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  • महात्मा गांधी ने इस पत्रिका में लिखा था, मंदिरो को तोड़ कर बनाई गई मस्जिदे…

     

    डेस्क। देश इस समय धर्म की राजनीतिक खींचतान में उलझा हुआ दिखाई दे रहा है। पहले धार्मिक हिंसाओं से जूझता भारत अब राजनीतिक अवबंदो में जकड़ा जा चुका है। सभी राजनीतिक पार्टी इस संवेदनशील मुद्दे को आग देकर अपना उल्लू सीधा करने में लगी हैं। कोर्ट में लगातार इससे जुड़े मामले फव्वारे की तरह बौछार मार रहें हैं। ज्ञानवावी से लेकर शाही ईदगाह और अजेमर शरीफ हो या ताजमहल ये सभी आज कड़घरे में जा खड़े हुए हैं। 

    हर कोई इनको अपने धर्म का अटूट हिस्सा बता रहा है। कोई इतिहास को अपनी सत्यता का प्रमाण कह रहा है तो किसी का मानना है कि खोज होनी चाहिए, इतिहास नहीं प्रत्यक्ष जो आएगा वही प्रमाण होगा। इसी कड़ी में अदालतों और ASI पर बारंबार दवाब भी बनाया जा रहा है। पर क्या आप जानते हैं कि भारत में धार्मिक खींचतान और मेरी जगह-मेरा मजहब की लड़ाई बहुत पुरानी है। भारत-पाक विभाजन भी इसी का प्रमाण है। ग़दर की लड़ाई भी धर्म और मेरी जगह-मेरा राज्य का ही परिणाम स्वरूप थी। इस कड़ी में आज हम धार्मिक सियासत को लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करेंगे। 

    उनके एक मासिक पत्रिका ‘सेवा समर्पण’ में तस्वीर के साथ छपे लेख जिसका शीर्षक, “मंदिरों को तोड़ कर बनाई गईं मस्जिदें ग़ुलामी के चिन्ह।” बता दें इस लेख में ‘नवजीवन’ के 27 जुलाई 1937 के अंक का संदर्भ दिया गया था। महात्मा गांधी का यह लेख देश में बने इस माहौल के बाद लाइमलाइट में आया है। जानकारी के अनुसार महात्मा गांधी का यह लेख श्रीराम गोपाल ‘शरद’ के एक पत्र के जवाब में था। जिसमें बापू ने केंद्र में ‘मंदिरों को तोड़ कर बनाई गईं मस्जिदें ग़ुलामी की निशानी है’ इस मुद्दे को प्रदर्शित करने की कोशिश की थी।

    जानिए इस लेख के केंद्र बिंदु

    इसमें कथित रूप से महात्मा गांधी ने लिखा है कि “किसी भी धार्मिक उपासना गृह के ऊपर बल पूर्वक अधिकार करना बड़ा जघन्य पाप है। मुगलकाल में धार्मिक धर्मान्धता के कारण मुगल शासकों ने हिंदुओं के बहुत से धार्मिक स्थानों पर अधिकार जमा लिया था जो हिंदु धर्म के पवित्र आराधना स्थल भी थे। इनमें से बहुत से लूटपाट कर नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए और बहुत को मस्जिद का रूप में बदल दिया गया। उन्होंने आगे कहा कि मंदिर और मस्जिद यह दोनों ही भगवान की उपासना के पवित्र स्थान हैं और दोनों में कोई भेद नहीं है पर हिंदू और मुसलमान दोनों की ही उपासना परंपरा बिल्कुल अलग है।” “धार्मिक दृष्टिकोण से एक मुसलमान यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसकी मस्जिद में, जिसमें वह इबादत करता चला आ रहा है, कोई हिंदू कुछ ले जाकर धर दे। इसी तरह से एक हिंदू भी कभी यह सहन नहीं करेगा कि उसके मंदिर में, जहां वह बराबर राम, कृष्ण, शंकर, विष्णु और देवों की उपासना करता चला आ रहा है, कोई उसे तोड़कर मस्जिद बना दें।”

    गांधी ने इसे बताया गुलामी का प्रतीक

    “जहां पर ऐसे कांड हुए हैं वह चिह्न गुलामी के हैं। हिंदू-मुसलमान दोनों को चाहिए कि ऐसी जगहों पर जहां इस तरह के झगड़े हों रहे है दोनों पक्ष आपस में मिलकर तय कर लें। मुसलमानों के वह पूजन-स्थल जो हिंदुओं के अधिकार में हैं, हिन्दू उन्हें उदारतापूर्वक मुसलमानों को लौटा दें। इसी प्रकार से हिंदुओं के जो धार्मिक स्थल मुसलमानों के कब्जे में हैं, वे उन्हें खुशी-खुशी हिंदुओं को वापस सौंप दें। इससे आपसी भेदभाव तो नष्ट होगा ही साथ में हिंदू-मुसलमान में एकता बढ़ेगी जो भारत जैसे धर्म प्रधान देश के लिए वरदान  है।”

  • वाह रे भारतीय राजनीति :- मुद्दों पर न ध्यान करो हिन्दू मुस्लिम तुम खूब लड़ो

    सम्पादकीय;- धर्म एक ऐसा विषय है जिसके पक्ष में बोलने से चीजे सकारात्मक रहती है लेकिन यदि आप इसके विरोध में एक शब्द भी अपनी जुबां से निकाल दें तो समझ लीजिए यह शब्द अपके लिए गले की फांस बन जाएगा और सही पर भी आप धर्म पुरोधाओं के कटाक्ष का शिकार होंगे। जहां धर्म आज के समय मे इंसान के जीवन का आज हिस्सा बन गया है और यह इतना प्रभावशाली हों गया है कि इसके चलते मनुष्य मानवता की भेंट चढ़ा देता है। लेकिन इसी धर्म के रंग में आजकल भारत की राजनीति भी खूब गोते लगा रही हो। 

    चुनाव चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का राजनीति में मुद्दा एक ही उठता है धर्म।आज के समय मे भारतीय राजनीति का परिदृश्य धर्म का चोला ओढ़े हुए हैं और उसे अपने धर्म से ऊपर कुछ नहीं दिखाई देता। वही राजनेता अपने राजनीतिक हित हेतु अलग अलग धर्म का चोला पहनकर जनता के हितैषी बनते हैं और उनको धर्म के नाम पर अलग करके अपने राजनीतिक कल्याण की फूली फूली रोटियां सेंकते है और पूरे पांच वर्ष तक उसे खाते हैं। 

    भारत और राजनीतिक:-

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    वैसे तो भारत विभिन्न जातियों वाला देश है यह अलग लग धर्म और जाति के लोग रहते हैं। वही अगर हम वर्ष 1991 में हुआ जनगणना पर गौर करें तो भारत मे हिंदुओं की आबादी 82.80% है जबकि मुस्लिम 11.70% हैं। वही भारत के संविधान ने भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया है। लेकिन जब 1857 में ब्रिटिश शासन के वक्त स्वतंत्रता संग्राम प्रभावित हुआ तो अंग्रेजो ने भारत मे फुट डालो रणनीति को अपना और भारत के राजाओं को अलग कर दिया। उन्होंने लोगो को धर्म और उनकी जातियों को आधर पर बांट दिया और एक एक राज्य के आधार पर भारत मे युद्द छेड़ उसपर अपना आधिपत्य स्थापित करना आरंभ कर दिया। वही इनके सत्ता में रहते भारत मे हिन्दू और मुस्लिम के मध्य कई दंगे हुए और तभी से राजनीति की अमुख सड़क हिन्दू मुस्लिम विवाद से होकर गुजरने लगी। 

