उपेन्द्र कुशवाहा
पडरौना,कुशीनगर : सृष्टि पर जब भी पाप का भार बढ़ता है, प्रभु अवतार जनकल्याण के लिए अवतार लेते है। त्रेता में प्रभु ने राजा दशरथ के पुत्र के रूप में अवतार लेकर पाप का विनाश कर रामराज्य की स्थापना की।
उक्त बातें क्षेत्र के गांव बसडीला महन्थ में आयोजित श्रीराम कथा के तीसरे दिन कथा की अमृत वर्षा करते हुए श्री अयोध्या धाम से आयी मानस मर्मज्ञ दीदी स्मिता वत्स ने कही। उन्होंने प्रभु श्रीराम के जन्मोत्सव के कथा की प्रस्तुति करते हुए श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया, कथा के भावपूर्ण प्रस्तुति पर श्रोता इतने भावुक हो गए कि प्रभु के जन्म के समय पूरा पंडाल श्रोताओं के संकीर्तन और नृत्य के दौरान जय सियाराम के जयघोष से गुज उठा। समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा(खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया।
जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अत्यंत सुंदर था। उस शिशु को देखने वाले देखते रह जाते थे। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। श्रोता अमृतमयी कथा में अंत तक डुबकी लगाते रहे।
कथा का शुभारम्भ हरिद्वार धाम से पधारे पूज्य संत स्वामी दिव्य सागर जी ने मानस पूजन एवं आरती कर किया। इस दौरान काफी संख्या में महिला एवं पुरुष श्रोता एवं आयोजन समिति के लोग मौजूद रहे।
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