Category: editorial

  • ऐसे देशद्रोही जिन्होंने पैसे और सत्ता के लिए बनाई भारत को बेचने की योजना

    इतिहास| कोई भी देश अगर हारता है या उसपर कोई अन्य देश आक्रमण करता है या उसे अपना गुलाम बनाता है तो उसमें सबसे अमुख भूमिका अगर कोई निभाता है तो वो है उस देश मे रहकर उस देश का खाकर उस देश के साथ दोगला व्यवहार करने वाले गद्दार। भारत का भी कुछ ऐसा ही इतिहास है भारत में ऐसे ऐसे महारथी रहे हैं जिन्हें परास्त करना किसी भी विदेशी शक्ति के वश में नहीं था लेकिन भारत के कुछ गद्दारों ने पैसे और अपने स्वार्थ के लिए भारत के साथ गद्दारी की और भारत को विदेशी शक्तियों के अधीन कर दिया है। इतिहास में इन द्रोहियों का नाम खूब चर्चित है लेकिन आपने भारत के सभी गद्दारों के नाम नहीं सुने होंगे। इसलिए आज हम इस आर्टिकल में आपको बताएंगे भारत के उन गद्दारों के बारे में जिन्होंने अपने लाभ के लिए भारत को बेचने तक की योजना बना ली।

    जयचंद:-

    इतिहास में जयचंद का नाम खूब प्रख्यात है। कहा जाता है की जयचंद ने अपने हित के लिए देश को बेच दिया था। वही उस समय पृथ्वीराज चौहान का पराक्रम पूरे भारत मे था हर कोई उनकी सराहना करता था। मोहम्मद गौरी ने कई वार भारत पर आक्रमण किया लेकिन वह अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हुआ। वही जयचंद पृथ्वीराज से ईर्ष्या करते थे उन्होंने पृथ्वीराज को हराने के लिए भारत से गद्दारी की ओर मोहम्मद गौरी से हाँथ मिलाया। जिसके बाद 1192 में हए पानीपत के युद्ध मे पृथ्वीराज को मोहम्मद गौरी से हारना पड़ा।

    मीर जाफर:-

    यह वही व्यक्ति है जिसके कारण भारत को अंग्रेजी हुकूमत के सामने घुटने टेकने पड़े और भारत ने ब्रिटिश शासन की गुलामी की। इसने अपने स्वार्थ ओर 1757 के युद्ध मे सिराजुद्दौला को परास्त करने के लिए अंग्रेजों की खूब मदद की और अंग्रेजों को हाँथो की कठपुतली बना रहा।

    मीर कासिम:- 

    अंग्रेजों में अपने रास्ते से मीर जाफर का पत्ता साफ करने के लिए मीर कासिम का इस्तेमाल किया। कासिम को अंग्रेजों के समर्थन से राजगद्दी तो मिल गई लेकिन वह खुलकर हुकूमत नहीं कर पाया। फिर एक वक्त आया तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ लेकिन तब सब बिखर चुका था।

    मान सिंह:- 

    हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराणा प्रताप को कौन नहीं जनता यह भारत के एकमात्र योद्धा थे जिन्होंने मुगलों के सामने झुकना और उनकी गुलामी करना कभी नहीं स्वीकार किया। लेकिन मान सिंह ने अपने स्वार्थ हेतु खुद को मुगलों के लिए समर्पित किया और राणाप्रताप को धोखा दिया। इसकी ग़द्दारी के चलते देश मे मुगलों का आधिपत्य स्थापित हुआ।

    मीर सादिक:-

    कहते हैं जब कोई अपना दुश्मन के साथ मिल जाए तो हम कभी भी नहीं जीत सकते। भारत जब जब हार या गुलाम बना उसके पीछे सबसे बड़ा कारण रहा भारत के अपनो द्वारा किया गया विश्वासघात। यही विश्वासघात टीपू सुल्तान को झेलना पड़ा जिसके चलते उन्हें हार का सामना करना पड़ा। मीर सादिक जो की टीपू सुल्तान का करीबी मंत्री था। 1779 के युद्ध से पूर्व इसने अंग्रेजों से हाँथ मिला लिया और टीपू सुल्तान को धोखा दिया। जिसके फलस्वरूप इस युद्ध में टीपू सुलतान को अंग्रेजो ने हरा दिया और भारत को एक बार फिर अपनो के छल के चलते हार का मुह देखना पड़ा।

  • भारत मे हर साल बढ़ रहा हिंदी बोलने वालों का आकड़ा, लोगो ने इसे राजभाषा नहीं राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकारा

    दिल्ली| जब से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 37 वीं संसदीय राजभाषा की बैठक में यह बयान दिया है कि अन्य राज्यों के लोगों को भी हिंदी बोलना चाहिए और दो अलग अलग राज्य के लोगों को अंग्रेजी की को छोड़कर हिंदी में बात करनी चाहिए। गृह मंत्री के इस बयान के बाद देश मे हिंदी को लेकर बयान बाजी आरम्भ हो गई है। 

