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  • Rectal Cancer का खतरा बढ़ा रहे ऐंटीबायॉटिक्स

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    सर्दी-खांसी, बुखार या फिर किसी छोटी-मोटी बीमारी के लिए भी अगर आप ऐलोपैथिक डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर सबसे पहले 3 या 5 दिन की ऐंटीबायॉटिक दवा का कोर्स लिख देते हैं ताकि मरीज जल्दी ठीक हो जाए। कई बात तो बिना डॉक्टर से पूछे भी बहुत से लोग बीमार होने पर ऐंटीबायॉटिक खा लेते हैं। अगर आप भी ऐसा करते हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि इससे कोलोन या रेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

    ऐंटीबायॉटिक्स का हो रहा है ज्यादा इस्तेमाल

    एक नई स्टडी में यह बात सामने आयी है कि सिंगल कोर्स ऐंटीबायॉटिक के सेवन से भी कोलोन यानी मलाशय का कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। Gut नाम के जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे ऐंटीबायॉटिक- दवा की इस कैटिगरी का समझदारी से इस्तेमाल करने की जरूरत है क्योंकि डॉक्टर्स भी इसे जरूरत से ज्यादा प्रिस्क्राइब कर रहे हैं और इसका बहुत ज्यादा यूज हो रहा है।

    ऐंटीबायॉटिक के इस्तेमाल की हमारी लापरवाही से यह लाइलाज महामारी

    अमेरिका में भारतीय सुपरबग के कारण एक महिला की मौत हो गई है। पता चला है कि दुनिया की कोई भी ऐंटीबायॉटिक इस संक्रमण का इलाज नहीं कर सकती है।साल 2008 में भारतीय मूल की एक स्वीडिश महिला के अंदर पहली बार यह सुपरबग पाया गया था। डॉक्टरों ने इसे न्यू डेली मेटालो-बीटा-लेक्टामेस (NDM) का नाम दिया है। इस खबर से अगर आपको डर लग रहा है, तो बिल्कुल सही लग रहा है। इसके नतीजे इतने भयानक हो सकते हैं, जिसका शायद आप ठीक-ठीक अनुमान भी ना लगा सकें। यह सुपरबग हम भारतीयों की लापरवाही के कारण पैदा होता है। एक ऐसी लापरवाही जो अगर तत्काल ना रोकी गई, तो आने वाले समय में एक भयंकर लाइलाज महामारी का रूप ले लेगी। इसकी चपेट में ना केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया आ सकती है। आगे की स्लाइड्स में इसके बारे में विस्तार से जानिए…
    भारत में यह बीमारी दिनोंदिन अपने पैर फैला रही है। न्यू यॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2013 में करीब 58,000 नवजात और छोटे बच्चे इसके कारण मारे गए। ये नवजात ऐसी बीमारी के साथ पैदा होते हैं, जिसपर कोई भी ऐंटीबायॉटिक असर नहीं करती।ऐसा नहीं कि मरने वालों में सिर्फ नवजात हैं। नवजातों को यह बीमारी मां के गर्भ में मिल रही है। इसका मतलब, बड़ी संख्या में वयस्क भी इस जानलेवा स्थिति के शिकार हो रहे हैं।सोचिए, बीमार पड़ने पर दवाओं से इलाज कर लेते हैं, लेकिन अगर आपकी बीमारी का दुनिया भर में कोई इलाज ही ना हो, तो? सोचिए कि एक छोटा सा घाव भरने की जगह आपकी जान ही ले ले?

    पिछली बार जब आप बीमार पड़े थे, तब आपने जो दवा खाई वह क्या डॉक्टर की सलाह लेकर खाई? बिना डॉक्टर के पास गए कितनी बार आपने खुद ही दवा की दुकान से ऐंटीबायॉटिक खरीदकर अपना इलाज किया?आपको लगा कि आप डॉक्टर के पास नहीं जाकर अपने पैसे बचा रहे हैं, लेकिन असल में आपकी यह आदत एक वैश्विक महामारी का रूप ले सकती है। बिना जरूरत के और बिना चिकित्सीय सलाह के दवा लेना आपको बहुत बहुत बहुत ज्यादा बीमार कर सकता है।इसके कारण आपके शरीर की रोग से लड़ने की क्षमता खत्म हो सकती है। इसके कारण आपके शरीर में ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जहां कोई भी ऐंटीबायॉटिक आपकी बीमारी का इलाज नहीं कर सकेगी। सर्दी और न्यूमोनिया जैसी साधारण बीमारियां आपकी जान ले सकती हैं। एक छोटा सा घाव बढ़कर आपके मौत की वजह बन सकता है।

    न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 के बाद भारतीय अस्पतालों में मल्टीड्रग रेज़िस्टेंट इंफेक्शन्स से ग्रस्त मरीजों की संख्या अप्रत्याशित तौर पर बढ़ रही है।शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में ऐसे जीवाणु बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जिनपर किसी भी ऐंटीबायॉटिक का कोई असर नहीं होता। यहां के पानी, नालों, जानवरों, मिट्टी और बड़ी तादाद में इंसानों के अंदर ऐसे जीवाणु पाए गए हैं, जिनका इलाज दुनिया की कोई भी ऐंटीबायॉटिक दवा नहीं कर सकती है।

    भारत में ऐंटीबायॉटिक के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता का इतना अभाव है कि लोग सर्दी और जुकाम जैसी स्थिति में भी ऐंटीबायॉटिक खा लेते हैं। याद रखिए, केवल जीवाणुओं के संक्रमण में ऐंटीबायॉटिक असर करता है, फंगल और वायरल संक्रमण पर नहीं।बिना डॉक्टरी सलाह के ऐंटीबायॉटिक खाना ऐसा ही है जैसे कि आप जहर खाकर बीमारी का इलाज कर रहे हैं।

