Category: editorial

  • निडरता से सच के लिए अपनी कलम से लिखें,सरकार ने न्यूज़ पोर्टल को कभी फर्जी नही माना

    न्यूज़ पोर्टल कि बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए 4 अप्रैल 2018 को सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से एक जारी आदेश में कहा गया है कि देश में चलने वाले टीवी चैनल और अखबारों के लिए नियम कानून बने हुए हैं और यदि वे इस नियम का उलंघन करते हैं तो उससे निपटने के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया(PCI) जैसी संस्थाएं भी है, लेकिन ऑनलाइन मीडिया के लिए कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है।इसे ध्यान में रखते हुए ऑनलाइल मीडिया के लिए नियामक ढांचा बनाने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा दस लोगों की एक समिति का गठन किया गया समिति के संयोजक सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव होंगे इस कमेटी में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और एनबीए के सदस्य भी साथ में शामिल होंगे गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय के सचिव भी इस कमेटी का हिस्सा होंगे। अब जब दस लोगों की एक टीम निर्धारित की गई जो न्यूज पोर्टल को रेगुलेट करने संबंधी नियम बनाए जा रहे हैं, इस नियम के बनने के पहले यदि कोई यह कहे कि न्यूज पोर्टल फर्जी है तो या तो वह अलप  ज्ञानी या फिर वह सरकार से ऊपर सोच रखने वाला है। सरकार ने न्यूज पोर्टल को कभी भी फर्जी नहीं माना। यही कारण है कि दस सदस्यीय समिति न्यूज पोर्टल हेतु नियम बना रही है। न्यूज़ पोर्टल के विषय में किसी भी प्रकार के अफवाह में नहीं पड़ना चाहिए। न्यूज पोर्टल पूर्णतः वैध है, और इसमें कार्यरत संवाददाता पत्रकार हैं।

  • दुनियां में ग्रीनशेड कॉफी का एकमात्र स्थान- कर्नाटक का कुर्ग

    कर्नाटक के कुर्ग जिसे स्कॉटलैंड ऑफ इंडिया और कर्नाटक के कश्मीर नाम से भी जानते हैं। कुर्ग या कोडागु, कर्नाटक के लोकप्रिय पर्यटन स्‍थलों में से एक है। कूर्ग, कर्नाटक के दक्षिण पश्चिम भाग में पश्चिमी घाट के पास एक पहाड़ पर स्थित जिला है जो समुद्र स्‍तर से लगभग 900 मीटर से 1715 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

    यह स्‍थान यहां पाई जाने वाली हरियाली के कारण के प्रसिद्ध है। यहां कॉफी उत्पादन भी खूब होता है। दक्षिण भारत में कॉफी पीने का चलन आम है और दिन-ब-दिन इसकी खपत भी बढ़ रही है। यही वजह है कि बेहतर भविष्य के लिए अब अच्छी जॉब छोड़ कर युवा कॉफी की खेती करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं।

    कॉफी का पौधा मानसून के पहले रोपित कर दिया जाता है या फिर ठीक मानसून के बाद में पौधे की रोपाई की जाती है। एक पौधे की रोपाई के बाद करीब 2 से 3 वर्ष के अंतराल पर कॉफी का उत्पादन होने लगता है। अगर पौधे की सही से देख की जाए तो लगातार 20 वर्षों तक एक ही पौधे से कॉफी का उत्पादन किया जा सकता है।

    पूरी दुनिया में यही एक जगह है, जहां पर शेड ग्रोन कॉफी का उत्पादन किया जाता है और ये जगह कर्नाटक के कुर्ग और चिकमंगलूर हैं। यहां की दो वैरायटी काफी मशहूर है। एक अरेबिका और दूसरी रोबस्टा। यहां की कॉफी भारत ही नहीं विदेशों तक एक्सपोर्ट की जाती है।

    (ये लेख निखिलेश मिश्रा जी द्वारा लिखा गया है जो कुशल लेखक और जानकार है जो कि पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी अधिकारी भी रह चुके है)

  • भारत का पहला हिंदी अख़बार- उद्दंत मार्तण्ड

    जेम्स ऑगस्टस हिक्की मूलतः आयरलैंड के थे और ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करे थे. उन्होंने ई. सन 1780 में भारत के पहले प्रिंटेड समाचार पत्र का प्रमोचन किया जिसका नाम ‘बंगाल गेजेट’ था इसे आगे चलकर ‘हिक्की’ज बंगाल गेजेट‘ के नाम से भी जाना गया.

    ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी होते हुए भी वे भारत के पहले पत्रकार थे जिन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार से लोहा लिया था. उन्होंने तत्कालीन गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स के अनैतिक संबंधो और उसके द्वारा भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों की कटू आलोचना अपने समाचार पत्र से की थी, जिसके कारण उन्हें जेल भेज दिया गया. वारेन हेस्टिंग्स की तानाशाही ने ‘हिक्की’ज बंगाल गेजेट’ को बंद करवा दिया.

    वारेन हेस्टिंग्स की तानाशाही ने भले ही ‘हिक्की’ज बंगाल गेजेट’ को बंद करवा दिया था लेकिन उस अख़बार के असर की जो गूंज भारत में सुनाई देना शुरू हुई थी इसको सबसे पहले कानपुर के साहित्यकार पंडित जुगल किशोर सुकुल सुना.

    उन्होंने अपने जीवन की सम्पूर्ण जमापूंजी को इकट्ठा कर बड़ी चालाकी से अंग्रेजों से ही उनकी प्रिटिंग मशीन खरीदी. शायद अंग्रेजी हुकूमत को इस बात की भनक भी नहीं होगी कि वे पंडितजी को प्रिंटिंग मशीन देकर खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं.

    अंग्रेजो की नीतियों के बारे में सीधा-सीधा लिखने के कारण जो हश्र ‘हिक्की’ज बंगाल गेजेट’ का हुआ था उससे सबक लेते हुए पंडित जुगल किशोर ने अपने अख़बार के लिए ब्रज और खड़ीबोली को चुना जो अंग्रेजो को एकदम से पल्ले नहीं पड़ने वाली थी. उन्होंने अपने अख़बार का नाम ‘उदन्त मार्तण्ड’ संस्कृत से लिया जिसका अर्थ होता है ‘समाचार सूर्य’.

    चूँकि ‘उदन्त मार्तण्ड’ में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ व्यंग और खड़ीबोली की भाषा में लिखा जा रहा था इसलिए अंग्रेजो को पहले तो पंडितजी के मंसूबो की भनक तक नहीं लगी लेकिन कुछ समय बाद जब उन्होंने पाया कि जनता में जो क्रांति की भावना पैदा हो रही है इसके पीछे इस अख़बार का भी हाथ हो सकता है तब उन्होंने अखबार की डाक ड्यूटी बढ़ा दी. जिसका सीधा असर पंडितजी की आर्थिक स्थिति पर पड़ा और इस तरह भारत का पहला हिंदी अख़बार बंद हो गया.

