Category: editorial

  • सिक्योरिटी गार्ड – अरे साहब, यहां गाड़ी मत खड़ी कीजिए!

    भाई, दो मिनट का समय दो। एक बूढ़ी आंटी आने वाली हैं। वह ज्यादा नहीं चल सकतीं। उन्हें बिठाते ही कार हटा दूंगा।

    नहीं साहब। ये गेट है। अभी प्रेसीडेंट ने देख लिया तो बहुत गाली देगा। पैसा तो आठ हजार ही देता है। जरा सा कुछ हुआ नहीं कि गाली चालू!

    उसके ऐसा कहते ही मैंने गाड़ी वहां से हटा ली। उसकी भाषा यह स्पष्ट कर चुकी थी कि वह बिहार का था। मैंने गाड़ी कुछ दूर खड़ी की। लौटकर वापस आया। गार्ड से दुबारा बातचीत शुरू की। वह बिहार का ही था। मध्यप्रदेश का होता तब भी मेरे विचार समान ही रहते।

    उसने जो भी कहा, वह केवल उसका कष्ट नहीं था। एक विशाल शहरी आबादी की हजारों लाखों सोसाइटीज और रिहायशी इलाकों में काम करने वाले सिक्योरिटी गार्ड की सामूहिक त्रासद कथा थी। अधिकांश सिक्योरिटी गार्ड सात आठ नौ हजार की पगार पर बारह घंटे की ड्यूटी करते हैं। अवकाश उनके जीवनाभ्यास में मृग मरीचिका है। इन बारह घंटों में अनगिन लोग उसे सुना सकते हैं, डांट सकते हैं। लगभग सभी लोग उसके स्वामी हैं। वह इस अखिल विश्व का ही भृत्य है। सोसायटी के लोगों की छोड़िए, वह तो किसी आगंतुक की आग भी झेलता है। कोई भी उसे गरिया सकता है। कोई भी नसीहत दे सकता है। वह सबसे सरल प्राप्य और वेध्य है। उसका कोई आत्माभिमान नहीं। उसकी अपनी कोई गरिमा नहीं। संभवतः वर्ष का कोई ऐसा दिन नहीं, जब उसे झिड़कियां उपदेश न सुनने पड़ते हों।

    ऊपर जिस बिहारी गार्ड से मेरा छोटा सा संवाद हुआ था, वह डीडीए की सोसाइटी के किसी एक खंड के मुख्य द्वार पर बैठता है। वैसे ही सैकड़ों हजारों फैले हुए हैं। लगभग छह बरस पहले मैं जिस सोसाइटी में रहा करता था, वहां गेट पर तैनात बुजुर्ग गार्ड से दिल्ली के एक स्थानीय महानुभाव ने छोटी सी बात पर विकट उद्दंडता की थी। उस लंपट ने बुजुर्ग और अत्यंत भद्र व्यक्ति से ऐसा गाली-गलौज किया कि मुझसे रहा न गया। मैंने सोसाइटी के प्रेसिडेंट को बुलवा कर उस आदमी की खूब इज्जत उतरवाई। और वही दिल्ली वाला कुछ देर के बाद मुझे पास के मॉल में चखने और सिगरेट की दुकान चलाता हुआ दीख गया। तब वह कुछ निर्लज्जता से हंसते हुए मेरी ओर देख रहा था।

    अच्छे और बुरे लोग तो हर जगह होते हैं। सभी सिक्योरिटी गार्ड्स अच्छे ही नहीं होते। कुछ बदमाश भी होते हैं। लेकिन बदमाश गार्ड्स की संख्या बहुत कम होती है। अधिकांश तो निरीह, आर्थिक रूप से टूटे हुए और हमारी कृपाओं के पात्र भर होते हैं। उनसे गाली गलौज करना, या तुम तड़ाक की भाषा में बोलना, कभी भी उनकी इज्जत उतार देना अमानवीय, अरुचिकर और पीड़ादायी है।

    दो साल पहले मेरी सोसायटी में कुछ गार्ड्स जाड़े की शाम को अलाव जलाते थे। उन्हें कहीं से पुरानी लकड़ियां मिल गई थीं। मैं जब भी शाम को बाहर से लौटता, एक बुजुर्ग भोजपुरी में मुझसे कहते; आईं हजूर! मुझे लज्जा होती थी। वह कुर्सी आगे बढ़ाते और मैं चुपचाप कुर्सी का प्रस्ताव ठुकराकर खड़े खड़े आग ताप लेता। आश्चर्य यह कि लगभग हर शाम वह कुर्सी आगे बढ़ाते, हर शाम मैं हंसकर मना कर देता लेकिन कुर्सी आगे बढ़ाने का सिलसिला कभी थमता नहीं था।

    वह तुमसे क्या उम्मीद करता है? तुम उसकी आर्थिक सहायता नहीं कर सकते। उसकी तकलीफें कम नहींं कर सकते। उसे छुट्टियां नहीं दिला सकते। कम से कम उस से आप कहकर तो बात करो! उसे मनुष्य होने का भान तो हो! उसे अपनी सारी विवशताओं और असहाय, अशक्त अनुभव करने की वेदनाओं के साथ थोड़ी सी मुस्कराहट दे दो! अच्छी भाषा, या अच्छे जेस्चर से तुम्हारा कुछ घट नहीं जाता। उसका मरता हुआ मन क्षण भर के लिए जी उठता है। उस क्षण की प्रसन्नता या साधारण से विश्वास से वह कई पहर के ताप सह सकता है। लेकिन कौन सुने! यहां सभी सम्राट हैं। उलटी दिशा से गाड़ी चलाकर आने वाला भी आपको ही आंख दिखलाकर जाता है तो वह किसी सिक्योरिटी गार्ड का सम्मान करेगा!

  • डॉ. राम मनोहर लोहिया – ‘जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं’

    किसी भी सरकार के खिलाफ जब विपक्ष की बुलंद आवाज सुनते होंगे तो एक लाइन आपकी कानों में जरूर जाती होगी, ‘जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं’। ये मशहूर पंक्ति डॉ. राम मनोहर लोहिया ने तब कही थी, जब उन्होंने कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था। तब, जब कांग्रेस पार्टी सबसे मजबूत स्थिति में थी, उसे उखाड़ फेंकने की बात अगर कोई कर सकता था तो डॉ. लोहिया थे। महज चार साल में भारतीय संसद को अपने मौलिक राजनीतिक विचारों से झकझोर देने का करिश्मा डॉ राम मनोहर लोहिया ने कर दिखाया था।भारत में गैर-कांग्रेसवाद की अलख जगाने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ही थे। उनकी सोच थी कि दुनियाभर के समाजवादी विचारधारा वाले एकजुट होकर एक मंच पर आएं। लोहिया को भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसवाद का ‘शिल्पी’ कहा जाता है।

    गैर कांग्रेसवाद का ‘शिल्पी’
    इसे डॉ. राम मनोहर लोहिया का अथक प्रयास ही कहिए, कि वर्ष 1967 में कांग्रेस को कई राज्यों में हार का सामना करना पड़ा। यह अलग बात है कि केंद्र में कांग्रेस सत्ता हासिल करने में कामयाब रही। लोहिया का असामयिक निधन 1967 में हो गया। लेकिन उन्होंने गैर कांग्रेसवाद की जो विचारधारा बढ़ाई, उसी की वजह से 1977 में पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनी। लोहिया मानते थे कि अधिक समय तक सत्ता में रहकर कांग्रेस अधिनायकवादी हो गई थी। वह उसके खिलाफ संघर्ष करते रहे।
    महिलाओं को सती-सीता नहीं, द्रौपदी बनना चाहिए

    डॉ. राम मनोहर लोहिया की पहचान उनकी सटीक बोली से थी। चाहे उनका पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रतिदिन 25 हजार रुपए खर्च करने की बात हो, या इंदिरा गांधी को ‘गूंगी गुड़िया’ कहने का साहस हो। या, फिर यह कहने की हिम्मत कि महिलाओं को सती-सीता नहीं बल्कि, द्रौपदी बनना चाहिए। उत्तर भारत के युवाओं के मन मस्तिष्क पर आज भी लोहियावाद का असर देखने को मिलता है। भले ही उन्होंने लोहिया को ठीक से पढ़ा नहीं हो। लेकिन उन्हें लोहिया की खरी-खरी बोली बेहद पसंद आती है। यही हाल 50 और 60 के दशक में भी था। तब युवा एक नारे का जिक्र बार-बार करते थे, ‘जब जब लोहिया बोलता है, दिल्ली का तख्ता डोलता है।’