    भारत के मशहूर संगीतज्ञ यू. श्रीनिवास का 45 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्हें ऐसा संक्रमण हुआ था, जिसका इलाज दुनिया के किसी भी डॉक्टर के पास नहीं था। भारतीय अस्पताल तो ऐसे लाइलाज संक्रमणों का कारखाना ही बन गए हैं।​भारतीय अस्पतालों में कितनी भीड़ होती है, यह किसी से नहीं छुपा। यहां साफ-सफाई के इंतजाम भी सही नहीं होते हैं। शौचालय गंदे होते हैं, हाथ धोने का साबुन मौजूद नहीं होता और पानी गंदा होता है। ऐसे में इस तरह के लाइलाज जीवाणुओं के संक्रमण का खतरा और भी बढ़ जाता है। इनके फैलने की संभावना और मजबूत हो जाती है।

    भारत में साफ-सफाई को लेकर जागरूकता बहुत कम है। यहां ऐंटीबायॉटिक्स के बिकने पर लंबे समय तक कोई पाबंदी नहीं थी।अभी भी, आप बिना डॉक्टर की पर्ची के आसानी से किसी दवा दुकान में जाकर ऐंटीबायॉटिक खरीद सकते हैं। इसके कारण ऐंटीबायॉटिक्स के बेअसर होने के मामलों की सुनामी आ गई है। ऐसा नहीं कि इसके कारण केवल भारत पर ही संकट है, बल्कि भारत की सीमाओं से निकलकर यह संक्रमण दुनिया के कोने-कोने तक फैल रहा है।

    कई शोधों में पाया गया है कि विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों में ऐसे जीवाणुओं की मौजूदगी ज्यादा है, जो कि ऐंटीबायॉटिक्स के प्रतिरोधक होते हैं। भारत इस मामले में पहले नंबर पर है।विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में जीवाणुओं का प्रसार बेहद आसान है। बड़ी संख्या में अब भी भारतीय खुले में शौच करते हैं। इसके अलावा जो लोग शौचालयों का इस्तेमाल करते भी हैं, उनके यहां से निकलने वाला मल बिना किसी उपचार के नालों और नदियों-तालाबों में बहा दिया जाता है। दुनिया में जीवाणुओं से संक्रमित होने में भारतीय सबसे आगे हैं। किसी भी अन्य देश के मुकाबले भारतीय कहीं ज्यादा ऐंटीबायॉटिक इस्तेमाल करते हैं।

    स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े लोग दशकों से ऐंटीबायॉटिक्स के बेतहाशा इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दे रहे थे। 20वीं सदी में ऐंटीबायॉटिक्स की खोज एक चमत्कार जैसी थी।​इसके कारण इंसानों की जिंदगी काफी बेहतर हुई। अब ऐंटीबायॉटिक के अनियंत्रित और बेतहाशा इस्तेमाल के कारण ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जहां जीवाणु बेहद मजबूत हो जाते हैं। जीवाणु इतने प्रबल हो जाते हैं कि उनपर कोई ऐंटीबायॉटिक असर नहीं करती। सितंबर 2014 में ओबामा प्रशासन ने इस समस्या से निपटे के लिए उपायों की घोषणा की। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया।

    डॉक्टर्स का कहना है कि भारत में स्वच्छता और साफ-सफाई की बेहतर मौजूदगी नहीं होने के कारण संक्रमण के खतरों को कम करने के लिए ऐंटीबायॉटिक्स पर निर्भरता काफी बढ़ जाती है।नतीजन, ऐंटीबायॉटिक्स बेअसर हो रहे हैं और सबसे ज्यादा असर नवजात बच्चों पर पड़ रहा है। भारत के टॉप शिशु रोग विशेषज्ञों का मानना है कि तुरंत पैदा होने वाले नवजातों के अंदर इस तरह के संक्रमणों की मौजूदगी बताती है कि समाज और गर्भवती महिलाओं के अंदर बड़ी संख्या में ऐसे जीवाणु मौजूद हैं।

    न्यू यॉर्क टाइम्स ने साल 2014 में भारत भर के कई अस्पतालों में डॉक्टर्स से बात की थी। पाया गया कि ज्यादातर नवजात शिशु ऐसे संक्रमण के साथ पैदा हो रहे हैं, जिनपर कोई ऐंटीबायॉटिक असर नहीं करती।​भारत में हर साल बड़ी संख्या में विदेशों से लोग इलाज कराने आते हैं। सुपरबग की खोज भारत के इस फलते-फूलते कारोबार को भी खत्म कर सकती है। टीबी का इलाज कराने वालों, ऑपरेशन कराने वालों, कैंसर के मरीजों या फिर ऑर्गन-हड्डी ट्रांसप्लांट कराने वाले लोगों को सुपरबग के संक्रमण का खतरा काफी ज्यादा होता है।

    भारत में टीबी के सबसे ज्यादा मरीज पाए जाते हैं। हाल में हुए कई शोधों में जनेटिक्स जांच से पता चला कि टीबी के जिन मरीजों का इलाज नहीं हुआ, उनमें से करीब 10 फीसद रोगी ऐसे हैं, जिनके अंदर सुपरबग पाया गया। उनके संक्रमण का किसी भी ऐंटीबायॉटिक से इलाज नहीं हो सकता है।

    सबसे डरावनी बात यह है कि इन मरीजों को अस्पतालों में नहीं, बल्कि अपने घरों पर यह संक्रमण हो रहा है। ऐसे में इस महामारी को रोकना काफी मुश्किल है।नैशनल इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च इन टीबी की निदेशक डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन ने एक विदेशी अखबार को दिए गए अपने इंटरव्यू में बताया था कि अगर सरकार गंभीर और तत्काल कार्रवाई नहीं करती है, तो जल्द ही भारत में टीबी लाइलाज बीमारी हो जाएगी। इसके मरीजों को किसी भी ऐंटीबायॉटिक से ठीक नहीं किया जा सकेगा।

    हाल के वर्षों तक डॉक्टर्स बच्चों को संक्रमण के खतरे से बचाने के लिए हाथ खोलकर ऐंटीबायॉटिक के टीके लगाया करते थे। कई जगहों पर तो यह बदस्तूर चालू है। ये संक्रमण ज्यादातर साफ-सफाई के अभाव में होते हैं। अब इस बारे में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया गंभीरता दिखा रही है।