    कई लोगों ने उनके इस बयान को इंगित करते हुए टिप्पणी की है। एआर रहमान ने भी अमित शाह के बयान के बाद एक ट्वीट कर हिंदी का विरोध किया। वही कई लोग गृह मंत्री के इस बयान का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने सभी के लिए 10 तक हिंदी अनिवार्य करदी है।

    जाने अंग्रेजी के बीच हिंदी पसन्द करने वालो का आकड़ा:-

    लेकिन इस विरोध के बीच अब हर कोई इस बात पर सवाल उठा रहा है कि वास्तव में भारत जैसे विशालकाय देश मे हिंदी का क्या औचित्य है। जहां भाषा की उत्पत्ति संस्कृत से मानी गई है वहां हिंदी अपना को तबजुब देने वाले कितने लोग हैं और कितने लोग हिंदी भाषा का उपयोग कर रहे हैं और अंग्रेजों की अंग्रेजी से पहले हिंदी हो महत्व दे रहे हैं। 
    यदि हम वर्ष 2011 में हुई भाषाई जनगणना की बात करें तो इसमे 121 मातृ भाषाएं शामिल थी। जिन भाषाओं में संविधान की आठवीं अनुसूची में शमिल 22 भाषाओं को भी जोड़ा गया था। वही यदि हम हिंदी की बात करें तो जनगणना में पता चला की 52.8 करोंड व्यक्ति या 42.6 फीसदी की आबादी हिंदी प्रिय है जो हिंदी का सम्मान करती है और इसे न सिर्फ बोलते है बल्कि भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में पूजते हैं। वह हिंदी को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और उसे राजभाषा न स्वीकार कर राष्ट्रभाषा के रूप में अपने मस्तिष्क पर बैठाए है।
    वही यदि हम हिंदी भाषा के इतिहास की बात करें तो इसका इतिहास बेहद पुराना है। इसकी उत्पत्ति संस्कृत से मानी जाती है। क्योंकि जब संस्कृत शब्द ईरानियों के संपर्क में आया तो उन्होंने इसे हिन्दू बना दिया और हिन्दू से हिंदी बन गई। हिंदी संस्कृत, पाली, प्राकृत भाषा से होती हुई अपभ्रंश / अवहट्ट से गुजरती हुई हिंदी का रूप ले लेती है। इसका व्यापक प्रचार प्रसार भारतेंदु युग मे हुआ। प्राचीन काल मे भारत मे कई भाषाओं को महत्व देने की जगह लोग अपनी मूल भाषा जगत जननी हिंदी को महत्व देते थे और संस्कृत का मूल ज्ञान रखते थे।

  • Ambedkar jayanti Special| दलित को सम्मान अंबेडकर की प्रथम प्राथमिकता थी

    UttarPradesh| आज पूरा भारत संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की जयंती मना ( 14 अप्रैल) रहा है। भारत के इतिहास में अंबेडकर का काम गाढ़े रंग से मुद्रित है। अंबेडकर ने अपने अथक प्रयास से दलितों के अधिकार के लिए खूब संघर्ष किया और उन्हें समाज मे बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए कदम उठाए थे। 

    बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर वह व्यक्ति थे जिन्होंने भारत के पहले कानून मंत्री के पद की जिम्मेदारी संभाली और भारत को एक नई दिशा देने का प्रयास किया। इन्होंने अपना पूरा जीवन शोषित के अधिकारों के लिए लड़ने और जाति व्यवस्था को जड़ से खत्म करने में गुजार दिया। यह हमेशा चाहते थे समाज मे सभी नागरिकों को एक समान अधिकार व सम्मान प्राप्त हो। 

    आखिर क्यों इतने बड़े पैमाने पर मनाई जाती है अंबेडकर जयंती:- 

    अगर हम अंबेडकर जयंती की बात करे तो यह सिर्फ इसलिए नहीं मनाई जाती की इस दिन भीम राव अंबेडकर का जन्म हुआ था। बल्कि इसका महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि अंबेडकर ने दलित समाज के लिए समान अधिकार की बात की ओर समाज मे परिवर्तन लाने की हर सम्भव कोशिश की। उन्होंने भारत को लिखित संविधान ही नहीं दिया बल्कि भारत के प्रत्येक नागरिक को कुछ अधिकार दिए। 
    वही यह अपने पूरे जीवन शोषित के लिए लगे रहे और जाति व्यवस्था का विरोध करते हैं। इन्होंने अपने जीवन काल मे दलितों के हक के लिए कठोर लड़ाई लड़ी। दलित को सम्मान इनकी प्रथम प्राथमिकता रही। बता दें अंबेडकर को दो बार राज्यसभा से सांसद के रूप में चुना गया. डॉ. भीमराव अंबेडकर का निधन 6 दिसंबर 1956 को हुआ था. सन् 1990 में, बाबासाहेब को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

