बुंदेले किसानों ने फूंका क्रांति का बिगुल, बंद की दूध, सब्जी अनाज की आपूर्ति

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बांदा। सरकार के खिलाफ बुन्देल खण्ड के किसानों का गुस्सा भड़क गया है। ऐसे में इसकी लपट प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में पहुच जाए तो कोई बड़ी बाॅत नही होगी। अधिकारियों द्वारा मिल रहे गलत फीड़ का परिणाम है कि मुख्यमंत्री किसानों की वास्तविक परेशानी को समझ नही पा रहे है। कई सालों से प्राकृतिक आपदा झेल रहे बुंदेले किसानों ने मंगलवार को क्रांति का बिगुल फूंक दिया। अगले पांच दिनों के लिए किसानों ने दूध, सब्जी, अनाज आदि बाजार में सप्लाई बंद कर हड़ताल का ऐलान कर दिया।

किसानों ने तय किया है कि वह न तो कचहरी, न बैंक और तहसीलों में खुद के काम के लिए जाएंगे। आंदोलन की अगुवाई करने वाली बुंदेलखंड किसान यूनियन व किसान सभा का कहना है कि सरकारी कर्मचारी हड़ताल कर मांगे पूरी करवा लेते हैं इसलिए अब किसान भी हड़ताल पर हैं। किसानों को मुफ्त बिजली पानी के साथ अपनी फसल के मूल्य निर्धारण का अधिकार मिलना चाहिए।

किसानों को बल देने के लिए स्वराज इंडिया के संयोजक प्रो. योगेन्द्र अखिल भारतीय किसान समिति के अध्यक्ष डॉ. सुनीलम भी बांदा पहुंच चुके है।ज्ञात हो कि पिछले 20 दिनों से बुंदेलखंड किसान यूनियन का धरना बांदा में चल रहा है। लेकिन सरकार के किसी मंत्री ने मिलकर इनकी समस्याओं को सुनना मुनासिब नही समझा। इसी दौरान किसान संघ ने किसान हड़ताल का ऐलान किया जिसके समर्थन में सभी किसान संगठन आ गए हैं।

किसानों के कई आंदोलन हुए पर सरकारों ने किसान समस्या को गंभीरता से नहीं लिया है। अब बांदा की धरती में सभी किसान संगठनों ने एकजुट होकर तय किया है कि अगले पांच दिनों तक गांव से किसान दैनिक जरूरत का सामान दूध, फल, सब्जी, अनाज बाहर नहीं भेजेंगे। किसान को उत्पादन की लागत का डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए। किसान को अपनी उपज का मूल्य तय करने का अधिकार नहीं है जबकि बाजार में हर चीज के दाम की कीमत तय करने का अधिकार कंपनी व कारोबारी को है।

किसानों का कहन है कि नुकसान झेल कर फसल उगाने वाले किसानों के बिजली-पानी के बिल माफ होने चाहिए। दिनों दिन उत्पादन घट रहा है, लागत तक नहीं निकल पा रही है। बुंदेलखंड किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विमल कुमार शर्मा व किसान संघ के संयोजक रामचंन्द सरस के अनुसार जिले की सीमा से सटे गांव गंछा, दुरेड़ी, त्रिवेणी आदि गांवों में किसानों ने हड़ताल का समर्थन किया है। इस हड़ताल में बांदा का बड़ोखर गांव सबसे सक्रिय भूमिका निभा रहा है। मंगलवार को यहां एक बूंद दूध और सब्जी बाजार नहीं गयी।

कोई किसान अपने किसी काम के लिए गांव से शहर के लिए नहीं निकला। यहां के प्रगतिशील किसान पेरम सिंह की बगिया में किसानों ने डेरा डाल लिया है। बड़ोखर के सौ फीसदी किसानों ने पूरी हड़ताल की है तो आसपास गावों में में भी हड़ताल का आंशिक असर देखने को मिला। कई गावों के किसान बड़ोखर पहुंचे और घोषणा की कि अगले दिनों में वह भी अपने गावों के सभी किसानों को हड़ताल के लिए तैयार करेंगे। यह चिनगारी बुंदेलखण्ड में धीरे-धीरे फैल रही है, आने वाले समय में किसानों का बड़ा आंदोलन बन सकता है।

जिले में शहरी इलाकों किसानों की हड़ताल अगर प्रभावी हो गई तो अगले पांच दिनों में शहरी क्षेत्रों में दूध का संकट खड़ा हो जाएगा। आलम यह होगा कि लोग चाय के लिए तरस जाएंगे। दूध की पूरी आवक गांव पर किसानों पर निर्भर है। डेयरी संचालक भी किसानी से जुड़े है। जिले में किसानों के यहा 5 हजार लीटर दूध रोजाना होता है जिसकी आपूर्ति शहरी इलाकों में होती है। बाॅदा में गोवंश व दुधारू मवेशियों की संख्या 695600 है। सरकारी कामधेनु डेयरी में दुग्ध उत्पादन प्रतिदिन 765 लीटर उपलब्ध होता है। रबी फसल में पिछले साल 561.769 हजार मैट्रिक टन अनाज का उत्पादन और सीमांत 211790, लघु 72912 व सामान्य किसान 75179 है।

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