    डॉक्टर्स के बीच जागरूकता बढ़ तो रही है, लेकिन स्थिति अब भी बेहद गंभीर है। और तो और, वैज्ञानिकों ने पशुपालन पर एक शोध किया।इसमें जिन मुर्गे-मुर्गियों की जांच की गई, उनमें से 40 फीसद के अंदर ऐसे जीवाणु पाए गए जिनपर कोई भी ऐंटीबायॉटिक्स असर नहीं करती। ऐसे मुर्गों को जब लोग खाते हैं, तो ये जीवाणु उनके अंदर भी चले जाते हैं।

    क्यों करते हैं ऐंटीबायॉटिक्स का इस्तेमाल- जो अक्सर गंभीर नहीं होते, लेकिन ठीक नहीं होने पर बाकी लोगों में फैल सकते हैं।- ऐसी बीमारियों में जहां ऐंटीबायॉटिक लेने से ठीक होने की रफ्तार तेज हो जाती है।- स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी परेशानी, जिसके ठीक ना होने पर कई और तरह की दिक्कतें हो सकती हैं।- जीवाणुओं से होने वाले संक्रमण के मामलों में।- कई बार ऐंटीबायॉटिक इलाज के लिए नहीं, बल्कि बचाव के लिए दिया जाता है।- फंगल और वायरल संक्रमण में ऐंटीबायॉटिक से कोई फायदा नहीं मिलता।

    अब क्यों नहीं होता ऐंटीबायॉटिक्स का ज्यादा इस्तेमाल- ज्यादातर संक्रमण विषाणुओं के कारण होता है, जिनपर ऐंटीबायॉटिक का असर नहीं होता- ऐंटीबायॉटिक के इस्तेमाल से ठीक होने की प्रक्रिया तेज तो हो जाती है, लेकिन इसके कई साइड इफेक्ट भी हैं- छोटी-मोटी परेशानियों में ऐंटीबायॉटिक लेने पर गंभीर बीमारियों के संक्रमण को ठीक करने का उनका असर कम हो जाता है

    किन्हें है जीवाणुओं के संक्रमण का ज्यादा खतरा- 75 से अधिक उम्र के लोग- नवजात बच्चे, खासतौर पर जन्म लेने के पहले 72 घंटों के दौरान- दिल की बीमारी के मरीज- डायबीटीज़ के ऐसे मरीज, जिन्हें इंसुलिन लेना पड़ता है- ऐसे लोग जिनके शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता कमजोर है

    और कब हो सकता है इस्तेमाल- अगर आपका ऑपरेशन होने वाला है- जोड़ों का रिप्लेसमेंट होने वाला है- ब्रेस्ट इंप्लांट सर्जरी करा रही हैं- पेसमेकर लगाया जा रहा है- पित्ताशय निकाला जा रहा है- अपेंडिक्स निकाला जा रहा है- घाव होने या फिर जानवरों द्वारा काटे जानेपरचेतावनी: किसी भी स्थिति में बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न खाएं। ऐंटीबायॉटिक का इस्तेमाल बिना डॉक्टरी सलाह के न करें। बिना डॉक्टर की पर्ची के अगर कोई दुकानदार ऐंटीबायॉटिक बेच रहा है, तो यह गैरकानूनी है। इसकी शिकायत करें।

    साइड इफेक्ट की वजह से क्रॉनिक बीमारियों का खतरा
    इस स्टडी की लीड ऑथर सिंथिया सियर्स कहती हैं, हमारी रिसर्च इस बात पर जोर देती है कि इस तरह की दवाइयों का शरीर पर कितना बुरा असर होता है और इनसे कई तरह की क्रॉनिक बीमारियां भी हो सकती हैं। इस स्टडी में यूके के 1 करोड़ 10 लाख मरीजों के डेटा की जांच की गई जिसमें जनवरी 1989 से दिसंबर 2012 यानी 23 साल के पीरियड की जांच हुई। इसमें करीब 28 हजार 890 मरीजों को कोलोरेक्टल कैंसर होने की बात सामने आयी।

    ऐंटीबायॉटिक एक्सपोजर से मलाशय के कैंसर का खतरा
    इन मेडिकल रिकॉर्ड्स का इस्तेमाल हर एक केस हिस्ट्री की जांच करने के लिए किया गया जिसमें कोलोन कैंसर के रिस्क फैक्टर्स जैसे- मोटापे का इतिहास, धूम्रपान, ऐल्कॉहॉल का सेवन, डायबीटीज और ऐंटीबायॉटिक के यूज पर भी ध्यान दिया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों को कोलोन कैंसर हुआ वे ऐंटीबायॉटिक्स के प्रति ज्यादा एक्सपोज्ड थे।

    धूम्रपान से ज्यादा खतरनाक है मोटापा

    हाल ही में हुई एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि मोटे लोगों में कैंसर होने का खतरा, धूम्रपान यानी स्मोकिंग करने वालों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। यूके के कैंसर रिसर्च की तरफ से यह स्टडी करवायी गई थी। स्टडी के मुताबिक, यूके के करीब एक तिहाई लोग मोटापे का शिकार हैं जबकि स्मोकिंग अब भी कैंसर के उन कारकों में शामिल हैं जिन्हें रोका जा सकता है।

  • हेल्थ के लिए अच्छा उबासी लेना है, होते हैं ये 5 फायदे

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    उबासी लेना बॉडी का एक नैचरल प्रॉसेस है जिसे कंट्रोल नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि उबासी या जम्हाई पर लोग ज्यादा ध्यान भी नहीं देते। वैसे तो अक्सर इसे आलस या नींद के साथ जोड़ा जाता है लेकिन क्या आपको पता है कि उबासी लेना हमारे शरीर को 5 तरह से फायदा पहुंचाता है।