    जब आजादी के बाद अपने मंसूबों में सफल हुए अंग्रेज और गहराई धार्मिक राजनीति:-

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    वर्ष 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो अंग्रेज अपने उद्देश्य में सफल हो चुके थे और वह हिन्दू और मुस्लिम को अलग अलग करके भारत विभाजन का कारण बने। वही आजादी के बाद भारत दो टुकड़ों में विभाजित हुआ और भारत का एक हिस्सा पाकिस्तान बना। इसी बटवारे के साथ भारत की राजनीति धर्म की राजनीति के पहिए के साथ गोल गोल घूमने लगी। हालाकि संविधान निर्माताओं ने भारत मे एकता का प्रचार प्रसार करने का अथक प्रयास किया लोगो को उनके अधिकारों से अवगत करवाया व भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य बताया। लेकिन धर्म की राजनीति के सामने संविधान निर्माताओं के संघर्ष ने घुटने टेक दिए और भारत मे धर्म की राजनीति फल फूल गई। 
    वही अगर हम धर्म की राजनीति पर गौर करें तो प्रत्येक राजनीति दल अब सत्ता के लाभ हेतु इसी फार्मूले का उपयोग कर रहा है। भारत मे आज के समय चुनाव से पूर्व धर्म का गुंजन होता है। राजनीति दल अपने हित हेतु धर्म का उपयोग करते हैं और सत्ता का सुख भोगते है। धर्म की राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण केरल की सत्ता में कांग्रेस का आना और वामपंथी दलों का मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन, मुस्लिम पर्सनल लॉ का न होना, इंदिरा गांधी का जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी के साथ बैठक, किसी भी धर्म पर आधारित राजनीति के उदाहरण हैं। इसके अलावा राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का विवाद धार्मिक राजनीति विवाद का बड़ा मुद्दा बना और इसके सहारे पर यूपी में भाजपा की जीत का डंका बना। भाजपा आरम्भ से राम जन्म भूमि के समर्थन में रही लेकिन इसके पीछे छुपी वास्विकता राम प्रेम से ज्यादा हिंदुओ को अपने समर्थन में करना था। वही इस आंदोलन ने हिंदुओ को भाजपा का समर्थक बना दिया।

    वर्तमान समय मे धर्म के नाम पर हो रहा कितना बड़ा राजनीतिक खेल:- 

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    आज के समय मे प्रत्येक दल धर्म के नाम पर जनता की भावनाओं के साथ खेल रहा है। हर किसी को यह लगता है कि आज यदि वह सत्ता में आना चाहता है तो उसे धर्म का इक्का फेंकना ही पड़ेगा। अगर हम बात अभी हाल ही में हुए यूपी विधानसभा चुनाव की बाद करें तो इसके हमे धर्म के अनेको रंग दिखे। कभी चुनाव से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी पहुंचते हैं और काशी विश्वनाथ मंदिर में शिव की पूजा आराधना कर जनता को लुभाने की कोशिश करते हैं। तो कभी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी लाइन में लग कर मंदिर में आम जनमानस की भांति पूजा करने पहुंच जाती है। कभी परशुराम जयंती पर अखिलेश जनता को धर्म के नाम पर आकर्षित करने की कोशिश करते हैं तो कभी एआईएमआईएम प्रमुख खुद को मुस्लिम हितैषी बताते है और अन्य पार्टियों को मुस्लिम विरोधी बताते हैं।
    वही अगर हम बात उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की करे तो यह डंके की चोट पर खुद को हिन्दू कहते हैं और हिन्दू के समर्थन में हमेशा खड़े रहते हैं। एक मुख्यमंत्री के तौर पर यह सभी को समान भाव से देखने की बात करते हैं लेकिन कहीं न कहीं इनका झुकाव हिंदुओ के प्रति अधिक रहता है। वैसे योगी आदित्यनाथ का भगवा चोला भी राजनीतिक में काफी अहम भूमिका निभाता है और प्रत्येक ब्राह्मण और क्षत्रिय उनके भगवा चोले पर मोहित है और उन्हें हिन्दू ह्रदय सम्राट के नाम से जानता है।

    राजनीति में गानों का पोस्टमार्टम:- 

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    यह ट्रेंड भारत की राजनीति में बिल्कुल नया आया है या यूं कहें की जब से भारत मे भाजपा की सरकार आई है इस ट्रेंड ने जोर पकड़ लिया है। यूपी चुनाव के दौरान ये भगवा रंग, जो राम को लाए हैं, शोर है योगी योगी, योगी राज में नहीं चलेगी बाते तालिबान की, योगी से डर लगता है तो यूपी छोड़ दो जैसे गानों ने खूब सुर्खियां बटोरी इन गानों को जवाब देने के लिए विपक्ष ने भी कदम बढ़ाए लेकिन विपक्ष इस फॉर्मूले को नहीं अपना सका और हर ओर यूपी में भगवा रंग छा गया। इन गानों ने न सिर्फ धर्म की राजनीति की बल्कि हर किसी को एक विशेष दल की ओर आकर्षित किया व जनता को यह बता दिया की आज के समय मे धर्म किंतना महत्वपूर्ण है।

    गुजरात मे भी गुंजा धर्म:- 

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    इस साल के अंत मे गुजरात मे विधानसभा चुनाव होने को है यहां पिछले 30 सालों से भाजपा सत्ता में है वही कांग्रेस यहां लगातार संघर्ष कर रही है और सत्ता में आने की कवायद में जुटी है। कांग्रेस के पाटीदार नेता ने हिन्दू हितैषी बताते हुए भाजपा का दामन थाम लिया और कहा की कांग्रेस एक ऐसा दल है जो हिंदुओ के पक्ष में नहीं बोलती वही कांग्रेस के एक नेता के बयान पर कहा जाने क्यों इन कांग्रेसियों को राम से इतनीं नफरत है। वही उन्होंने भाजपा को राज्य की कल्याणकारी पार्टी बताया और 2 जून को वह भाजपाई हो गए। हार्दिक के इन बयानों से यह स्पष्ट हो गया कि आज मुद्दों की राजनीति का कोई महत्व नहीं है अब जो धर्म का खेल जितनी मजबूती से खेलेगा सत्ता में वह उतनी मजबूती से टिकेगा।
    वही भाजपा के इस हिन्दू कार्ड का सहारा लेकर अब गुजरात मे कांग्रेस भी सत्ता में वापसी करना चाहती है। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने गुजरात मे धर्म की राजनीति की थी और भाजपा को कांटे की टक्कर देते हुए कांग्रेस यहां बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी थी। वही इस बार भी गुजरात के धर्म की राजनीति होने के आसार दिखाई दे रहे हैं हालांकि केजरीवाल दिल्ली मॉडल का गुणगान करते रहते हैं लेकिन उनका यह पैतरा कितना सफल होगा यह आगामी वक्त ही बताएगा। क्योंकि यूपी के चुनाव में इन्होंने पलटी मारते हुए राम के धाम से अपनी चुनावी यात्रा की शुरुआत की थी।

