Category: editorial

  • क्यों भारत की जरूरत बन गई हिंदी में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई

    रोचक– मध्यप्रदेश में सबसे पहले यह घोषणा की गई की अब वहां मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी में करवाई जाएगी। मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार का यह निर्णय काफी सराहनीय बताया जा रहा है। उनके इसी निर्णय की तर्ज पर उत्तरप्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने भी यह घोषणा की है कि अब उत्तरप्रदेश में भी अगले सत्र से मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी में होगी।
    इन दोनों राज्यों के निर्णय से यह साफ है कि देश में अब मातृ भाषा के सम्मान की बात हो रही है और अन्य भाषाओं की जगह अपनी मूल भाषा को महत्व दिया जा रहा है। गृह मंत्री अमित शाह ने भी कई बार हिंदी के महत्व को समझने का मुद्दा उठाया है और कहा है कि मेडिकल की पढ़ाई में हिंदी की किताबो का उपयोग होना चाहिए। 
    अभी तक रूस, यूक्रेन, जापान, चीन और फिलीपींस जैसे देशों में भी मातृभाषा में मेडिकल की पढ़ाई होती थी। लेकिन अब भारत भी इन देशों की लिस्ट में शामिल हो रहा है और भारत लगातार अपनी मातृ भाषा को सम्मान दिलाने के लिये संघर्ष कर रहा है। खबरों के मुताबिक, 97 डॉक्टरों की टीम ने 4 महीने में इन किताबों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है। 

    जाने क्यों आवश्यक है हिन्दी मे मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई-

    अगर हम हिंदी में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के महत्व को समझे तो इसके पीछे की वजह साफ है कि इस बार फोकस ग्रामीण परिवेश के युवाओं और हिंदी मीडियम में पढ़े छात्रों पर किया गया है। भारत की आधे से अधिक आबादी गांव से कनेक्ट है। गांव के लोग अपने बच्चो को हिंदी मीडियम में पढ़ाते हैं। लेकिन सपना वह भी देखते है कि उनका बच्चा भी मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करे।
    सरकार के इस कदम से अब हिंदी मीडियम के छात्र भी मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर सकेंगे और उन्हें भी अपने सपनो को हासिल करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा अगर हिंदी में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की जाएगी तो हमारी मूल भाषा हिंदी के कद में बढ़ोतरी होगी और लोग उसे वैश्विक स्तर पर सम्मान की नजर से देखेंगे।

    किन छात्रों को मिलेगी मदद-

    जानकारो का कहना है कि जो बच्चे हिंदी मीडियम से पढ़ने के बाद मेडिकल और इंजीनियरिंग में दाखिला लेते हैं। उन्हें अंग्रेजी समझने में काफी समस्या होती है और कई बार वह परीक्षा में सफल नही हो पाते हैं। अब अगर मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी में होगी तो इन छात्रों का मनोबल बढ़ेगा और इन्हें सभी चीजें सुचारू रूप से समझ आएगी और यह आसानी से अपने सपनो को हासिल कर सकेंगे।

  • क्यों जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने के पीछे पड़ी है आरएसएस

    देश– बढ़ती जनसंख्या देश के लिये बड़ा खतरा बनती जा रही है। जब से संयुक्त राष्ट्र ने यह घोषणा की है कि आगामी समय मे भारत की जनसंख्या चीन से अधिक हो जाएगी। देश मे जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग तेजी से उठने लगी है। 
    आरएसएस बार बार यह मुद्दा उठा रही है कि बढ़ती जनसंख्या देश के लिए खतरा है। जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू होना चाहिए और उसका सख्ती से पालन करवाने हेतु कदम भी उठाये जाने चाहिए। लेकिन एक बात सभी के मन मे खटक रही है कि हिन्दू की पैरवी करने वाली आरएसएस आज कल जनसंख्या नियंत्रण कानून पर इतना फोकस क्यों कर रही है।
    वही जब इस बात की तह को खंगाला गया तो इसका जवाब आरएसएस के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबा के बयान से मिल गया उन्होंने कहा कि देश में कन्वर्जन और कम प्रजनन की वजह से हिंदू आबादी लगातार कम हो रही। यह वास्तव में चिंता का विषय है।

    जाने क्यों जनसंख्या नियंत्रण कानून पर फोकस कर रही आरएसएस-

    आरएसएस का कहना है कि देश में बढ़ती जनसंख्या देश के विकास के लिए बाधा साबित हो सकती है। इसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। वही अगर हम वर्तमान परिपेक्ष्य की बात करे तो आंकड़ों के लिहाज से अभी भारत की आबादी 140 करोड़ है जो 2050 तक 166 करोड़ होने का अनुमान है।
    यदि हम हिन्दू मुस्लिम की बढ़ती हुई आबादी का जिक्र करे। तो साल 2011 के आकड़ो के मुताबिक भारत मे हिंदू आबादी में महज 20% बढ़ोतरी हुई, जबकि मुस्लिम आबादी 36% तक बढ़ी है। आंकड़े से स्पष्ट है कि बढ़ती आबादी हिंदूओ के लिए भी खतरा है और देश के लिये भी।
    2011 में हुई जनगणना के मुताबिक देश की जनसंख्या 120 करोड़ थी वर्तमान में यह आंकड़ा 140 करोड़ तक पहुंच गया है। वही अगर हम बीते आकड़ो को प्रतिशत में समझे तो मुस्लिम की आबादी में बीते वर्षों में 4 फीसदी की वृद्धि हुई है। जबकि हिंदूओ की आबादी इसी अनुपात में कम हुई है।
    आरएसएस बार बार जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की बात कह रही है। इसके पीछे कही न कही एक कारण यह भी है कि देश मे हिन्दू समाज की आबादी कम हो रही है और मुस्लिम आबादी में तेजी से बढ़ोतरी देंखने को मिल रही है।

  • जाने क्यों पानी और साबुन से नफरत करते थे दुनिया के सबसे गंदे व्यक्ति

    देश– एक व्यक्ति जिसे साबुन और पानी के इस्तेमाल से डर लगता था। उन्हें लगता था कि अगर उन्होंने साबुन या पानी का इस्तेमाल किया तो न वह सिर्फ बीमार पड़ जायेंगे। बल्कि उन्हें कई समस्याओं से जूझना पड़ेगा।
    अपने इसी तर्क के चलते अमोउ हाजी ने कई सालों से नही नहाया था। मीडिया इन्हें दुनिया का सबसे गंदा व्यक्ति कहती थी। इनकी उम्र 94 साल थी। वही अभी हाल ही में जब इन्होंने नहाया तो शायद इसका इनके स्वास्थ्य पर प्रभाव देखने को मिला और इनकी मौत हो गई।