    ब्रेन होता है कूल

    उबासी लेने के दौरान व्यक्ति मुंह खोलकर कूल एयर सांस के साथ अंदर लेता है। इससे ज्यादा ऑक्सिजन ब्रेन तक जाती है जिससे ब्रेन के हॉट ब्लड को नीचे की ओर फ्लो होने और उसकी जगह कूल ब्लड के पहुंचने में मदद मिलती है। यह दिमाग के ओवरऑल तापमान को कम करने में मदद करता है।

    शरीर में बढ़ता है ऑक्सिजन का फ्लो

    उबासी लेने के दौरान हम गहरी सांस लेते हैं जिससे ऑक्सिजन की मात्रा शरीर में ज्यादा जाती है और इससे बॉडी में जमा हुई कार्बन डाइऑक्साइड को शरीर से बाहर निकालने में मदद मिलती है। यह लंग्स के साथ ही दिमाग के लिए भी अच्छा होता है।

    अलर्ट रहने में मदद

    आमतौर पर उबासी को नींद के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि यह व्यक्ति को अलर्ट रहने में मदद करती है। दरअसल, उबासी शारीरिक क्रिया की श्रेणी में आती है और जब तक किसी भी तरह की फिजिकल ऐक्टिविटी होती रहती है तब तक व्यक्ति सो नहीं सकता, जो उसे अपने आसपास की चीजों के प्रति सजग बने रहने में मदद करता है।

    कान के दर्द को करता है दूर

    आपने भी ध्यान दिया होगा कि फ्लाइट में अक्सर एयर प्रेशर के कारण कान बंद हो जाते हैं जिससे दर्द होता है, इस स्थिति में अगर उबासी ली जाए तो कान खुल जाते हैं और दर्द से तुरंत राहत मिलती है। दरअसल, उबासी कान में बनने वाले एयर प्रेशर को रिलीज करने लगता है जिससे पर्दे पर दबाव नहीं बनता और दर्द चला जाता है।

  • न दें 2 साल से कम उम्र के बच्चों को फ्रूट जूस: एक्सपर्ट्स

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    फ्रूट जूस पीना भला किसे पसंद नहीं। इससे न सिर्फ जरूरी पोषक तत्व शरीर को मिलते हैं बल्कि पानी की कमी भी दूर हो जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिशुओं और छोटे बच्चों को फ्रूट जूस बिल्कुल भी नहीं देना चाहिए, फिर चाहे वह फ्रेश हो या फिर पैक्ड जूस। खासकर 2 साल से 18 साल की उम्र के बीच के बच्चों को फ्रूट जूस या फ्रूट ड्रिंक्स पीने से रोकना चाहिए। इसके बजाय बच्चों को मौसमी फल खिलाने चाहिए ताकि उनकी सेहत दुरुस्त रहे। ऐसा एक्सपर्ट्स का कहना है।

    आइडियन अकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के न्यूट्रिशन चैप्टर द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय सलाहकार समूह यानी नैशनल कंसल्टेटिव ग्रुप ने हाल ही में फास्ट ऐंड जंक फूड्स, शुगर स्वीटन्ड बेवरेजेस और एनर्जी ड्रिंक्स को लेकर ताजा दिशानिर्देश जारी किए हैं और उन्हीं में कहा गया है कि शिशुओं व छोटे बच्चों को फ्रूट जूस देने के बजाय मौसमी फल खिलाने चाहिए।

    इस समूह ने सलाह दी है कि अगर बच्चों को फ्रूट जूस या फिर फ्रूट ड्रिंक्स दिए भी जाते हैं तो उसकी मात्रा 2 से 5 साल की उम्र के बच्चों के लिए प्रति दिन 125ml यानी आधा कप होनी चाहिए, जबकि 5 साल से अधिक आयु वाले बच्चों को एक कप यानी प्रति दिन 250 ml के हिसाब से फ्रूट जूस देना चाहिए। राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सीनियर पीडिऐट्रिशन डॉ. हेमा गुप्ता मित्तल, जोकि इस सलाहाकर समूह यानी कन्सलटेटिव ग्रुप का भी हिस्सा हैं, उन्होंने कहा, ‘बच्चों को बताई गई मात्रा में दिया जाने वाला फ्रूट जूस एकदम फ्रेश होना चाहिए। चाहे फलों का जूस ताजा हो या फिर डिब्बाबंद, इनमें शुगर की मात्रा तो अधिक होती ही है, साथ ही कैलरी भी ज्यादा होती हैं। वहीं फल मांसपेशियों के विकास में मदद करते हैं और डेंटल हेल्थ के लिए भी जरूरी हैं।’

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    बच्चों को चाय-कॉफी कितनी मात्रा में?
    वहीं ऐसे कैफीनयुक्त ड्रिंक्स पर जारी किए गए आईएपी के दिशानिर्देशों के अनुसार, 5 साल से कम उम्र के बच्चों को कार्बोनेटेड ड्रिंक्स जैसे कि चाय और कॉफी से बिल्कुल दूर रहना चाहि। स्कूल जाने वाले बच्चों और किशोरों की बात करें तो 5 से 9 साल के बच्चों के लिए चाय या कॉफी की मात्रा प्रति दिन आधा कप रहनी चाहिए, जबकि 10 से 18 साल के बच्चों के लिए प्रति दिन 1 कप चाय या कॉफी देनी चाहिए। बशर्ते उन्हें कैफीनयुक्त अन्य कोई चीज न दी जाए। आईएपी ग्रुप ने जंक फूड को JUNCS नाम की टर्म से रिप्लेस करने की भी सलाह दी है ताकि अनहेल्दी फूड्स से संबंधित अन्य चीजों और कॉन्सेप्ट्स को इसमें शामिल किया जा सके। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ऐसा इसलिए किया गया है ताकि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स, कैफीनयुक्त ड्रिंक्स और शुगर स्वीटन्ड बेवरेजेस को इसमें शामिल किया जा सके। छोटे बच्चों को बिल्कुल भी न दें ये फूड


    क्या हो सकती हैं दिक्कतें?