    वर्तमान में हुए दंगो का चुनावी कनेक्शन:-

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    वैसे तो ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर भाजपा ने चुप्पी साध रखी है लेकिन उसकी इस चुप्पी को राजनीतीज्ञय विशेषज्ञ राज्यसभा चुनाव से जोड़ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा हिन्दू कार्ड खेलना चाहती है और पुनः केंद्र में मोदी सरकार लाना चाहती है। भारत मे पिछले कई दिनों से हिन्दू मुस्लिम विवाद से जुड़े मुद्दे उफना रहे हैं और इन्हीं के इर्द गिर्द राजनीति हो रही है। कभी राम नवमी पर विवाद तो कभी हनुमान जयंती पर दंगा कभी अचानक से मस्जिद में शिवलिंग मिलना तो कभी मस्जिद ओर मंदिर के मुद्दे का जोर पकड़ना। 
    कभी मुगलों को मस्लिम का वंशज बताना तो कभी इतिहास में हुई घटनाओं के नाम पर दंगे करना और देश का माहौल खराब करना और फिर इन घटनाओं पर पक्ष विपक्ष की प्रतिक्रिया आना और अपने अपने टारगेटेड वोट बैंक का समर्थन कर उनका वोट बैंक हासिल करना आज की राजनीति का अहम हिस्सा है। आज राजनीति में मुद्दों से ज्यादा धर्म की चर्चा होती है और लोग धर्म के नाम पर अलग अलग राजनीति परिदृश्य के साथ बंटे हुए हैं।

  • जाने क्या है पैगम्बर मोहम्मद का सच, क्या हिंसक कभी हो सकते हैं पैगम्बर के अनुयायी

    Islam:- इस समय पूरे भारत मे पैगम्बर मोहम्मद की चर्चा हो रही है और इनके समर्थक सड़को को पत्थरो से पाटने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जहाँ भाजपा प्रवक्ता में पैगम्बर मोहम्मद को लेकर विवादित टिप्पणी की और इनके अनुयायियों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया वही अब इनके अनुयायी लगातार भारत को आहत करने में जुटे हुए हैं और नुपुर शर्मा की गिरफ्तारी की मांग के चलते जगह जगह पर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन अगर हम बात पैगम्बर मोहम्मद की करें तो वह सभी को समानांतर देंखने की बात करते थे और हिंसा को कभी बढ़ावा देने की बात नहीं करते थे। 

    इस्लाम में कभी भी हिंसक गतिविधियों का जिक्र नहीं किया गया और आज भारत मे जिस प्रकार से लोगो खुद को पैगम्बर का अनुयायी बताकर सड़को को पथराव से भर रहे हैं वह कही न कही पैगम्बर के नियमों के विरुद्ध है और उनकी धार्मिक नीतियों को अस्त व्यस्त कर रहा है। पैगम्बर मोहम्मद जिन्हें मुस्लिम समाज ईश्वर का दूत कहता है इन्हें ईश्वर का इस्लामी पैगम्बर भी कहा जाता है और ईश्वर अपने लिए किसी को आहत करने की अनुमति कभी नहीं देता है।  

    जाने क्या है पैगंबर मोहम्मद का सच:- 

    पैगम्बर मोहम्मद को ईश्वर का दूत कहा जाता है जब यह 6 वर्ष के थे तो इन्होंने अपने माता पिता दोनो को खो दिया था। पैगम्बर मोहम्मद का पालन पोषण उनके चाचा ने किया था। पैगम्बर मोहम्मद जब 25 वर्ष के थे तो उन्होंने ख़ादीजा नाम की एक विधवा के घर काम करना आरंभ किया और बाद में ख़ादीजा बिन खुवैलिद से विवाह किया जोकि उनके इस्लाम धर्म अपनाने के पश्चात् पहली मुस्लिम बनी थी। वही जब यह 40 वर्ष के हुए तो इन्होंने स्वम् को ईश्वर से बातचीत करने और मिलने का दावा किया वही यह उपदेश दिया की ईश्वर एक है और सभी को एकजुट होकर एकता के साथ रहना चाहिए।
    मुस्लिम समाज के लोगो का कहना है कि पैगम्बर मोहम्मद को मक्का की पहाड़ियों में ज्ञान की प्राप्ति हुई और यही से यह विश्व विख्यात हो गए। मक्का में जब पैगम्बर ने उपदेश दिए तो वहां की जनजातियों ने इनका विरोध किया और वह इनकी कट्टर दुश्मन बन गई। इस विरोध के चलते पैगम्बर ने शांति का परिचय दिया और मक्का छोड़कर मदीना की ओर चल दिए। उनके मक्का से मदीना की ओर जाने की घटना को इस्लाम मे हिजरा के नाम से जाना जाता है। वही इस्लामी कलेंडर का निर्माण इसी हिजरा के आधार पर हुआ है। 
    कहा जाता है कि पैगम्बर मोहम्मद ने अपने उपदेशों से लोगों का दिल जीत लिया और इनके अनुयायियों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई। जब पैगम्बर के अनुयायी बढ़ गए तो इन्होंने उनके समर्थन के साथ मक्का पर चढ़ाई कर दी और जीत हासिल की। इस जीत के बाद मक्का के लोगो ने इस्लाम को स्वीकार किया और मक्का में स्थित काबा को इस्लाम का प्रमुख धार्मिक स्थल घोषित कर दिया गया। वही पैगम्बर मोहम्मद का निधन उस दौर में हुआ जब इस्लाम का प्रचार प्रसार चर्म पर था पूरा अरब इस्लाम के सूत्र में बंध चुका था। मोहम्मद पैगम्बर की मौत के बाद साहब के दोस्त अबू बकर को मुहम्मद साहेब का उत्तराधिकारी घोषित किया गया और इस्लाम को सर्वोपरि माना गया उसका एक एक कथन पत्थर की लकीर बना और जो लोग इस्लाम का सच्चे मन से अनुसरण करते थे उन्होंने पैगम्बर के संदेश को मानते हुए एकता का परिचय दिया और सभी धर्मों का सम्मान किया। क्योंकि पैगम्बर का पहला उद्देश्य इसी संदर्भ में था कि ईश्वर एक है और सभी को एकजुट होकर रहना चाहिए।