  • हवसी भेड़ियों का शिकार बनी नाबालिक दलित बालिका, ये सब और कब तक सहेंगी बेटियाँ

    हमारे देश में जब किसी लड़की के साथ रेप की वारदातों की खबर आती है तो उसमें खबर के वायरल होने में सबसे बड़ा योगदान मीडिया और सोशल मीडिया का होता है दिल्ली के कैंट इलाके के नंगल गांव में एक नाबालिग दलित लड़की की मौत का मामला चर्चा में है। जहां लड़की के साथ बलात्कार के बाद हत्या के आरोप लगे है और लड़की के शव का जबरन अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। पुजारी के विशेष धर्म होने के कारण इस मामले को ज्यादा तवज्जो नहीं दिया जा रहा है और कहा जा रहा है कि नाबालिग दलित बालिका की मौत करंट से हुई है अगर नाबालिग दलित बालिका की मौत करंट से हुई थी तो इतनी जल्दी क्या थी जो पुजारी और उनके साथियों ने अंतिम संस्कार के नाम पर बलात्कार के बाद दलित नाबालिक बालिका को को जिंदा जला दिया जब तक उसकी मां को पता चलता लड़की की टाँगे ही शेष रह गई। लड़की की मां को यह बताया गया कि करंट से मौत हुई है पुलिस से बचने के लिए उसका अंतिम संस्कार जल्दबाजी में किया गया है।

    पुलिस ने इस मामले में एक पुजारी को हिरासत में लिया है।श्मशान घाट के सामने किराए पर पुराना नंगल में नौ साल की नाबालिग लड़की अपने माता-पिता के साथ रहती थी। वह लगभग 5:30 बजे अपनी मां को बताकर श्मशान घाट के वाटर कूलर से ठंडा पानी लेने गई थी। 6 बजे श्मशान घाट के पुजारी पंडित राधेश्याम और नाबालिग लड़की की मां को जानने वाले 2-3 अन्य लोगों ने उसे श्मशान में बुलाया और लड़की के शव को यह कहते हुए दिखाया कि वाटर कूलर से पानी पीने के दौरान उसे करंट लग गया था।लड़की की बाईं कलाई और कोहनी के बीच जलने के निशान थे। उसके होंठ भी नीले थे। यह मां ने देखा पुजारी और 2-3 लोगों ने मां से कहा कि अगर आप पीसीआर कॉल करते हैं तो पुलिस इसका मामला बनाएगी और पोस्टमॉर्टम में डॉक्टर लड़की के सभी अंगों को चुरा लेंगे और इसलिए उसका अंतिम संस्कार करना बेहतर है लड़की का अंतिम संस्कार कर दिया गया, जिसके बाद मृतक लड़की की मां ने पति के साथ शोर मचाया कि उनकी मर्जी के बिना उस लड़की का अंतिम संस्कार कर दिया गया।भीड़ जमा हो गई और फिर पीसीआर कॉल की गई। तुरंत स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची, स्थिति को नियंत्रण में लिया गया।लड़की की मां ने अपना बयान दिया और पुजारी को हिरासत में ले लिया गया ।

    पुलिस ने इस मामले में आईपीसी 304, 342, 201 और एससी/एसटी एक्ट के तहत सभी चार आरोपियों पुजारी राधेश्याम, सलीम, लक्ष्मीनारायण, कुलदीप को गिरफ्तार कर लिया । दिल्ली में घटित इस हृदय विदारक दुखद घटना के बाद से एक बात तो साफ हो गई है कि कहीं ना कहीं इसमें राष्ट्रीय महिला आयोग एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी जिम्मेदार है क्योंकि जिस तरीके से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अश्लीलता परोसी जा रही है वेब सीरीज के नाम पर देह व्यापार किया जा रहा है।इससे समाज में लड़कियों के प्रति लोगों की सोच बदल गई है।

    राष्ट्रीय महिला आयोग एंव सूचना प्रसारण मंत्रालय के जिम्मेदार लोग आँख मूंद कर चुपचाप मौन धारण किये है।दिल्ली में हुई इस हृदय विदारक घटना में जिस तरीके से दलित नाबालिग बालिका के साथ दरिंदगी की गई है उससे तो एक बात साफ हो गई है कि ऐसे घिनौने दुष्कृत्य करने वालो के अंदर का भय समाप्त हो गया। दिल्ली में हुई इस घिनौनी घटना के बाद अमिताभ बच्चन अभिनित

    फिल्म अंधा कानून की याद याद आ गई है जिसमें मजबूरी का फायदा उठा कर बलात्कार करने के बाद दुष्कर्मियों के अंदर कानून का भय बिल्कुल नहीं रहता है और अपराधी अपराध पर अपराध करता रहता है अब तो कहना मुश्किल है कि हमारे देश की बेटियां कितनी सुरक्षित हैं बेटियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब भगवान भरोसे है।

    योगेन्द्र गौतम

  • अँधेरे में एक रोशनदान…’आजादी से पहले, आजादी के बाद’

    राज खन्ना एक बेहतरीन दोस्त हैं। उन्हें पत्रकार कहना उन्हें कम करके आंकना होगा। मैं नहीं समझता कि वे पत्रकार बन पाए। एक बेहतर मनुष्य कभी अच्छा पत्रकार नहीं बन सकता। अच्छा पत्रकार बनने के लिए थोड़े नेताओं के गुण भी होने चाहिए। थोड़ा झूठ बोलने का अभ्यास, कभी भी पाला बदलने की तैयारी और पत्रकार दिखने के लिए जरूरी संसाधन की व्यवस्था करने वाले लोगों का आस-पास होना। कोई साहब के लिए गाड़ी का दरवाजा खोले, कोई खर्च-बर्च की चिंता करे, कोई अफसरों-नेताओं को पहले ही सचेत किये रहे कि साहब आ रहे हैं ताकि उन्हें बाहर इन्तजार न करना पड़े। ये सब रोब-दाब के लिए जरूरी है लेकिन राज खन्ना जी में यह कुछ भी नहीं है। वे अखबारों के लिए चाहे जितना कुछ लिखते रहे हों, जितना अच्छा लिखते रहे हों, जितनी प्रशंसा हासिल करते रहे हों, मैं उन्हें पत्रकार के रूप में ख़ारिज ही करूंगा। वो पत्रकार क्या, जिसका कोई रोब-रुआब न हो, जिसकी बड़े अफसरों और नेताओं में चर्चा न हो, बैठकी न हो, जो कुछ गैर-कानूनी काम करा पाने की औकात न रखता हो। हाँ, वे एक बेहतरीन आदमी हैं और एक बार आप को समझ लिया, मान लिया तो समझिये, वो मानना जिंदगी भर चलता रहेगा। मेरी उनकी कुछ ऐसी ही बनती है। इसीलिये मैं बहुत कोशिश करके भी उनके बारे में कुछ लिखते हुए उनकी थोड़ी-बहुत अनावश्यक प्रशंसा कर ही दूंगा। जहां आप को ऐसा कुछ लगे आप उसे अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र होंगे। न मैं बुरा मानूंगा और न ही राज जी।