    आईएपी की गाइ़डलाइन कहती है कि इन खाद्य पदार्थों और ड्रिंक्स का सीधा संबंध हाई बॉडी मास इंडेक्स से होता है और बच्चों में हार्ट संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा कैफीनयुक्त ड्रिंक्स पीने से नींद आने में दिक्कत होने लगती है। भारतीय बच्चों में फास्ट फूड और शुगर स्वीटन्ड बेवरेजेस की खपत में वृद्धि को देखते हुए ये दिशानिर्देश काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय बच्चों में ऐसी चीजों की खपत ज्यादा इसलिए है क्योंकि ये आसानी से मिल जाती है, अगर पैरंट्स वर्किंग हैं तो भी उस स्थिति में प्रोसेस्ड फूड्स और ड्रिंक्स एक तरह से वरदान का काम करते हैं। इसके अलावा इन्हें आकर्षक पैकेजिंग में परोसा जाता है, जिसकी वजह से बच्चे इनकी ओर अधिक आकर्षित होते हैं।

    13 अगस्त को सेंटर फॉर साइंस ऐंड इन्वाइरनमेंट यानी सीएसई द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक, 9 से 14 साल के 200 बच्चों में से 93 फीसदी ऐसे बच्चे थे जो हफ्ते में एक बार से अधिक पैकेज्ड या प्रोसेस्ड फूड आइटम्स खाते हैं वहीं 68 फीसदी बच्चे ऐसे थे जो इसी टाइम पीरियड में पैकेज्ड शुगर स्वीटन्ड बेवेरेजस का सेवन करते हैं। वहीं 53 फीसदी ऐसे बच्चों का भी आंकड़ा था जो कम से कम दिन में एक बार ये चीजें खाते हैं। ज्यादा फ्रूट जूस पीने से समय से पहले मौत का खतरा: स्टडी

    एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसकी वजह से बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट संबंधी परेशानियां, डेंटल हेल्थ इशूज और बिहेवियरल चेंजेस अत्यधिक होने लगे हैं।
    आईएपी ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI के एक सुझाव की वकालत करते हुए सुझाव दिया है कि सभी पैक खाद्य पदार्थों की ट्रैफिक लाइट कोडिंग की जाए ताकि जंक फूड्स के खतरे से लड़ा जा सके। इसके अलावा ऐसे उत्पादों के विज्ञापन और विपणन के लिए अलग-अलग दिशानिर्देश विकसित किए जाएं।

    भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के सीईओ पवन अग्रवाल ने कहा कि इस संबंध में उन्होंने एक प्रपोजल पर प्रोसेस्ड फूड इंडस्ट्री से बात की है। उन्होंने उन उत्पादों के पैकेटों के सामने लाल रंग की कोडिंग प्रदर्शित करने का प्रस्ताव रखा है जिनमें फैट, शुगर या सॉल्ट यानी नमक की अत्यधिक मात्रा है। बकौल पवन अग्रवाल, ‘इस इंडस्ट्री के कुछ रिजर्वेशन्स हैं और हम इस बात पर एक आम सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन्हें कैसे लागू किया जाए।

     

  • Mental disorder की ओर पहला इशारा जाने क्या है लक्षण ?

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    मेंटल डिसऑर्डर को लेकर आज भी भारत में बहुत कम जागरूकता है। इस वजह से अक्सर इलाज तब शुरू हो पाता है जब स्थिति काफी बिगड़ जाती है। ऐसे में ज्यादा दवाइयां और अन्य उपायों का सहारा लेकर मरीज के डिसऑर्डर को दूर करने की कोशिश की जाती है। यह इलाज लंबा या जिंदगीभर चल सकता है।

    अगर मेंटल डिसऑर्डर के लक्षणों को शुरुआत में ही पहचान लिया जाए तो व्यक्ति को नॉर्मल होने व आम लोगों जैसा जीवन जीने में मदद मिलती है और उसके पूरी तरह ठीक होने के चांस भी काफी ज्यादा होते हैं। हम बता रहे हैं ऐसे ही कुछ मुख्य लक्षणों के बारे में:

    • दुखी महसूस करना और किसी चीज से खुशी न मिलना
    • किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होना
    • बहुत ज्यादा डर लगना और चिंता होना
    • मूड में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव
    • दोस्तों और ऐक्टिविटीज से दूर होना
    • सोने में परेशानी, थकान महसूस करना और ऊर्जा में कमी आना
    • रिऐल्टी से दूर होना और इमेजिनेशन का सोच पर हावी होना व उसको रिऐल्टी समझना
    • रोजमर्रा की परेशानियों का सामना करने में परेशानी
    • दूसरों की स्थिति को समझने में परेशानी आना
    • ड्रग्स लेना या शराब का बहुत ज्यादा सेवन
    • खाने की आदतों में बदलाव आना
    • सेक्स ड्राइव में बदलाव
    • बहुत ज्यादा गुस्सा आना, चीजें तोड़ना, मारना
    • आत्महत्या का ख्याल आना या खुद को नुकसान पहुंचाना

    कई बार मेंटल डिसऑर्डर के लक्षण फिजिकली भी दिखाई देते हैं। इससे गुजरने वाले व्यक्ति को पेट में दर्द, खाने में दिक्कत, मोशन में दिक्कत, पीठ में दर्द, सिरदर्द जैसी परेशानियां होती हैं।

    कब दिखाएं डॉक्टर को
    अगर आपको ऊपर लिखे लक्षणों में से कोई एक भी दिखाई दे तो बेहतर यही है कि आप डॉक्टर को दिखाएं। सही डायग्नोज होने पर उसी के मुताबिक इलाज शुरू किया जा सकेगा। यह ध्यान रहे कि इलाज जितनी जल्दी शुरू होगा मरीज के पूरी तरह ठीक होने के चांस भी उतने ही ज्यादा होंगे।

  • 64% भारतीय नहीं करते एक्सरसाइज, कैसे बनेगा इंडिया फिट?