  • जब मन कही नहीं लगता तब मैं खुद के साथ होती हूं।

    जब मन कही नहीं लगता 
    तब मैं खुद के साथ होती हूं। 
    कई किस्से याद आते हैं
    कई पुरानी यादें झझकोरती हैं
    कलम आहिस्ता चलती है 
    बिना सोचे समझे लिखती है
    जो जीवन मे हस्तक्षेप नहीं बर्दाश्त होते  
    उनका परित्याग करती है
    कुछ शब्दों का जाल बुनती हूँ 
    शब्दों को कई रंग देती है
    विचार भावन सब एक साथ होते हैं
    बंधता है जीवन का एक एक तार शब्दों में
    विस्तृत माया से मुक्ति मिलती है
    मोह नहीं रहता किसी भी चीज का
    मन शान्त होता है शफ्फाक पानी की भांति
    संसार का कोई दुख मुझे सुख से कम नहीं लगता
    परंपरा कर्तव्य सब की पोटली एक कोने में रखी होती है
    और मैं एकांत में सुख के साथ होती हूँ
    क्योंकि जब मन कही नहीं लगता 
    तब मैं खुद के साथ होती हूं।।
    Priyanshi

  • जहांगीरपुरी हिंसा:- हिन्दू , मुस्लिम या राजनेता दंगे का जिम्मेदार कौन , आखिर किसने रची साजिश ?

    Delhi| कल यानी 16 अप्रैल को उत्तर पश्चिमी दिल्ली के जहांगीरपुरी से हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर निकल रही शोभा यात्रा के दौरन हिंसा भड़क गई। इस हिंसा में छः पुलिस कर्मी भी घयाल हुए हैं जिनका इलाज नजदीकी अस्पताल में चल रहा है। हुनमान जयंती पर हिंदुओं की इस शोभा यात्रा में तकरीबन 300 से 400 लोग मौजूद थे। हिंसा का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है कि आखिर वह कौन लोग थे जिन्होंने हिंसा को हवा दी और बहस से शुरू हुई बात हाँथपाई से पथराव और आगजनी तक पहुंच गई। आखिर वह कौन से कारण रहे की अचानक से हनुमान जयंती पर इतना बड़ा दंगा हो गया। 

    जहांगीरपुरी इलाके से मिली जानकारी के अनुसार लोग लगातार कोशिश में लगे हैं कि वह पता लगा सके की हिंसा के पीछे क्या कारण रहे। पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। लेकिन इसी में कई लोगों ने बताया कि यह हिंसा तब भड़क उठी जब जहांगीरपुरी इलाक़े के सी-ब्लॉक से हुनमान जयंती की शोभायात्रा गुजर रही थी अचानक से शोभायात्रा पर एक अकारण हमला हुआ। इस अकारण हुए हमले के बाद दो पक्ष में बहस छिड़ गई। बहस कब हिंसा में बदल गई पता ही नहीं चला। हिंसा में भड़की भीड़ ने इलाके के हालात बदल दिए। कई दुकानें तबाह हो गई। आगजनी से लोगों में अफरा तफरी मच गई। 
    वही कुछ अन्य लोग इस हिंसा का कारण हिन्दू मुस्लिम का मतभेद बता रहे हैं। उन लोगो का कहना है कि भड़काऊ नारे बाजी के चलते हिंसा को गति मिली। हालांकि इस बात में कितनी सत्यता है इससे स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा सकता है। क्योंकि यह अभी साफ नहीं हुआ है कि हिंसा को किसने भडकाया है। 

    2020 के बाद कल दिल्ली में भड़का बड़ा साम्प्रदायिक दंगा:-  

    बता दें कल की घटना ने पूरे भारत को दहला दिया है। हिंदुओ के मन मे कई सवाल है कि आखिर क्यों सिर्फ हिंदुओं के त्योहार पर इस प्रकार के दंगे भड़क रहे हैं। सवालो के पीछे का सबसे बड़ा कारण एक सप्ताह में हिन्दू के दो बड़े त्योहार पर दंगो का भड़कना। वही यदि हम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की बात करे तो उनकी शान्ति बनाए रखने की अपील और इन दंगों पर कोई एक्टिव एक्शन न लेना कई सवाल खड़े कर रहा है। 
    वही यदि हम 2020 में हुए दिल्ली दंगे की बात करे तो हनुमान जयंती पर हुआ दिल्ली दंगा 2020 के बाद हुई पहली साम्प्रदायिक हिंसा है। इस घटना ने पूरे दिल्ली को और दिल्ली सरकार को सवालों के घेरे में उतार दिया है। इससे पहले जेएनयू में रामनवमी के दिन हुए विवाद के बाद अरविंद केजरीवाल सरकार वैसे ही लोगो की नजरों में चढ़ी हुई थी। क्योंकि इन्होंने जेएनयू में हुई हिंसा को लेकर सिर्फ ट्वीट किया और अपना पल्ला झाड़ लिया। जिसके बाद लोग लगातार इन्हें राम के नाम पर राजनीति करने के लिए जोड़ रहे हैं और कह रहे हैं यह राम के नाम पर राजनीति करेंगे लेकिन राम के लिए बोलेंगे नहीं।