    नेहरू के खिलाफ फूलपुर सीट से चुनाव लड़े
    लोहिया की जुबान में तल्खी थी, जिसे सहज महसूस किया जा सकता था। आजादी के ठीक बाद जब देश ‘नेहरूवाद’ से प्रभावित था, तब लोहिया ही थे, जिन्होंने नेहरू को सवालों से घेरना शुरू किया था। नेहरू से उनकी तल्खी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार यहां तक कहा था कि ‘बीमार देश के बीमार प्रधानमंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए।’ यही वजह थी कि 1962 में डॉ. लोहिया उत्तर प्रदेश के फूलपुर सीट पर जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ने चले गए। तब उस चुनाव में लोहिया की चुनाव प्रचार टीम में शामिल लोग बताते हैं कि लोहिया कहा करते थे, मैं पहाड़ से टकराने आया हूं। मैं जानता हूं कि पहाड़ से पार नहीं पा सकता। लेकिन उसमें एक दरार भी कर दी तो चुनाव लड़ना सफल हो जाएगा। कहते हैं, इस चुनाव में नेहरू उन-उन क्षेत्रों में पीछे रहे, जहां-जहां लोहिया ने चुनावी सभा को संबोधित किया था।

    मुलायम-लालू-रामविलास सभी लोहिया से प्रभावित
    समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी कई मौकों पर कहते रहे हैं कि लोहिया ही हमारे पार्टी के सबसे बड़े आदर्श हैं। 1967 में पहली बार उन्होंने ही ‘नेताजी’ को टिकट दिया था, जसवंतनगर विधानसभा सीट से। दरअसल, मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक क्षमता को सबसे पहले लोहिया ने ही देखा था। उस दौर के सभी युवा नेता जो लोहिया से प्रभावित थे । बाद के समय में राजनीति के शीर्ष तक गए चाहे वो मुलायम सिंह हों या लालू यादव या फिर रामविलास पासवान। इन सब पर लोहिया का असर दिखा। लेकिन यह भी सच है कि बाद के समय में इनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इन्हें जातिवादी राजनीति के दायरे में बांधकर रख दिया, जिसका लोहिया आजीवन विरोध करते रहे।

    निजी जीवन में दखल बर्दाश्त नहीं
    डॉ. लोहिया की निजी जिंदगी भी कम दिलचस्प नहीं थी। उनके नजदीकी बताते हैं कि लोहिया अपनी जिंदगी में किसी का दखल बर्दाश्त नहीं करते थे। हालांकि महात्मा गांधी ने एक बार उनके निजी जीवन में ऐसी ही दखल देने की कोशिश की थी। गांधी ने लोहिया से सिगरेट पीना छोड़ने को कहा था। इस पर लोहिया ने बापू को कहा था कि ‘सोच कर बताऊंगा।’ कहते हैं, तीन महीने के बाद उन्होंने गांधी से कहा था कि मैंने सिगरेट छोड़ दी।

    सोच के साथ जीवनशैली भी बिंदास
    डॉ. लोहिया जीवन भर रमा मित्रा के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। रमा मित्रा दिल्ली के मिरांडा हाउस में प्रोफेसर रहीं। दोनों के एक-दूसरे को लिखे पत्रों की किताब भी प्रकाशित हुई है। कहा जाता है कि लोहिया ने अपने संबंध को कभी छिपाकर नहीं रखा। लोग जानते थे। लेकिन उस दौर में निजता का सम्मान होता था। लोहिया ने जीवन भर रमा मित्रा के साथ अपने संबंध को निभाया। आप सोच सकते हैं कि जो व्यक्ति 1950-60 के दशक में इतने आजाद ख्याल का था, वह कितना बिंदास होगा। लोहिया महिलाओं के आजाद ख्याल और सशक्त भूमिका के पक्षधर थे।

    मौत भी कम विवादित नहीं
    डॉ. लोहिया की मौत भी कम विवादास्पद नहीं रही। बताते हैं उनका प्रोस्टेट ग्लैंड बढ़ गया था, जिसका ऑपरेशन दिल्ली के सरकारी विलिंग्डन अस्पताल में किया गया था। उनकी मौत के बारे में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘बियांड द लाइन्स’ में ज़िक्र किया है। उन्होंने लिखा है, कि ‘मैं राम मनोहर लोहिया से अस्पताल में मिलने गया था। उन्होंने मुझसे कहा कुलदीप मैं इन डॉक्टरों के चलते मर रहा हूं।’ देखिए, लोहिया की बात सच निकली। डॉक्टरों ने उनकी बीमारी का गलत इलाज कर दिया था। आज वही अस्पताल राम मनोहर लोहिया के नाम से जाना जाता है।

  • आज के दिन ही गांधी ने शुरू किया था दांडी मार्च, अंग्रेजों ने टेके थे घुटने

    जीवन शैली| महात्मा गांधी जिनका नाम भारत के इतिहास में मोटे अक्षरो में मुद्रित है। भारत का बच्चा बच्चा इनके नाम को जानता है। यह वह महान पुरष है जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता के सामने बिना हथियारों को संघर्ष किया और एकजुटता का परिचय देते हुए सम्पूर्ण भारत को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया। गांधी को लोग शान्ति का दूत भी मानते थे। इन्होने बिना हथियारों के सभी को परास्त किया। वही यदि हम आज की तारीख को याद करें तो आज के दिन गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ दांडी मार्च निकाला था।

    यह वही मार्च है जिसने नमक मार्च या दांडी सत्याग्रह के नाम से इतिहास में जगह मिली है। बात उस समय की है जब भारत अंग्रेजी सत्ता के पराधीन था। अंग्रेजों का हुक्म न मानने वाले को मौत की सजा मिलती थी और अंग्रेज जैसे चाहे वैसे भारत पर कर लगाकर भारत की अवाम को अपने अनुसार काम करने को मजबूर करते थे। वर्ष 1930 जब अंग्रेजों ने भारत पर जुल्मों की हद पार करदी और नमक पर कर लगा दिया। 
    अंग्रेजों ने कानून बनाया की अब सभी भारत वासियों को नमक के लिए कर देना होगा। गाँधी जी ने अंग्रेजों के इस नमक कानून के खिलाफ आंदोलन शुरू किया और 12 मार्च 1930 को दांडी सत्याग्रह आरम्भ हुआ। बता दें इस सत्याग्रह में गांधी समेत 78 लोगों के द्वारा अहमदाबाद साबरमती आश्रम से समुद्रतटीय गांव दांडी तक पैदल 390किलोमीटर की यात्रा की थी। 12 मार्च को शुरू हुई ये यात्रा 6 अप्रैल 1930 को नमक हाथ में लेकर नमक विरोधी कानून भंग करने का आह्वान क‍िया। 
    वही नमक कानून से मुक्ति दिलाने हेतु उसी समय उन्होंने सविनय अवज्ञा कार्यक्रम आयोजित किया। गांधी के इस आंदोलन में सी. राजगोपालचारी, पंडित नेहरू जैसे आंदोलनकारी शामिल थे. इसके तहत गांधी व अन्य समर्थकों को अंग्रेजों के जुल्म सहने पड़े कई नेताओं की गिरफ्तारी हुई। यह आंदोलन पूरे एक वर्ष तक चला और वर्ष 1931 में इसपर विराम लगा। बता दें यह आंदोलन इरविन के बीच हुए समझौते से खत्म हो गया और सविनय अवज्ञा आंदोलन का आरंभ हुआ।

  • ज्ञानग्रंथ को पढ़कर मिलता अवगुण से उद्धार

    समझना मुश्किल है बिना समझे बताती हूं
    ज्ञानग्रंथ की तुम्हें भी एक झलक दिखाती हूँ