    जाने पैगम्बर मोहम्मद की कितनी पत्नी थी:-

    अगर हम पैगम्बर मोहम्मद की शादियों की बात करें तो यह अपनी पहली पत्नी ख़दीजा थी। पैगम्बर मोहम्मद ने खदीजा से 25 वर्ष की उम्र में विवाह किया था। यह खदीजा से बेहद प्यार करते थे। जब पैगम्बर मोहम्मद ने खदीजा से शादी की तो उनकी उम्र 40 थी जबकि मोहम्मद की उम्र मात्र 25 वर्ष थी। खदीजा की मौत के बाद पैगम्बर मोहम्मद ने 10 और शादियां की थी। पैगम्बर मोहम्मद की पहली पत्नी खदीजा काफी दयावान थी वह अपनी आय को गरीबों, अनाथों, विधवाओं और बीमारों के बीच बांटा करती थी। उन्होंने गरीब लड़कियों की शादी के खर्च का भी ध्यान रखा और एक बहुत ही नेक और सहायक महिला के रूप में जानी जाति थी। वही अगर हम पवित्र कुरान की बात करें तो इसे मोहम्मद की मौत 100 साल बाद लिखा गया वही इसका संग्रह और बाद में हुआ है। 

  • क्या एक महिला पर अभद्र टिप्पणी करना सिखाते थे मुस्लिमों के पैगम्बर मोहम्मद

    सम्पादकीय – भाजपा की निलंबित प्रवक्ता नुपुर शर्मा के पैगम्बर मोहम्मद और उनकी बीवी हजरत आयशा की शादी को लेकर दिये बयान ने भारत से लेकर इस्लामिक देशो में हंगामा मचा दिया है और हर और विद्रोह की आग सुलग रही है। मुस्लिम समाज लगातार भाजपा प्रवक्ता की गिरफ्तारी की माग उठा रहा है और नुपुर शर्मा के विरोध में जगह जगह हिंसक झड़प देंखने को मिल रही है। मुस्लिम देशों में नुपुर शर्मा के बयान के कारण बहिष्कृत आंदोलन छिड़ा है और भारत की चीजो के उपयोग का बहिष्कार करने की मांग उठ रही है। 

    क्या एक महिला पर अभद्र टिप्पणी करना सिखाते थे पैगम्बर:-

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    क्या एक महिला पर अभद्र टिप्पणी करना सिखाते थे मुस्लिमों के पैगम्बर मोहम्मद

    असल मे नुपुर शर्मा ने पैगम्बर मोहम्मद और उनकी पत्नी हजरत आयशा की उम्र 6 साल बताकर विवादित बयान दिया और उनके बयान के बाद मुस्लिम समाज एकदम से आग बबूला हो उठा लोग नुपुर शर्मा की गिरफ्तारी की मांग उठाने लगे। भारत समेत खड़ी देशो ने नुपुर शर्मा को लेकर तरह तरह की आपत्तिजनक टिप्पणी होने लगी। कोई इन्हें सामुहिक बलात्कार की धमकी देने लगा तो कोई इनका सर तन से अलग करने की बात कर रहा है। कही सोशल मीडिया पर बिजली की वायर से नुपुर शर्मा को इंगित करते हुए फांसी पर पुतला लटकाया जा रहा है और दारूल उलूम देबंद की वेबसाइट दारूल इफ्ता की वेबसाइट पर आयशा की उम्र 6 वर्ष लिखी होने के वाबजूद भारत मे एक महिला पर इस प्रकार की अभद्र टिप्पणी हो रही है और भारत सरकार मूक दर्शक बनी उस महिला का अपमान सह रही है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि यह लोग पैगम्बर मोहम्मद के समर्थक हैं और उनके सम्मान के लिए इस तरह का बयान दे रहे हैं तो अब क्या एक महिला के खिलाफ इस प्रकार की आपत्तिजनक टिप्पणी का उपदेश इनको पैगम्बर मोहम्मद ने दिया था।

    जो मुस्लिम कर रहे वह पैगम्बर और अल्लाह के संदेश से भिन्न:-

    अगर हम मान ले की नुपुर शर्मा ने हदों से आगे बढ़ते हुए किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है तो क्या आज भारत का जो माहौल है मुस्लिम समाज जिस प्रकार नुपुर का विरोध कर रहा है और अपनी आतंकी सोच का परिचय दे रहा है वह क्या मौलिक रुप से अप्रासंगिक है। क्योंकि जिस कुरान की वह बात करते हैं उसमे कहा गया है अल्लाह अपराधियों को भली भांति जानता है और वह अपराध के लिए उन्हें सजा भी देता है क्योंकि अल्लाह एक है और वह एकता का समर्थक हैं। वही अगर हम बात पैगम्बर मोहम्मद की करें तो उन्होंने अपना पहला उपदेश ही एकता से दिया था और कहा था सभी को एकजुट होकर रहना चाहिए और ईश्वर अपने लिए किसी को आहत करने की अनुमति नहीं देता। लेकिन जो मुस्लिम समाज कर रहा है वह वास्तव में पैगम्बर के उपदेश और अल्लाह के संदेश से भिन्न है।

    अतीत के नाम पर महिला पर आपत्तिजनक टिप्पणी ओछी सोच का प्रदर्शन:-

    वही अगर हम नुपुर शर्मा के बयान पर छिड़ी बहस की बात करे तो आज भारत मे उस समय पर बहस हो रही है जब समाज मे महिला का कोई अस्तित्व नहीं था प्रत्येक व्यक्ति महिला को अपनी सम्पत्ति समझता था और अपने हित हेतु उसका उपयोग करता था। घरों में अक्सर आयशा की उम्र की दुल्हन मिल जाती थी।  1949 में, जिस उम्र में महिलाओं की शादी हो सकती थी, उसे बढ़ाकर 15 साल कर दिया गया। बाद में 1978 में शादी की उम्र 15 से बढ़ाकर 18 कर दी गई। दिसंबर में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए उम्र को 18 से बढ़ाकर 21 करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।

    वही अगर हम बात इस समय उठे पैगम्बर मोहम्मद के विवाह मुद्दे की करे तो वास्तव में वह इतनीं बड़ी हिंसा भड़काने की लिए बिल्कुल अनुचित है। क्योंकि जिस दौर में पैगम्बर मोहम्मद थे उस दौर में बाल विवाह होना मुनासिब था और उन्होंने भी एक 6 साल की बच्ची से विवाह किया जिसे मुस्लिम समाज झुठला नहीं सकता। लेकिन उस समय की घटना को लेकर आज को प्रभावित करना और देश का माहौल खराब करना चिंतनीय है। क्योंकि यदि आज भी अतीत के नाम पर एक महिला को लेकर अभद्र भाषा का प्रयोग किया जा रहा है और उसे मारने की धमकी दी जा रही है तो यह अपकी ओछी सोच का प्रदर्शन कर रही है।