  • टुकड़ो टुकड़ो में टूट रही सपा की साइकिल को कैसे जोड़ेंगे अखिलेश

    उत्तरप्रदेश:- उत्तरप्रदेश की राजनीति में जब से सपा का नेतृत्व अखिलेश यादव के हाँथ में गया है और प्रदेश में भाजपा का आगमन हुआ है कई परिवर्तन देंखने को मिल रहे हैं। जहां एक ओर प्रदेश की सत्ताधारी सरकार को जनता का समर्थन प्राप्त हो रहा है वही अखिलेश के नेतृत्व में सपा को अपनो से ही घात मिल रहा है। सपा को छोड़कर लगातार उसके अपने भाजपा के रंग में रंग रहे हैं। उनके भाजपा में शामिल होने से अब अखिलेश ऐसे चक्रव्यूह में उलझते जा रहे हैं जिसका तोड़ उन्हें नहीं मिल रहा। क्योंकि एक ओर जहां सपा को लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है। वही दूसरी ओर अखिलेश के अपनो ने अखिलेश को बड़ा झटका देते हुए खुद को भगवा रंग में रंग लिया है जिसके बाद आप सपा की साइकिल राजनीति में काफी धीरे चल रही है या यूं कहें की सपा की साइकिल में अब इतने पंचर हो गए हैं जिसे जोड़ने में अखिलेश यादव को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।

    जाने किस किस ने थामा अब तक भाजपा का दामन:- 

    अगर हम अखिलेश के नेतृत्व के बाद भाजपा में शमिल हुए सपाइयों की बात करें तो लगातार मुलायम के करीबियों ने सपा को छोड़ भाजपा को अपना नया ठिकाना बनाया है। इन सपाइयों में अगर हम यादव के सबसे करीबी की बात करे तो अपर्णा यादव का नाम इस विधानसभा चुनाव में काफी सुर्खियों में रहा। क्योंकि अपर्णा यादव न सिर्फ सपा परिवार का हिस्सा थी बल्कि यह मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक की पत्नी है। इनके भाजपा में शामिल होने से जनता के बीच एक बुरा संदेश प्रस्तावित हुआ और अखिलेश की घरेलू कलह का प्रभाव राजनीतिक गलियारों में देखने को मिला। वही अपर्णा के अलावा मुलायम के सबसे करीबी हरिओम यादव , नरेश सैनी और धर्मपाल यादव ने अखिलेश के नेतृत्व के बाद सपा को छोड़कर भाजपा का हिस्सा बनना पसन्द किया।

    अखिलेश का साथ फिर योगी से मुलाकात आखिर क्या है शिवपाल की नई राजनीति चाल:-  

    अगर हम शिवपाल यादव की बात करें तो इन्होंने सपा का साथ तब छोड़ दिया जब पार्टी का नेतृत्व अखिलेश के हाँथो में गया। इन्होंने सपा का साथ छोड़कर 2017 में अपनी नई पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का गठन किया। सपा से जाने के बाद अखिलेश और शिवपाल के बीच काफी मतभेद देंखने को मिले और चाचा भतीजे के बीच जो अपनापन था वह समाप्त हो गया। लेकिन वर्ष 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में अखिलेश ओर शिवपाल एक बार पुनः एक साथ आए। लेकिन इन दोनों के बीच जो मन मुटाव था वह खत्म नहीं हुआ और चुनाव के तुरंत बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और प्रसपा अध्यक्ष शिवपाल यादव अलग हो गए। 
    शिवपाल के सपा से गठबंधन खत्म करने के बाद अचानक यह खबरें आने लगी कि शिवपाल अब भाजपा में शामिल होने वाले हैं। वही इन खबरों के बीच शिवपाल के अचानक से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने की खबर सामने आई। जिसके बाद से अब हर ओर यह अटकलें लगाई जा रही है कि शिवपाल भाजपा परिवार का हिस्सा बन जायेंगे। वही एक साक्षात्कार के दौरान शिवपाल यादव ने कहा कि वह जल्द ही कुछ बड़ा करने वाले हैं और अब अच्छे दिन आने वाले हैं। 
    शिवपाल के अच्छे दिन आने के बयान ने सियासी गलियारों में हलचल मचा रखी है कि क्या अब शिवपाल ने निश्चय कर लिया है कि वह भाजपा में शामिल हो जायेगें। क्योंकि शिवपाल यादव ने जो कोट अपने साक्षात्कार में इस्तेमाल किया उसकी तर्ज पर 2014 में भाजपा का स्लोगन बना था कि अच्छे दिन आने वाले हैं हम मोदी जी को लाने वाले हैं।

    आजम ने गिराई सपा पर गाज:- 

    शिवपाल सिंह यादव के सपा से अलग होने के जख्मों पर अभी अखिलेश यादव ने मरहम लगा नहीं पाया था कि अखिलेश को अंजाम खान के सपा से अलग होने का बड़ा झटका लगा। कई मुस्लिम नेताओं ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का विरोध किया। कई लोगो का कहना है कि आज आजम खान जेल में है इसके पीछे सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का हाँथ है क्योंकि वह चाहते ही नहीं हैं कि आजम खान जेल से बाहर आए। वही एक अन्य मुस्लिम नेता ने सपा से इस्तीफा देते हुए कहा कि अखिलेश यादव एक कायर नेता हैं वह पार्टी के मुस्लिम नेताओं के हित मे नही बोल सकते और जो पार्टी के नेताओं के लिए नहीं बोल सकता वह जानता के लिए क्या बोलेगा। 