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    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज नैशनल स्पोर्ट्स डे के मौके पर देश में फिट इंडिया मूवमेंट लॉन्च करने जा रहे हैं ताकि देशवासियों को फिटनेस के बारे में ज्यादा से ज्यादा जागरुक किया जा सके। लेकिन हकीकत यही है कि हम भारतीय एक्सर्साइज करने के मामले में बेहद पीछे हैं। ज्यादातर लोग उतनी एक्सर्साइज करते ही नहीं जितनी उन्हें करनी चाहिए।

    एक्सर्साइज नहीं करते 64 प्रतिशत भारतीय

    अब तक हुए कई सर्वे में यह बात सामने आ चुकी है कि करीब 64 प्रतिशत भारतीय ऐसे हैं जो एक्सर्साइज नहीं करते और उनमें भी 18 से 47 साल के बीच के एज ग्रुप वालों की एक्सर्साइज न करने की तादाद 30 से 40 प्रतिशत है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ICMR की एक स्टडी के मुताबिक करीब 54 प्रतिशत भारतीय किसी भी तरह की शारीरिक गतिविधि नहीं करते और महज 10 प्रतिशत ऐसे हैं जो थोड़ी बहुत शौकिया फिजिकल ऐक्टिविटी कर लेते हैं।

    फिजिकल इनऐक्टिविटी की वजह से डायबीटीज, कैंसर जैसी बीमारियां
    फिजिकल इनऐक्टिविटी यानी शारीरिक निष्क्रियता ज्यादातर क्रॉनिक और गैर संक्रामक बीमारियों की सबसे बड़ी वजह है। 4 सबसे कॉमन गैर संक्रामक बीमारियां हैं- हार्ट डिजीज, कैंसर, डायबीटीज और सांस से जुड़ी बीमारी जिसकी वजह से 30 से 70 साल के बीच के करीब 60 प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है। बीमारियों का यह बोझ, हेल्थ पर होने वाले खर्च के साथ-साथ देश की आर्थिक उत्पादकता पर भी बोझ बढ़ाता है। यूनाइटेड नेशन्स की तरफ से यह सुझाव भी दिया गया है कि एक्सर्साइज को हर व्यक्ति के मेडिकल रेकॉर्ड में जांच संबंधी सवाल के तौर पर शामिल करना चाहिए।

     

    हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट की शारीरिक गतिविधि है जरूरी
    साल 2018 में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन WHO ने दुनियाभर में एक ऐक्शन प्लान लॉन्च किया था ताकि फिजिकल ऐक्टिविटी को बेहतर बनाया जा सके और गैर संक्रामक बीमारियों को रोकने की कोशिश की जा सके। WHO की मानें तो अगर कोई वयस्क व्यक्ति एक सप्ताह में 150 मिनट से कम और अगर कोई किशोर एक सप्ताह में 60 मिनट से कम शारीरिक गतिविधि कर रहा था तो इसका मतलब है कि उसकी फिजिकल ऐक्टिविटी अपर्याप्त है और उसे एक्सर्साइज और शारीरिक गतिविधियों को बढ़ाने की जरूरत है।

    एक्सर्साइज करने के हैं ढेरों फायदे
    एक्सर्साइज करने से न सिर्फ हमारा शरीर फिट और हेल्दी रहता है बल्कि मस्तिष्क पर भी इसका पॉजिटिव असर पड़ता है। शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर रहता है, हाई ब्लड प्रेशर की समस्या दूर होती है, नींद न आने की समस्या दूर होती है, याददाश्त तेज होती है, सीखने की शक्ति में सुधार होता है। इतना ही नहीं एक्सर्साइज करने और फिजिकल ऐक्टिविटी बढ़ाने से डिप्रेशन, तनाव और मनोभ्रंश की दिक्कत भी दूर होती है।

  • ये आसान उपाय दिलाएंगे Body Odour से तुरंत मुक्ति

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    आप अपने Body Odour को छिपाने के लिए तेज परफ्यूम लगाते हैं या डियो का उपयोग करते हैं। कई बार इससे आपके आस-पास के लोग परेशानी महसूस करते हैं। क्योंकि हर गंध हर किसी को पसंद नहीं आती। साथ ही कुछ समय बाद ये सब तरीके बेअसर हो जाते हैं और आप शरीर की दुर्गंध से परेशान होने लगते हैं। इससे बचने के लिए अपनाएं ये घरेलू तरीके…

    ऐसे मिलेगी तुरंत मदद

    शरीर से आने वाली पसीने की बदबू से तुरंत छुटकारा पाने के लिए कॉटन बॉल्स की मदद से शरीर के उन हिस्सों में गुलाबजल लगाएं जहां से दुर्गंध आ रही हो। इसके बाद आप ऐंटिबैक्टीरियल क्रीम लगा सकते हैं। इससे आपको दोबारा जल्द ही बॉडी ऑडर से परेशानी नहीं होगी। साथ ही पसीनेवाली जगह पर खुजली भी नहीं होगी।
    असेंशल ऑइल्स हैं मददगार

    आप अपनी पसंद की खुशबू वाला कोई भी असेंशल ऑइल खरीदकर हर समय अपने साथ रखें। कॉटन बॉल्स की मदद से इस ऑइल को सुबह नहाने के बाद और दिन में जब भी बॉडी ओडर की समस्या हो तो इस ऑइल को लगा लें। आप भीनी-भीनी खुशबू से महकने लगेंगे।

    सिरका और पानी

    आप एक चम्मच सिरका आधा कप पानी में मिलाएं और संबंधित एरिया पर कॉटन की मदद से लगाएं। दो-तीन मिनट ऐसा करने के बाद कॉटन को साफ पानी में भिगोएं और इस जगह की सफाई कर दें। आपको तुरंत राहत मिलेगी।

    रात को लगाएं नारियल का तेल

    नारियल का वर्जिन ऑइल बॉडी ओडर से मुक्ति पाने का आसान तरीका है। आप हर रोज रात को सोने से पहले शरीर के उन हिस्सों पर नारियल तेल से हल्की मसाज करें जहां दुर्गंध आती है। कुछ दिन ऐसा करने पर आपको आराम मिलेगा।