     उनकी यह नयी किताब आयी है, ‘आजादी के पहले, आजादी के बाद।’ मैंने उन्हें एक लेखक के रूप में कभी नहीं देखा। वे भी कभी अपने को लेखक की तरह दिखने में कोई यकीन नहीं रखते लेकिन उनके इष्ट-मित्र, उनका सुलतानपुर उन्हें न केवल अव्वल दर्जे का लेखक माåनता है, बल्कि उसी तरह अव्वल दर्जे का वक्ता भी। जब सुलतानपुर मानता है तो मुझे तो मानना ही पडेगा। वे जितना अच्छा बोलते हैं, उतना ही अच्छा लिखते भी हैं, जैसे बोलते हैं, वैसे ही लिखते हैं। उनका लिखा हुआ पढ़ते हुए आप को लग सकता है जैसे वे बोल ही रहे हों। इस तरह लिखना मुझे बहुत अच्छा लगता है। इस तरह लिखा हुआ अदना से अदना आदमी भी आसानी से समझ सकता है। कहूँ तो गलत नहीं कहूंगा कि  उनकी भाषा अखबारी है। अखबारी यानी हिन्दुस्तानी। जो आम लोग बोलते हैं, जो आम लोग समझते हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि  उनकी नयी किताब में जो लेख शामिल किये गए हैं, वह मुझे भी आसानी से समझ में आ गए क्योंकि मैं भी उसी भाषा का कायल हूँ। ये लेख किसी योजना के तहत लिखे गए हैं, ऐसा मुझे नहीं लगता लेकिन जिस तरह ये प्रस्तुत किये गए हैं, उससे यही लगता है कि सब कुछ बहुत सोच-समझ कर किया गया है। दरअसल यह सारा लेखन राज खन्ना जी की अपनी व्यक्तिगत रूचि से जुड़ा मालूम पड़ता है।  जैसा कि मैं समझता हूँ, उनकी रूचि इस बात में ज्यादा रहती है कि देश में सब ठीक-ठाक चले। जनता को कोई दुःख तकलीफ न हो।  अच्छी सरकार हो। वह खुद ही लोगों की कठिनाइयां समझ ले और उसके समाधान की ओर बढ़ जाए। लोग ईमानदारी से अपना काम करें। कुछ भी करते हुए यह ध्यान रखें कि उनके किये से किसी और का कोई नुकसान न हो।जब भी किसी कमजोर को, किसी जरूरतमंद को मदद की जरूरत महसूस हो, लोग मदद के लिए आगे आएं। भ्रष्टाचार न हो, धोखा, छल-कपट न हो, ठगी न हो। समाज में गैर-बराबरी न हो। महिलाओं का सम्मान हो। सभी बेहतर नागरिक की तरह काम करें, फिजूल की लंतरानियों से बचें। अफसर और नेता जनता के सेवक की तरह काम करें क्योंकि वे हैं ही जनता के सेवक। केवल सेवक या मुख्य सेवक या प्रधान सेवक कहने भर से काम नहीं चलेगा। मैं बहुत लम्बी सूची गिनाने की जगह कहूंगा कि राज खन्ना जी एक बेहतरीन देश की कल्पना करते हैं और उसमें सबकी सच्ची और सार्थक भूमिका चाहते हैं। लेकिन कठिनाई यही है कि वे देखते हैं कि ऐसा हो नहीं रहा है। ज्यादातर लोग अपने बारे में ज्यादा सोचते हैं, देश के बारे में, समाज के बारे में कम, बल्कि अपने लाभ के लिए वे समाज का, देश का नुकसान करने में भी संकोच नहीं करते। ऐसा सोचते हुए जब राज जी बहुत हैरान-परेशान होते हैं तो इसके कारणों की तलाश करते हैं। आखिर क्यों ऐसा है ? क्यों लोग इतने बेईमान हो गए हैं, क्यों लोग इतने स्वार्थी, छली हो गए हैं, क्यों लोग इतने धूर्त, पाखंडी हो गए हैं ? क्यों जातीय भेदभाव है, क्यों साम्प्रदायिक संघर्ष के हालात हैं, क्यों इतनी गरीबी है, गरीब और अमीर के बीच इतना फासला क्यों है? 

    जब वर्तमान में इसका जवाब नहीं मिलता तो वे पीछे लौटते हैं। इतिहास में जाते हैं। पड़ताल करते हैं, परीक्षण करते हैं और उन वजहों की तलाश करते हैं, जिनके कारण हमारा इतना मूल्यगत, नैतिक और सामाजिक पतन हुआ।मेरे ख़याल से यही सब सोचते हुए ये सारे लेख राज खन्ना जी के हाथों लिखे गए होंगे। योजना नहीं कहूंगा लेकिन जब एक खास चिंतन किसी काम के पीछे होता है तो उसमें अनजाने ही एक तारतम्यता आ ही जाती है। कोई भी उनकी किताब पढ़ते हुए इसे महसूस कर सकता है। एकसूत्रात्मकता, एकात्मता, एकोन्मुखता, यह सब इस किताब में दिखाई पड़ती है। कोई सोच सकता है कि आज की समस्याएं हैं तो गुजरे हुए कल में क्या समाधान मिलेगा। जब कोई वैद्य या चिकित्सक किसी मरीज के मर्ज के बारे में जानना चाहता है तो उसे उसके इतिहास में ही जाना पड़ता है। एक बार कारण समझ में आ गया, एक बार जड़ मिल गयी तो निदान भी आसान हो जाता है और इलाज भी। अब राज खन्ना जी को इसमें कितनी कामयाबी मिली है, यह तो पाठक ही बतायेंगे लेकिन मैं उन कुछ ख़ास बिंदुओं पर गौर करने की कोशिश करूंगा, जो राज खन्ना की लेखन प्रक्रिया में एक सातत्य लेकर आते हैं, जिनके भीतर एक रास्ता नजर आता है, एक ऐसा रास्ता जिस पर चलकर हम डेड एन्ड की ओर बढ़ते जाने की नियति से बच सकते हैं, एक रचनात्मक प्रस्थान बिंदु पर जाकर खड़े हो सकते हैं, जहाँ से आगे बढ़ना फिर बहुत सहज होगा।  