    हर छंद में वह वाणी का वरदान है

    सद्गुण दायी वह दुर्गुणों का निदान है

    मानव का रूप किन्तु ईश्वर का वरदान है

    जीवन सफल करे जो गीता का वह ज्ञान है

    मोक्षदायिनी अमृतधारा काशी विश्वनाथ का धाम है

    अलकनंदा, भागीरथी सी जीवनदायिनी, पापनाशिनी

    आदिशक्ति का है रूप है जिसका दिव्यता की पहचान है

    शांति तेज आंखों का कर दे जीवन का कल्याण

    आलौकिक दर्शन जिसने पाया उसको मिला है ज्ञान

    कष्टों में भी धैर्य है जिसके , संयम अथाह अपार

    ज्ञानग्रंथ को पढ़कर मिलता  अवगुण से उद्धार।।

  • हिन्दू से इतनी नफरत क्यों बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर

    इतिहास| भारत मे हिन्दू धर्म सभी धर्मों में सर्वोपरि धर्म है। हिन्दू धर्म को भारत की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। हिंदुत्व से भारत की पहचान है। लेकिन कई बार लोग भारत के हिंदुत्व पर सवाल उठाते हैं। भारत के अपने ही भारत के हिंदुत्व के आड़े आते हैं। हिन्दू वादी नीति को गलत ठहरा कर अनेको दलीलें देते हैं और बेबुनियादी बातों से हिंदुत्व को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। वह भारत के गर्व को अपने स्वार्थ के लिए भली भांति उपयोग करते हैं। जब उनका कोई राजनीतिक स्वार्थ आता है तो वह हिंदुत्व का चोला ओढ़ते है लेकिन वास्तव में जब हिंदुत्व के लिए बोलने की बात आती है तो वह कटी पतंग की भांति किनारा पकड़ लेते हैं और सर्वजन की बात करते हैं। यह वह लोग होते हैं जो समय के अनुसार अपना चोला परिवर्तित करते हैं यह कभी ब्राह्मण तो कभी क्षत्रिय बनते हैं कभी यह स्वय को हिन्दू कहते हैं तो कभी मजार में बैठ कर नमाज अदा करते हुए मुस्लिम बन जाते हैं। 

    लेकिन क्या आप जानते हैं यह हिंदुत्व विरोधी नीति आज की नहीं है यह नीति तब से हमारे देश मे अपनी जगह बनाए हुए हैं जब से हमारा देश आजाद हुआ। भारत जो हिन्दू बाहुल्य देश है यदि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए तो इसमे हिन्दू को खास तौर पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन भारत के साथ सबसे बड़ी समस्या हिन्दू ही है एक और जहां भारत का बड़ा वर्ग चाहता है भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए वही एक तरफ कुछ लोग ऐसे है जो हिंदू होकर भी हिंदू के विरोध में खड़े हैं। यदि हम इतिहास के पन्नों की ओर गौर करें तो संविधान निर्माता बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर को कौन नहीं जानता। समाज का एक बड़ा वर्ग इन्हें भगवान के रूप में पूजता है। इन्हें बहुजन नायक के नाम से भी जाना जाता है। इन्होंने बहुजन आंदोलन को गति दी और ब्राह्मणवाद का विनाश करने का लक्ष्य रखा। कहा जाता है इनका उद्देश्य स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर आधारित न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करना था ।
    लेकिन ब्राह्मण समाज के प्रति इनका नजरिया और हिन्दू राज के प्रति इनकी सोच हिंदुत्व को झझकोर देती है। यह हिन्दू होकर भी हिन्दू का विरोध करते थे इन्हें ब्राह्मणों से समस्या थी। यह हिन्दू राज के स्वप्न को भारत के लिए विनाशकारी मानते थे। इन्होंने अपनी किताब पाकिस्तान ऑर दी पार्टिशन आफ इण्डिया’ (1940) में बताया कि यदि हिन्दू राज का स्वप्न साकार होता है तो यह भारत के सबसे बड़ा अभिशाप साबित होगा। हिन्दू कितना भी कहे लेकिन हिन्दू धर्म स्वतंत्रता और बन्धुता के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है। यह लोकतंत्र से मेल नहीं खाता है। इसलिए इसे किसी भी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
    इतना ही नहीं यह हिन्दू राज के विरोध में इतना खड़े हुए हैं कि इन्होंने इसका सीधा सम्बंध ब्राह्मण वाद की स्थापना से जोड़ दिया है। वही इनकी नीति सिर्फ इतनीं ही नहीं थी इन्होने हिन्दू राष्ट्र का सम्बंध में यह भी कहा कि यह ओबीसी और दलितों के लिए खतरा सिद्ध हो सकता है। इन्होंने बौद्ध धर्म का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि जब भारत पर मुस्लिमों ने आक्रमण किया उससे पूर्व भारत मे बौद्ध धर्म और ब्राह्मणों के बीच कड़ा संघर्ष हुआ और बौद्ध धर्म ने ब्राह्मण धर्म को परास्त किया। 
    अंबेडकर के यह शब्द स्पष्ट दिखा रहे हैं कि उन्होंने संविधान तो लिखा लेकिन सिर्फ एक विशेष वर्ग पर ध्यान केंद्रित करते हुए। वह आरंभ से ही ब्राह्मण और हिंदुत्व के विरोधी रहे हैं। इन्होंने अपनी इस किताब में ब्राह्मणों के प्रति इतना जहर उगला है जिसका जिक्र करना असम्भ है। इनके मुताबिक ब्राह्मण समाज भारत के लिए हमेशा खतरा रहा है और हिंदू राज भारत के विनाश का कारण बनेगा। यदि हम इतिहास को खंगाले तो कई ऐसे पहेलु मिल जायेंगे जो यह स्पष्ट कर रहे होंगे की भारत को हिंदू राज्य न बनने देने में अंबेडकर का भी अहम योगदान रहा है।
    वही यदि हम वर्तमान परिपेक्ष्य की बात करे तो आज भी समाज मे अंबेडकर वादी सोच के लोग हैं। यह इतने कुटिल प्रवर्तित के है कि इन्हें हिन्दू से नहीं अपितु बौद्ध से प्रेम है यह हिन्दू नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का विरोध करते हैं उनकी अभेलना करते हैं और हिंदुत्व के नाम पर लगातार हिन्दू धर्म की अलोचना करते रहते हैं। इसका हम सबसे सटीक उदाहरण अभी हाल ही में आई द कश्मीर फाइल्स फ़िल्म में देख सकते हैं। यह फ़िल्म कश्मीर में हुए पंडितों के साथ दुराचार की कहानी का वर्णन करती है। कई राज्यों की सरकारों ने इन फ़िल्म को टैक्स फ्री किया है। लेकिन कई अलोचनात्म प्रवर्तित के लोग इस फ़िल्म की आलोचना कर रहे हैं वह कई तर्क उठाकर जबर्दस्ती इस फ़िल्म की आलोचना में डाल रहे हैं। यह लोग कुछ उसी प्रवर्तित के है जो हिन्दू होकर भी हिन्दू के विरोध में खड़े वही जयचंद है जो अपने देश के साथ गद्दारी करता है।

  • भगत सिंह की फाँसी के समय क्या जेल में गूंज उठा था ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गीत?