  • दिनभर थकान के बाद ये चीजें खाने से मिलेगी Instant Energy

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    कई बार हमारे शरीर में अचानक ही एनर्जी की बहुत ज्यादा कमी हो जाती है और हमारा कोई काम करने का मन नहीं करता। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं कुछ ऐसी चीजों के बारे में जिन्हें खाकर आप पा सकते हैं तुरंत पर्याप्त ऊर्जा। एक नजर ऐसे ही खाद्य पदार्थों पर…

    ​सिंपल कार्ब

    इंस्टेंट एनर्जी के लिए आप पास्ता, वाइट ब्रेड, क्रैकर, कैंडी, कुकी या स्वीट का विकल्प अपना सकते हैं। ज्यादा शुगर या फिर सफेद आटे से बनी चीजों को शरीर द्वारा अवशोषित कर पाना ज्यादा आसान नहीं होता। इस कारण यह शुगर रक्त प्रवाह में तेजी से मिलती है। इससे ऊर्जा का तुरंत संचार होता है, लेकिन जब आपका ब्लड शुगर घटना शुरू होता है तो आप आलस जैसा महसूस करने लगते हैं।

    ​साबुत अनाज

    इनमें ब्राउन राइस, जौ, ओटमील और साबुत अनाज शामिल है। आपको इनसे ज्यादा फाइबर मिलेगा, जो आपकी ऊर्जा को लंबे समय तक बरकरार रखेंगे। इसके साथ ही ये खाद्य पदार्थ कई पोषक तत्वों से भरे होते हैं जो सेहत के लिए बेहद अच्छे होते हैं।

    ​नींबू पानी

    अगर आपको शरीर में एनर्जी की कमी महसूस हो रही है या फिर सिर घूम रहा है या चक्कर जैसा महसूस हो रहा है तो एक गिलास ठंडा-ठंडा नींबू पानी पी लें और इसका हर दिन सेवन करें। नींबू पानी में चुटकी भर नमक, चुटकी भर चीनी और थोड़ा सा पुदीना भी डालें। ऐसा करने से आपके शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का बैलेंस बना रहेगा और आपको पूरे दिन एनर्जेटिक भी महसूस होगा और शरीर में पानी की कमी भी नहीं होगी।

    ​कैफीन

    जब आप दिन की शुरुआत कॉफी या चाय से करते हैं तो तुरंत ऊर्जा का अहसास होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कैफीन में ऐसे रसायन होते हैं, जो आपको अलर्ट कर देते हैं। अगर आप सोने से पहले कॉफी पीते हैं तो नींद आने में दिक्कत हो सकती है। इस कारण आपको अगले दिन थकान लगने लगेगी।

  • Breast Cancer: कैंसर दोबारा होने का ये है कारण

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    लंबे समय से ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के लिए हॉर्मोन थेरपी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन मामलों में कई बार कैंसर ठीक होने के बाद फिर आ जाता है। अब एक रिसर्च में पता चला है कि हॉर्मोन थेरपी से कुछ कैंसर सेल्स स्लीप मोड में चले जाते हैं जो बाद में फिर ऐक्टिव हो सकते हैं।

    इस रिसर्च के बाद अब ऐसे रास्ते खोजे जा सकेंगे जिनसे इन सेल्स को लंबे समय तक स्लीप मोड में रखा जा सके या फिर ऐक्टिव करके इलाज के दौरान उन्हें मार दिया जाए।

    इस रिसर्च में लैबोरेटरी में ब्रेस्ट कैंसर सेल्स पर हॉर्मोन के प्रभाव को देखा गया। लीड रिसर्चर लुसा मगनानी ने कहा कि इसके बारे में जानना बेहद जरूरी है क्योंकि ब्रेस्ट कैंसर के ज्यादातर मामलों में हॉर्मोन थेरपी से ही इलाज किया जाता है। उन्होंने कहा कि अगर इन डॉर्मेंट सेल्स के बारे में अच्छे से पता लगा सकें तो कैंसर को वापस आने से रोका जा सकता है।

    इसके लिए या तो उन्हें और भी लंबे समय तक के लिए स्लीप स्टेज में ही रखा जा सकता है या फिर उन्हें ऐक्टिव करके खत्म किया जा सकता है। ब्रेस्ट कैंसर के ज्यादातर मामलों ट्यूमर को निकाल दिया जाता है। इसके बाद उन्हें हॉर्मोन थेरपी दी जाती है। हालांकि, कई मरीजों को दोबारा कैंसर हो जाता है।

    कई मामलों में तो 20 साल बाद भी कैंसर फिर से हो जाता है। कैंसर का इतने लंबे समय बाद वापस आना और भी खतरनाक होता है क्योंकि तब तक यह शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका होता है और दवाओं के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है।

  • कम होगी स्वेटिंग इन टिप्स को अपनाने पर

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    मौसम चाहे जो भी हो शरीर पर पसीना आता ही है। गर्मियों और उमस भरे मौसम में तो पसीने के कारण हालत खराब हो जाती है। इस वजह से कहीं आने-जाने की भी इच्छा नहीं होती और यह समस्या चिड़चिड़ा भी बना देती है। लेकिन कुछ तरीकें हैं जो इस परेशानी को काफी हद तक दूर कर सकते हैं।

    शेव या वैक्सिंग

    शरीर पर बाल यानी ज्यादा पसीना, इसलिए टाइम टू टाइम शेव करते या वैक्सिंग करवाते रहें। इससे स्किन के पोर्स को भी क्लीन रहने में मदद मिलेगी जो पसीने की समस्या को भी कम कर देगा।

    लोशन और क्रीम

    स्किन के हाइड्रेशन को बनाए रखने के लिए लोशन या क्रीम बेहद जरूरी है, हालांकि इसके कारण पसीना भी ज्यादा आता है। इससे बचने के लिए ऐसे लोशन या सनस्क्रीन चुनें तो वॉटर या जेल बेस्ड हों। आप चाहें तो ऐलोवेरा या समर स्पेशल लोशन भी चुन सकती हैं जो स्किन में आसानी से अब्जॉर्ब हो जाते हैं और स्किन चिपचिपी नहीं होती। इससे पसीना भी कम आता है।