    6 वार्षिक आयशा से पैगम्बर की शादी का सच:- 

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    अगर हम इस्लामी विद्वानों की बात करे तो इनकी उम्र को लेकर वह भी संशय में है। अगर हम बात दारूल उलूम देबंद की वेबसाइट दारूल इफ्ता के मुताबिक देखे तो हजरत मुहम्मद साहब से हजरत आयशा की 6 साल की उम्र में हुई थी लेकिन जब उनकी रुखसती हुई तो उनकी उम्र 9 साल कुछ माह की थी। वही अगर हम हदीस की बात करें तो इसके अनुसार जब पैगम्बर मोहम्मद का विवाह आयशा से हुआ था तो उनकी उम्र 6 साल थी जबकि पैगम्बर मोहम्मद की उम्र उस समय 53 वर्ष थी। लेकिन उनकी रुख्सती 9 साल की उम्र में तब हुई जब वह शारीरिक रूप से बालिग हो गईं और रुखसती का यह पैगाम उनकी मां ने ही भिजवाया था। वही भारत मे इस समय पैगम्बर को आयशा के विवाह को लेकर हंगामा मचा हुआ है और नुपुर शर्मा के बयान पर पूरा मुस्लिम समाज बवाल काट रहा है। हालाकि नुपुर शर्मा ने वही बयान दिया जो कि जगह जगह उल्लेखनीय है कि पैगम्बर मोहम्मद ने 6 वार्षिक आयशा से विवाह किया था और 9 साल की उम्र में उनकी रुखसती हुई थी।

     

  • Draupadi Murmu से जीतकर भी हार जाएंगे Yashwant Sinha

     

     

    क्यों निर्विरोध मिलनी चाहिए Draupadi Murmu को राष्ट्रपति की कुर्सी?

     

     

    उनके (आदिवासी) जीवन को ध्वस्त कर हमने हमेशा छीने हैं मौके

    Draupadi Murmu को रोकना देश को दे रहा गलत संकेत

    चुनावी कुरुक्षेत्र नहीं बदलाव के नारे के साथ विपक्ष को करना चाहिए Draupadi Murmu का समर्थन

    President Election 2022 । देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर कौन होगा? क्या विपक्ष अपने आगे सत्तारूढ़ को नतमस्तक कर देगा या सत्ताधारी अपना रास्ता साफ करेंगे? इन दिनों इसी बात की चर्चा हर जगह हो रही है। क्या आपको पता है राष्ट्रपति को देश की संसद का एक अंग माना जाता है जिस कारण से यह चुनाव बेहद खास हो जाता है। 

    एक ओर भारतीय जनता पार्टी अलायन्स NDA की तरफ से द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना ऐतिहासिक बताया जा रहा है।

    पद की दावेदार, दमदार लीडर हैं Draupadi Murmu

    बता दें कि दलितों के पास भीमराव आंबेडकर थे लेकिन आदिवासी समुदाय के पास कोई भी राजनैतिक आवाज़ नहीं थी। इसलिए देश के कोने-कोने में फैले होने के बाद भी उनका राजनैतिक प्रतिनिधित्व कभी प्रखर नहीं रहा। भारत को दो दलित राष्ट्रपति भी मिले जिनमें के आर नारायणन और कोविंद जी शामिल हैं लेकिन आदिवासी समुदाय से ना प्रधानमंत्री मिला और ना ही राष्ट्रपति, ना आज तक कोई वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री और गृह मंत्री आदिवासी समुदाय से आया।

    यशवंत सिंहा क्यों नज़र आ रहे लड़ाई से बाहर

    बता दें कि कोई भी आदिवासी केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका में लंबे समय तक नहीं रहा है लेकिन द्रौपदी मुर्मू की दावेदारी की घोषणा के बाद राजनैतिक समीकरण बदला हुआ नजर आ रहा है। टीएमसी के नेता यशवंत सिन्हा संपूर्ण विपक्ष के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बने हैं। 

    राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार वो हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं।क्योंकि उनकी दावेदारी से विपक्ष के एकजुट होने के आसार नजर नहीं आ रहे। विशेषज्ञ बताते हैं कि कलाम साहब के वक़्त जो हुआ वो ही सभी राजनीतिक पार्टियों को करने की कोशिश करनी चाहिए। उनके अनुसार मुर्मू का समर्थन होना चाहिए और केवल विरोध के नाम पर उम्मीदवार नहीं आना चाहिए।  

    बता दें कि आज लेफ्ट भारतीय राजनीति में मायने ही नहीं रखती है। उसे कोई पूछता ही नहीं है। यशवंत सिन्हा जी भी पिछड़े लोगों की राजनीति करते है तो उनको मुर्मू जी की उम्मीदवारी का पूर्ण समर्थन करना चाहिए। जिससे देश में सही संकेत जाएगा और आदिवासी समाज को भी लगेगा कि उनके साथ न्याय हो रहा है। अगर यशवंत ऐसा नहीं करते है तो यह पूर्ण रूप से आदिवासी लोगों की खिलाफत मानी जाएगी।

    क्या आप जानते हैं कि आज़ादी के बाद अगर किसी ने सबसे ज़्यादा तकलीफ का सामना किया है तो वो आदिवासी समाज ने किया है क्योंकि विकास के नाम पर उनके जंगल काटे गए। उसकी लाइफ में हमने इंटरफेयर किया पर उनको कभी समाज से जुड़ने की नहीं दिया। 

    द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनने से रोकना गलत

    इस बात पर कई दल ये कहेंगे कि उनकी लड़ाई मुर्मू से नहीं बल्कि संघ से है। लेकिन इस दावेदारी ने सिद्ध कर दिया है कि संघ आज दलित और आदिवासियों के ज़्यादा करीब जा खड़ा है। मुर्मू जी को कोई राष्ट्रपति बनने से नहीं रोक सकता। ऐसे में यशवंत सिंहा को विवेक रख विचार करना चाहिए और निविरोध ही यह चुनाव भाजपा के खेमे में डाल देना चाहिए। 

    जिन लोगों ने देश के विकास के लिया अपना जंगल, अपना घर खोया है अगर उनमें से निकला कोई व्यक्ति बिना विवाद के देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पर जाएगा तो निसन्देश ही यह पूरे समाज के लिए एक अच्छा सन्देश बनेगा। इसी कारण से मुर्मू को बिना लड़े ही राष्ट्रपति भवन भेजने की चेष्टा होनी चाहिए।

  • सत्ता भी गई पार्टी भी गई क्यों उद्धव के लिए जहर बना सीएम का पद

    Maharashtra Crisis:- महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार गिरने को है। शिवसेना का वर्षो पुराना मजबूती का रिकॉर्ड टूट रहा है और पार्टी के नेता पार्टी के विरोध में खड़े गए हैं। शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे अपनी उम्दा नीतियो और प्रभावशाली राजनीतिक परिदृश्य के चलते अपने दौर में हमेशा चर्चा में रहे। इन्होंने अपने बलबूते पर शिवसेना को इतने बड़े पैमाने पर खड़ा किया। यह भाजपा को कमलाबाई कहते थे और अपने मन के मुताबिक राजनीति करते थे। लेकिन इन्हें कभी सस्ता का सुख नहीं मिला या यूं कहें की शिवसेना परिवार सत्ता का हिस्सा बनना ही नहीं चाहता था या उन्हें सत्ता में आने नहीं दिया जा रहा था। 