    यह पुस्तक तीन अध्यायों में बंटी हुई है। ‘आजादी की अलख’, ‘उनकी किसे याद’, ‘जो भुला दिए गए’। आप इस विभाजन पर गौर करें तो समझ में आएगा कि यह केवल समयगत विभाजन नहीं है, न ही यह किसी इतिहास क्रम का संकेत है। आजादी की अलख जगाने वालों का रास्ता साफ़ था। वे किसी भ्रम में नहीं थे। बात इतनी भर नहीं थी कि  वे आजादी चाहते थे, बात यह भी थी कि वे आजादी क्यों चाहते थे, किसके लिए चाहते थे। जब यह कहा गया कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है तो यूँ ही नहीं कहा गया, यह किसी व्यक्ति या किसी समूह का अंग्रेजों के खिलाफ ‘दुस्साहस’ मात्र नहीं था बल्कि इसके पीछे एक दृष्टि थी, एक विजन था। अंग्रेज आक्रांता थे, लुटेरे थे, हत्यारे थे। उन्होंने हमारे देश पर राज करने का अधिकार बल और छलपूर्वक हमसे छीन लिया था। वे व्यापारी बनकर आये थे और हमारी कमजोरियों का लाभ उठाकर हमारे शासक बन बैठे। हम अपनी गलतियों के कारण उनके गुलाम बन गए।  हमारे बीच के ही बहुत सारे लोगों ने अपने पद, प्रतिष्ठा और वैभव की लिप्सा के कारण हमारे दुश्मनों की मदद की। क्रांतिकारी देश की मुक्ति चाहते थे तो यह हमारा अधिकार था। मुक्ति का जो स्वप्न क्रांतिकारियों ने देखा था, उसके लिए संघर्ष के जो रास्ते अपनाये गए थे, वे भी स्पष्ट समझ के साथ अपनाये गए थे। हो सकता है अलग-अलग दलों के क्रांतिकारियों के रास्ते अलग-अलग हों लेकिन सबका ध्येय वाक्य एक ही था। भारत हमारा था, हमारा है, हमारा रहेगा। आक्रांताओं को जाना पडेगा, शांति से नहीं गए तो बलपूर्वक खदेड़ दिया जाएगा। मुक्ति के इस स्वप्न के साथ मुक्त भारत के भी सपने क्रांतिकारियों ने देखे थे। एक भारत, जहाँ सब बराबर हों, सबको विकास के सारे अधिकार हों, जाति या सम्प्रदाय को लेकर कोई भेदभाव न हो, हर नागरिक मनुष्य की तरह समझा जाए, लोक की सत्ता हो और सत्ता में लोक हो। कोई अधिपति या भाग्यविधाता न बने। कोई शेरशाह न हो, कोई शाह न हो, कोई तानाशाह न हो। आज हम आजाद हैं लेकिन इस मुक्तिकामना से संघर्ष करने वाले, बलिदान देने वाले क्रांति योद्धाओं के सपने कहाँ गए ? उनका क्या हुआ? गरीबों का भाग्य क्यों नहीं बदला ? कुछ ख़ास लोगों की मुट्ठी में ही सारी समृद्धि कैसे चली गयी ? नेता और राजनीतिक दल कब जन गण मन अधिनायक बन गए ? 

    दूसरे अध्याय में देश को आजादी दिलाने वाले क्रांतिकारियों की बलिदान कथाओं का समावेश है और तीसरे अध्याय में आजादी के बाद देश के बदलते राजनीतिक वात्याचक्र और देश की लम्बी पतन-कथा के विकराल दौर का आख्यान है। सभी लेखों की चर्चा करना तो बहुत कठिन और असाध्य काम होगा। यह काम पाठकों पर ही छोड़ना चाहिए लेकिन इस पुस्तक में कहीं-कहीं जो अनबुझी चिंगारियां हैं, उन पर उंगली रखने की कोशिश मैं जरूर करूंगा, भले ही मेरी उंगली जल जाय।  यह इसलिए कि  अगर हम सबको देश को रास्ते पर लाना है तो अपनी उंगलियां ही नहीं अपने दिमाग और दिल भी क्रान्तिकाल की जलती हुई मशालों की आंच पर रखना होगा, जरूरत हुई तो जलाना भी होगा।  

    ‘गाँधी और जिन्ना’ लेख का आरम्भ करते हुए लेखक जिस तरह ध्यान खींचता है, वह अवर्ण्य है, ‘गांधीजी ने कहा, ‘जब आप बताएँगे कि प्रस्ताव मेरा है तो जिन्ना कहेंगे, ‘धूर्त गांधी।’ माउंटबेटन की टिप्पणी थी, ‘और मैं समझता हूँ जिन्ना सही होंगे।’ विभाजन को रोकने का यह गांधी का अंतिम प्रयास था जो कामयाब नहीं हुआ। जिन्ना अंग्रेजों के रहते पाकिस्तान हासिल कर लेना चाहते थे।  विभाजन उनकी जिद  थी।  गांधीजी का प्रस्ताव था कि कांग्रेस द्वारा चलाई जा रही सरकार लीग को सौंप दी जाए पर देश एक रहे। राज खन्ना लिखते हैं, अंततः विभाजन स्वीकार करना पड़ा लेकिन यह विभाजन शांति की उम्मीद में स्वीकार किया गया। ‘अकथनीय पीड़ा के साथ नाउम्मीदी हाथ लगी। साथ-साथ आगे की नेहरू की उम्मीद एक बार फिर टूटनी और गलत साबित होनी थी। उनकी आशंका सच होनी थी।  तभी से जारी है , युद्ध.. युद्ध। .. और युद्ध।’ ‘मौलाना आजाद ने कहा था’ एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेख है। आरम्भ देखिये, ‘तुम्हें याद है ?’ मौलाना आजाद ने सवाल किया सामने मौजूद भारी भीड़ से। उदास चेहरों की मायूस निगाहें एकटक उनसे मुखातिब थीं।  इस भीड़ का बड़ा हिस्सा वह था, जिसने उन्हें सुनना तो दूर, बरसों-बरस उन्हें जलील करने का कोई मौका छोड़ा नहीं था। गद्दार। दलाल। बिकाऊ। .. आज वही भीड़ उन्हें सुनने को बेताब थी।  मौलाना आजाद बोल रहे थे, ‘मैंने तुम्हें पुकारा और तुमने मेरी जबान काट ली। मैंने कलम उठाई और तुमने मेरे हाथ कलम कर दिए….. मेरा अहसास जख्मी है और  मेरे दिल को सदमा है।  सोचो तो सही तुमने कौन सी राह अख्तियार की ? कहाँ पहुंचे और अब कहाँ खड़े हो ? क्या ये खौफ की जिंदगी नहीं ? और क्या तुम्हारे भरोसे में फर्क नहीं आ गया है ? ये खौफ तुमने खुद ही पैदा किया है।.. अजीजों तब्दीलियों के साथ चलो।  ये न कहो कि इसके लिए तैयार नहीं थे बल्कि तैयार हो जाओ। सितारे टूट गए लेकिन सूरज तो चमक रहा है। उससे किरण मांग लो और उस अंधेरी राहों में बिछा दो, जहाँ उजाले की सख्त जरूरत है।’ जाहिर है वह भीड़ उन मुसलमानों की थी, जो भारत में रहने के बावजूद एक जड़ आशंका से, भय से ग्रस्त थे।  