    अपनी ही पार्टी के विरोध में खड़े नेता बने अखिलेश के लिए बड़ी चुनौती:-

    सपा के नेताओ के अपनी ही पार्टी के विरोध में इस प्रकार के बयान सपा की डगमगा रही स्थिति का परिचय दे रही है। अखिलेश के लिए यह बयान बड़ी चुनैती बने हुए हैं जिनसे निकलने के लिए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को कोई बड़ा चक्रव्यूह रचना होगा और यदि वह इस चक्रव्यूह को नहीं रच पाए तो यूपी में सपा का अस्तित्व सवालों के घेरे में होगा और इसका पूरा वोट बैक अलग अलग खेमो में विभक्त हो जाएगा। जिसके बाद सपा की हालत कांग्रेस से बेबदतर होगी।

  • न कोई था न कोई है जिसने यू इतिहास बनाया है, आईएस से लेकर नेता तक हर किरदार निभाया है?

    सम्पादकीय:- यदि आज आपसे कोई पूछे भारत के सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति का नाम बताइए जो डॉक्टर भी रहा हो, बैरिस्टर भी रहा हो, आईएएस /आईपीएस अधिकारी रहा हो, विधायक मंत्री सांसद भी रहा हो, चित्रकार photographer पेंटर भी रहा हो, मोटिवेशनल स्पीकर भी रहा हो ,पत्रकार कुलपति भी रहा हो ,संस्कृत गणित का विद्वान भी रहा हो , इतिहासकार भी हो समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र का भी ज्ञान रखता हो काव्य रचना भी लिखता हो अधिकांश लोग यही कहेंगे क्या ऐसा संभव है आप एक व्यक्ति की बात कर रहे हैं या किसी संस्थान की |

    भारतवर्ष में ऐसा व्यक्ति जन्म ले चुका है और 49 वर्ष की अल्पायु में भयंकर सड़क हादसे में इस संसार से विदा भी ले चुका है | उस व्यक्ति का नाम है श्रीकांत जिचकर श्रीकांत जिचकर का जन्म 1954 में संपन्न मराठा कृषक परिवार में हुआ था | वह भारत के सर्वाधिक पढ़े-लिखे व्यक्ति थे, की गिनीज बुक ऑफ लिम्का में रिकॉर्ड दर्ज है 

    40 से अधिक यूनिवर्सिटी से 20 डिग्रीयाँ हाँसिल की थी 

    डॉ श्रीकांत जिचकर ने 40 से अधिक यूनिवर्सिटी से 20 डिग्रीयाँ अर्जित की. श्रीकांत जिचकर ने ज्यादातर में प्रथम श्रेणी हासिल की और 28 गोल्ड मैडल जीते. सन 1972 से 1990 के बीच में उन्होंने हर साल गर्मी में और ठंडी में कुल मिलाकर 42 यूनिवर्सिटी परीक्षाएँ दी.श्रीकांत जिचकर ने अपने करियर की शुरुआत एक डॉक्टर के रूप में की, इसके लिए उन्होंने MBBS, MD की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने कानून की पढाई के लिए L.L.B., पोस्ट ग्रेजुएशन इन इंटरनेशनल लॉ L.L.M. की डिग्री ली. मास्टर्स इन बिज़नस एडमिनिस्ट्रेशन, DBM, MBA की डिग्री ली. पत्रकारिता के क्षेत्र में B.Journ की डिग्री ली.

    10 विषयों में कि थीं मास्टर्स की डिग्री :

    श्रीकांत जिचकर ने इन 10 विषयों में मास्टर्स की डिग्री हासिल की. M.A. (लोक प्रशासन) ; M.A. (Sociology) ; M.A. (अर्थशास्त्र); M.A. (संस्कृत); M.A. (इतिहास ); M.A.(इंग्लिश साहित्य); M.A. (दर्शनशास्त्र); M.A. (राजनीति शास्त्र ) ; M.A. (प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व ); M.A (मनोविज्ञान ).
    संस्कृत में हांसिल कि D.Litt की डिग्री 

    सिविल सर्विसेज परीक्षा भी पास की:-

    डॉ श्रीकांत जिचकर ने 1978 में सिविल सर्विसेज परीक्षा दी, जिसमें उन्हें IPS (इंडियन पुलिस सर्विस) विभाग मिला. उन्होंने IPS ज्वाइन नहीं किया और पुनः 1980 में सिविल सर्विसेज परीक्षा दी. इस बार उन्हें IAS (इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज) मिला. डॉ जिचकर इस नौकरी में भी ज्यादा दिन नहीं टिके और मात्र 4 महीने बाद ही उन्होंने इस पद से इस्तीफ़ा देकर चुनाव लड़ने का फैसला किया.