    जाने कौन था सबसे गंदा आदमी-

    मीडिया जिन्हें दुनिया का सबसे गंदा व्यक्ति कहती थी। कई लोग उन्हें सन्यासी भी कहते थे। लोगो का मानना था कि अमोउ हाजी को इस बात की अनुभूति पहले से ही हो गई थी कि अगर वह साबुन और पानी का इस्तेमाल करेंगे तो उनकी मौत हो जाएगी। शायद यही कारण था कि उन्होंने इन दोनों चीजो से 50 साल पहले ही मुह मोड़ लिया था।
    यह दक्षिणी ईरान के फ़ार्स प्रांत में रहते थे। कई लोगो का कहना था कि लोग उनपर शरीर को साफ करने का दवाब बनाते थे। लेकिन वह कभी लोगो की बातों में नही आए। लेकिन कई वर्षों बाद उन्हें लोगो के सामने झुकना पड़ा और उन्होंने नहाया जो उनकी मौत का कारण बन गया।

    जाने क्यों पानी से बैर था सबसे गंदे आदमी को-

    ईरान के एक समाचार एजेंसी द्वारा इस बात की पुष्टि भी की गई है कि दशकों बाद नहाना उनके लिए मौत बन गया। एक दफा इंटरव्यू के दौरान दुनिया के सबसे गंदे व्यक्ति ने कहा था कि वह पानी से दूर रहते हैं। इसका एक कारण उन्हें उनके जीवन मे प्राप्त हुए भावनात्मक दुख भी है।
    वही उन्हें भोजन में सबसे अधिक साही पसन्द है और वह जमीन में एक होल बनाकर रहते थे। उनको दुनिया की चहल पहल कम पसन्द थी। क्योंकि उनका मानना था कि लोग उनपर दवाब बनाते हैं अगर वह लोगो के साथ रहे तो वह कभी भी पानी और साबुन से दूर नही रह पाएंगे।

    जाने कैसे हो गई थी सबसे गंदे आदमी की त्वचा और क्या खाते पीते थे-

    इन्होंने दशकों से पानी और साबुन का इस्तेमाल नही किया था। इनकी त्वचा काली हो गई थी। उसमें मवाद भरा हुआ था। यह सड़ा हुआ मांस खाते थे और ऑयल के पुराने कैन से पानी पीते थे।
    इन्हें धूम्रपान करना काफी पसंद था। यह एक साथ 4 – 4 सिगरेट पी लेते थे। वह न तो मंजन करते थे और न ही उन्हें अपने आप को साफ रखने का कोई शौक था। वह सिर्फ अपनी धुन में मस्त रहते थे और अपने अलावा किसी से मतलब नही रखते थे।

  • आसान नही था इंदिरा गांधी का सफर रोज होती थी आलोचनाएं

    देश– 11जनवरी 1966 का दिन था। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत हो गई थी। सत्ता संभालने के लिए कई नाम सामने आने लगे। मोरारजी देसाई के नाम पर चर्चा सुर्खियों में थी। लेकिन इंदिरा गांधी उस समय मौन होकर अपना राजनीतिक ताना बाना बुन रही थी।
    कई लोग यह बात कह रहे थे। कि इंदिरा गांधी की तुलना मोरार जी देसाई से करना अनुचित है। वह भले ही सत्ता में आ जाए लेकिन वह कमान को नही सम्भाल पाएगी। लेकिन उसके बाद भी कई नेताओं ने यह उम्मीद जताई की इंदिरा गांधी में इतना सामर्थ्य है कि वह देश की बागडोर सम्भाल पाए।
    मतदान हुआ और 19 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया है। मतदान में इंदिरा गांधी को 
    355 और मोरार जी को 169 वोट मिले थे.। इंदिरा प्रधानमंत्री तो बन गई लेकिन उनके लिए यह राह आसान नही थी। उन्हें काफी समस्याओं से जूझना पड़ा और लोगो की आलोचनाओ का सामना करना पड़ा।

    जाने प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी का सफर-

    जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो लोगो ने उनका तिरिस्कार किया। वह बोलना नही जानती थी। काफी सहमी रहती थी। उनके मन मे डर रहता था। लोग उन्हें देखकर उनका मजाक बनाते है। वही राम मनोहर लोहिया ने इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहकर संबोधित किया था।
    सदन में इंदिरा गांधी पुरुष राजनेताओ के सावालो से घिरी रहती थी। आलोचनाओ से कई बार वह हताश भी हो जाती थी। लेकिन इंदिरा गांधी ने कभी हार नही मानी। वह हमेशा मजबूत खड़ी रही। 

    इंदिरा की सत्ता वापसी-

    पहली बार प्रधानमंत्री बनी इंदिरा गांधी को आलोचनाओ का सामना करना पड़ा। लेकिन 1967 के चुनावों में कांग्रेस की 283 सीटें हासिल करके सत्ता में वापसी हो गई थी। पुनः 13 मार्च 1967 को इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। नेताओ का दवाब अभी भी उनपर बना हुआ था। 
    लेकिन जब डॉक्टर जाकिर हुसैन के निधन के बाद वी वी गिरि, कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। उसके बाद से कांग्रेस पार्टी में काफी उथल पुथल देंखने को मिली।कांग्रेस दो हिस्सों में बंट चुकी थी. गरीब समर्थक छवि की चमक के लिए उन्होंने पूर्व रियासतों के राजाओं का प्रीविपर्स खत्म करके हलचल मचा दी थी . 1971 में समय से पूर्व लोकसभा चुनाव की घोषण हुआ।
    इस घोषणा ने इंडिया गांधी को मजबूत नेता बना दिया। इंदिरा ने विपक्षियों का डटकर सामना किया। उन्होंने सभाओं को सम्बोधित करते हुए कहा, वह कहते हैं इंदिरा हटाओ मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ। इंदिरा गांधी का यह नारा घर घर गूंजने लगा। हर कोई इस बात से इंदिरा के पक्ष में हो गया। 
    इंदिरा के इस रूप को देखकर विपक्ष सहम गया और जनता के समर्थन से 352 सींटो पर कांग्रेस की जीत हुई और विपक्ष का सूपड़ा साफ हो गया। यही से इंदिरा गांधी एक मिसाल बन गई और विपक्ष की नाक में उन्होंने दम कर दिया। जो पुरुष नेता इंदिरा गांधी को नीचा दिखा रहे थे उनको इंदिरा गांधी ने मुह तोड़ जवाब दिया। उन्हें बताया की एक महिला यदि अपने पर उतर आए तो वह किसी के भी सामने अपने आप को बेहतर दिखा सकती है।