    ‘सरदार पटेल और कश्मीर’ शीर्षक लेख में वे लिखते हैं, ‘कश्मीर को लेकर नेहरू और पटेल में मतभेद थे। सरदार खामोश नहीं रहे।  माउंटबेटन के साथ नेहरू की प्रस्तावित लाहौर यात्रा का उन्होंने कड़ा विरोध किया और कहा, जब हम सही हैं तो जिन्ना के सामने रेंगने क्यों जाएँ ? देश की जनता हमें क्षमा नहीं करेगी।’ सरदार के कड़े विरोध के कारण नेहरू को वह यात्रा स्थगित करनी पडी। एक अन्य लेख में राज खन्ना जी लिखते हैं कि ‘सरदार पटेल की मुस्लिमों को लेकर सोच पर भी सवाल उठते रहे हैं। उन्हें मुस्लिम विरोधी माना गया। दिलचस्प है कि संविधान सभा की अल्पसंख्यक विषयक सलाहकार समिति के अध्यक्ष पटेल ही थे।  इस समिति की सर्वसम्मति से की गयी सिफारिशों में अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा की गारंटी शामिल थी। पटेल ने 6 जनवरी 1948 को लखनऊ में कहा, ‘मैं मुसलमानों का सच्चा दोस्त हूँ। फिर भी मुझे उनका सबसे बड़ा दुश्मन बताया जाता है। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि भारत के प्रति निष्ठा की महज घोषणा से बात नहीं बनेगी।  उन्हें इसका व्यावहारिक सुबूत देना होगा।’ ‘काकोरी के शहीद’ में वे लिखते हैं कि  फांसी के फंदे की ओर बढ़ते हुए, अशफाक उल्ला खान ने कहा था, ‘मेरे हाथ इंसानी खून से नहीं रंगे हैं। मुझ पर जो इल्जाम लगाया जा रहा है, वह गलत है। खुदा के यहां मेरे साथ इन्साफ होगा।’ उनकी आख़िरी ख्वाहिश बस इतनी थी, ‘कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो ये। रख दे कोई जरा सी खाके वतन कफ़न में।’ इसी तरह फांसी के फंदे पर चढने से पहले रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने शेर पढ़े, ‘मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे। बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।  जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे, तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे। अब न अगले बलबले हैं और न अरमानों की भीड़। एक मिट जाने की हसरत बस दिले बिस्मिल में हैं।’  ‘असेम्बली बम विस्फोट: ताकि बहरे सुन लें’ में लिखा गया है कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बेम फेंके थे। क्यों फेंका, इस बारे में दोनों ने अदालत में बयान देने का फैसला किया।  वे बोले,  ‘इंग्लैण्ड को सपनों से जगाना जरूरी था। हमने असेम्बली चैम्बर के फर्श पर उन लोगों की ओर से  विरोध दर्ज करने के लिए बम फेंका, जिनके पास अपनी तक़लीफ़ें सामने लाने का कोई जरिया नहीं था।  हमारा एकमात्र उद्देश्य बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुँचना और ढीठ लोगों को समय रहते चेतावनी देना था।’ 

    यह सपनों भरी पुस्तक है।  नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चापेकर बंधु, मदनलाल ढींगरा, जतींद्र दास, दुर्गा भाभी, भगवती चरण बोहरा, उधम सिंह, चंद्रशेखर, पुरुषोत्तम दास टंडन, आचार्य नरेंद्र देव, लाल बहादुर शास्त्री, गणेश शंकर विद्यार्थी, दीन दयाल उपाध्याय, राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और इंदिरा गाँधी तक को इस पुस्तक में शामिल किया गया है। बाद में जनता सरकार का आगमन, चंद्रशेखर का एक बड़े नेता के रूप में उदय और क्रांति से उपजी व्यवस्था के पतन तक की इस पुस्तक में चर्चा की गयी है। आपातकाल को याद करते हुए जेपी आंदोलन और इस बहाने एक बार फिर आजादी के आंदोलन की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के जागरण की बात कही गयी है। स्वाधीनता के मूल्य को समझने का यह एक बड़ा अवसर था। आज भी आपातकाल के दौरान की आंदोलनकारी ताकतों की पीढ़ी के मन में जेपी की सम्पूर्ण क्रान्ति बसती है।  इसमें कोई दो राय नहीं कि जेपी के बहुत सारे शिष्य भ्रष्टाचार के  दलदल में समा गए लेकिन इससे उस महान नेता की चमक फीकी नहीं पड़ती।  उन पर रामधारी सिंह दिनकर, धर्मबीर भारती और दुष्यंत जैसे बड़े कवि लिखने को प्रेरित हुए थे।दिनकर ने कहा, ‘हाँ, जयप्रकाश है नाम समय की करवट का, अंगड़ाई का, भूचाल बवंडर के ख्वाबों से भरी हुई तरुणाई का।’  भारती के शब्दों में ‘एक बहत्तर साल का बूढ़ा आदमी /अपनी कांपती हुई कमजोर आवाज में /सच बोलता हुआ निकल पड़ा है।’ दुष्यंत कुमार ने लिखा, ‘एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूँ कहो, इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।’ आखिरकार जयप्रकाश नारायण द्वारा छेड़े गए आंदोलन ने श्रीमती इंदिरा गांधी की जिद को पराजित किया और उन्हें आपातकाल ख़त्म करना पड़ा। राज खन्ना की यह पुस्तक वर्तमान में एक बार फिर बढ़ते गहरे अँधेरे के इस समय में एक रोशनदान की तरह है। उम्मीद है इसे पढ़कर बहुत सारे नवजवान एक बार फिर रोशनख्याली के साथ हर अँधेरे से जूझने को तैयार मिलेंगे।

  • झूँठी है हुमायूँ और हिन्दू रानी कर्णावती की कहानी,रक्षाबंधन का पुराणों के समय से है महत्त्व