    सबसे कम उम्र में MLA बनकर बनाया था रिकॉर्ड ;

    सन 1980 में श्रीकांत जिचकर महज 25 की उम्र में MLA बनकर सबसे कम उम्र में MLA बनने का रिकॉर्ड बनाया. आगे चलकर डॉ जिचकर गवर्नमेंट मिनिस्टर भी बने. मिनिस्टर के रूप में एक समय डॉ जिचकर 14 से अधिक विभागों का काम देखते थे. इस प्रकार डॉ श्रीकांत का राजनीतिक सफर भी शानदार रहा.

    इनके पास था 52 हजार पुस्तकालयों का राजस्व:

    डॉ श्रीकांत जिचकर जी एक शिक्षणतज्ज्ञ, चित्रकार, पेशेवर फोटोग्राफर और अभिनेता भी थे. श्रीकांत जिचकर जी का खुद का बहुत ही बड़ा पुस्तकालय था. जिसमे लगभग 52,000 से ज्यादा पुस्तक थे। उनका पुस्तकालय भारत के सबसे बड़े पुस्तकालय में से एक था. उन्होंने 1992 में नागपुर में सैंडिपानी स्कूल की स्थापना
    की थीं.

    कार दुर्घटना में हुआ था निधन:

    ऐसे महान व्यक्ति की मृत्यु एक कार अपघात मे 2 जून 2004 मे नागपुर के पास एक कोडाली गांव एक कार दुर्घटना में निधन हो गया. 2 नवंबर 2013 को अदालत ने एसटी निगम को कार चालकों के लिए जिम्मेदार ठहराया और जिचकर के परिवार के सदस्यों को 50 लाख 67 हजार रुपये मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया.

  • ताज या तेजोमहालय के रहस्य से कब उठेगा पर्दा , आज से 88 वर्ष पहले खुले थे 22 दरवाजे

    सम्पादकीय:- हमने अपने बचपन से ताजमहल की कहानियां सुनी है यह कहानियां ऐसी है जिन्हें हमे हमारे अपनो ने बड़े चाहो से सुनाई है। वह अक्सर शाहजहां का नाम लेकर मुस्कुरा देते थे और कहते थे कि उसके जैसा प्रेम किसी ने नहीं किया उसने अपनी पत्नी की याद में ताजमहल का निर्माण करवाया वह अपनी पत्नी से बेहद प्रेम करता था और हम बचपन से ही ताजमहल को प्रेम का प्रतीक मानने लगते हैं।

    हम सब भी यही कहते हैं कि मुगल शासक शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में ताज का निर्माण करवाया था। लेकिन इसके पीछे के रहस्य को कोई नहीं जानता कि वास्तव में दुनिया का सातवां अजूबा कहा जाने वाला ताजमहल ताज है या तेजोमहालय है। क्योंकि इस समय दुनिया का सातवां अजूबा विवादों की बेंडियो में जकड़ा हुआ है और हिन्दू मुस्लिम के तार्किक जाल में फंसता जा रहा है। 

    ताजमहल या तेजोमहालय:-

    एक ओर जहां मुस्लिम इसे प्रेम की निशानी बता रहे हैं वही हिन्दू इसे तेजोमहालय कह रहे हैं और इसके पीछे हिंदू धर्म के पुराने इतिहास को जोड़ रहे हैं। अभी हाल ही में आचार्य परमहंस ने इस प्रेम प्रतीक कहे जाने वाले ताजमहल को तेजोमहालय बताते हुए भूमिपूजन करना चाहा था हालाकि उन्हें रोक दिया गया था और ताज की सुरक्षा भी बड़ा दी गई थी लेकिन अब यह विवाद एक अलग ही रूप लिए है और हिंदुओं का कहना है कि जिस दिन ताजमहल के 22 दरवाजों को खोल दिया जाएगा मुस्लिम का मुह बन्द हो जाएगा क्योंकि ताज के अंदर हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां है जिन्हें छुपाया जा रहा है।

    जाने कब खुले थे ताज के 22 दरवाजे:- 

    आज हर कोई ताज के 22 दरवाजो के पीछे छुपे रहस्यमयी सच को जानना चाहता है। लोगो के मन मे सवाल है कि आखिर ताजमहल के 22 दरवाजों के पीछे की कहानी क्या है। आखिर क्यों ताजमहल के यह 22 दरबाजे बन्द पड़े हुए हैं। वही अब इस बीच जानकारों का कहना है की आज से 88 वर्ष पूर्व 1934 में ताजमहल के 22 दरवाजों को खोला गया था। लेकिन इन 22 कमरों में क्या है इसका खुलासा अब तक नहीं हुआ है। 
    हालांकि अब ताजमहल के 22 दरवाजों के पीछे छुपे रहस्य को जानने के लिए एक जांच कमेटी गठित करने की मांग की गई है और इसके दरवाज़ों को खोलने के संदर्भ में एक याचिका दायर की गई है। लोगो का कहना है कि अगर ताजमहल के 22 दरवाजे खुले गए तो कई अनजाने रहस्यमयी सच खुलकर सामने आ जाएंगे और हिन्दू और मुस्लिमों द्वारा किए जा रहे दावों का राज खुल जाएगा। बता दें ताजमहल के बंद इन 22 कमरों को खोलने और वीडियोग्राफी कराने की एक याचिका आगरा न्यायालय में भी लंबित है।