    डेस्क। भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव के बलिदान दिवस पर आपने उनकी बहादुरी के चर्चे तो सुने ही होंगे। उनकी गौरवगाथा का बखान करने के लिए हिंदी सिनेमा ने भी कई फिल्मों की रचना की है। इसी में से लगभग हर फिल्म में भगत सिंह की फांसी के समय ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गीत भी आपने सुना ही होगा। अंतिम सीन में आपने देखा होगा कि तीनों स्वतंत्रता सेनानी इंकलाब जिंदाबाद बोलते हुए फाँसी को अपने गले लगा लेते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि यह गाना सिर्फ एक फिल्मी गाना है? या इसे सच में शहीदों द्वारा गुनगुनाया गया था।

    जानिए, इस गीत का इतिहास-

    सबसे पहले गीत के इतिहास के बारे में बात करें तो 1927 की वसंत ऋतू में, स्वतंत्रता सेनानियों में से एक ने राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ से पूछा कि वह बसंत (वसंत) के मौसम पर एक गीत क्यों नहीं बनाते। तभी बिस्मिल ने अशफाकउल्लाह खान, खत्री, ठाकुर, रोशनी आदि जैसे 18 अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गीत की रचना की।

    जेल में गूंजा इंकलाब या रंग दे बसंती चोला…

    शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को जब फांसी दी गई थी, उस समय जेल का क्या माहौल था इसकी पुख्ता जानकारी तो नहीं है पर इसके उपलक्ष में तीन अलग अलग बातें देखने को मिलतीं हैं।  एक कहता है कि उन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा लगाया और दूसरी के अनुसार,उन्होंने ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गीत गाया, और अगर तीसरे प्रकरण की माने तो उन्होंने दोनों ही चीजे की। यह देखते हुए कि उस समय जेल में तालाबंदी थी, केवल उनके साथ आने वाले पुलिसकर्मी ही सच्चाई जान सकते थे।

  • आज भारत मना रहा है शहीद दिवस, इंकलाब जिंदाबाद के साथ उठी थी आजादी की मांग

    भारत| आज यानी 23 मार्च को पूरा भारत शहीद दिवस मना रहा है। आज ही के दिन 23 मार्च 1931 को मध्यरात्रि में अंगेजो ने भारत के तीन महान स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दे दी थी। यह तीन शहीद सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु थे। इन तीनो वीर सपूतों को शहादत देने के लिए पूरा देश 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाता है।

    सरदार भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु भारत के वह वीर सपूत थे जिन्होंने देश के खातिर हंसते हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए और बिना उफ किए सूली पर चढ़ गए। आपको बता दें इन्होंने वर्ष 1929 में 8 अप्रैल को इंकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ केंद्रीय विधानसभा पर बम फेंके थे इनके इस आजादी के विद्रोह ने अंगेजो को हिला कर रख दिया था।
    जानकारी के लिए बता दें जब इन तीनो स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी का बिगुल फूंका तो भारत मे अंगेजो के अत्याचार के खिलाफ एकजुटता की भावना जाग गई। सभी भारतीयों ने आजादी का संकल्प ले लिया। अंग्रेजों को इनकी नीतियों और विद्रोह से डर लगने लगा। वही जब इनको फांसी की सजा सुनाई गई तो लोगो की भीड़ ने जेल को चारों ओर से घेर लिया। अंगेजो ने इन्हें फांसी तो दे दी लेकिन इनकी मौत ने भारत मे इंकलाब का शोर मचा दिया और हर भारतीय आजादी के लिए संघर्ष करने को तैयार हो गया।

  • अजमेर का दर्द कैसे भूले हिन्दू:- मुस्लिम द्वारा 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों के बलात्कार पर जब मौन रही कांग्रेस

    Ajmer rape and blackmailing case:-

    रेप नाम सुनते ही रूह कांप उठती है मन विचलित हो उठता है और अनेको सवाल हमारी अंतरात्मा को झझकोरने लगते हैं। कि कोई इतना निर्लज्ज निर्दयी कैसे हो सकता है कि अपने पुरुषार्थ की सिद्ध हेतु एक महिला के साथ इतना जघन्य कृत्य करे। घटना 1992 की है जब राजस्थान (Ajmer rape case) रेप नाम सुनते ही रूह कांप उठती है मन विचलित हो उठता है और अनेको सवाल हमारी अंतरात्मा को झझकोरने लगते हैं। कि कोई इतना निर्लज्ज निर्दयी कैसे हो सकता है कि अपने पुरुषार्थ की सिद्ध हेतु एक महिला के साथ इतना जघन्य कृत्य करे। घटना 1992 की है जब राजस्थान के अजमेर में सब ठीक ठाक चल रहा था कि अचानक से एक ऐसी घटना का खुलासा हुआ जिसने पूरे देश को खून के आंसू रुलाया। अजमेर सीरियल गैंग रेप और ब्लैकमेलिंग केस (In 1992, the Ajmer Serial Gang Rape & Blackmailing Case of Hindu girls was one of India’s biggest cases of coerced sexual exploitation). ऐसा कोई नहीं जो इस केस से परिचित न हो यह भारत ने महिलाओं के साथ दरिंदगी का सबसे बड़ा केस था। जिसमे सैकड़ों महिलाएं शामिल थी। 

    घटना सन 1992 की है जिसने बलात्कार का घिनौना सच जनता के सामने लाकर रख दिया। जो भी इस घटना को सुनता उसकी आंखों से आंसू नहीं रुकते क्योंकि इस घटना में एक या दो नहीं अपितु सोफिया गर्ल्स स्कूल अजमेर की लगभग 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों का रेप किया गया था। उन हिन्दू लड़कियों को लव जिहाद में फंसाकर न केवल उनके साथ सामुहिक दुष्कर्म किया गया बल्कि उनमें से एक लड़की से उसकी फ्रेंड भाभी बहन आदि परिजनों को भी वहाँ लाने को कहा गया। दरिंदों में हिन्दू लड़कियों के साथ दुष्कर्म करने हेतु एक पूरे न्यूड सिस्टम का निर्माण किया था जिसमे वह हिन्दू लड़कियों को अश्लील तस्वीरे दिखाते थे उनके यौन शोषण की तस्वीरों के माध्यम से ब्लैकमेल करते थे और उनके साथ आय दिन दुष्कर्म करते थे।

    जाने कौन था इन 250 हिन्दू लड़कियों के साथ दरिंदगी करने वाला और किसकी थी सत्ता:- 

    जब अजमेर (Ajmer Shareef) के सोफिया गर्ल्स स्कूल (sofiya girls school) लगभग 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों का रेप किया गया तब भारत मे कांग्रेस (congress) की सत्ता थी। वही जिन लोगों को हिन्दू लड़कियों के साथ हुए इस जघन्य अपराध में दोषी पाया गया था वह फारूक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती थे। यह तीनों मुस्लिम युवक अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह के खादिम (केयरटेकर) के रिश्तेदार/ वंशज तथा कांग्रेस यूथ लीडर के लीडर भी थे ( main accused, Farooq Chishtee, Nafees chishtee, and Anver chishtee belonging to the Khadims of Ajmer Shairf Dargah, was president of the Ajmer Indian Youth Congress). मुख्य आरोपी फारूक चिश्ती ने एक हिन्दू लड़की को अपने प्रेम जाल में फंसाया और उसे प्रेम की मीठी मीठी बातों की चाशनी में फंसाकर एक फार्म हाउस पर ले गया। जहां उसने अपनी गंदी सोच का परिचय दिया और उस हिन्दू लड़की के साथ बलात्कार कर उसकी अश्लील तस्वीरे ली और फिर उन तस्वीरों के जरिए उसे ब्लैकमेल कर उससे उसकी सहेलियों को भी वहाँ लाने को कहा। 

    उसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई की उसे न उस समय की सत्ता का भय था न अपनी हरकतों पर कोई मलाल वह रोज एक हिन्दू लड़की को अपनी हवस का शिकार बनाता और उसकी अश्लील तस्वीरों के माध्यम से उसे ब्लैकमेल करता उससे उसकी सहेली बहन भामी को वहाँ लाने को बोलता। वही अगर कोई इसका विरोध करता तो उसे उसकी दरिंदगी झेलनी पड़ती। उसने अपने इस पैंतरे से लगभग 250 हिन्दू लड़कियों की जिंदगी तबाह कर दी। 

    सूत्रों का कहना है कि इस घटना में सिर्फ फारूक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती नहीं शमिल थे अपितु उस समय की कांग्रेस सरकार के कई नेता और अधिकारी भी इसका हिस्सा थे। क्योंकि इतने बड़े कांड को कोई अकेले बारदात देना आसान नहीं था। जब इन लोगो की हवस पूरी नहीं हुई तो इन्होंने एक गिरोह बनाया जिसमे 18 लोग शामिल हुए। वही हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार करने वाले इसके तीन गुना लोग थे जो कि मुस्लिम समुदाय के थे। इन्हें हिन्दू लड़कियों से इतनी घृणा थी कि यह हिन्दू लड़कियों के साथ स्वयं बलात्कार करते फिर और लोगो को उनके साथ बलात्कार करने के लिए ओब्लाइज करते। 