  • ऐसी क्या मजबूरी थी की सोनिया गांधी को आना पड़ा राजनीति में

    देश– सोनिया गांधी आज अपना 76वां जन्मदिन मना रही हैं। सोनिया गांधी का विवाह राजीव गांधी के साथ हुआ था। उन्होंने अपने जीवन मे कई उतार चढ़ाव देखे। सोनिया गांधी कभी भी राजनीति में नहीं आना चाहती थी। उनके पति राजीव गांधी ने भी अपनी मां के साथ राजनीति करके की राह न चुनकर पायलट बनना स्वीकार किया था।
    लेकिन अचानक से सोनिया गांधी और राजीव गांधी के जीवन मे बड़ा फेरबदल देंखने को मिला। जब इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी का निधन हुआ तो राजीव गांधी की मां टूट गई। उनपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अपनी मां को सहारा देने के लिए राजीव गांधी ने न चाहते हुए राजनीति में कदम रखा।
    राजीव गांधी का राजनीति में आना सोनिया गांधी के लिए राजनीति का मार्ग खोलने जैसा था। 1984 में इंदिरा गांधी की मौत हुई। उस समय राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनना था। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तब सोनिया गांधी राजनीति से काफी दूर थी। लेकिन जब राजीव गांधी की मौत हुई तो मानो सोनिया के कंधों पर अपनी विरासत को संभाल कर रखने की जिम्मेदारी आ गई।
    राजीव गांधी की मौत के बाद साल 1997 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की बागडोर अपने हाथ मे ली। उनके नेतृत्व में कांग्रेस में पुनः जान आ गई। साल 2004 में उन्होंने गठबंधन के साथ मिलकर सरकार बनाई और साल 2009 में पुनः केंद्र में यूपीए की सरकार बनी।

  • क्यों सवालों के घेरे में हैं भारतीय फार्मा कंपनियां

    बीते कुछ दिनों में दो खबरें आईं, जिससे भारत के फार्मा सेक्टर की छवि पर गहरा असर पड़ा है। पहले तो अफ्रीकी देश गाम्बिया में एक भारतीय फार्मा कंपनी का सिरप पीने के कारण 60 से अधिक शिशुओं का निधन हो गया। कहना न होगा कि उस घटना से देश के फार्मा सेक्टर की भारी बदनामी हुई है। हालांकि, सिरप बनाने वाली कंपनी का दावा है कि उसकी सिरप में कोई गड़बड़ नहीं थी। अब उज्बेकिस्तान ने भी आरोप लगाया कि भारत में बना कफ सिरप देने की वजह से उनके देश में भी 18 बच्चों की जान चली गई। इस मामले में हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने जांच में सहयोग करने की बात कही। वहीं, भारत सरकार ने भी उज्बेकिस्तान सरकार के आरोपों की जांच का फैसला किया है। उज्बेकिस्तान ने कहा नोएडा की एक फार्मा कंपनी में बना कफ सिरप पीने से उनके यहां बच्चों की जान चली गई है।
    उज्बेकिस्तान का दावा है कि कफ सिरप में एथिलीन ग्लाइकॉल है, जो कि विषैला पदार्थ होता है। इसके इस्तेमाल से उल्टी, बेहोशी, ऐंठन, किडनी फेलियर और दिल से जुड़ी समस्या हो सकती है। जब बच्चों को यह सिरप पिलाई गई तो एक दर्जन से ज्यादा बच्चों की जान चली गई। बेशक, ये दोनों मामले बहुत गंभीर और दुखद हैं। इनकी तह तक जाँच भी होनी चाहिए और दोषियों को सख्त सजा भी मिलनी चाहिये I
     कहना न होगा कि भारत के संबंधित विभागों को सारे मामले की निष्पक्ष जांच करनी होगी। जांच के बाद अगर कोई दोषी पाया जाता है तो उस पर कठोर एक्शन भी लेना होगा। इन घटनाओं पर लीपापोती नहीं की जा सकती। ये अक्षम्य अपराध है।
    भारत का फार्मा क्षेत्र का निर्यात 1.83 लाख करोड़ रुपये से अधिक का माना जाता है। पर यह याद रखना होगा कि हमारे फार्मा सेक्टर की ग्रोथ पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, अगर हमने आगे चलकर अपने उत्पाद विश्व स्तरीय न बनायें। वैसे भी हमारी फार्मा कंपनियों पर आरोप लगता ही है कि वे अनुसंधान पर बहुत कम धन खर्च करती हैं। हां, इस बाबत कुछ ही कंपनियां अपवाद हैं।
    किसी भी ईमानदार जांच से पता चल जाएग कि हमारी अधिकतर फार्मा कंपनियां नई दवाओं को ईजाद करने में बहुत कम निवेश करती हैं। याद रखिए कि बड़ी कंपनी वही होती है जो नई-नई दवाओं को ईजाद करती है। किसी कंपनी की पहचान इसलिए नहीं होती कि उसका मुनाफा या निर्यात कितना है और कितना बढ़ रहा है। बड़ी कंपनी वही मानी जाती है जो अनुसंधान कर नई नई असरदार दवायें मार्केट में लाये I
    बहरहाल, बच्चों की मौतों के बाद उज्बेकिस्तान और भारत में जांच शुरू हो चुकी है। उत्तर प्रदेश ड्रग कंट्रोलिंग एंड लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने एक जॉइंट इन्क्वायरी शुरू कर दी है। देखिए, भारत का मित्र है उज़्बेकिस्तान। सोवियत संघ के विघटन के बाद से भारत- उज़्बेकिस्तान के सम्बन्ध लगातार करीब आते रहे हैं। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने 1993 में उज़्बेकिस्तान की यात्रा की थी। उस दौरान, दोनों देशो के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग पर हस्तक्षार हुए साथ ही ताशकंद के विश्व आर्थिक और कूटनीति विश्वविद्यालय में इंडियन चेयर की घोषणा और ताशकंद में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की गयी। इसी प्रकार भारत और उज़्बेकिस्तान के रिश्तो को मजबूती प्रदान करने के लिए 2006 में 8 समझौतों पर हस्ताक्षार किया गया।
    उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति करीमोव द्वारा 1994, 2000, 2005 व 2011 में भारत की यात्रा की गयी। उनकी 2011 में की गयी यात्राएं बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है I क्योंकि, भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच सामरिक साझेदारी पर हस्ताक्षर हुए, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय सहयोग को गति देना था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में उज़्बेकिस्तान की सफल यात्रा की। यानी भारत- उज़्बेकिस्तान के संबंध लगातार मतबूत होते रहे। जिस तरह भारत का मित्र है उज़्बेकिस्तान। उसी तरह से अफ्रीकी देश गाम्बिया भी भारत का मित्र देश है। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 2015 में गाम्बिया की यात्रा पर गए थे। उन्होंने वहां पर गाम्बिया की संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि अफ्रीका का भविष्य का आर्थिक अनुमान और भारत का विकास दोनों ही एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
    भारत- गाम्बिया के व्यापार और निवेश संबंधों में प्रगति हो रही है। गाम्बिया से युवा शिक्षा, कौशल और डिजिटल क्षेत्र में ज्ञान प्राप्ति के लिए भारत आते हैं। वहां भारतीय मूल के लोग भी हैं। दरअसल समूचा अफ्रीका भारत का गांधी जी के रंगभेद के खिलाफ किए आंदोलन के कारण आदर करता है। भारत सभी 54 अफ्रीकी देशों से बेहतर संबंध स्थापित करने को लेकर प्रतिबद्ध है। भारत अफ्रीका में बड़ा निवेशक भी है। अफ्रीका में टाटा, महिन्द्रा, भारती एयरटेल, बजाज आटो, ओएनजीसी जैसी प्रमुख भारतीय कंपनियां कारोबार कर रही है।
    भारती एयरटेल ने अफीका के करीब 17 देशों में दूरसंचार क्षेत्र में 13 अरब डालर का निवेश किया है। भारतीय कंपनियों ने अफ्रीका में कोयला, लोहा और मैगनीज खदानों के अधिग्रहण में भी अपनी गहरी रुचि जताई है। इसी तरह भारतीय कंपनियां दक्षिण अफ्रीकी कंपनियों से यूरेनियम और परमाणु प्रौद्योगिकी प्राप्त करने की राह देख रही है। दूसरी ओर अफ्रीकी कंपनियां एग्रो प्रोसेसिंग व कोल्ड चेन, पर्यटन व होटल और रिटेल क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के साथ सहयोग कर रही हैं।
     पहले गाम्बिया और अब उज़्बेकिस्तान में भारतीय फार्मा कंपनियां सवालों के घेरे में हैं। हमें मित्र देशों की भावनाओं को समझना होगा और यथोचित सम्मान भी करना होगा । अगर ये हमारी फार्मा कंपनियों पर कोई आरोप लगा रहे हैं, तो उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। गाम्बिया और उज़्बेकिस्तान की घटनाओं को सारी दुनिया के मीडिया ने जगह दी है। सच में यह एक विकट और गंभीर स्थिति है।
    भारत सरकार को यहां बनी दवाओं के कारण उपर्युक्त देशों में हुई बच्चों की मौतों के मामलों को गंभीरता से लेना होगा। इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती हैं। इन दोनों ही मामलों की जांच के नतीजे जल्दी आने चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। अगर हमारी कंपनियां दोषी नहीं हैं तो उनके साथ भी सरकार को खड़ा होना होगा। पर भारतीय फार्मा कंपनियों को अपने अनुसंधान को लेकर नए सिरे से सोचने की जरूरत तो है। इसमें तो किसी तरह के विवाद का प्रश्न नहीं है I हमारी फार्मा कंपनियां कैसे विश्व स्तरीय हों यह उनके लिये ही नहीं पूरे देश के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न तो है ही I
    लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद:- आर.के. सिन्हा
     

