन क्या आपने कभी निप्पल ऑर्गैज्म के बारे में सुना है? जी हां, ब्रेस्ट ऑर्गैज्म पॉसिबल है और इसके पीछे साइंटिफिक वजहें भी हैं। यहां जानें इसके बारे में डीटेल में…

    ट्राई करने से पहले जान लें कुछ बातें

    जब ब्रेस्ट प्ले की बात आती है तो हर महिला की अपनी प्रिफरेंस होती है। कुछ लोगों को पिंचिंग, ट्विस्टिंग वगैरह पसंद आती है वहीं कुछ को इसमें दर्द हो सकता है। इसलिए ऐसा कुछ ट्राई करने से पहले जान लें कि आपके लिए बेस्ट क्या है।

    बदलती रहती है ब्रेस्ट सेंसिटिविटी

    बता दें कि महिलाओं की ब्रेस्ट्स की सेंसिटिविटी वक्त के साथ बदलती रहती है। जैसे मेंस्ट्रुअल साइकल के पहले यह काफी सेंसिटिव हो जाते हैं और इनमें स्वेलिंग होती है। ऐसे में इनमें दर्द हो सकता है।

    बेस्ट क्लाइमेक्स की गारंटी

    वहीं इंट्रेस्टिंग बात यह है कि ब्रेस्ट को उत्तेजित करने से दिमाग का वही पार्ट ऐक्टिवेट होता है जो कि जननांगों को उत्तेजित करने से। फाइनली यह ऐक्ट क्लाइमेक्स तक भी ले जा सकता है लेकिन कई लोगों को यह बात पता नहीं होती।

    ब्रेस्ट हैं सेंसिटिव पार्ट

    इस बात को सपोर्ट करने के लिए और भी फैक्ट्स हैं जैसे ब्रेस्ट काफी सेंसिटिव बॉडी पार्ट होता है और जब महिलाएं उत्तेजित होती हैं तो इनका साइज 25 फीसदी तक बढ़ सकता है। इसमें काफी नर्व एंडिंग्स होती हैं जिनकी वजह से महिलाओं के अराउज्ड होने पर इनका रंग गहरा हो जाता है।

    मिलेगा बेस्ट ऑर्गैज्म

    हालांकि ब्रेस्ट ऑर्गैज्म इतना आसान नहीं होता लेकिन अगर आप यह समझने लगें कि आपके लिए कौन से टिप्स और ट्रिक्स बेस्ट हैं तो यह बेस्ट ऑर्गैज्म दे सकता है।

  • बिगाड़ सकती है आपकी सेहत का हाल YO-YO डायटिंग

    बिगाड़ सकती है आपकी सेहत का हाल YO-YO डायटिंग

    वेट गेन करने पर डायटिंग शुरू करना और वेट लूज हो जाने पर फिर से अनियमित लाइफस्टाइल फॉलो करना, आपके शरीर के लिए बहुत अधिक नुकसानदायक हो सकता है। वेट गेन और वेट लूज के अनियमित प्लान का जिक्र एक बार फिर काफी तेजी से हो रहा है तो इसका श्रेय जाता है बॉलिवुड ऐक्टर राणा दग्गुबाती को।

    ऐक्टर राणा दग्गुबाती ने बहुत ही तेजी से अपना वेट लॉस किया है। इस पर हेल्थ एक्टपर्ट्स का कहना है कि ऐसा करना सेहत के लिए इतना नुकसानदायक है कि आप किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ सकते हैं या आपको जान का भी खतरा हो सकता है।

    इस तरह का वेट गेन और वेट लॉस रूटीन अपनाने से पहले जरूरी है कि मेटाबॉलिक मेथ को समझा जाए। लोग जब अपनी डायट और एक्सर्साइज को लेकर लापरवाही बरतते हैं तो बड़ी मात्रा में कैलरी स्टोर करते हैं और जब उन्हें अपना वेट घटाना होता है तो डायटिंग करने लगते हैं, इसे yo-yo Dieting पैटर्न कहा जाता है।

    अगर आप वजन में थोड़ा बहुत अंतर करते हैं तब तो फिर भी बॉडी आसानी से झेल लेती है लेकिन अगर आप बार-बार अपने वजन को लेकर एक्सपेरिमेंट्स करते रहते हैं और कभी मोटी तो कभी पतले अवतार में आते रहते हैं तो इसके लिए आपको सेहत और डायट की डीप नॉलेज होना बहुत जरूरी है। क्योंकि युवा बड़ी संख्या में सिलेब्रिटीज को फॉलो करते हैं, ऐसे में उन्हें जागरूक रहना चाहिए। कहीं सेहत की अनदेखी भारी ना पड़ जाए।

  • हड्डियां रहेंगी तंदुरुस्त सेंकिए सर्दियों में धूप

    हड्डियां रहेंगी तंदुरुस्त सेंकिए सर्दियों में धूप

    नई दिल्ली। स्वस्थ जीवन के लिए हड्डियों को मजबूत बनाए रखना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। सर्द मौसम में दिल्ली जैसे महानगर में प्रदूषण के कारण लोगों तक सूर्य की किरणों से मिलने वाले प्राकृतिक विटामिन-डी कम ही पहुंच पाती है। ऐसे में लोगों के शरीर में विटामिन-डी की कमी होना लाजमी है। इस बारे में फोर्टिस राजन ढल हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के ऑर्थोस्कॉपी एंड स्पॉर्ट्स इंजुरी के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. विश्वदीप शर्मा ने कुछ प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डाला है।