    बलात्कार के बाद हिन्दू लड़कियों की क्या थी स्थिति:- 

    1992 की इस घटना ने हिन्दू लड़कियों की जिंदगी को तहस नहस करके रख दिया। सोफिया गर्ल्स स्कूल अजमेर की लगभग 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों का रेप की बारदात का सच सामने आने के बाद लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया। हर कुर्ते वाले शख्स में लड़कियों को बलात्कारी नजर आने लगे और आते भी क्यों न उनकी वजह से 250 से ज्यादा हिन्दू लड़कियों को इस दरिंदगी का शिकार होना पड़ा। वही इस लड़कियों में से अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम (केयरटेकर) चिश्ती परिवार का खौफ इतना था कि कई लड़कियों ने आत्महत्या कर ली तो कईयों ने अपने आप को देखा कि उनका परिवार इस आग में झुलस रहा है तो वह घर छोड़कर कही चली गई। लोग जो महिलाओं के समर्थन की बात करते थे उन्होंने अपने हाँथ ऊपर कर लिए। उनके समर्थन में खड़े होने से हर किसी ने इनकार किया।

    वही उस समय का लोकप्रिय मोमबत्ती गैंग अपराधियों के समर्थन में खड़ा हो गया। जिसके बाद हिन्दू लड़कियों का आत्मविश्वास चूर चूर हो गया। कई लड़कियों में इस स्थिति का सामना करने से इनकार कर दिया और आत्महत्या कर ली। वही सबसे ज्यादा चकित करने वाली बात तब सामने आई जब पता चला कि इस रेप कांड में आईएएस अधिकारी और पीएसीएस अधिकारियों की बेटियां भी थी जिसकी इन मुस्लिमों ने तस्वीरे ले ली थी और प्रशासन में होने के बाबजूद वह मूक दर्शक बने हुए थे। इस घटना में अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम (केयरटेकर) चिश्ती परिवार के जिन सदस्यों में हिन्दू लड़कियों के साथ दरिंदगी की हदें पार की वह सभी लड़कियां नाबालिग थी और 10वीं व 12 वीं में पढ़ती थी।

    सरकार क्यों बनी रही मूक दर्शक:- 

    जो कांग्रेस आज के समय मे महिलाओं की समस्या के बलबूते पर सत्ता में वापसी की आस लगाए हुए हैं उसने 1992 में अजमेर की इस घटना पर अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी। जब अजमेर में 250 से ज्यादा हिन्दू लड़कियों के साथ दरिंदगी हुई थी तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। उस समय सोशल मीडिया इतना प्रचिलित नहीं था कि यह मामला आम जनमानस के जरिए तूल पकड़े और राजनीतिक दल इसकी आड़ में अपने स्वार्थ की रोटियां सेके। लेकिन कांग्रेस ने उस समय सत्ता में रहते हुए भी इस मामले पर खुलकर कुछ खास नहीं किया और इस खबर को कांग्रेसी नेताओं ने वोट और तुष्टीकरण की राजनीति के लिए दबा दिया था। 

    घटना के मुख्य आरोपियों को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। जिन लड़कियों ने दरिंदों के खिलाफ आवाज़ उठाने का प्रयास किया उनकी आवाज को दबा दिया गया। सत्ताधारी दल के समर्थन के चलते लड़कियों के घर वालो ने भी उनका समर्थन नहीं किया। कुछ लड़कियों की जिद्द के चलते पुलिस ने कार्यवाही की लेकिन उसका कुछ खास परिणाम नहीं निकला। वही यदि हम कांग्रेस की बात करें तो उसने भी हिन्दू लड़कियों के साथ हुई उस जघन्य घटना को महत्व न देखकर राजनीति की रोटियां सेंकी। 

    कब इस मामले में दर्ज हुआ केस और कितने लोगों को मिली सजा:-

     हिन्दू लड़कियों के साथ हुई इस जघन्य घटना पर सरकार तो मूक दर्शक बनी ही रही। वही समाज के डर से लड़कियों को चुप करवा दिया गया। किसी ने अपराधियों के खिलाफ केस दर्ज नहीं किया। वही जब तस्वीरों के माध्यम से तीन लड़कियों की पहचान हुई तब बड़ी मशक्कत के बाद इस संदर्भ में केस फाइल हुआ और लगभग 250 में से महज 12 लड़कियां ही केस फ़ाइल करने को सामने आई।

    लेकिन ज्यो ही इन 12 लड़कियों ने केस फाइल किया इन्हें धमकियां मिलने लगी और यह डर के चलते पीछे हट गई। लेकिन इन 12 लड़कियों में से 2 हिन्दू लड़कियों ने मुस्लिम अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम (केयरटेकर) चिश्ती परिवार के खिलाफ केस करने की हिम्मत जताई और केस को आगे बढ़ाया। इन लड़कियों ने 16 लोगो की पहचान की जिन्होंने इस घिनौने कृत्य को अंजाम दिया था। जिसके बाद ग्यारह लोगों को पुलिस ने अरेस्ट किया। जिला कोर्ट ने आठ लोगों को उम्र कैद की सजा सुनाई।

    इसी बीच इस घटना के मुख्य आरोपियों में से एक फारूक चिश्ती को उसके समर्थकों ने उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं होने का सर्टिफिकेट पेश कर फांसी की सजा से बचा लिया और उसे महज इस घिनौने कृत्य के बदले में 10 साल की सजा का ही दंड मिला।

    वर्तमान में क्या है इस केस की स्थिति:- 

    यदि हम वर्तमान परिपेक्ष्य की बात करे तो हिन्दू महिलाओं के साथ हुए इस जघन्य अपराध को शायद पूरा देश भूल चुका है। सभी के दिमाग से यह बात बाहर हो चुकी है कि राजस्थान के अजमेर में वर्ष 1992 में हिन्दू लड़कियों के साथ दरिंदगी हुई थी। लगभग 250 लड़कियों का मुस्लिम युवकों द्वारा बलात्कार किया गया था और उन्हें सजा के नाम पर कांगेसी सरकार के समय महज ऊंट के मुह में जीरा मिला था। 

    आज अजमेर बलात्कार काण्ड के अपराधी चिश्तियों में से कोई भी अब जेल में नहीं है। सभी आजाद घूम रहे हैं और हिन्दू लड़कियों के साथ हुए इस जघन्य अपराध पर कोई सवाल नहीं कर रहा है। वर्तमान में कांग्रेस हर मुद्दे पर अपनी सक्रियता का परिचय दे रही है। वर्तमान सरकार पर सवाल कर रही है हाथरस के कांड को लेकर रोज सत्तारूढ़ सरकार को घेर रही है। लेकिन 1992 में हिन्दू लड़कियों के साथ हुए सबसे बड़े बलात्कार कांड को भूल चुकी है। कांग्रेस की नीतियों से यह समझना आसान है कि राजनीति में स्वार्थ सिद्धि सर्वोपरि है और राजनेता किसी भी मुद्दे पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेक सकता है और अपना धर्म और कर्म अपने स्वार्थ के अनुसार बदल सकता है। के अजमेर में सब ठीक ठाक चल रहा था कि अचानक से एक ऐसी घटना का खुलासा हुआ जिसने पूरे देश को खून के आंसू रुलाया। अजमेर सीरियल गैंग रेप और ब्लैकमेलिंग केस । ऐसा कोई नहीं जो इस केस से परिचित न हो यह भारत ने महिलाओं के साथ दरिंदगी का सबसे बड़ा केस था। जिसमे सैकड़ों महिलाएं शामिल थी। 

    घटना सन 1992 की है जिसने बलात्कार का घिनौना सच जनता के सामने लाकर रख दिया। जो भी इस घटना को सुनता उसकी आंखों से आंसू नहीं रुकते क्योंकि इस घटना में एक या दो नहीं अपितु सोफिया गर्ल्स स्कूल अजमेर की लगभग 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों का रेप किया गया था। उन हिन्दू लड़कियों को लव जिहाद में फंसाकर न केवल उनके साथ सामुहिक दुष्कर्म किया गया बल्कि उनमें से एक लड़की से उसकी फ्रेंड भाभी बहन आदि परिजनों को भी वहाँ लाने को कहा गया। दरिंदों में हिन्दू लड़कियों के साथ दुष्कर्म करने हेतु एक पूरे न्यूड सिस्टम का निर्माण किया था जिसमे वह हिन्दू लड़कियों को अश्लील तस्वीरे दिखाते थे उनके यौन शोषण की तस्वीरों के माध्यम से ब्लैकमेल करते थे और उनके साथ आय दिन दुष्कर्म करते थे।