  • भारत की जान बसती भारतवंशियों में

    पिछले दो सालों से कोरोना के कारण आयोजित नहीं हो पा रहा प्रवासी भारतीय दिवस (पीबीडी) सम्मेलन आगामी 8-10 जनवरी को इंदौर में होने जा रहा है। यह सुखद संयोग ही है। प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के अंतिम दिन तीन देशों के राष्ट्रपति एक साथ इंदौर में मौजूद रहेंगे। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी और गुयाना के राष्ट्रपति मोहम्मद इरफान अली भी अतिथि के रूप में रहेंगे। भारत की राष्ट्रपति दोनों राष्ट्राध्यक्षों के साथ अलग-अलग मुलाकातें भी करेंगी। 17वें प्रवासी भारतीय दिवस के आयोजन का सिलसिला 8 जनवरी से शुरू होगा। इस दिन अतिथि के रूप में आस्ट्रेलिया की सांसद जेनेटा मेस्क्रेंहेंस मंच पर देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ मौजूद रहेंगी। दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, दोनों प्रवासी विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ मंच पर मौजूद रहेंगे।
     
    यह सच में गर्व का विषय है है कि गुयाना और सूरीनाम के राष्ट्रपति भी प्रवासी सम्मेलन में शामिल रहेंगे। इन दोनों देशों में 150 साल से भी पहले भारतीय गिरमिटिया मजदूर के रूप में चले गए थे।
     
    ब्रिटेन को 1840 के दशक में गुलामी प्रथा का अंत होने के बाद श्रमिकों की जरूरत पड़ी जिसके बाद भारत से मजदूर बाहर के देशों में जाने लगे। भारत के बाहर जाने वाला प्रत्येक भारतीय अपने साथ रामचरित मानस,हनुमान चालीसा आदि के रूप में एक छोटा भारत ले कर जाता था। इसी तरह भारतवंशी अपने साथ तुलसी, रामायण, भाषा, लोकगीत खानपान एवं परंपराओं के रूप में भारत की संस्कृति ले कर गए थे। उन्हीं ही मजदूरों की संतानों के कारण फीजी, त्रिनिडाड, गयाना, सूरीनाम और मारीशस आदि लघु भारत के रूप में उभरे। इन देशों में ले जाए गए मजदूरों से गन्ने के खेतों में काम करवाया जाता था। इन श्रमिकों ने कमाल की जीवटता दिखाई और घोर परेशानियों से दो-चार होते हुए अपने लिए जगह बनाई। इन भारतीय श्रमिकों ने लंबी समुद्री यात्राओं के दौरान अनेक कठिनाइयों को झेला। अनेकों ने अपनी जानें भी गवाई I अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर जाकर बसने के बावजूद इन्होंने अपने संस्कारों को छोड़ा नहीं। इनके लिए अपना धर्म, भाषा और संस्कार बेहद खास थे।
     
