नई दिल्ली। पिछली सरकारों में अक्सर सरकार से भी ऊपर एक सलाहकार समिति बनाकर सरकार को सुझाव देने के काम में सरकार से बाहर के ऐसे लोगों का उपयोग सरकार करती थी, जैसा संप्रग सरकार में सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री से भी ऊपर का अधिकार देने के लिए एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति यानी एनएसी बनी जिसमें सदस्य के तौर पर ऐसे ही सोशल एक्टिविस्ट शामिल किए गए। एनएसी भले ही सोनिया गांधी को सुपर प्राइम मिनिस्टर बनाए रखने के मकसद से बनाई गई थी। लेकिन समिति के सदस्य समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार कार्य करने वाले योग्य व्यक्ति थे। संप्रग सरकार में कमजोर लोगों की मदद के लिए सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार जैसे बेहद महत्वपूर्ण कानून इसी सलाहकार समिति के सदस्यों के सुझाव पर बने, लेकिन 2017 में सामने आई एनएसी की फाइलों से साबित हुआ कि कैसे राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने संवैधानिक व्यवस्था को ध्वस्त किया। मंत्रलयों से ज्यादा प्रभाव एनएसी का हुआ करता था। इस व्यवस्था ने लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए जनप्रतिनिधियों की स्थिति को कमजोर किया था।
फिर भी सरकार का हिस्सा रहने तक वह संघर्ष एक सीमा के आगे नहीं गया। लेकिन जब मई 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो सरकार चलाने के आदी रहे सलाहकार समिति के सदस्यों और उसी आस में एक्टिविच्म करने वाले, संघषों के साये में, वाली मनःस्थिति में आ गए। संप्रग शासनकाल में राष्ट्रीय सलाहकार समिति के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अर्थशास्त्रियों, बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्ट ने मिलकर एक ‘मिशन जय हिंद’ का सुझाव सरकार को दिया है। ऐसे लोग क्या चाहते हैं, इसे समझने के लिए मिशन जय हिंद को ध्यान से पढ़ने की जरूरत है। प्रोफेसर प्रणब बर्धन, च्यां द्रेज, अभिजीत सेन, जयति घोष, देबराज रे, आर नागराज, अशोक कोतवाल, संतोष मेहरोत्र, अमित बसोले और हिमांशु जैसे अर्थशास्त्री इसके मूल प्रस्तावक हैं और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन इससे पूरी तरह सहमति रखते हैं। इसके अलावा राजमोहन गांधी, हर्ष मंदर, निखिल डे, एडमिरल रामदास, आकार पटेल, बेजवाडा विल्सन, आशुतोष वाष्ण्रेय, दीपा सिन्हा और योगेंद्र यादव जैसे बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट इसका समर्थन कर रहे हैं। ये सभी बड़े अर्थशास्त्री, बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट की श्रेणी में श्रेष्ठ दिखते हैं, लेकिन आखिर मिशन जय हिंद के जरिये ये लोग देश को उबारना कैसे चाह रहे हैं, इसे समझना बेहद जरूरी है।
सात सूत्रीय सुझाव में पहला सुझाव यही है कि 10 दिनों के भीतर सभी प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचा दिया जाए। एनएसी के सुझाए मनरेगा के जरिये रोजगार देना इनका सबसे बड़ा सुझाव है। गांव लौटने वाले प्रवासी मजदूरों को तुरंत राहत देने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान विशेष पैकेज में सरकार ने मनरेगा में 40 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त देने का एलान पहले ही कर दिया है जिससे गांवों में रोजगार आसानी से मिल सके। इसके अधिकांश सुझावों पर पहले से ही काम हो रहा है। लेकिन मिशन जय हिंद के नाम पर हिंद को बर्बाद करने वाला सुझाव इस प्रस्ताव का एकमात्र उल्लेखनीय और सबसे खतरनाक हिस्सा है।
इसमें कहा गया है कि मिशन जय हिंद के लिए जरूरी संसाधन जुटाने के लिए कुछ भी किया जाए और इसके लिए सुझाव दिया गया है कि देश के सभी व्यक्तियों की संपत्तियों को सरकार अपने कब्जे में कर ले और इससे आए राजस्व का आधा राज्यों के साथ बांट दे। जब देश में सबके एक साथ खड़े होने की जरूरत है, तब सरकार को लोगों की संपत्ति जब्त करने जैसा सुझाव देकर सरकार को तानाशाह साबित करने और वर्ग संघर्ष खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। देश को इन बंधुआ, कुतर्की अर्थशास्त्री, बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट के बारे में स्पष्टता से पता हो। एक विशेष तरह की सरकार की इच्छा रखने वाले अर्थशास्त्री, बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट लगातार ऐसी स्थिति बना रहे हैं, जिससे नागरिक समाज की भूमिका संदेह का दायरे में आ रही है और यह स्थिति भी समाज के लिए अच्छी नहीं है।
एक खास वैचारिक वर्ग के बुद्धिजीवियों ने मिशन जय हिंद के नाम से एक विध्वंसक सुझाव दिया है कि संकटकाल में देश के नागरिकों की सभी संपदाएं जब्त की जा सकती हैं। ऐसा सुझाव देने वाले लोग संप्रग सरकार में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से सत्ता सुख भोगते और मोदी सरकार के फैसलों को कोसते आए हैं। इस दांव के पीछे भी उनकी यही मंशा लगती है कि कोरोना संकट से जूझ रही मोदी सरकार यदि इस दिशा में आगे बढ़े तो उन्हें उसे घेरने का मौका मिल सके।
‘मिशन जय हिन्द’ एक सात पॉइंट का एक्शन प्लान है. इसमें ऐसे कुछ जरूरी कदम बताए गए हैं, जो केंद्र और राज्य सरकारों को उठाने चाहिए।
1. 10 दिनों के अंदर प्रवासी मजदूरों को घर भेजा जाए
सरकार इस बात की जिम्मेदारी ले कि प्रवासी 10 दिनों के अंदर अपने घर पहुंच जाएं.