    लेकिन साल 2019 में शिवसेना का यह रिकॉर्ड टूट गया और ठाकरे परिवार से उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने। उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने के लिए कई प्रयास किए। अपने वर्षो पुराने भाजपा के गठबंधन को तोड़ दिया और विरोधी विचारधारा के दल एनसीपी के साथ गठबंधन कर लिया। एनसीपी के साथ जब शिवसेना का गठबंधन हुआ तो शिवसेना के कार्यकर्ता कही न कही शिवसेना के नेतृत्व से रूष्ट हो गए। लेकिन उन्होंने अपनी नाराजगी उस वक़्त जाहिर नहीं की और ढाई साल के बाद उद्धव ठाकरे की सरकार न सिर्फ गिरने की कगार पर आ गई बल्कि उसका अस्तित्व भी डगमगा रहा है। 

    क्यों सीएम का पद बना जहर:- 

    उद्धव ठाकरे में मुख्यमंत्री पद की लालसा के चलते भाजपा के साथ अपना गठबंधन तोड़ा था और एनसीपी से हाँथ मिलाया था। उस समय उद्धव ठाकरे को यह रसमलाई सा लगा और उन्होंने सीएम का पद ग्रहण करते हुए इसे बड़े स्वाद से खाया। लेकिन ढाई साल में ही यह जहर बनकर सामने आया और उद्धव का सीएम पद उनके लिए नासूर बन गया। आज इस पद की वजह से शिवसेना के समर्थक रहे एकनाथ शिंदे आज शिवसेना और उद्धव ठाकरे के विरोध में खड़े हैं। लोगो का कहना है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के लिए पहले एकनाथ शिंदे का नाम घोषित किया गया था लेकिन उद्धव ठाकरे की जिद के चलते उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया गया जो आज उनके लिए और शिवसेना के लिए बड़ी समस्या बन गया है।

    सत्ता के साथ मिली आलोचनाएं:- 

    भाजपा के साथ गठबंधन तोड़कर एनसीपी के साथ मिलने के बाद शिवसेना को सत्ता और ठाकरे परिवार को संवैधानिक पद तो मिल गया। लेकिन इस पद के साथ शिवसेना को लोगो की आलोचनाओ का शिकार होना पड़ा। जो शिवसेना बालासाहेब ठाकरे के समय मे अपने प्रभावित राजनीतिक वातावरण के चलते जानी जाती थी उसे लोग सत्ता स्वार्थी बताने लगे। वही उद्धव ठाकरे के विषय मे राजनीतिक विशेषज्ञयों का कहना है कि वह जनता को बांध कर रखने में असफल रहे। जहाँ बालासाहेब ठाकरे के समय शिवसेना एकजुट रही वही उद्धव ठाकरे के राज में पार्टी के अंदर आपसी मतभेद बढ़ गया और पार्टी चूर चूर हो गई।

  • जिस नरसंहार में गई 69 जान, अभी भी नहीं मिले अवशेष, उसके दोषी आरोपी जमानत पर आजाद

    गुजरात दंगा:- वर्ष 2022 में हुए गुजरात दंगे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी है और इस मामले में समाज सेवी और पेशे से पत्रकार रही तीस्ता सीतलवाड़ को हिरासत में लिया गया है। तीस्ता सीतलवाड़ पर आरोप है कि उन्होंने दंगा पीड़ितों की भावनाओं को आहत किया और उनका अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु फायदा उठाया। उनपर यह भी आरोप लगा कि उन्होंने मोदी की छवि खराब करने की कोशिश की ओर वह कांग्रेस से जुड़ी थी। 

    कोर्ट में प्रधानमंत्री को क्लीन चिट देते हुए गुजरात दंगा मामले में जकिया जाफरी की याचिका को खारिज कर दिया। बता दें जकिया जाफरी ने अपने पति अहसान जाफरी को इस हिंसा के दौरान खो दिया था, जो कांग्रेस के पूर्व सांसद थे। वही इस हिंसा में 69 लोगो की मौत हुई थी जिसके दोषी आज जमानत पर खुले आम घूम रहे हैं। बता दें यह दर्दनाक घटना 28 फरवरी, 2002 को अहमदाबाद के मेघानीनगर इलाके में गुलबर्ग सोसाइटी में हुई थी। 
    इस हमले में 69 लोगो की जान गई जिसमें से 30 लोग आज भी लापता हैं। इन लापता लोगो मे जकिया जाफरी के पति भी शामिल थे। इन लोगो के अन्वेषण अभी तक नहीं मिल पाए हैं। इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त की गई एसआईटी द्वार करवाई गई थी। वही इस केस के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सावालो के घेरे में थे। लेकिन एसआइटी की टीम ने मोदी को क्लीन चिट दी थी जिसके बाद जकिया जाफरी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और उनके विरोध में याचिका दायर की थी जिसे साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर मोदी को क्लीन चिट दी है।
    इस दंगे के मामले में 72 लोगो को आरोपी घोषित किया गया था। इन 72 लोगो मे से 4 नाबालिग थे जिनपर अलग धराओ के तहत कार्यवाही हुई थी। बाकी बचे आरोपियों में से 6 की मौत सुनवाई के दौरान हो गई थी। जबकि 38 को बरी कर दिया गया। बरी किए गए लोगों में उस समय मेघानीनगर पुलिस स्टेशन के प्रभारी निरीक्षक के जी एरडा शामिल थे, जिनके अधिकार क्षेत्र में गुलबर्ग सोसाइटी आती थी। वही जून 2016 को 24 दोषियों को एक विशेष अदालत ने सजा सुनाई, जिनमें 11 को उम्रकैद की सजा दी गई थी। इन दोषियों में से तीन ने अपनी सजा पूरी कर ली, जबकि उनकी अपील लंबित है। बाकी सभी 21 जमानत पर बाहर हैं, जिनमें 11 उम्रकैद वाले आरोपी भी शामिल हैं। इन 24 दोषियों में से कुछ पर गंभीर आरोप थे जबकि कुछ पर कम गंभीर आरोप थे। इनमें चार आरोपी फरार हैं।

  • जाने क्यों तेजी से बढ़ता इस्लाम लोगो के लिए बनता जा रहा कत्लेआम

    Editorial– 14 सो साल पहले आया इस्लाम धर्म आज विश्व स्तर पर काफी तेजी से फैल रहा है। जहां मुस्लिम समाज इस्लाम के खिलाफ एक शब्द नही सुनना चाहता हैं वही इस धर्म ने डेढ़ दशक में विश्व को बड़े संकट के बीच लाकर खड़ा कर दिया है। आज इस्लाम को लेकर कई सवाल उत्पन्न हो रहे हैं। लोगो का कहना है कि इस्लाम जिसके अनुयायी तेजी से बढ़ रहे हैं वह दुनिया के लिए संकट क्यों बनता जा रहा है लोग इसे लेकर इतना चिंतित क्यों है। अगर इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है तो इसका विरोध क्यों हो रहा है। वही अगर यह एक अच्छा धर्म है तो लोग इस्लाम को लेकर इतने सवाल क्यों खड़े कर रहे हैं इस्लाम को मानने वाले लोगो के मन मे इतना डर क्यों है आखिर इस्लाम इतना डरावना ओर भ्रमित क्यों होता जा रहा है ओर लोग इतना सब होने के बाद भी इसे क्यों अपना रहे हैं।