    प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का आयोजन बहुत जरूरी है। भारत उन भारतीयों से दूर नहीं जा सकता जो अपनी जन्मभूमि या पुरखों की भूमि को छोड़कर अन्य जगहों में बस गए हैं। भारत से बाहर जाकर बसे भारतवंशी और प्रवासी भारतीय (एनआरआई) देश के स्वतः स्फूर्त ब्रांड एंबेसेडर हैं। यह कहना होगा कि देश में नरेन्द्र मोदी सरकार के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद विदेश नीति के केन्द्र में आ गए हैं विदेशों में बसे भारतीय। मोदी सिडनी से लेकर न्यूयार्क और नैरोबी से लेकर दुबई जिधर भी गए वे वहां पर रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से गर्मजोशी से मिले। उनसे पहले यह कतई नहीं होता था। वैसे भारतवंशियों से कोई रिश्ता न रखने की यह नीति पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर से ही चली आ रही थी। कहते हैं कि नेहरू जी ने संसद में 1957 में यहाँ तक कह दिया था कि देश से बाहर जाकर बसे भारतीयों का हमारे से कोई संबंध नहीं है। वे जिन देशों में जाकर बसे हैं, उनके प्रति ही अपनी निष्ठा दिखाएं। यानी कि उन्होंने विदेशों में उड़ते अपने पतंग की डोर स्वयं ही काट दी थी। उनके इस बडबोलेपन से विपक्ष ही नहीं तमाम राष्ट्रवादी कांग्रेसी भी आहत हुए थे। उन्हें ये सब कहने की आवश्यकता तक नहीं थी। जो भारतीय किसी अन्य देश में बस भी गया है, तब भी वह भावनात्मक स्तर पर तो भारतीय ही रहता है जिंदगीभर। नेहरू जी की सोच के जवाब में मैं यहां पर अवतार सिंह सोहल तारी का अवश्य जिक्र करूंगा। सारी दुनिया के हॉकी प्रेमी अवतार सिंह सोहल तारी का नाम बड़े सम्मान से लेते हैं। उन्हें फिलवक्त संसार का महानतम सिख खिलाड़ी माना जाता है। उन्होंने 1960, 1964, 1968 और 1972 के ओलंपिक खेलों के हॉकी मुकाबलों में केन्या की नुमाइंदगी की है। फुल बैक की पोजीशन पर खेलने वाले तारी तीन ओलपिंक खेलों में केन्या टीम के कप्तान थे। वे लगातार भारत आते रहते हैं। वे कहते हैं कि मैं पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय हॉकी संघ के पदाधिकारी के रूप में घूमता हूं। मैं हर जगह भारतवंशियों को भारतीय टीम को सपोर्ट करते हुए ही देखता हूं। वे उस देश की टीम को सपोर्ट नहीं करते जिधर वे या उनके परिवार लंबे समय से बसे हुए हैं। मुझे लगता है कि भारतवंशियों के लिए भारत एक भौगोलिक एन्टिटी ( वास्तविकता) ही नहीं है। ये समझना होगा। अगर बात सिखों की करूं तो भारत हमारे लिए गुरुघर है। इसलिए इसके प्रति हमारी अलग तरह की निष्ठा रहती ही है। शेष भारतवंशियों के संबंध में भी कमोबेश यही कहा जा सकता है। इसलिए वे केन्या, कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन वगैरह में बसने के बाद भी अपने को भारत से दूर नहीं कर पाते। इसका उदाहरण हमें इंगलैंड, आस्ट्रेलिया या दक्षिण अफ्रीका में देखने को मिलता है। इन देशों में बसे भारतवंशियों का समर्थन स्थानीय टीम के साथ नहीं होता। हो सकता है कि आने वाले 50-60 वर्षों के बाद भारतवंशियों की सोच बदले। हालांकि वहां बसे भारतीय उन देशों के निर्माण में अपना अहम रोल निभा रहे हैं।
     
    खैर,प्रवासी सम्मेलन में उन भारतवंशियों को भी आमंत्रित किया जाना चाहिए जो खेल,बिजनेस, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं। दुनिया के चोटी के भारतवंशी जैसे विश्व विख्यात फीजी के गॉल्फर विजय सिंह तथा फ्रांस की फुटबॉल टीम के खिलाड़ी रहे विकास धुरासू जैसे प्रख्यात प्रवासी भारतीय भी प्रवासी सम्मेलन में आते तो अच्छा होता। काश! कभी सलमान रश्दी को बुलाया गया होता ? मुझे नहीं लगता कि कभी महान लेखक वी.एस.नॉयपाल को बुलाने के बारे में किसी ने सोचा हो? साउथ अफ्रीका से नेल्सन मंडेला के साथी मैक महाराज और उन पर फिल्म बनाने वाले अनंत सिंह के भी सम्मेलन में आने की कोई खबर नहीं है। प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के दौरान सात समंदर पार बसे भारतीयों के मसलों को हल करने पर तो विचार होगा ही। ख्याति प्राप्त प्रवासियों का उचित सम्मान भी होना चाहिये I

  • नोएडा-दुबई जैसा बनेगा कानपुर तो नारायणमूर्ति भी करेंगे कानपुर में निवेश:- आर.के. सिन्हा

    गंगा किनारे बसे प्राचीन कानपुर शहर में आपको अब भी इस तरह के अनेक लोग मिल जाएंगे, जिन्हें अच्छी तरह से याद है जब उनके शहर की पहचान एशिया के मैनचेस्टर के रूप में हुआ करती थी। भारत में कपड़े का सबसे अधिक उत्पादन इसी कानपुर शहर में होता था। इसलिए ही इसे एशिया का मैनचेस्टर कहा जाता था। जाहिर है, देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में कानपुर का बेहद महत्त्वपूर्ण योगदान हुआ करता था। कुछ दशक पहले तक कानपुर में सायरन, मशीनों की गड़गड़ाहट और अपनी-अपनी मिलों के लिए सड़क किनारे भागते श्रमिकों के साइकिल की घंटियों की आवाजें सुनाई दिया करती थीं। फिर महान स्वाधीता सेनानी और शहीद ए आजाम भगत सिंह के गुरु गणेश शंकर विद्यार्थी के शहर कानपुर का चेहरा-मोहरा धीरे-धीरे बदलने लगा। यहां से कपड़ा मिलें बंद होने लगीं। मजदूर बेरोजगार होते चले गए। कानपुर जैसा जीवंत शहर अपनी पहचान खोने लगा।
     
    पर अब फिर से कानपुर देश-विदेश के निवेशकों द्वारा निवेश के लिए तैयार है। वे इस शहर में निवेश करें और आगे बढ़े। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी यही चाहते हैं। कानपुर के इंफ्रास्ट्रक्चर में भी पिछले दिनों तेजी से सुधार हुआ है। यहां सड़कें, मेट्रो, स्कूल, अस्पताल, कॉलेज सब कुछ तो है। बिजली भी चौबीसों घंटे आ रही है। कहने वाले कह रहे हैं कि सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि देश के कई उद्योगपति और चोटी के पेशेवर भी कानपुर में अपना कारोबार शुरू करने के संबंध में सोच रहे हैं। ये सभी आईआईटी, कानपुर में ही पढ़े हैं। इनमें इंफोसिस के फाउंडर सीईओ एन. नारायणमूर्ति, माइक्रोसाफ्ट के पूर्व सीईओ भास्कर प्रमाणिक,नैस्कॉम के पूर्व चेयरमेन सोम मित्तल, रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के पूर्व चेयरमेन ललित जालान,आईबीएम के डायरेक्टर अरविंद कृष्णा वगैरह शामिल हैं। कानपुर में 1959 में आईआईटी स्थापित हो गई थी। यहां से अब तक हजारों योग्य विद्यार्थी निकले। इन सबका कानपुर से भावनात्मक संबंध होना स्वाभाविक है। ये उसी कानपुर शहर में अब इनवेस्टर के रूप में अपनी वापसी करना चाहेंगे। एन.नारायणमूर्ति तो कानपुर का जिक्र बार-बार अपने लेखों और संस्मरणों में करते ही रहते हैं। वे कानपुर में इंफोसिस का कोई दफ्तर जल्द ही खोल सकते हैं। उनसे इस बाबत बात करनी होगी। ब्रिटेन के प्रधानमंत्रई श्रषि सुनक के ससुर नारायणणूर्ति को समझाना होगा कि उनका कानपुर में किया निवेश लाभ देकर जाएगा। इंफोसिस के दफ्तर नोएडा में तो हैं ही। अगर वे कानपुर में भी निवेश कर देते हैं, तो निवेशकों के बीच में एक सकारात्मक संदेश जाएगा। मोदी सरकार में रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव भी कानपुर आईआईटी से ही हैं।
     