    कपड़े

    ऐसे कपड़े पहने जिनमें से हवा आर-पार हो सके। कॉटन इसके लिए बेस्ट चॉइस है। साथ ही में कलर भी लाइट चुनें। ज्यादा डार्क कलर ज्यादा गर्मी व सनलाइट सोखते हैं जिससे बॉडी का तापमान बढ़ता है और पसीना ज्यादा आता है, इसलिए लाइट फैब्रिक और कलर के कपड़े बेस्ट चॉइस हैं।

    न खाएं ये चीजें

    ज्यादा ऑइली, स्पाइसी, नॉन वेज और फास्ट फूड खाने से बचें। इन सभी को पचाने में बॉडी ज्यादा एनर्जी लेती है जिससे पसीना भी ज्यादा आता है।

    कूल ड्रिंक्स

    कम पसीने के लिए बॉडी को बाहर ही नहीं बल्कि अंदर से भी कूल रखने की जरूरत है। इसके लिए आप छाछ, दही, लस्सी, नारियल पानी, ताजे फलों के जूस, सब्जियों के जूस आदि को पी सकते हैं।

    नॉर्मल तापमान की डालें आदत

    गर्मी से बचने के लिए लोग एसी में रहना पसंद करते हैं जो उनकी बॉडी को तुरंत कूल डाउन करता है और पसीना बिल्कुल भी नहीं आता। हालांकि, शरीर को इसकी आदत लग जाए तो उसे मौसम के मुताबिक खुद को ढालने में परेशानी होती है। कोशिश करें कि आप ज्यादा से ज्यादा समय नॉर्मल रूम टेंपरेचर में गुजारें जिससे शरीर को आसानी से अजस्ट होने में मदद मिलेगी और पसीना कम आएगा।

    ऐपल साइडर विनिगर

    ऐपल साइडर विनिगर को एक बोल में निकालें और रुई की मदद से अपने बॉडी के उन हिस्सों पर लगाएं जहां आपको सबसे ज्यादा पसीना आता है। इसे रातभर लगे रहने दें और सुबह धो लें। माना जाता है कि इस विनिगर से पोर्स को टाइट होने में मदद मिलती है जिससे पसीना कम आता है।

    ब्लैक टी

    एक कप पानी गरम करें और उसमें चाय पत्ती मिलाएं। इसे उबलने दें और फिर गैस बंद कर दें। पानी ठंडा हो जाए तो उसे छान लें और पानी को रुई की मदद से ज्यादा स्वैट करने वाले हिस्सों पर लगाएं। ब्लैक टी में भी ऐपल साइडर विनिगर जैसी खासियत है। यह भी पोर्स को टाइट करते हुए स्वैटिंग की समस्या को कम करता है।

  • इन बातों के लिए करें खुद को तैयार, फिर करे प्यार का इज़हार

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    किसी से प्यार करना तो हमारे वश में हैं लेकिन हमारे उस इमोशन को स्वीकार करना या ना करना जाहिर तौर पर दूसरे के अधिकार क्षेत्र की बात है। जैसे हम उम्मीद करते हैं कि हमारे फैसले का सम्मान होना चाहिए, ठीक वैसे ही दूसरा भी इस बात की उम्मीद हमसे करता है। लेकिन अपने मन की बात सही ढंग से दूसरे तक पहुंचाना एक आर्ट है ताकि प्रपोजल एक्सेप्ट होने के चांसेज बढ़ जाएं…

    रियल लाइफ में नहीं है उतना एक्साइटिंग

    किसी को पसंद करना और उसे I Love You बोलना सोचने में जितना एक्साइटिंग होता सकता है, असल में उतना ना तो आसान होता है और ना ही एक्साइटिंग। क्योंकि हमारी लाइफ तीन घंटे की स्क्रिप्टेड मूवी नहीं है। इसलिए किसी के प्रति अपनी भावनाएं जाहिर करने से पहले उसे समझने का पूरा प्रयास करना चाहिए। साथ ही बेहतर होगा कि आप उसकी फीलिंग्स के बारे में भी पता लगा लें।

    टाइमिंग मैटर करती है

    इससे ज्यादा जरूरी शायद कुछ नहीं, जब आपको पता होना चाहिए कि अपने दिल की बात कहने का सही मौका कौन-सा रहेगा। इस बात को दिमाग में रखें कि प्यार के मामले में कभी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

    प्यार का शुरुआती दौर

    जब आप किसी प्रति आकर्षण महसूस करते हैं तो शुरुआती कुछ महीनों में दूसरे व्यक्ति की हर बात अच्छी लगती है, सबकुछ परियों की कहानी जैसा लगने लगता है। लेकिन कुछ वक्त बीत जाने के बाद उसी व्यक्ति का आदतें हमें बुरी आदत लगने लगती हैं। इसलिए मच्योरिटी के साथ आगे बढ़ने की जरूरत होती है। पूरा वक्त लें।

    ‘I Love You’ कहने का सही तरीका

    दुनिया में ऐसा कोई तरीका नहीं है, जिसके लिए कहा जा सके कि पहली बार अपना प्यार जाहिर करने के लिए यही परफेक्ट रहता है। गिफ्ट और फ्लॉवर के साथ अपनी बात करना कॉमन जरूर हो सकता है पर जरूरी नहीं परफेक्ट हो। वक्त और सिचुएशन के हिसाब से आप अपनी बात जाहिर कर सकते हैं। गिफ्ट और फूल महंगे हों ये जरूरी नहीं, भावनाएं सच्ची होनी चाहिए।

    ‘ना’ सुनने के लिए तैयार रहें

    प्यार जताने के लिए जितने साहस की जरूरत है, उतने ही साहस की जरूरत होती है ना सुनने के लिए। लेकिन इसके लिए खुद को तैयार रखना चाहिए। कोई हमारा प्रपोजल एक्सेप्ट नहीं कर रहा है तो ना तो वो हमारा दुश्मन हो जाता है और ना ही हमें उसके साथ बुरा बर्ताव करना चाहिए। यह उसकी अपनी पसंद पर निर्भर करता है।