कर्नाटक सरकार की 11 नए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की योजना, जो सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत चलेगें, उन 11 जिलों में है जहाँ पर अभी तक सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं हैं। यह एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसका उद्देश्य राज्य में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को बेहतर बनाना है। लेकिन क्या यह पीपीपी मॉडल सही रास्ता है, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसका उत्तर इस योजना की सफलता और उसके दूरगामी प्रभावों पर निर्भर करेगा। योजना के लाभ और चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह परियोजना आम जनता के लिए लाभदायक हो।
कर्नाटक में मेडिकल कॉलेजों की कमी और पीपीपी मॉडल
कर्नाटक में वर्तमान में 22 सरकारी मेडिकल कॉलेज 22 जिलों में स्थित हैं, जबकि 11 अन्य जिलों में कोई सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं है। इस कमी को दूर करने के लिए, राज्य सरकार ने इन 11 जिलों – तुमाकुरु, दावाणगेरे, चित्रदुर्ग, बागलकोट, कोलार, दक्षिण कन्नड़, उडुपी, बेंगलुरु ग्रामीण, विजापुर, विजयनगर और रामनगर में पीपीपी मॉडल के तहत नए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है। यह कदम ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की बेहतरी और ग्रामीण, गरीब और मेधावी छात्रों को चिकित्सा शिक्षा में अधिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
पीपीपी मॉडल का महत्व और चुनौतियां
पीपीपी मॉडल सरकारी निवेश की कमी को दूर करने में मदद कर सकता है, जिससे नए मेडिकल कॉलेजों का निर्माण तेजी से हो सके। निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता और संसाधनों का उपयोग करके, राज्य सरकार इस महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवा आधारभूत संरचना में सुधार कर सकती है। हालांकि, पीपीपी मॉडल में निजी भागीदारों की लागतों और लाभों पर विचार करना होगा जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और उसकी सुलभता प्रभावित हो सकती है।
भूमिका और उत्तरदायित्व
राज्य सरकार जमीन आवंटित करेगी और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के तहत जिला अस्पतालों का संचालन जारी रखेगी। निजी संगठन नये मेडिकल कॉलेजों का निर्माण करेंगे और क्लीनिकल अभ्यास के लिए जिला अस्पतालों का उपयोग करेंगे। इस प्रकार की साझेदारी में सरकार और निजी संगठन के बीच स्पष्ट भूमिका और उत्तरदायित्व होना जरूरी है।
संभावित जोखिम
कुछ राज्यों और विशेषज्ञों ने पीपीपी मॉडल की आलोचना करते हुए कहा है कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को निजी क्षेत्र को “बेचने” जैसा है। यदि सरकार अस्पतालों के संचालन से वापस लेती है, तो गरीब लोगों की स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच कम हो सकती है। इसलिए इस पहलू का गहन अध्ययन आवश्यक है।
नीति आयोग की सिफारिशें और सरकार का रुख
नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि राज्य सरकार 750 से अधिक बेड वाले जिला अस्पतालों को निजी संस्थानों को क्लीनिकल अभ्यास के लिए दे दे, जबकि वे इन अस्पतालों के आसपास मेडिकल कॉलेज बनाएं। यह सुझाव स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा के बुनियादी ढाँचे में अंतर को पाटने के लिए एक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। हालांकि, यह पीपीपी मॉडल गरीबों की स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच को प्रभावित कर सकता है और यह चिंता का विषय है। सरकार को इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए पीपीपी मॉडल को क्रियान्वित करना होगा।
वित्तीय बाधाएं और समाधान
एक मेडिकल कॉलेज स्थापित करने और चलाने की लागत बहुत अधिक है, जो लगभग 600 करोड़ रुपये तक जा सकती है। इस कारण पिछले प्रयासों में वित्तीय बाधाएँ आ रही थीं। पीपीपी मॉडल वित्तीय दबाव को कम करने में मदद कर सकता है, परन्तु निजी क्षेत्र की संलिप्तता के साथ पारदर्शिता सुनिश्चित करने की भी जरूरत होगी।
मौजूदा चिकित्सा कॉलेजों की स्थिति और भविष्य की योजनाएँ
कर्नाटक में कुल 73 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से 22 सरकारी हैं। राज्य में कुल 12,095 सीटें उपलब्ध हैं। सरकार ने रामनगर में राजीव गांधी विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य विज्ञान (आरजीयूएचएस) परिसर को स्थानांतरित करने और विश्वविद्यालय परिसर में एक मेडिकल कॉलेज बनाने का निर्णय लिया है। कनाकपुरा में एक नए सरकारी मेडिकल कॉलेज को भी मंज़ूरी मिल गयी है। ये कॉलेज अगले शैक्षणिक वर्ष से शुरू होने की उम्मीद हैं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ये कॉलेज पीपीपी मॉडल के तहत शुरू होंगे या सरकार स्वयं उन्हें बनाकर चालेगी। भविष्य में, इन कॉलेजों की संख्या में इजाफ़ा कैसे होता है, और सरकार क्या प्रबंधन करने की योजना बनाती है, यह महत्वपूर्ण मुद्दा है।
निष्कर्ष और भविष्य के निहितार्थ
कर्नाटक सरकार की 11 नए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की योजना पीपीपी मॉडल के तहत राज्य में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में सुधार करने की दिशा में एक सराहनीय पहल है। हालांकि, इस योजना की सफलता पीपीपी मॉडल के सफल क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। सरकार को इस बात को ध्यान में रखते हुए सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए कि इस पहल से गरीब और कमज़ोर वर्गों की स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच प्रभावित न हो। संबंधित पहलुओं, जिसमें वित्तीय बाधाओं और निजी क्षेत्र की भागीदारी शामिल हैं, पर पारदर्शिता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
मुख्य बातें:
- कर्नाटक में 11 नए मेडिकल कॉलेज पीपीपी मॉडल के तहत स्थापित किये जाने हैं।
- यह योजना चिकित्सा शिक्षा और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए है।
- पीपीपी मॉडल से वित्तीय बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है, लेकिन यह गरीबों की स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच को भी प्रभावित कर सकती है।
- सरकार को पीपीपी मॉडल के क्रियान्वयन में सावधानी बरतने की आवश्यकता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह सभी के लिए फायदेमंद हो।
- सरकार को इस योजना में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।

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