केंद्र सरकार इन प्रवासियों के लिए ट्रेनों की व्यवस्था करे और उसका पैसा भी दे.
राज्य सरकारें प्रवासियों के इंटर-स्टेट मूवमेंट की जिम्मेदारी लें और स्टेशन या बस टर्मिनल से गांव तक मुफ्त ट्रांसपोर्ट दे.
स्थानीय प्रशासन तुरंत खाना, पानी और शेल्टर मुहैया कराए.
सिविल एडमिनिस्ट्रेशन की मदद के लिए आर्मी स्टैंडबाई पर रहे.
2. कोरोना मरीजों और फ्रंटलाइन वर्कर्स का साथ दें
जिन मरीजों में लक्षण हैं, उनका फ्री टेस्ट हो.
प्राइवेट इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल इंस्टीट्यूशनल क्वॉरंटीन के लिए किया जाए.
अस्पताल बेड और वेंटिलेटर की व्यवस्था हो.
सभी फ्रंटलाइन वर्कर्स और उनके परिवारों के लिए पूरे एक साल का मेडिकल और इकनॉमिक कवर.
बीमारी और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी जानकारी का समय-समय पर पूरी तरह डिस्क्लोजर.
3. कोई भूखा न रहे
राशन कार्ड रखने वाले हर व्यक्ति को 10 किलो अनाज, 1.5 किलो दाल, 800 उस तेल और 500 ग्राम चीनी हर महीने मिले.
प्रमाण पत्र के आधार पर अतिरिक्त नाम या इमरजेंसी राशन कार्ड
मिड डे मील और प्ब्क्ै स्कीम के बराबर का राशन घर पहुंचाया जाए.
हर स्कूल में कम्युनिटी किचन.
4. सब के लिए नौकरी
डछत्म्ळै गारंटी बढ़ाकर हर जॉब कार्ड के लिए 200 दिन हो.
400 रुपये रोजाना के हिसाब से शहरी इलाकों में हर शख्स के लिए 100 दिन का रोजगार.
लॉकडाउन में नौकरी जाने पर सभी जॉब कार्ड होल्डरों को डछत्म्ळ। के मुताबिक 30 दिन तक मुआवजा.
सभी गांवों के लिए डछत्म्ळै काम चालू रखना अनिवार्य
डछत्म्ळै का पेमेंट दिहाड़ी मजदूरी के हिसाब से.
5. सब के लिए इनकम
म्च्थ् के तहत रजिस्टर सभी एम्प्लोयी को जॉब जाने का मुआवजा.
खस्ताहाल कंपनियों को ब्याज मुफ्त लोन, जिससे वो कर्मचारयों को कुछ सैलरी दे सकें.
डैच् के नीचे दाम जाने और खराब होने वाले उत्पादों के नुकसान पर किसानों को मुआवजा.
हॉकर्स, वेंडर्स, छोटे दुकानदारों को बिजनेस दोबारा शुरू करने के लिए एक बार में 10,000 सब्सिडी.
6. इकनॉमी ठीक होने तक ब्याज नहीं
प्रार्थना करने पर पहले हाउस लोन को रीपेमेंट और ब्याज से तीन महीने के लिए मुक्ति.
प्रार्थना करने पर मुद्रा श्शिशुश् और श्किशोरश् लोन को रीपेमेंट और ब्याज से तीन महीने के लिए मुक्ति.
प्रार्थना करने पर ज्ञब्ब् पर फसल लोन को रीपेमेंट और ब्याज से तीन महीने के लिए मुक्ति.
शेड्यूल टप् इलाकों में आदिवासियों को मनीलेंडरों के ऊंचे ब्याज दरों से सुरक्षित रखना.
7. नेशनल मिशन तैयार करना
नागरिकों और देश के पास मौजूद कैश, रियल एस्टेट, प्रॉपर्टी, बॉन्ड जैसे सभी संसाधनों को राष्ट्रीय संसाधन समझना.
इस काम के लिए जुटाए गए अतिरिक्त रेवेन्यू का कम से कम 50ः हिस्सा केंद्र राज्य सरकारों को दे.
इस मिशन के तहत होने वाले खर्चे को एक्सचेकर का पहला काम समझा जाए. सभी गैर-जरूरी खर्चे और सब्सिडी रोक दी जाएं.
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