    जाने कौन था इन 250 हिन्दू लड़कियों के साथ दरिंदगी करने वाला और किसकी थी सत्ता:- 

    जब अजमेर के सोफिया गर्ल्स स्कूल लगभग 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों का रेप किया गया तब भारत मे कांग्रेस की सत्ता थी। वही जिन लोगों को हिन्दू लड़कियों के साथ हुए इस जघन्य अपराध में दोषी पाया गया था वह फारूक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती थे। यह तीनों मुस्लिम युवक अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह के खादिम (केयरटेकर) के रिश्तेदार/ वंशज तथा कांग्रेस यूथ लीडर के लीडर भी थे। मुख्य आरोपी फारूक चिश्ती ने एक हिन्दू लड़की को अपने प्रेम जाल में फंसाया और उसे प्रेम की मीठी मीठी बातों की चाशनी में फंसाकर एक फार्म हाउस पर ले गया। जहां उसने अपनी गंदी सोच का परिचय दिया और उस हिन्दू लड़की के साथ बलात्कार कर उसकी अश्लील तस्वीरे ली और फिर उन तस्वीरों के जरिए उसे ब्लैकमेल कर उससे उसकी सहेलियों को भी वहाँ लाने को कहा। 
    उसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई की उसे न उस समय की सत्ता का भय था न अपनी हरकतों पर कोई मलाल वह रोज एक हिन्दू लड़की को अपनी हवस का शिकार बनाता और उसकी अश्लील तस्वीरों के माध्यम से उसे ब्लैकमेल करता उससे उसकी सहेली बहन भामी को वहाँ लाने को बोलता। वही अगर कोई इसका विरोध करता तो उसे उसकी दरिंदगी झेलनी पड़ती। उसने अपने इस पैंतरे से लगभग 250 हिन्दू लड़कियों की जिंदगी तबाह कर दी। 
    सूत्रों का कहना है कि इस घटना में सिर्फ फारूक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती नहीं शमिल थे अपितु उस समय की कांग्रेस सरकार के कई नेता और अधिकारी भी इसका हिस्सा थे। क्योंकि इतने बड़े कांड को कोई अकेले बारदात देना आसान नहीं था। जब इन लोगो की हवस पूरी नहीं हुई तो इन्होंने एक गिरोह बनाया जिसमे 18 लोग शामिल हुए। वही हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार करने वाले इसके तीन गुना लोग थे जो कि मुस्लिम समुदाय के थे। इन्हें हिन्दू लड़कियों से इतनी घृणा थी कि यह हिन्दू लड़कियों के साथ स्वयं बलात्कार करते फिर और लोगो को उनके साथ बलात्कार करने के लिए ओब्लाइज करते। 

    बलात्कार के बाद हिन्दू लड़कियों की क्या थी स्थिति:- 

    1992 की इस घटना ने हिन्दू लड़कियों की जिंदगी को तहस नहस करके रख दिया। सोफिया गर्ल्स स्कूल अजमेर की लगभग 250 से ज्यादा हिन्दू लडकियों का रेप की बारदात का सच सामने आने के बाद लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया। हर कुर्ते वाले शख्स में लड़कियों को बलात्कारी नजर आने लगे और आते भी क्यों न उनकी वजह से 250 से ज्यादा हिन्दू लड़कियों को इस दरिंदगी का शिकार होना पड़ा। वही इस लड़कियों में से अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम (केयरटेकर) चिश्ती परिवार का खौफ इतना था कि कई लड़कियों ने आत्महत्या कर ली तो कईयों ने अपने आप को देखा कि उनका परिवार इस आग में झुलस रहा है तो वह घर छोड़कर कही चली गई। लोग जो महिलाओं के समर्थन की बात करते थे उन्होंने अपने हाँथ ऊपर कर लिए। उनके समर्थन में खड़े होने से हर किसी ने इनकार किया।
    वही उस समय का लोकप्रिय मोमबत्ती गैंग अपराधियों के समर्थन में खड़ा हो गया। जिसके बाद हिन्दू लड़कियों का आत्मविश्वास चूर चूर हो गया। कई लड़कियों में इस स्थिति का सामना करने से इनकार कर दिया और आत्महत्या कर ली। वही सबसे ज्यादा चकित करने वाली बात तब सामने आई जब पता चला कि इस रेप कांड में आईएएस अधिकारी और पीएसीएस अधिकारियों की बेटियां भी थी जिसकी इन मुस्लिमों ने तस्वीरे ले ली थी और प्रशासन में होने के बाबजूद वह मूक दर्शक बने हुए थे। इस घटना में अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम (केयरटेकर) चिश्ती परिवार के जिन सदस्यों में हिन्दू लड़कियों के साथ दरिंदगी की हदें पार की वह सभी लड़कियां नाबालिग थी और 10वीं व 12 वीं में पढ़ती थी।

    सरकार क्यों बनी रही मूक दर्शक:- 

    जो कांग्रेस आज के समय मे महिलाओं की समस्या के बलबूते पर सत्ता में वापसी की आस लगाए हुए हैं उसने 1992 में अजमेर की इस घटना पर अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी। जब अजमेर में 250 से ज्यादा हिन्दू लड़कियों के साथ दरिंदगी हुई थी तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। उस समय सोशल मीडिया इतना प्रचिलित नहीं था कि यह मामला आम जनमानस के जरिए तूल पकड़े और राजनीतिक दल इसकी आड़ में अपने स्वार्थ की रोटियां सेके। लेकिन कांग्रेस ने उस समय सत्ता में रहते हुए भी इस मामले पर खुलकर कुछ खास नहीं किया और इस खबर को कांग्रेसी नेताओं ने वोट और तुष्टीकरण की राजनीति के लिए दबा दिया था। 
    घटना के मुख्य आरोपियों को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। जिन लड़कियों ने दरिंदों के खिलाफ आवाज़ उठाने का प्रयास किया उनकी आवाज को दबा दिया गया। सत्ताधारी दल के समर्थन के चलते लड़कियों के घर वालो ने भी उनका समर्थन नहीं किया। कुछ लड़कियों की जिद्द के चलते पुलिस ने कार्यवाही की लेकिन उसका कुछ खास परिणाम नहीं निकला। वही यदि हम कांग्रेस की बात करें तो उसने भी हिन्दू लड़कियों के साथ हुई उस जघन्य घटना को महत्व न देखकर राजनीति की रोटियां सेंकी। 

    कब इस मामले में दर्ज हुआ केस और कितने लोगों को मिली सजा:-

     हिन्दू लड़कियों के साथ हुई इस जघन्य घटना पर सरकार तो मूक दर्शक बनी ही रही। वही समाज के डर से लड़कियों को चुप करवा दिया गया। किसी ने अपराधियों के खिलाफ केस दर्ज नहीं किया। वही जब तस्वीरों के माध्यम से तीन लड़कियों की पहचान हुई तब बड़ी मशक्कत के बाद इस संदर्भ में केस फाइल हुआ और लगभग 250 में से महज 12 लड़कियां ही केस फ़ाइल करने को सामने आई।
    लेकिन ज्यो ही इन 12 लड़कियों ने केस फाइल किया इन्हें धमकियां मिलने लगी और यह डर के चलते पीछे हट गई। लेकिन इन 12 लड़कियों में से 2 हिन्दू लड़कियों ने मुस्लिम अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम (केयरटेकर) चिश्ती परिवार के खिलाफ केस करने की हिम्मत जताई और केस को आगे बढ़ाया। इन लड़कियों ने 16 लोगो की पहचान की जिन्होंने इस घिनौने कृत्य को अंजाम दिया था। जिसके बाद ग्यारह लोगों को पुलिस ने अरेस्ट किया। जिला कोर्ट ने आठ लोगों को उम्र कैद की सजा सुनाई।
    इसी बीच इस घटना के मुख्य आरोपियों में से एक फारूक चिश्ती को उसके समर्थकों ने उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं होने का सर्टिफिकेट पेश कर फांसी की सजा से बचा लिया और उसे महज इस घिनौने कृत्य के बदले में 10 साल की सजा का ही दंड मिला।