    वही जब हम इन सभी सावालो के जवाब को खोजते हैं तो हमे इस्लाम को लेकर तरह तरह के मत सुनने को मिल जाते हैं। इस्लाम को मानने वाले इस सवाल का जवाब इस्लाम के पक्ष में देते हैं वही इस्लाम को न मानने वाले इन सावालो पर अनोखी प्रतिक्रिया देते हैं वह इस्लाम की कमियों को गिनाने से कभी नहीं चूकते। लेकिन आज हम आपको इस्लाम से जुड़े कुछ ऐसे तत्व बताने जा रहे हैं। जो इन दोनों मतों को दर्शाते हैं कि आखिर आज के समय मे इस्लाम इतना आकर्षक क्यों है ओर यह डर क्यों बनता जा रहा है।

    जाने इस्लाम की आकर्षक बाते:- 

    इस्लाम को मानने वाले लोगो का कहना है कि इस्लाम और क्रिश्चियेनिटी के बाद आया है। इसमे इन दोनों धर्मो की अच्छी बातों को शामिल किया गया है। इस्लाम सच्चाई की सीख देता है इस्लाम यह दावा करता है कि जो सत्य को मानता है जो अन्न्याय से दूर रहता है वह अल्लाह का सच्चा उपासक है। इस्लाम के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के साथ अन्न्याय करता है दुर्व्यवहार करता है लोगो का सम्मान नहीं करता है वह इस्लाम के अनुसार गलत है। इस्लाम मे स्पष्ट रूप से कहा गया है कि लोगो को दयाभाव से रहना चाहिए ओर हमेशा एक दूसरे के हित के लिए खड़ा होना चाहिए। 

    इस्लाम के मुताबिक एक अच्छा इंसान वही है जो सद्व्यवहार, दयाभाव व आदर्श समाज की स्थापना में अपना योगदान देता है। इस्लाम का उद्देश्य है लोगो का सहयोग करना ओर एक ऐसे समाज की स्थापना करना जहाँ मनुष्य मनुष्य के लिए खड़ा रहे। इस्लाम का उद्देश्य विश्व शांति और सामाजिक समृद्धि है। आज जब इस्लाम में इतनीं अच्छाई है अल्लाह सभी को सद्व्यवहार ओर एकता से रहने को कहते हैं तो यह धर्म आज इतना निर्दयी क्यों बनता जा रहा है। 

    जाने क्यों इस्लाम बनता जा रहा कत्लेआम:-

    आज इस्लाम के अनुयायी कत्ल करने को क्यों तैयार है। आज अगर कोई एक शब्द बोल देता है तो इस्लाम को मानने वाले तलवारें लेकर क्यों खड़े हो जाते हैं ओर सर तन से जुदा करने जैसे बाते सामने आने लगती है। इस्लाम जो की शान्ति की बात करता है लेकिन इस्लाम के अनुयायी कत्लेआम की बात करते हैं। आखिर ऐसा क्या है कि लोग इस्लाम के नाम पर इतने निरंकुश हों गए हैं कि किसी का कत्ल करते समय उनके हाथ नहीं कांपते है। अगर हम गहराई से सोचे तो इस्लाम को इतना निरंकुश बनाने में कही न कही बड़े बड़े राजनेताओं का हाथ है क्योंकि राजनेताओं ने अपने व्यक्तिगत लाभ हेतु इस्लाम को अपना हथियार बनाया ओर शान्ति को उग्र धर्म बना दिया। लोगो को धर्म के नाम पर लड़वाया ओर एक धर्म के लोगो के मन मे दूसरे धर्म के लोगो के प्रति नफरत का बीज रोपित किया। वही जब यह बीच फलने फूलने लगा तो उन्होंने इस नफ़रत के बीच से अंकुरित पेड़ की लकड़ियों को आग लगाई ओर हिन्दू मुस्लिम का विवाद पैदा किया।

    आज इस्लाम नफरत का कारण इसलिए है क्योंकि उसकी को राजनेताओं ने हिन्दू मुस्लिम के तौर पर अपने उपयोग हेतु अपने परिदृश्य के मुताबिक गढ़ी है। आज लोग धर्म की वास्तविकता को समझे बिना आपस मे लड़ते हैं ओर छोटे छोटे बयानों को बड़ा करके प्रस्तुत कर उनके नाम पर दो धर्म, एकता, आपसी भाईचारा ओर शान्ति का कत्ल करते हैं। इस्लाम के खतरनाक बनने में इतना जिम्मेदार मुस्लिम समाज नहीं है जितना की राजनीति दल क्योंकि यह अपने उल्टे सींधे बयानों को अलग अलग तरीके से प्रस्तुत कर लोगो के मन मे नफरत का बीच रोपित करते हैं।

  • जब एक कविता की पंक्ति से हिल गई थी कांग्रेस सरकार ओर सत्ता के लिए पार की थी हदें

    राजनीति:- 1971 में इंदिरा हटाओ के नारे को मात देते हुए गरीबी हटाओ के नारे के साथ प्रचंड बहुमत से अपनी जीत हासिल करने वाली इंदिरा गांधी भारत के हर नागरिक के लिए उम्मीद बन गई। इंदिरा गांधी ने उस समय जनमत से जुड़कर राजनीति शुरू की ओर जनता का समर्थन प्राप्त कर सत्ता हासिल की। यह वही साल था जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने युद्ध मे पाकिस्तान को मात दी थी ओर बांग्लादेश दुनिया के नक्शे पर आया था। यह वह दौर था जब गूंगी गुड़िया कही जाने वाली इंदिरा गांधी लोगो के बीच दुर्गा बनकर सामने आई। 

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    जमीनी स्तर पर जुड़ी इंदिरा गांधी ने जनता का खूब दिल जीत लेकिन साल 1975 में इंदिरा गांधी का विरोध होने लगा। इंदिरा गांधी की सरकार गिरने की कगार पर आ गई। 25-26 जून रात इंदिरा गांधी ने रेडियो के माध्यम से देश मे आपातकाल की घोषणा करदी। इंदिरा गांधी ने कहा राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के आदेश पर संविधान की धारा 352 के अधीन ‘आंतरिक अशांति’ के तहत देश में आपातकाल की घोषणा की गई है। यह भारत का सबसे कठिन समय था। क्योंकि भारत के 21 महीने तक आपातकाल लगा रहा। यानी 26 जून 1975 से लगा आपातकाल 21 मार्च 1977 तक जारी रहा। 
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    आपातकाल का दौर काफी गम्भीर दौर रहा। लोगो के अधिकार उनसे छीन गए। चुनाव निरस्त हो गया। लोगो के पास उनके मौलिक अधिकार नही थे। बेबाक आवाज को दबाया जाने लगा। लोगो की भरभराकर गिरफ्तारी हुई। स्वतंत्र पत्रकारिता को दबाने का हर सम्भव प्रयास किया जाने लगा। देश संकट की आग में झुलस रहा है। लेकिन इस सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह था कि जिस सरकार को जनता ने चुना, जिनके गरीबी हटाओ के वाक्य ने जनता का दिल जीता। वह तानाशाही सरकार कैसे बन गई। आखिर ऐसा क्या हुआ कि इंदिरा गांधी अपने ही चेहतो के लिए समस्या बनकर खड़ी हो गई। क्योंकि 1971 में जब इंदिरा गांधी की सरकार बनी तो इसने इंदिरा गांधी की छवि विकसित की लेकिन जब आपातकाल लगा तो इसके इंदिरा गांधी की छवि एक तानाशाही सरकार के रूप में बनाई। 