    देखिए कानपुर भले ही उत्तर प्रदेश की राजधानी न हो, पर यह उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का केन्द्र तो हमेशा से ही रहा। हालांकि अब इस लिहाज से नोएडा ने उसे पीछे छोड़ दिया है। कानपुर में आईटी कंपनियां चाहें तो अपने रिसर्च एंड डवलपमेंट (आरएंडडी) सेंटर और अन्य विभागों के दफ्तर तो खोल ही सकती हैं। उन्हें स्थानीय स्तर पर शिक्षित और योग्य नौजवान नौकरी करने के लिए मिल सकते हैं। इसकी वजह यह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश तथ बिहार से सैकड़ों नौजवान यहां पर विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। जाहिर है कि अगर उन्हें यहां पर नौकरी मिल जाए तो वे अपने घरों के भी करीब रह सकते हैं। कानपुर में अगर बहुत सारी कपड़ा मिलें बंद हुई तो यह शहर अब एजुकेशन हब बनने लगा। इसलिए य़ह नहीं कहा जा सकता है कि कानपुर में बंजर हो गया।
     
    उत्तर प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर कानपुर को फिर से उसका पुराना गौरव दिलवाने का निश्चय किया है। कानपुर में आईटी सेक्टर के अलावा इलेक्ट्रानिक सामान और आटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े उत्पादों का उत्पादन करने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। कानपुर से देश के उत्तर, पूर्व तथा पश्चिम राज्यों के बाजारों में पहुंचने की पर्याप्त सुविधा है। कानपुर में एयरपोर्ट भी है। इसके करीब ही राज्य की राजधानी लखनऊ में भी एयरपोर्ट है। दिल्ली-हावड़ा मुख्य लाइन पर ट्रेनों की भरमार है I इसलिए कानपुर में कुशल पेशेवरों का मिलना कभी मुश्किल नहीं होगा। क्योंकि अधिकतर पेशेवर कानपुर या लखनऊ में या आसपास के इलाकों मिल जाएंगे। चूंकि कानपुर मूलत: तथा अंतत: एक बड़ा महानगर है, इसलिए यहां पर देश-विदेश के पेशेवर आकर काम कर सकते हैं। लखनऊ से तो कानपुर में वैसे भी रोज सैकड़ों लोग नौकरी के लिए आते- जाते हैं।
     
    कानपुर में हरियाणा के मानेसर की ही तरह आटो और आटो पार्ट्स की अनेकों इकाइयां खड़ी हो सकती हैं। मानेसर को आप श्रीपेरम्बदूर का लघु संस्करण मान सकते हैं। तमिलनाडू के श्रीपेरम्बदूर में आटो सेक्टर की कम से कम 12 बड़ी कंपनियां उत्पादन कर रही हैं। मानेसर शिखर आटो कंपनी मारुति उद्योग लिमिटेड के लिए अहम शहर हो गया है। यहां मारुति कारों के तमाम पार्ट्स का उत्पादन होता है। चूंकि उत्तर प्रदेश सरकार अपने यहां आने वाले निवेशकों को टैक्स में भी छूट दे रही है इसलिए कानपुर में निजी क्षेत्र के निवेश का होना तय है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आगामी 10 से 12 फरवरी तक एक ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का आयोजन हो रहा है, ताकि राज्य में अनंत व्यापार के उपलब्ध अवसरों का प्रदर्शन किया जा सके तथा समग्र आर्थिक विकास के लिए वैश्विक व्यापारिक समुदाय के साथ सहयोग करने के लिए एक एकीकृत मंच प्रदान किया जा सके।
     
    हमारे सामने नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुड़गांव, बैंगलुरू समेत अनेक शहरों के उदाहरण हैं। ये सब शहर बीते बीस-पच्चीस सालों में भारत की अर्थव्यवस्था की जान बन गए। इधर लाखों करोड़ रुपये का निवेश होने लगा, हजारों पेशेवरों को नौकरी मिलने लगी और सरकार को इनसे भारी-भरकम टैक्स भी प्राप्त होने लगा। दुबई को ही लें। दुबई में आज सारी दुनिया से निवेशक आ रहे हैं। वहां सौ से ज्यादा देशों के नागरिक मिल-जुलकर काम कर रहे हैं। दुबई में 1970 तक सिर्फ रेत के टीले ही होते थे। यकीन मानिए कि इन सब शहरों से कानपुर इस लिहाज से अलग है क्योंकि उसका औद्योगिकरण का लंबा गौरवशाली इतिहास रहा है। हां,यह मुमकिन है कि वहां पर पहले की तरह बहुत सारी कॉटन मिलें फिर न शुरू हों, पर कानपुर का निवेशक अन्य उद्योगों के लिए रूख कर सकते हैं। सिर्फ कानपुर ही नहीं, बल्कि उन सब शहरों को फिर से जिंदा करने की जरूरत है जहां पर कभी मिलें और मजदूर दिन रात उत्पादन करते थे। अब इनमें हाई-टेक दफ्तरों में बैठकर पेशेवर काम कर सकते हैं। हां, इनमें शहरों में अब मिलें और मजदूरों की वापसी तो हो ही सकती है।