    वर्तमान में क्या है इस केस की स्थिति:- 

    यदि हम वर्तमान परिपेक्ष्य की बात करे तो हिन्दू महिलाओं के साथ हुए इस जघन्य अपराध को शायद पूरा देश भूल चुका है। सभी के दिमाग से यह बात बाहर हो चुकी है कि राजस्थान के अजमेर में वर्ष 1992 में हिन्दू लड़कियों के साथ दरिंदगी हुई थी। लगभग 250 लड़कियों का मुस्लिम युवकों द्वारा बलात्कार किया गया था और उन्हें सजा के नाम पर कांगेसी सरकार के समय महज ऊंट के मुह में जीरा मिला था। 
    आज अजमेर बलात्कार काण्ड के अपराधी चिश्तियों में से कोई भी अब जेल में नहीं है। सभी आजाद घूम रहे हैं और हिन्दू लड़कियों के साथ हुए इस जघन्य अपराध पर कोई सवाल नहीं कर रहा है। वर्तमान में कांग्रेस हर मुद्दे पर अपनी सक्रियता का परिचय दे रही है। वर्तमान सरकार पर सवाल कर रही है हाथरस के कांड को लेकर रोज सत्तारूढ़ सरकार को घेर रही है। लेकिन 1992 में हिन्दू लड़कियों के साथ हुए सबसे बड़े बलात्कार कांड को भूल चुकी है। कांग्रेस की नीतियों से यह समझना आसान है कि राजनीति में स्वार्थ सिद्धि सर्वोपरि है और राजनेता किसी भी मुद्दे पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेक सकता है और अपना धर्म और कर्म अपने स्वार्थ के अनुसार बदल सकता है।

  • शाहजहां ने बनाया था हिंदू महिलाओं को बड़े पैमाने पर यौन दासी

    History of Mughal |

    आतंकी संगठन आईएसआईएसआई के बारे में हमने खूब पढा और सुना है उनके अत्याचारों के बारे जब भी कही जिक्र होता है तो अक्सर हमारी आंखों में दर्द छलक उठता है कि कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है। कहा जाता है कि आतंकी संगठन आईएसआईएसआई महिलाओं को यौन गुलाम बनाकर रखता है जो आज की सदी का सबसे दर्दनाक मंजर है सभी उनके इस जघन्य अपराध की अभेलना करते हैं उनका तिरस्कार करते है लेकिन कोई उनपर कार्यवाही नहीं करता। लेकिन यदि हम इतिहास के पन्नो को पलटना आरम्भ करें तो भारत में रहकर भारत का खाकर कुछ बादशाहों ने भारत की महिलाओं के साथ इस  जघन्य अपराध को अंजाम दिया था।

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    घटना पुरानी है लेकिन इतिहास को जानना अत्यधिक आवश्यक क्योंकि आज टेलीविजन के दौर में कई निर्देशक ऐसे है जो उन बादशाहों पर फिल्में बनाने और जनमत के बीच उनकी एक उम्दा छवि विकसित करने की कोशिश करते हैं। फिल्मों के माध्यम से आधा अधूरा इतिहास दिखाकर वास्तविकता ओर खास तौर पर हिंदुओं के खिलाफ हुए अत्याचारों पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं। वही यदि कोई हिन्दू यह विचार कर ले कि वह हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को उजागर करे तो उसपर अनेकों सवालों की बौछार होने लगती है और लोग उसके विरोध के लिए खड़े हो जाते हैं।

    जाने क्या हुआ था दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों और मुगलों के राज में महिलाओं के साथ:-

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    कई निर्देशक इन सुल्तानों और बादशाहों पर फिल्में नाटक बनाते हैं और इतिहास को उलट पलट का जनता के सामने पेश करते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि आतंकी संगठन आईएसआईएसआई से भी ज्यादा निर्दयी निर्लज्ज थे। इनके सत्ता में रहते बहुसंख्यक हिंदू महिलाओं को बड़े पैमाने पर यौन दासी यानी सेक्स सेल्व्स बनाया था। इनके साथ हर दिन दरिंदगी होती थी।
    इन सुल्तानों और बादशाहों में शाहजहां का नाम सबसे ज्यादा प्रसिद्ध रहा। जिस शाहजहां ने ताजमहल का निर्माण करवाया जिसके नाम का हर भारतीय चर्चा करता है। जिसकी लोग प्रेम की परिभाषा देते है। उसके बारे में कहा जाता है कि वह महिलाओं का सम्मान नहीं करता था। मुगलों में महिलाओं के साथ हुए यौन अपराध के लिए शाहजहां का हरम सबसे अधिक बदनाम रहा, जिसके कारण दिल्ली का रेड लाइट एरिया जी.बी.रोड बसा। जेबी रोड पर आज भी महिलाओं के साथ दरिंदगी की घटनाएं सामने आती है और यहाँ पर महिलाओं को सम्मना नहीं प्राप्त है यहां की महिलाओं को लोग ओछी नजरो से देखते है। 

    जाने शाहजहां के हरम में कितनी महिलाओं को बनाया गया था रखैल:- 

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    प्रेम के लिए विख्यात शाहजहां ने महिलाओं के साथ अत्याचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हिन्दू महिलाओं को अपनी रखैल बनाना उसके शासन काल का लोकप्रिय कार्य था। इतिहासकार वी. स्मिथ ने लिखा है, जब शाहजहां के हाँथो में सत्ता थी तो इसके हरम में 8000 रखैलें थीं जो उसे उसके पिता जहाँगीर से विरासत में मिली थी। शाहजहां ने सत्ता में आने के बाद उन महिलाओं पर कोई दया नहीं की बल्कि महिलाओं को अलग अलग किया फिर हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम की बढ़त की। उसके 8000 महिलाओं को लगातार बढ़ाया उसके अत्याचार का मुख्य आधार हिन्दू महिलाएं बनी। जानकारी के लिए बता दें यह पूरी कहानी अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पेज नम्बर 359 पर मिल जाएगी)
    कहा जाता है दिल्ली का बदनाम एरिया जे बी रोड इन्ही महिलाओं द्वारा बना हुआ है। क्योंकि जब महिलाओं से इनका जी भर जाता था तो यह उन्हें अपने हरम से भगा देते थे। उन हिन्दू महिलाओं के रहने का कोई आश्रय नहीं तब इन्होंने इस धंधे का आरंभ किया और जेबी रोड पर मजबूरन उन्हें अपने शरीर को बेचने का धंधा शुरू करना पड़ा। बता दें यह इतना निरंकुश सम्राट था कि यह हिन्दू महिलाओं को जबरन अगवा कर उनसे यौन-गुलामी और यौन व्यापार करवाता था। अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था और यदि कोई हिन्दू महिला इसके निर्णय का विरोध करती तो यह इसके साथ निरंकुशता की हर हद को लांघ देता था। यह नर पशु, यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था कि इसने हिन्दू महिलाओं का मीन बाजार लगवाना आरम्भ किया था। 

    मीन बाजार के विषय मे हिंदू पुरुषों को अपने सामने नपुंसक बनाता था शाहजहां- 

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    वी स्मिथ, ऑक्सफोर्ड, 1934 द्वारा लिखित पुस्तक ट्रेविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर- फ्रान्कोइस बर्नियर में बताया गया है कि शाहजहां अपने महल में महिलाओं का मीन बाजार लगवाया करता था। जिसमे अगवा कर लाई गई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का क्रय विक्रय होता था। शाहजहां इतना हिंसक था कि यह अपनी वासना को मिटाने हेतु कई लड़कियों को अपनी रखैल बनाए हुए था और कई लड़को को नपुंसक बनना इसका प्रिय शौक। यह ज्यादातर हिन्दू लड़को को नपुंसक बना देता था और उनके सामने हिन्दू महिलाओं के साथ यौन दुराचार करता था। 