    हिन्दू धर्म में रक्षाबंधन को एक अत्यंत ही पवित्र पर्व माना जाता है,इस दिन बहनें अपने भाइयों की दाहिनी कलाई पर एक रक्षा सूत्र बाँधती हैं और उनसे आजीवन अपनी रक्षा करने का वचन भी लेती हैं और भाई खुशी खुशी अपनी बहनों को इस वचन को पूरा करने का विश्वास दिलाते हैं इसी रक्षासूत्र बंधन के पवित्र पर्व को भारतवर्ष में रक्षाबंधन के नाम से भी जाना जाता है I हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को ये पर्व मनाया जाता है इस वर्ष ये पर्व 22 अगस्त रविवार के दिन मनाया जायेगा I इस दिन को भाई-बहन के आपसी प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है I

    वर्तमान में रक्षाबंधन की कहानी को आम-जनमानस मुग़ल बादशाह हुमायूँ और चित्तौड़ की महान हिन्दू रानी कर्णावती से जोड़कर सुनता और पढता आया है जिसमें चित्तौड़ की हिन्दूरानी कर्णावती ने दिल्ली के मुगल बादशाह हुमायूं को अपना भाई मानकर उस मुग़ल के पास अपनी रक्षा के लिए राखी भेजी थी और हुमायूं ने रानी कर्णावती की राखी स्वीकार की और समय आने पर रानी के सम्मान की रक्षा के लिए गुजरात के बादशाह से युद्ध किया किन्तु ये कहानी पूरी तरह से मनगढ़ंत और कपोलकल्पित है और न ही इस घटना का कोई भी लिखित ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है वर्तमान समय में ये सिद्ध हो चुका है कि इस तरह की कोई भी घटना हुई ही नहीं थी I  

    पुराणों से जुडी है रक्षाबंधन की कथा 
     पौराणिक कथाओं में रक्षाबंधन से सम्बंधित कई कथायें मिलती हैं हिन्दू मान्यताओं के अनुसार एक समय माता लक्ष्मी ने  दैत्य राजा बलि को अपना भाई बनाकर भगवान विष्णु को उनके दिए गए वचन से ‘मुक्त’ कराया था। 
    माता लक्ष्मी ने सबसे पहले राजा बलि को बांधी थी राखी

    पुराणों में वर्णन है कि प्रसिद्ध विष्णुभक्त, महान दानवीर, विरोचन के पुत्र दैत्यराज बलि एक महान् योद्धा थे। वे वैरोचन नामक साम्राज्य के सम्राट थे जिसकी राजधानी महाबलिपुर थी। इन्हें परास्त करने के लिए ही भगवान् विष्णु का वामनावतार हुआ था। समुद्रमंथन से प्राप्त रत्नों के लिए जब देवासुर संग्राम छिड़ा और दैत्यों एवं देवताओं के बीच युद्ध हुआ तो दैत्यों ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करके देवताओं को युद्ध में परास्त कर दिया, उसके बाद  महाबलशाली दैत्यराज बलि 100 यज्ञ पूरा करके स्वर्ग पर आधिपत्य करने का प्रयास करने लगे, राजा बलि ने विश्वजित्‌ और शत अश्वमेध यज्ञों को करके तीनों लोकों पर अधिकार जमाने का प्रयास किया और अंत में संपूर्ण विजय के लिए दैत्यराज बलि अपना अंतिम अश्वमेघ यज्ञ का समापन कर रहे थे, तब ये देखकर स्वर्गाधिपति इंद्र डर गए। 

    वे भगवान विष्णु के पास गए और उनसे अपनी व स्वर्ग की  रक्षा का निवेदन किया। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और दान के लिए वामन रूप में ब्राह्मण वेशधारी विष्णु दैत्यराज बलि के समक्ष उपस्थित हुए,क्योंकि यदि राजा बलि का यह यज्ञ भी पूर्ण हो जाता तो पृथ्वी पर धर्म समाप्त होने की आशंका थी I भगवान् विष्णु ने राजा बलि से दान माँगा जिस पर राजा बलि ने बड़े घमंड के साथ कहा कि इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा क्या है जो मैं तुम्हें नहीं दे सकता तीनों लोकों का आज मैं एकमात्र राजा हूँ अतः जो भी तुम्हे उचित लगे मांग लो,मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि जो भी तुम मांगोगे मैं वो अवश्य ही तुम्हें दे दूंगा I 

    वामन वेश में भिक्षुक बन कर आये भगवान विष्णु को दैत्यराज बलि के गुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया और राजा बलि को  सावधान भी किया किन्तु महादानी दैत्यराज बलि अपने गुरु के इशारे को समझकर भी उन वामन वेशधारी भगवान् विष्णु को दान देने से विमुख न हुआ। बलि के वचन देने पर वामन भगवान् ने बलि से सिर्फ तीन पग भूमि दान में माँगी,दैत्यराज बलि हँसते हुए बोला- हे ब्राह्मण, तुमने तो बड़ा ही तुच्छ दान माँगा है यदि तुम्हें कुछ मांगना ही था तो हीरे,स्वर्ण या फिर राज्य मांगते,तुम्हारे इन छोटे से पैरों में किंतनी धरती आयेगी जो तुमने सिर्फ तीन पग धरती मांगी I वामन भगवान् ने ये सुनकर तनिक भी विचलित हुए बिना उत्तर दिया कि हे राजा बलि, मैंने तो सुना है कि आप महादानी हैं और इस पूरे ब्रह्माण्ड में आपके समान कोई दानी नहीं है किन्तु आप तो सिर्फ तीन पग धरती मांगने पर ही विचलित हो गये I बलि ने उत्तर दिया, हे वामन देव,यदि आपको ऐसा लगता है तो आप अपने इन नन्हे-नन्हे पैरों से जितनी भी पृथ्वी नाप लेंगे मैं वो सब आपको दे दूंगा I बलि के ऐसा कहते ही वामन भगवान् ने अत्यंत विशाल रूप धारण कर प्रथम दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग को ही नाप लिया और अपने तीसरे पग के लिए बलि से स्थान पूंछा,ये देखकर अचंभित दैत्यराज बलि ने शेष दान के लिए स्वयं अपना मस्तक नपवा दिया । 