    जाने आपातकाल की वजह;-

    जब देश मे इंदिरा गांधी की सरकार बनी तो उन्होंने प्रेस पर नियंत्रण पाने की कोशिश की उनका उद्देश्य प्रेस को सरकार के अधीन करना था। उसी कड़ी में इंदिरा सरकार, न्‍यायपालिका और प्रेस पर नियंत्रण की कोशिश में भी लग गई. 1967 में गोलकनाथ केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्‍यवस्‍‍था देते हुए कहा कि संविधान के बुनियादी तत्‍वों में संशोधन का अधिकार संसद के पास नहीं है. इस फैसले को बदलवाने के लिए 1971 में 24वां संविधान संशोधन पेश किया गया। इंदिरा गांधी की यह कोशिश तब विफल हो गई जब केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7-6 बहुमत के आधार पर 1973 में फैसला दिया कि संविधान की मूल भावना के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. न्‍यायपालिका के साथ कार्यपालिका का विवाद इस हद तक बढ़ गया कि एक जूनियर जज को कई वरिष्‍ठ जजों पर तरजीह देते हुए चीफ जस्टिस बना दिया गया. नतीजतन कई सीनियर जजों ने इस्‍तीफा दे दिया। 
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    1973 में अहमदाबाद में एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज हॉस्टल मेस शुल्क में बढ़ोतरी की गई जिसके बाद छात्रों ने सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। इस आंदोलन ने भ्रष्‍टाचार और आर्थिक संकट के खिलाफ उग्र रूप धारण किया और इसका नतीजा यह हुआ कि मुख्‍यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्‍तीफा देना पड़ा और राज्‍य में राष्‍ट्रपति लगाना पड़ा। इस आंदोलन के बाद कई ऐसे आंदोलन छिड़ गए जो सरकार की नीतियों के विरोध में थे। 
    1974 में जेपी ने छात्रों, किसानों और लेबर यूनियनों से अपील करते हुए कहा कि वे अहिंसक तरीके से भारतीय समाज को बदलने में अहम भूमिका निभाएं. इन सब वजहों से इंदिरा गांधी की राष्‍ट्रीय स्‍तर पर छवि प्रभावित हुई।

    जब इंदिरा को जीत को मिली चुनौती:- 

    देश मे चल रहे आंदोलनों के बीच समाजवादी नेता राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव (1971) में जीत को चुनौती दी। राज नारायण ने आरोप लगाया कि चुनावी फ्रॉड और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के चलते इंदिरा गांधी ने वह चुनाव जीता। इस केस का फैसला करते हुए 12 जून, 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के के जज जगमोहन लाल सिन्‍हा ने इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध ठहरा दिया. इंदिरा गांधी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 24 जून, 1975 को जस्टिस वीके कृष्‍णा अय्यर ने इस फैसले को सही ठहराते हुए सांसद के रूप में इंदिरा गांधी को मिलने वाली सभी सुविधाओं पर रोक लगा दी. उनको संसद में वोट देने से रोक दिया गया. हालांकि उनको प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की छूट दी गई। 

    जब इंदिरा के खिलाफ गुंजा सिंहासन खाली करो की जनता आती है:-

    25 जून, 1975 को दिल्‍ली के रामलीला मैदान में जेपी ने इंदिरा गांधी के पद नहीं छोड़ने के लिए अनिश्चित काल का आंदोलन छेड दिया। उन्होंने रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं से आंदोलन में जोश भर दिया। आंदोलन की गूंज जब इंदिरा के कानों में पड़ी तो सरकार में हलचल मच गई ओर उसी रात देश मे आपातकाल की घोषणा की गई। आपातकाल लगने के बाद लोगो के अधिकार खत्म कर दिये गए ओर धड़ाके से बुलंद आवाज को दबाया जाने लगा गिरफ्तारी होने लगी। यही वह दौर बना जो कांग्रेस के लिए आज तक नासूर बनता गया। आज भी आपातकाल को याद कर जनता कांग्रेस को अस्वीकार कर देती है।

  • 42 साल के जिन्ना को जब हुआ 18 साल की लड़की से प्यार तो कटवा दी अपनी मूंछें और बदल डाला अंदाज

    जिन्ना: पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना का जिक्र भारत मे अक्सर होता है। लोग जिन्ना को भारत का दुश्मन बताते हैं लोगो का कहना है कि अगर जिन्ना न होते तो भारत का विभाजन नही होता। जिन्ना की जिद और भारत के कुछ नेताओं के सहिष्णु व्यवहार के खातिर भारत के सीने में खंजर चला और भारत का विभाजन हो गया। लेकिन क्या आपने कभी जिन्ना की प्रेम कहानी के बारे में सुना है। क्योंकि जिन्ना की प्रेम कहानी किसी फिल्म से कम नही थी और लोग जिन्ना को सच्चा आशिक कहते हैं।

    आपको जिन्ना के प्रेम का यह किस्सा सुनकर हैरत होगी कि उन्होंने अपनी प्रेमिका के हठ के कारण आपनी मूंछे कटवा दी थी। वरिष्ठ पत्रकार शीला रेड्डी ने अपनी किताब, ‘मिस्टर एंड मिसेज जिन्ना- द मैरिज दैट शॉक इंडिया’ में जिन्ना की प्रेम कहानी का जिक्र किया है। इस किताब में जिन्ना की प्रेम कहानी से लेकर उनकी शादी तक के अनोखे किस्सों का जिक्र किया गया है।
    किताब में बताया गया है कि जिन्ना अपनी प्रेमिका रुत्ती से बेहद प्यार करते थे। वह उनके लिये कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। जिन्ना हमेशा उनके चेहरे पर मुस्कुराहट देखना चाहते थे। वही साल 1918 में जब जिन्ना उनके सामने शादी का प्रस्ताव रखते हैं तो वह जिन्ना के सामने शर्त रखते हुए कहती है कि मैं आपसे शादी तभी करूंगी जब आप अपनी मुछों को कटवा देंगे।
    अपनी प्रेमिका की शर्त सुनकर जिन्ना पहले तो चिकत हो गए। लेकिन वह उनसे सच्चा प्रेम करते थे उन्होंने अपनी प्रेमिका की बात झटपट मान ली और अपनी मूंछों को कटवा कर उनसे शादी कर ली। जिन्ना ने उनको इम्प्रेस करने के लिये अपनी मूंछें ही नही कटवाई बल्कि अपना हेयरस्टाइल भी बदल दिया। इसके बाद बेहद शाही अंदाज में मुंबई के जिन्ना हाउस में 42 साल के जिन्ना और 18 साल की रुत्ती की शादी हुई। किताब में लिखा है जिन्ना की शादी फिल्मी अंदाज में हुई थी।