    क्या यह कर सकता था किसी से प्रेम:-

    लोग मुमताज और शाहजहां के प्रेम की बड़ी बड़ी मिशाल देते हैं। लोग कहते हैं वह अपनी बेगम से इतना प्रेम करता था कि उसने उसकी याद में ताजमहल का निर्माण करवाया। लेकिन क्या आप जानते हैं जिस्म के शौकीन शाहजहां की मुमताज न तो पहली बेगम थी और न आखिरी क्योंकि यह इनकी चौथी बेगम थी। इसे मुमताज से प्रेम नहीं था अपितु सेक्स की भूंख थी। मुमताज से शादी करने के बाद इसकी यौन सम्बंध की चाहत जब खत्म नहीं हुई तो इसने तीन और शादियाँ की। वही सबसे अधिक गौर करने वाली बात तो यह है कि जिस मुमताज से यह प्रेम करते थे उसके दर्द को नहीं समझे और उसकी मौत किसी गंभीर बीमारी से नहीं बल्कि महज 34 वर्ष की उम्र में 14 वें बच्चे को जन्म देने के चक्कर मे हो गई। वही अपनी प्रेमिका से इनका प्रेम कुछ ऐसा था कि यह उसके मरने के एक हफ्ते नहीं रुके और उसकी छोटी बहन को इसने अपनी रखैल बना लिया। बता दें जब मुमताज ने शाहजहां से शादी की तब वह भी शादी शुदा थी। उसका पति शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम “शेर अफगान खान“ था। शाहजहाँ ने शेर अफगान खान की हत्या कर मुमताज से शादी की थी। 

    अपनी बेटी के साथ किया था सम्भोग:- 

    प्रेम की मिसाल माने जाने वाला शाहजहां वास्तव ने एक ऐसा दरिंदा था जिसका इतिहास जानना हर हिन्दू और मुस्लिम का धर्म है। इसने हिंदुओं के साथ तो अपराध की सभी हदें पार ही की वही मुस्लिम महिलाएं भी इसकी प्रताड़ना से कभी नहीं बच पाई। इसके लिए महिला कभी सम्मान जनक नहीं बनी अपितु सम्भोग की वस्तु रही। इसने हर किसी को सेक्स के लिए इस्तेमाल किया। यह इतना सेक्स अभिलाषी था कि इसने अपनी सगी बेटी जहाँआरा के साथ सम्भोग किया जिसके चलते इतिहासकार इसकी कड़ी निंदा करते हैं। बता दें इसकी बेटी जहाँआरा बिल्कुल अपनी मां की तरह लगती थी जिसके चलते यह खुद पर काबू नहीं कर पाया और उसके साथ संभोग करने लगा। यह इतना निर्लज्ज था कि अपनी संभोग की इच्छा पूरी करते रहने के चलते उसका विवाह भी नहीं होने दिया। वही जब बाप बेटी के इस सम्भोग की चर्चा होने लगी तो मौलवियों ने इसका विरोध करने की वजह कहा माली को अपने द्वारा लगाए फल को खाने का अधिकार है। 
    इसकी बेटी अपने बाप की जिस्म की भूख मिटाने के लिए उसकी मदद करती थी उसने कई बार हिन्दू महिलाओं को धोखे से महल में बुलाकर अपने बाप के हवाले क़िया। जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था। शाहजहाँ के राज ज्योतिष की 13 वर्षीय ब्राह्मण लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे से नशा देकर बाप के हवाले कर दिया था, जिससे शाहजहाँ ने अपनी उम्र के 58 वें वर्ष में उस 13 बर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह किया था। यह वही हिन्दू बेटी थी जिसमे शाहजहां के कैद होने के बाद औरंगजेब की हवस से बचने हेतु अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।

  • अंबेडकर का जाति मुक्त भारत का सपना , जातिय बेंडियो में जकड़े दलित ही नहीं पूरा होने दे रहे

    Ambedkar jayanti| आज यानी 14 अप्रैल को भारत मे संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाई जा रही है। भीमराव अंबेडकर को दलित नायक भी कहा जाता है। इन्होंने अपना पूरा जीवन शोषित और दलित को उनके हक दिलाने में गुजारा दिया। इनका उद्देश्य था कि भारत जाति व्यवस्था से मुक्त हो और सभी को उसके अधिकार मिले।

    अंबेडकर का जाति मुक्त भारत और आज की राजनीति:-

    आज अंबेडकर के नाम पर राजनीति एक अलग ही रूप ले चुकी है। बसपा अंबेडकर के नाम पर दलित वोट बैंक को साध रही है। एक ओर जहां अंबेडकर जाति को खत्म करने की बात करते रहे हैं वही दलित आज जातिय धर्म की बेंडियो में जकड़ा हुआ है। उनकी पार्टी वही है जो उनके समाज के नायक द्वारा संचालित। वह जाति पर नहीं पार्टी के नायक पर मतदान करते हैं और अंबेडकर के कदम पर चलकर जाति व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं। 
    आज सिर्फ बसपा ही नहीं अपितु प्रत्येक राजनीति दल जातिय वोट बैंक अपने खेमे में करने की कोशिश करता है। क्योंकि भारत मे एकता से पहले जातिय धर्म को तबजुब दिया जा रहा है। हर दल एक विशेष जाति से जुड़ा हुआ है। यदि बसपा दलित के बलबूते पर राजनीति में राज करना चाहती है। तो सपा मुस्लिम वोट बैंक पर अपना कब्जा जमाए है। भाजपा को लोग हिन्दू का तमगा पहना रहे हैं। वही कांग्रेस पंडित राहुल गांधी के नाम से जातिय समीकरण तैयार करती है। हर दल को जातिय वोट की अभिलाषा रहती है। लेकिन अंबेडकर के उद्देश्य जाति का विनाश पर किसी का ध्यान केंद्रित नहीं होता। 

    जातिय समीकरण में कितना जकड़ा है दलित:- 

    आज लोग जाति के लिए ब्राह्मण और क्षत्रिय को दोषी ठहराते हैं समाज मे ऐसी कुटिल मानसिकता के लोग हैं जो जाति व्यवस्था को बढ़ावा देने का सम्पूर्ण आरोप इन वर्ग के लोगों पर मढ़ देते हैं। समाज मे व्याप्त हिन्दू मुस्लिम की भावना पर बड़े बड़े राजनेता अपने बयान देते हैं और अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकते है। हिन्दू मुस्लिम तो दो धर्म है जो सभी को दिखाई देते हैं। लेकिन भारत फैले जातिय धर्म पर किसी का ध्यान केन्दित नहीं होता। आज दलित खुद को अंबेडकर के नक्से कदम पर चलने को बताता है लेकिन वास्तव में वह कट्टर जातिय धर्म मे जकड़ा हुआ है। वह स्वयं को कट्टर चमार, कट्टर दलित के नाम से सम्बोधित करता है। जब उससे मतदान की बात करो तो वह कहता है हम चमार हैं तो चमार को वोट देंगे। लेकिन लोगो को जाति का बढ़ावा देने का सम्पूर्ण दोष सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय के माथे पर मढ़ना रहता है। 

    अंबेडकर जयंती पर समरसता दिवस मना कर भाजपा ने रचा नया चक्रव्यूह :-

    जब से भाजपा की सत्ता आई देश मे कई चीजें बदली है। वैसे तो लोग भाजपा को हिन्दू की पार्टी कहते हैं लेकिन भाजपा ने सर्वसमाज के बीच अपनी धमक बना ली है। आज हर समाज भाजपा के कार्य से कहीं न कहीं खुश हैं। वही बसपा के दलित वोट बैंक पर भी भाजपा ने अपना परचम लहराया है और उसे अपने खेमे में कर लिया है। वही आज अंबेडकर जयंती के मौके पर भाजपा समरसता दिवस मना रही है। वही बीजेपी पूरे प्रदेश में जिले से लेकर मंडल स्तर पर अंबेडकर जयंती मनाकर दलितों के बीच रहेगी। भाजपा के इस समरसता दिवस ने बसपा के दलित वोट बैंक पर सीधे प्रहार किया है। इस प्रहार का सबसे बड़ा नुकसान बसपा को आगामी लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। यदि हम राजनीतिक परिपेक्ष्य से देखे तो इसका एक मात्र उद्देश्य बसपा के दलित वोट बैंक में सेंधमारी करना है।