  • पाक हाई कमीशन- पहले जासूसी, अब यौन उत्पीड़न

    राजधानी का डिप्लोमेटिक एरिया चाणक्यपुरी आजकल एकबार फिर खबरों में है। वजह यह है कि वहां पर स्थित पाकिस्तान के हाई कमिशन में एक भारतीय महिला प्रोफेसर के साथ यौन उत्पीड़न का केस सामने आया है। वह वहां पर पाकिस्तान जाने के लिए वीजा लेने के लिए गईं थीं। अफसोस कि पाकिस्तान हाई कमीशन में कभी कोई सार्थक और रचनात्मक गतिविधियां नहीं हुईं। वहां पर पाकिस्तान के स्वाधीनता दिवस पर बिरयानी की दावत जरूर आयोजित होती थी। पर यह जगह मात्र भारत की जासूसी का अड्डा बना रहा। यहां पर जम्मू-कश्मीर के पृथकतावादी और आतंकवादी नेताओं को दामादों की तरह से सम्मान मिलता ही रहा।
     भारत सरकार ने 1950 के दशक में चाणक्यपुरी में विभिन्न देशों को भू-भाग आवंटित किये थे। पाकिस्तान को भी इस आशा के साथ बेहतरीन जगह पर अन्य देशों की अपेक्षा बड़ा प्लाट दिया गया था कि वह भारत से अपने संबंधों को मधुर बनाएगा। पर पाकिस्तान ने भारत को निराश ही किया। वह अपनी करतूतों से न बाज आया न ही सुधरा । उसके गर्भनाल में भारत के खिलाफ नफरत भरी हुई है। अब वहां पर उन भारतीयों के साथ यौन उत्पीड़न भी हो रहा है, जो वीजा लेने के लिए वहां पर जाते हैं। मतलब घटियापन की इंतिहा कर रहा है पाकिस्तान। भारत से नफरत करना पाकिस्तान के डीएनए में है। वह भारत का सिर्फ बुरा ही चाहता है। यह बात अलग है कि उसके न चाहने के बाद भी भारत संसार की सैन्य और आर्थिक दृष्टि से एक बड़ी शक्ति बन गया हैं। पर पाकिस्तान के घटियापन के बावजूद भारत ने पाकिस्तान को भी किसी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाया। यह सब करना भारत की कूटनीति का अंग ही नहीं है।
    पाकिस्तान की अब आंखें भी खुल रही हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने देश की सच्चाई से मुंह मोड़ने की जगह जनता को असली स्थितियों से अवगत करा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने पाकिस्तान के लिए बार-बार ऋण मांगने की तुलना भीख मांगने से की थी और कहा था कि उन्हें इसकी वजह से शर्मिंदा होना पड़ता है। अब उन्होंने भारत से रिश्तों को लेकर भी बयान दिया है। शरीफ ने कहा है कि भारत से तीन युद्धों में पराजय के बाद उनका देश अपने सबक सीख चुका है। शरीफ से भारत के साथ रिश्तों को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से तीन युद्धों में पाकिस्तान ने सबक सीखे हैं और वे अब शांति चाहते हैं। शरीफ ने इस बार भारत को कश्मीर पर कोई भी धमकी नहीं दी, बल्कि भारत से वार्ता की अपील करते दिखे।
    बहरहाल, शरीफ कितनी भी शराफत दिखाएं पर पाकिस्तानी सेना भारत से संबंधों को सामान्य नहीं होने देगी। पाकिस्तान सेना को विदेशी मामलों में भी दखल देने का पुराना रोग है। पाकिस्तान में जब भी किसी अन्य देश का राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री या अन्य कोई अन्य महत्वपूर्ण नेता आता है तो सेनाध्यक्ष उससे मिलते ही हैं। कमर जावेद बाजवा भी उसी रिवायत को आगे बढ़ा रहे थे। अब वे रिटायर हो गए हैं। नए सेनाध्यक्ष के बारे में अभी कुछ नहीं कहना चाहिए। उनका कार्यकाल अभी चालू ही हुआ है। बाजवा को या उनसे पहले के जनरलों को डिप्लोमेसी की कोई समझ नहीं थी। बाजवा 23 जुलाई, 2019 को वाशिंगटन में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात करते हैं। इमरान खान को यह समझ नहीं आ रहा था कि सेनाध्यक्ष डिप्लोमेसी में क्यों दखल दे रहा है। इसलिए दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गईं। गौर करें कि इमरान खान की रूस यात्रा के बाद उनके खिलाफ विपक्ष लामबंद हुआ। वे दावा कर रहे थे कि अमेरिका उनकी सरकार को हटाना चाहता है। दूसरी तरफ, बाजवा अमेरिका को पाक साफ बताते रहे। अब उनकी थू थू हो रही है।
    पाकिस्तानी सेना देश की सरहदों की रक्षा करने में नाकाम रही है। उसे भारत से 1948,1965, 1971 और फिर करगिल में कसकर मार पड़ी थी। पर कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं होता ना । यही हाल पाक सेना का है। रस्सी जल गई पर ऐंठन बाकी है I
    पाकिस्तान में सेना के चरित्र को जानने–समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को खंगाल लेना होगा। पाकिस्तान 14 अगस्त, 1947 को दुनिया के मानचित्र पर आता है। वहां पर पहले ग्यारह साल तो आर्मी अपनी छावनियों में रही। इस बीच पाकिस्तान के दो शिखर नेता मोहम्मद अली जिन्ना 1948 में और फिर लियाकत अली खान 1951 में संसार से विदा हो गए। यूपी, हरियाणा और दिल्ली से समान रूप से संबंध रखने वाले लियाकत अली खान की 1951 में रावलपिंडी के आर्मी हाउस के करीब एक पब्लिक मीटिंग के दौरान हत्या कर दी जाती है। इतने भयावह हत्या कांड के दोषियों के नाम या हत्या के पीछे की गुत्थी कभी सामने नहीं आई। पाकिस्तान आर्मी के लिए साल 1958 खास रहा। वहां पर तब मीर जाफर के वंशज (सच में) प्रधानमंत्री इस्कंदर मिर्जा 27 अक्तूबर, 1958 को देश के संविधान को भंग करने के बाद देश में मार्शल लॉ लागू कर देते हैं। मिर्जा ने इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में पढ़े पर बिना कोई डिग्री लिए वहां से निकले अयूब खान को आर्मी चीफ बना दिया। पर मिर्जा जिसे अपना समझते थे उसी अयूब खान ने उन्हें तेरह दिनों के बाद सत्ता से बेदखल कर दिया। अयूब खान सत्ता पर काबिज हो गए। मिर्जा के प्रधानमंत्री बनने तक तो पाकिस्तान में जम्हूरियत की बयार बही और उसके बाद वह हमेशा- हमेशा के लिए बंद हो गई। फिर वहां पर आर्मी का सिक्का कायम हो गया। आर्मी ने मुल्क के विदेशी और घरेलू मामलों में भी दखल देना चालू कर दिया। यही से पाकिस्तान बर्बाद होने लगा।
     अब हम फिर से अपने मूल विषय पर वापस आएंगे। हम बात कर रहे थे पाक हाई कमीशन में भारतीय महिला के साथ हुए यौन शोषण की। यह बेहद शर्मनाक घटना है। इस पर भारत का रुख भी सख्त है। भारत किसी भी सूरत में अपने किसी नागरिक का अपमान स्वीकार नहीं कर सकता। यह बात पाकिस्तान को अच्छी तरह समझ लेनी होगी।
    लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद – आर.के. सिन्हा