    दैत्यराज बलि का प्रण और दान के प्रति उनकी इच्छाशक्ति को देखकर भगवान विष्णु दैत्यराज बलि से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने बलि को कोई भी वरदान मांगने के साथ ही उसे पाताल लोक में रहने की आज्ञा दी । भगवान् को प्रसन्न देख राजा बलि ने कहा कि हे प्रभु, पहले आप वचन दें कि जो मैं मांगूंगा, वह आप मुझको प्रदान करेंगे और आप मुझसे छल न करेंगे,भगवान विष्णु ने उनको वचन दिया। तब बलि ने कहा कि वह पाताल लोक में तभी रहेंगे, जब आप स्वयं सदैव मेरी आंखों के सामने प्रत्यक्ष रूप में रहेंगे। यह सुनकर विष्णु भगवान स्वयं बड़ी दुविधा में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि राजा बलि ने तो उनको अपना पहरेदार बना दिया। किन्तु भगवान वचनबद्ध थे अतः वो भी पाताल लोक में राजा बलि के यहां रहने लगे। इधर माता लक्ष्मी विष्णु भगवान की प्रतीक्षा कर रही थीं। काफी समय बीतने के बाद भी नारायण नहीं आए। इसी बीच नारद जी ने बताया कि वे तो अपने दिए वचन के कारण राजा बलि के पहरेदार बने हुए हैं। माता लक्ष्मी ने नारद से उपाय पूछा, तो उन्होंने कहा कि आप राजा बलि को अपना भाई बना लें और उनसे रक्षा का वचन लें और बदले में भगवान् को मांग लें ।

    तब माता लक्ष्मी ने एक महिला का रूप धारण किया और राजा बलि के पास  रोती-बिलखती  हुई गयीं I एक दीन-हीन दुखियारी महिला को देखकर बलि ने उनके रोने का कारण पूंछा तो माता लक्ष्मी ने कहा कि उनका कोई भाई नहीं है इसीलिए ये संसार उन्हें प्रताड़ित करता है अगर मेरा भी कोई भाई होता तो वो मेरी रक्षा करता I ये सुनकर बलि ने उनको अपनी धर्म बहन बनाने का प्रस्ताव दिया। जिस पर माता लक्ष्मी ने दैत्यराज बलि को रक्षा सूत्र बांधा और आजीवन अपनी रक्षा का वचन लिया । बलि के वचन देने के पश्चात माता लक्ष्मी ने अपने लिए किसी उपहार की मांग की और बलि के वचन देते ही उन्होंने उपहार स्वरुप भगवान विष्णु को मांग लिया। इस प्रकार माता लक्ष्मी ने बलि को रक्षा सूत्र बांधकर भाई बनाया, साथ ही भगवान विष्णु को भी अपने दिए वचन से मुक्त करा लिया। भगवान् ने बलि को दिए वचन से मुक्ति मिलने के बाद प्रसन्न होकर दैत्यराज बलि को अमरता का वरदान भी दिया,हिन्दू मान्यता के अनुसार 8 चिरंजीवियों में दैत्यराज बलि का भी स्थान है  

    अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमानश्च विभीषण:।
    कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
    सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
    जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

    कृष्ण-द्रौपदी कथा
    एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून की धार बह निकली। यह सब द्रौपदी से नहीं देखा गया और उसने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण के हाथ में बाँध दिया फलस्वरूप खून बहना बंद हो गया। कुछ समय पश्चात जब दुःशासन ने द्रौपदी की चीरहरण किया तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर इस बंधन का उपकार चुकाया। यह प्रसंग भी रक्षाबंधन की महत्ता को प्रतिपादित करता है।
    जनेन विधिना यस्तु रक्षाबंधनमाचरेत।
    स सर्वदोष रहित, सुखी संवतसरे भवेत्।।

    श्रीकृष्ण ने बतायी रक्षाबंधन की कथा  
    एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- ‘हे अच्युत ! मुझे रक्षाबंधन की वह कथा सुनाइये जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है।  भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ, एक बार दैत्यों तथा असुरों में भीषण युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा,असुरों ने देवताओं को पराजित करने के बाद स्वर्ग के राजा इंद्र को भी पराजित कर दिया।
     
    ऐसी स्तिथि में देवताओं सहित इंद्र अमरावती नामक पुरी में चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजआज्ञा दे दी कि इंद्र कभी भी मेरी सभा में न आयें और देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें,सभी लोग सिर्फ मेरी पूजा करें।
    दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए। धर्म के नाश के कारण देवताओं का बल दिन-प्रतिदिन घटने लगा। यह देख इंद्र देवताओं के गुरु ब्रहस्पति के पास गए और उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- हे गुरुवर, ऐसी स्तिथि में लगता है कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे क्योंकि न तो मैं  कहीं भाग ही सकता हूँ और न ही उस दैत्य के सामने युद्धभूमि में टिक सकता हूँ,अतः आप ही कोई उपाय बताइए। देवगुरु ब्रहस्पति ने इंद्र की करुण वेदना को सुनकर उन्हें रक्षा विधान करने को कहा और पूरे विधि-विधान के साथ श्रावण मास की पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया।

    लेखक- पं.अनुराग मिश्र “अनु” आध्यात्मिक लेखक व कवि

     
    येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:
    तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।

    इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर उच्च ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का सूत्र लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बाँधकर युद्धभूमि में उस दैत्यराज से लड़ने के लिए भेज दिया। ‘रक्षाबंधन’ के प्रभाव से दैत्य युद्ध भूमि से भाग खड़े हुए और अंततः स्वर्ग के राजा इंद्र की विजय हुई। 

    रक्षासूत्र बाँधते समय एक श्लोक और पढ़ा जाता है जो इस प्रकार है-
    ओम यदाबध्नन्दाक्षायणा हिरण्यं, शतानीकाय सुमनस्यमाना:।
    तन्मSआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदृष्टिर्यथासम्।।

    लेखक- पं.अनुराग मिश्र “अनु”
    आध्यात्मिक लेखक व कवि

  • आजादी का अमृत वर्ष

    यह आजादी का अमृत वर्ष ,
    काश: यूं अमृत बरसाए,
    छट जाए बादल सब दुख के,
    भारत फिर स्वर्णिम कहलाए।
         

    न हो कोई भूखा-नग्गा, 
    घर- घर में खुशियां भर जाए।
       न हो कही बेटी की हत्या,
    न कोई बहू प्रताड़ित हो।
    बस हो हर आंगन में खुशियां,

    आजादी का अमृत वर्ष
     

    बेटी हर घर में प्यारी हो।
      न हो कोरोना से हाहाकार,
    न डेल्टा वायरस बच्चो पे हावी हो।
    न आए कोई थर्ड वेव,

    न बच्चो को कोई बीमारी हो।
       

    न हो कोई आतंकी हमला,
    न काश्मीर की मांग उठे,
    बस हो सब में भाई -चारा,
        न भाई - भाई पे हावी हो।
      न हो मानवता शर्मसार,

     

    न नारी की इज्जत तार - तार,
    दानव का दंश भी थम जाए,
    न अराजकता  कभी भी भारी हो।
       ये आजादी का अमृत वर्ष,
    काश: यूं अमृत बरसाए,काश: यूं अमृत बरसाए,
    ये आजादी का अमृत वर्ष।।
         