    जाने क्या है ताज महल विवाद:-

    रजनीश सिंह के वकील रूद्र विक्रमसिंह ने यह दावा किया है कि 1600 ईसवीं में आए तमाम यात्रियों ने अपने यात्रा वृत्तांत में मानसिंह के महल के बारे में बताया है। याचिका में अयोध्या के जगद्गुरु आचार्य परमहंस के भगवा वस्त्र धारण करके ताजमहल में भूमिपूजन के विवाद का भी हवाला दिया गया है। याचिका में कहा गया है कि यदि ताजमहल के 22 बंद कमरों को खोलने का निर्देश न्यायालय देता और जांच कमेटी के गहनता से अध्ययन करती है तो ताजमहल के संबंध हो रही राजनीति और सभी विवाद अपने आप सुलझ जाएंगे और यहां हिन्दू इतिहास से जुड़े कई रहस्यों का खुलासा होगा।

  • इस वजह से राजीव गांधी को बिल्कुल नहीं पसन्द करते थे सोनिया के पापा

    सम्पादकीय:- आज यानी 21 मई को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 31 वीं पुण्यतिथि है। राजीव गांधी अपने समय के लोकप्रिय नेताओ में से एक रहे हैं। जिस तरह से भाजपा के काल मे लोग मोदी को खूब पसंद कर रहे हैं उसी प्रकार जब कांग्रेस की सत्ता थी तो लोग राजीव गांधी को और उनकी नीतियों को खूब पसंद करते थे। 

    राजीव गांधी की जनता के बीच एक अलग छवि बनी हुई थी और लोग इन्हें एक लोकप्रिय नेता के रूप में जानते थे। राजीव का राजनीतिक जीवन काफी उतार चढ़ाव भरा रहा वही अगर हम इनकीं व्यक्तिगत लाइफ के बारे में बात करें तो वह किसी फिल्म की स्टोरी से कम नहीं रही। वही अगर हम इनकीं और सोनिया की शादी की बात करें तो इनकीं शादी में कई समस्याएं आई और इनकीं शादी के लिए सोनिया गांधी के पिता ने न बोल दिया था।
    3 अगस्त, 2006 को सोनिया गांधी कैलिफोर्निया के पूर्व गवर्नर अर्नोल्ड श्वाजनेगर की पत्नी मारिया श्रीवर से दिल्ली में आधिकारिक दौरे पर मिली थीं। दोनो के बीच हुई इस बातचीत को यूएस एम्बेसी में रिकॉर्ड किया गया था। जिंसमे सोनिया कहती है कि राजीव और वह हमेशा अपने रिश्ते को प्राइवेट रखना चाहते हैं और उन दोनों की रुचि राजनीति में बिल्कुल भी नहीं थी। वही जब हमारी शादी का प्रस्ताव मेरे घर पहुंचा तो मेरे माता पिता ने शादी करवाने से इनकार कर दिया।
    क्योंकि वह राजीव को नहीं पसन्द करते थे और न वह यह चाहते थे कि मेरी शादी राजीव गांधी से हो लेकिन किस्मत को कोई नहीं पलट सकता मेरी शादी राजीव से हुई और अब मैं उनकी पत्नी के रूप में जानी जाती हूँ। उनके पिता का राजीव को न पसन्द करने का कारण भारत के रीति रिवाज और दूरी थी वह नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी की शादी इतनी दूर हो।

  • अकबर द्वारा सती प्रथा पर रोक एक मनगढ़ंत कहानी

    सम्पादकीय:- आज के समय मे मुगल भारत के कोने कोने में चर्चा का विषय बने हुए हैं हर कोई मुगलों के इतिहास के बारे में जानने को उत्सुक हैं वही अगर हम इतिहासकार द्वारा लिखी किताबो को टटोले तो मुगलों का इतिहास महिलाओं के साथ अत्याचार अपनी सगी मां बहनों के साथ दुर्व्यवहार और उनके साथ जबरन यौन शोषण की घटनाओं से पटा पड़ा है। यह एक ऐसा खानदान है जो अपनी ऐय्याशी के लिए विख्यात है। 

    अगर हम हुमायूं की बात करें तो यह अपनी सगी बेटी के साथ शरीरिक सम्बंध बनाने के लिए विख्यात है वही अगर हम शाहजहां का इतिहास देखे तो इसने अपनी सगी बहन के साथ संभोग किया। मुगलों का इतिहास इतना खराब रहा है कि उनके यहां हमेशा महिलाओं का शोषण हुआ है और महिलाओं को पुरूषों के पुरुषार्थ का शिकार होना पड़ा।