    दिन में धूप सेंकने के उचित समय और विटामिन-डी के पर्याप्त स्तर को बनाए रखने को लेकर कई शोध किए गए हैं।

    आमतौर पर कहा जाता है कि शरीर का 20 प्रतिशत हिस्सा यानी बिना ढका हाथ और पैरों से प्रतिदिन 15 मिनट धूप का सेवन करने से विटामिन-डी अच्छी मात्रा में लिया जा सकता है। अगला प्रश्न यह है कि दिन का कौन सा पहर सूर्य की रोशनी के संपर्क में आने का सबसे उपयुक्त होता है। आम धारणा के अनुसार, सुबह का धूप और देर शाम का धूप सेवन के लिए उपयुक्त होता है, जबकि सच्चाई यह है कि सुबह 10 से दोपहर 3 बजे के बीच के दौरान धूप का सेवन मानव शरीर की त्वचा को विटामिन-डी प्रदान करता है। हालांकि धूप के सेवन के दौरान त्वचा पर सन-ब्लॉक क्रीम या लोशन नहीं लगे होने चाहिए।

    दिल्ली जैसे शहर, जहां प्रदूषण के कारण लोगों तक धूप नहीं पहुंच पाती है, वहां लोग दुग्ध उत्पादों व आहार के जरिए विटामिन डी का सेवन कर सकते हैं। महिलाओं में विशेष रूप से प्री-मेनोपॉजल और पोस्ट-मेनोपॉजल की श्रेणी की महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोमलेशिया होने की संभावना होती है। वहीं खुद को पूरी तरह से ढकने वाली महिलाओं व सनक्रीम लगाने वाली महिलाओं में भी विटामिन-डी की मात्रा काफी कम होती है, क्योंकि उनकी त्वचा के अंदर धूप प्रवेश नहीं कर पाता है। वहीं बच्चों में विटामिन डी की कमी से रिकेट्स की समस्या होने लगती है।

    बच्चों को शुरुआत में ही पर्याप्त आहार के साथ-साथ अच्छी धूप का सेवन कराना आवश्यक होता है। बच्चों को खास कर उन बच्चों को जिन्होंने मां का दूध पीना छोड़ दिया है, उन्हें विटामिन डी से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन कराना आवश्यक है।

    वहीं सर्दियों में हड्डियों को स्वस्थ रखने में अच्छी मात्रा में कसरत करने से भी फायदा मिलता है। कसरत से हड्डियों का घनत्व बना रहता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है।

  • ब्रेकफस्ट, लंच और डिनर करने का जानें बेस्ट टाइम

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    खाना खाना एक सिंपल काम लग सकता है लेकिन छोटी-छोटी गलतियां इससे होने वाले फायदों पर बड़ा असर डाल सकती हैं। यह जानना जरूरी है कि जब खाने की बात आती है तो इसका टाइम सबसे अहम फैक्टर है। वक्त का ध्यान रखकर आप वजन पर नियंत्रण रखने के साथ दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम्स से बच सकते हैं।

    जानें, खाने का बेस्ट टाइम

    कई बार आप ब्रेकफस्ट में देर कर देते हैं या वर्काउट के बाद खाना स्किप कर देते हैं। कई बार आप बिस्तर पर जाने के ठीक पहले खा लेते हैं। दिन में कई बार खाने के बीच में लंबा गैप हो जाता है। खाने का बेस्ट टाइम कब हो यह पता लगाना ट्रिकी हो सकता है, यहां है आपके के लिए हैं कुछ टिप्स…

    ब्रेकफस्ट

    सुबह सोकर उठने के 30 मिनट के अंदर ब्रेकफस्ट कर लें। ब्रेकफस्ट करने का सबसे अच्छा टाइम सुबह 7 बजे होता है। 10 बजे के बाद तक नाश्ते का टाइम डिले न करें। ध्यान रखें कि आपके नाश्ते में प्रोटीन हो।

    लंच

    लंच करने का बेस्ट टाइम 12: 45 मिनट है। ब्रेकफस्ट और लंच के बीच कम से कम 4 घंटे का अंतर रखें। लंच का टाइम 4 बजे तक डिले न करें।

    डिनर

    डिनर करने का बेस्ट टाइम शाम 7 बजे है। रात के खाने और सोने के बीच कम से कम 3 घंटे का फर्क रखें। 10 बजे तक डिनर डिले न करें। सोने से पहले खाने से आपकी नींद डिस्टर्ब हो सकती है।

    वर्काउट

    कभी भी खाली पेट वर्काउट न करें। वर्काउट के पहले खाने के लिए सबसे सबसे अच्छे ऑप्शंस प्रोटीन सैंडविच, प्रोटीन शेक, होल वीट ब्रेड के साथ स्क्रैम्बल्ड एग, पीनट बटर सैंडविच वगैरह हैं।