    आजादी का अमृत वर्ष

    रागिनी विवेक त्रिपाठी 

    कवियत्री व (स.अ.) पूर्व मा वि गोहरामऊ,काकोरी

  • गोलागंज-बारूद खाना आवासीय समिति का हुआ पुनर्गठन

    आज गोलागंज बारूदखाना स्थित सुप्रसिद्ध प्रेम प्रकाश भवन,सिंधी मंदिर में गोलागंज-बारूद खाना आवासीय समिति की महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई जिसमें समिति के सभी सदस्यों की सहमति पर आवासीय समिति का पुनर्गठन किया गया I समिति पुनर्गठन की प्रक्रिया के बाद सर्व सहमति से डॉ.के.के. श्रीवास्तव व श्री निर्मल चंद्र श्रीवास्तव को समिति के संरक्षक के लिए चुना गया ।

    समिति में अध्यक्ष पद पर निखिलेश अस्थाना, वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुनीत माथुर,उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार सिंह ‘लालू’, महासचिव के पद पर स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पं. अनुराग मिश्र ‘अनु’, सचिव अनुज मिश्र, संयुक्त सचिव संजय चड्ढा, कोषाध्यक्ष मुकेश सक्सेना इत्यादि को सर्वसहमति के आधार पर चुना गया ।

     
    पुनर्गठन कार्यक्रम के बाद समिति के सभी नवनियुक्त संरक्षकों व पदाधिकारियों का समिति के महासचिव पं.अनुराग मिश्र “अनु” द्वारा माला पहनाकर सम्मान किया गया I इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय भाषण में नवनिर्वाचित अध्यक्ष निखिलेश अस्थाना ने आने वाली जन्माष्टमी, 26 जनवरी व उसके अलावा अन्य सामाजिक व धार्मिक कार्यों के भव्य आयोजनों की रुपरेखा तैयार करने पर विशेष जोर दिया,इस पर समिति के सभी पदाधिकारियों ने नवनिर्वाचित अध्यक्ष को अपने समर्थन का विश्वास दिलाया I इस अवसर पर मनन चौधरी, आशीष माथुर,पं .राम मिलन चौबे इत्यादि अनेकों क्षेत्रीय नागरिक उपस्थित रहे।

  • “रक्षाबंधन” राखी का अटूट बंधन

     

     रक्षाबंधन”
    राखी का अटूट बंधन,
    ऐसे महके जैसे चंदन।
    कहने को तो बस एक धागा है ,
    पर आजीवन रक्षा का वादा है।
    रक्षा का ये पावन बंधन,
    रक्षाबंधन कहलाता है।

    https://www.astrosumittiwari.com/2525/

    ये कल्,
    परसो से बना नही इसका इतिहास पुराना है।
    सतयुग से ये प्रारंभ हुआ, था दैत्य जरासन का पुत्र बलि ,
    उससे थी सब दुनियां हिली।
    किए उसने सौ-सौ अश्वमेघ ,अब स्वर्गलोक की बारी आई 
    इंद्रासन तक डोल गया।
     मां लक्ष्मी ने तब बलि को बांधी राखी
    और अपना भाई बनाया था 
    और स्वर्ग का राज बचाया था।
    जब आया द्वापर कृष्णकाल,
    द्रौपदी ने कृष्ण को भाई कहा 
    और रक्षासूत्र में बांध लिया।
    इस बंधन की महिमा समझो ,
    जब हुआ द्रौपदी चीर हरण कृष्ण ने चीर बढ़ाया था। 
    द्रौपदी की लाज बचा करके अपना भाई धर्म निभाया था।
    तबसे ये बंधन पावन है ,
    लगता सबको मनभावन है।
    राखी की शान निराली है ,
    जो रिश्तों की करती रखवाली है।
    हर भाई इसका दीवाना है,
    हर बहना इसकी मतवाली है।
    राखी की शान निराली है ,
    राखी की शान निराली है।।

    कवियित्री-रागिनी विवेक त्रिपाठी 

  • अंतर्राष्ट्रीय डॉटर्स डे हर साल सितंबर के चौथे रविवार को मनाया जाता है

    रिपोर्टर – योगेन्द्र गौतम 

    अंतर्राष्ट्रीय डॉटर्स डे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ हर साल सितंबर के चौथे रविवार को मनाया जाता है। भारत मे बेटी दिवस 26 सितम्बर को मनाया जा रहा है।संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार 11 अक्टूबर 2012 को एक दिन बेटियों को समर्पित किया। संयुक्त राष्ट्र की इस पहल का स्वागत दुनिया भर के देशों ने किया। इसके बाद से ही हर देश में बेटियों के लिए एक दिन समर्पित किया गया है। डॉटर्स डे हर देश में अलग-अलग दिन मनाया जाता है।हर क्षेत्र में बेटियां अपना हुनर दिखा रही है। चाहे खेलकूद हो या शिक्षा क्षेत्र हो वह बड़ी से बड़ी नौकरी हासिल करती है। आज बेटियां चांद तक पहुंच गई है हर कार्य कर सकती है।यह लाइन तो सुनी ही होगी ना, कि बेटा भाग्य से पैदा होते हैं और बेटियां सौभाग्य से।बेटियां अपने साथ पूरे परिवार की किस्मत बदल देती है। उन्हें खुला आसमान दिया जाए तो वह ऊंची उड़ान भर सकती है।

    एक बेटियां ही होती है जिसके दिल में सबके लिए प्यार होता है ।चाहे वह मायका हो या ससुराल। दोनों घरों को बांध कर रखती है। बेटों से ज्यादा बेटियां अपने माता पिता और परिवार की परवाह करती है।बेटियां आज किसी भी बात पर बेटों से कम नहीं है। उनकी शिक्षा-दीक्षा अगर अच्छे से की जाए तो वह हर मुश्किल को पार कर के माता पिता का नाम रोशन कर सकती है। वैसे बेटियों को एक दिन सेलिब्रेट करना संभव नहीं है। फिर भी यह एक दिन बनाया गया है। इस दिन बेटियों को विशेष रुप से सेलिब्रेट किया जाता है।समाज पुरुष प्रधान रहा है और महिलाओं को वोट देने का मूल अधिकार 1920 में काफी संघर्ष के बाद प्राप्त हुआ था। इसलिए समाज में लड़कियों को लेकर कलंक को मिटाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसे दिनों को मनाना और भी जरूरी हो जाता है। समाज को यह स्वीकार करना चाहिए कि लड़कियां बुद्धिमान, सहानुभूति रखने वाली, स्वतंत्र और स्तर की होती हैं।