  • जिन्हें पालपोस कर बड़ा किया वही भेज रहे वृद्धाश्रम

    आर.के. सिन्हा
    राजधानी दिल्ली का पॉश ग्रेटर कैलाश इलाका।  यहां समाज के सबसे सफल, असरदार और धनी समझे जाने वाले लोग ही रहते हैं। बड़ी-बड़ी कोठियों के उनके अंदर-बाहर लक्जरी कारें खड़ी होती हैं। लगता है, मानो इधर किसी को कोई कष्ट या परेशानी नहीं है। पर यह पूरा सच नहीं है। अभी हाल ही में यहां के एक बुजुर्गों के बसेरे, जिसे वृद्धाश्रम या “एज ओल्ड होम” भी कहते हैं, में आग लगने के कारण क्रमश: 86 और 92 वर्षों के दो वयोवद्ध नागरिकों की जान चली गई। जरा सोचिए, कि इस कड़ाके की सर्दी में उन्होंने कितने कष्ट में प्राण त्यागे होंगे। इस वृद्धाश्रम में रहने वाले हरेक व्यक्ति को हर माह सवा लाख रुपये से अधिक देना होता है। यानी यहां पर सिर्फ धनी-सम्पन्न परिवारों के बुजुर्गों को ही रख सकते हैं। अफसोस कि इन बुजुर्गों को इनके घर वालों ने इनके जीवन के संध्याकाल में घर से बाहर निकाल दिया। यह कहानी देश के उन लाखों बुजुर्गों की है, जिन्हें उनके परिवारों में  बोझ समझा जाने लगा है। अगर इनका आय का कोई स्रोत्र नहीं है तो इनका जीवन वास्तव में कष्टकारी है।
    देखिए, भारत में तेजी से बढ़ती जा रही है बुजुर्गों की आबादी। एक अनुमान के मुताबिक, 14 बरस बाद, यानी 2036 में हर 100 लोगों में से केवल 23 ही युवा बचेंगे, जबकि 15 लोग बुजुर्ग होंगे। सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल देश के हर 100 लोगों में से 27 युवा और 10 बुजुर्ग हैं। 2011 में भारत की आबादी 121.1 करोड़ थी। 2021 में 136.3 करोड़ पहुंच गई। इसमें 27.3% आबादी युवाओं, यानी 15 से 29 साल की आयु वालों की है। यूथ इन इंडिया 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2036 तक युवाओं की संख्या ढाई करोड़ कम हो जाएगी। फिलहाल देश में युवाओं की आबादी वर्तमान में 37.14 करोड़ है। यह 2036 में घटकर 34.55 करोड़ हो जाएगी। देश में इन दिनों 10.1% बुजुर्ग हैं, जो 2036 तक बढ़कर 14.9% हो जाएंगे। मतलब बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है।
    जिस देश में बुजुर्गों की तादाद इतनी तेजी से बढ़ रही है, वहां पर सरकार को बुजुर्गों के लिए कोई ठोस योजना तो बनानी ही होगी, ताकि वे अपने जीवन का अंतिम समय आराम से वक्त गुजार सकें। उन्हें दवाई और दूसरी मेडिकल सुविधाएं मिलने में दिक्कत न हो। उनका बुढ़ापा खराब न हो।
    राजधानी दिल्ली के राजपुर रोड में भी एक बुजुर्गों का बसेरा है। यहां पर करीब 35-40 बुजुर्गों के लिए रहने का स्पेस है। इसे सेंट स्टीफंस कॉलेज तथा सेंट स्टीफंस अस्पताल को स्थापित करने वाली संस्था “दिल्ली बद्ररहुड़ सोसायटी” चलाती है। इनके कुछ बसेरे अन्य स्थानों और शहरों में भी हैं। यहां पर भी बेबस और मजबूर वृद्ध ही रहते हैं। ये रोज सुबह से इंतजार करने लगते हैं कि शायद कोई उनके घऱ से उनका हाल-चाल जानने के लिए आए। पर उनका इंतजार कभी खत्म ही नहीं होता। कभी-कभार ही किसी बुजुर्ग का रिश्तेदार कुछ मिनटों के लिए आकर औपचारिकता पूरी कर निकल जाता है। यहां पर रहने वालों से कोई पैसा नहीं लिया जाता। उन्हें दो वक्त का भोजन, सुबह का नाश्ता और चाय भी मिल जाती है। कुछ दानवीरों की मदद से संचालित दिल्ली ब्रदरहुड़ सोसायटी की तरह से चलाए जा रहे बुजुर्गों के बसेरे देश में गिनती के ही होंगे। वर्ना तो सब पैसा मांगते है किसी बुजुर्ग को अपने यहां रखने के लिए। हालांकि यह बात भी है कि बसेरा चलाने के लिए पैसा तो चाहिए ही। पैसे के बिना काम कैसे होगा।
    दरअसल बुजुर्गों के लिए स्पेस घटने के कई कारण समझ आ रहे हैं। जब से संयुक्त परिवार खत्म होने लगे तब से बुजुर्गों के सामने संकट पैदा होने लगा है। संयुक्त परिवारों में तो उम्र दराज हो गए लोगों का ख्याल कर लिया जाता था। तब बच्चे और बुजुर्ग सबके- साझे हुआ करते थे। उन्हें परिवार के सभी सदस्य मिलजुल कर देख लिया करते थे। परिवार का बुजुर्ग सबका आदरणीय होता था। संयुक्त परिवारों के छिन्न-भिन्न होने के कारण स्थिति वास्तव में विकट हो रही है। एक दौर था जब बिहार और उत्तर प्रदेश के हरेक घर के आगे सुबह परिवार के बुजुर्ग सदस्य सुबह चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहे होते थे। जिन परिवारों में बुजुर्ग नहीं होते थे उन्हें बड़ा ही अभागा समझा जाता था। पर अब इन राज्यों में भी बुजुर्ग अकेले रहने को अभिशप्त हैं। मुझे इन राज्यों के बैंगलुरू, मुंबई, दिल्ली, गुरुग्राम में रहने वाले अनेक नौकरीपेशा लोग मिलते हैं। वे अच्छा-खासा कमा रहे हैं। उनसे बातचीत करने में पता चलता है कि उनके साथ उनके माता-पिता नहीं रहते। वे अपने पुश्तैनी घरों में ही हैं। इसका मतलब साफ है कि अगर वे संयुक्त परिवारों में नहीं हैं तो वे राम भरोसे ही हैं। कारण बहुत साफ है। अब बिहार-उत्तर प्रदेश का समाज भी पहल की तरह नहीं रहा। वहां पर भी कई तरह के अभिशाप आ गए हैं।  एक बात समझ ली जाए कि हमे अपने बुजुर्गों के ऊपर पर्याप्त ध्यान देना ही होगा। उनका अपने परिवारों को शिक्षित करने से लेकर राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान रहता है। गांधी जी और गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर के सहयोगी रहे दीनबंधु सीएफ एन्ड्रूज से संबंध रखने वाली दिल्ली ब्रदरहुड़ सोसायटी की तरफ से चलाए जाने वाले बसेरों में तो उन बुजुर्गों का अंतिम संस्कार भी करवाया जाता है जिनका निधन हो जाता है। कई बार सूचना देने पर भी दिवंगत बुजुर्गों के सगे-संबंधी पूछने तक नहीं आते। तब बसेरे में काम करने वाले ही दिवंगत इंसान का अंतिम संस्कार करवा देते हैं। जरा सोच लीजिए कि कितना कठोर और पत्थर दिल होता जा रहा है समाज।
    केन्द्र और राज्य सरकारों को मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों,गिरिजाघरों वगैरह में भी बुजुर्गों के बसेरे खोलने के बारे में विचार करना चाहिए। इनके पास पर्याप्त स्पेस भी होता है। इनमें कुछ बुजुर्ग रह ही सकते हैं। वैसे सबसे आदर्श स्थिति तो वह होगी जब परिवार ही अपने बुजुर्ग सदस्यों का ख्याल करेंगे। आखिर कौन चाहता है कि वह इतना अभागा हो कि घर से बाहर अपने बुढापे के दिन गुजारे।
    (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)