    अकबर ने हिन्दू ही नहीं मुस्लिम महिलाओं की भी लुटी अस्मत:-

    वही जब बात मुगल शासक अकबर ही होती है तो उसके विषय मे कई अनेको कहानियां विख्यात हैं लोग इन्हें प्रेम की मिशाल मानते हैं वही भारतीय सिनेमा जोधा अकबर के प्रेम का साक्ष्य बन अकबर की उम्दा छवि बनाने का निरंतर प्रयास करती है। लेकिन अकबर की छवि जिस प्रकार से भारतीय सिनेमा में दिखाई जाती है। वास्तविकता उससे बिल्कुल भिन्न है क्योंकि अकबर एक ऐसा शासक था जिसने अपनी हवस मिटाने के लिए मुस्लिम महिलाओं की अस्मत लूटी इसने अपने स्वार्थ के लिए महिलाओं का उपयोग किया। वही मुस्लिम रानियों में विख्यात चांद बीबी का नाम इसमे काफी मशहूर है। अकबर एक ऐसा सम्राट था जिसने अपनी हवस को पूरा करने हेतु अपनी सगी बेटी आराम बेगम की शादी नहीं होने दी और जहाँगीर के शासन काल मे उसकी अविवाहित ही मौत हो गई। अकबर को सिर्फ अपने स्वार्थ से मतलब था इसे किसी के दुख दर्द की परवाह नहीं थी यह अपनी हवस मिटाने के लिए महिलाओं के साथ अभद्रता की सभी हदे पार कर देता था।

    अकबर ने लगाई सती प्रथा पर रोक एक मनगढ़ंत कहानी:-

    अकबर को लेकर इतिहास में कहानी वर्णित है कि इसने भारत मे सती प्रथा पर रोक लगाई थी और महिलाओं के लिए हितकारी काम किया। लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और हैं भारत मे सती प्रथा थी राजपूत राजाओं की पत्नी अपने पति के साथ सती हो जाती थी हालाकि यह व्यवस्था गलत थी और इसे खत्म करने के लिए राजा राममोहन राय ने काफी मशक्कत की और अपने संघर्ष के चलते भारतीय महिलाओं को सती प्रथा से निजात दिलाया। लेकिन जिस प्रकार से कहा जाता है कि सती प्रथा को खत्म करने के लिए पहला कदम अकबर ने उठाया था वह बिल्कुल गलत था क्योंकि इसका इसे रोकने के पीछे का उद्देश्य बिल्कुल अलग था यह इसे रोककर राजवंशी राजकुमारों और राजाओं को मरवाकर उनकी बीवियों को अपने हरम में रखना चाहता था और उनके साथ संभोग करना चाहता था।
    सती प्रथा रोकने के पीछे अकबर का क्या इरादा था इसका उदाहरण इतिहास में देखा जा सकता है। जब राजकुमार जयमल की हत्या हुई तो इनकीं पत्नी घोड़े पर सवार होकर सती होने जा रही थी। अकबर ने रास्ते मे उसे पकड़ लिया और उनके सगे संबंधियों को कारागार में भेज दिया और उनको अपने हरम में भेज दिया। वही पन्ना के राजकुमार का कत्ल कर अकबर ने उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया और उन्हें अपने हरम में ठूस दिया व उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। 
    इतना ही नही यह हर नए साल पर लगने वाले मीना बाजार में महिलाओं के वस्त्र धारण करके जाता था और अपने राजदरबारियों से उनकी पत्नियों को सज धज के मीना बाजार भेजने को कहता था फिर इसे वहाँ जो महिला पसन्द आती थी यह उंसे अपने साथ ले आता था और उनसे खुद का मनोरंजन करता था। वह महिलाओं को एक रात व एक महीने के लिए अपने हरम में रखता था और उनके साथ अपनी ऐय्याशी पूरी करता था। 

    अकबर ने किया इस्लाम का दुरुपयोग;-

    अकबर महिलाओं के साथ इतना गंदा व्यवहार करता था कि उसे शब्दो मे बयां नहीं किया जा सकता यह जब कही बाहर जाता था तो यह सभी महिलाओं को अपने हरम में भुंसे की तरह बन्द कर देता था और जब वापस आता था तो उनके साथ अपनी हवस मिटाता था । इसने अपने स्वार्थ हेतु इस्लाम का दुरुपयोग किया सुन्नी काजी ने कहा की इस्लाम मे कहा गया है कि एक पुरुष चार से ज्यादा महिलाओं को अपने साथ नहीं रख सकता तो यह सुन्नी काजी से रुष्ट हो गया और इसने अपने दरबार से उसे हटा कर शिया काजी को रख लिया। क्योंकि शिया में असीमित शादियों की अनुमति थी।

    अबुल फज़ल ने किया है अकबर के हरम में मौजूद महिलाओं का वर्णन:- 

    अकबर के हरम में मौजूद महिलाओं के बारे में अबुल फजल ने व्याख्यान किया है अबुल फजल ने अपनी किताब में बताया की अकबर के महल में 5 हजार से अधिक महिलाएं थी यह अकबर की 35 बेगमों से अलग थी यानी 36 बेगमो से जब अकबर का मन नहीं भरा तो वह अलग अलग महिलाओं के साथ अपनी हवस को पूरी करता था।