नई दिल्ली। तबलीगी जमात एक बार फिर चर्चा में है। कट्टर सुन्नी इस्लाम का रहनुमा होने का दम भरने वाले सऊदी अरब ने सुन्नी मुसलमानों के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन कहे जाने वाले तबलीगी जमात पर बैन लगा दिया है। सऊदी ने तबलीगी जमात को आतंकवाद का एंट्री गेट तक बताया है। इतना ही नहीं, मस्जिदों से जुमे की नमाज के बाद लोगों को तबलीगी जमात से न जुड़ने और इस समूह से पैदा होने वाले खतरों को भी बताने का ऐलान किया है।
इस्लाम के प्रचार-प्रसार के नाम पर सऊदी अरब पर टेरर फंडिंग के आरोप लगते रहे हैं। 90 के दशक से लेकर इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के उत्तरार्ध तक सऊदी अरब ने चैरिटी के नाम पर आतंक को हवा दी। पहले तब चर्चा में था जब 2020 में कोरोना महामारी ने भारत में दस्तक दी थी। तब आरोप लगे थे कि तबलीगी जमात के सदस्यों ने जाने-अनजाने में देश के अलग-अलग हिस्सों में संक्रमण पहुंचाया। अब फिर चर्चा में है और इस बार भी नकारात्मक वजहों से।
टेरर फंडिंग का गढ़ रहे सऊदी अरब को आखिर तबलीगी जमात खतरा क्यों दिखने लगा? यह अचानक हृदय परिवर्तन है या फिर तबलीगी जमात सचमुच इतना बड़ा खतरा है कि टेरर फंडिंग का बादशाह तक उससे डर गया? आखिर सऊदी का तबलीगी जमात पर बैन लगाना क्यों कोई मामूली घटना नहीं है, आइए समझते हैं।
वियॉन न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस दौरान सऊदी अरब बेस्ड मुस्लिम वर्ल्ड लीग नाम का चैरिटी संगठन दुनियाभर में आतंकी संगठनों को समर्थन देता रहा। बाद में तमाम डॉक्युमेंट्स से यह खुलासा हुआ कि इस चैरिटी को सऊदी के शाही परिवार के सदस्य ही चला रहे थे। बाद में अमेरिका ने इस चैरिटी संगठन को आतंकी संगठन घोषित कर दिया।
संयुक्त राष्ट्र में सौंपी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक कुख्यात आतंकी संगठन अलकायदा को 1992 से 2002 के बीच 10 वर्षों के दौरान 30 से 50 करोड़ डॉलर की फंडिंग मिली थी। सऊदी अरब पर तो यहां तक आरोप लगते रहे हैं कि उसके उच्चायोग भी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। 2008 में अल कायदा के अली अहमद अली हमद नाम के एक आतंकी ने सनसनीखेज खुलासा किया था कि बोस्निया में सऊदी हाई कमिशन ने ही उसे और बाकी अल कायदा सदस्यों की भर्ती कराई थी!
The Saudi Arabia government has banned Tablighi Jamat, a Sunni Islamic organistation, in the country.https://t.co/qxr6ad8rfy
— News18.com (@news18dotcom) December 10, 2021
आपको बता दें सऊदी अरब ने सिर्फ अलकायदा नहीं बल्कि तालिबान का भी समर्थन किया है। 1998 में सऊदी के पूर्व खुफिया प्रमुख तुरकी अल फैसल ने तालिबान के एक शीर्ष अधिकारी को एक शख्स के जरिए 1 अरब रियाल यानी आज के हिसाब से 20 अरब रुपये से ज्यादा का चेक भेजा था।
4 दशकों से सऊदी अरब के चैरिटी संगठन आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद पहुंचाते रहे हैं। एक ताकतवर मुस्लिम देश और समृद्धशाली होने की स्थिति का सऊदी दुरुपयोग करता आया है और उसने कई आतंकियों को अपने यहां पनाह दी। 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने सऊदी दौरे के दौरान जोर देकर इस मुद्दे को उठाया था।
दुनियाभर में आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद पहुंचाने के लिए कुख्यात सऊदी अरब का तबलीगी जमात पर आतंक का द्वार कहते हुए बैन लगाना अपने आप में बहुत अहम है। अचानक सऊदी अरब को डर लगने लगा है कि कहीं उसका मुल्क भी आतंकवाद की चपेट न आ जाये और सारा तहस नहस न हो जाये।
सउदी का अचानक हृदय परिवर्तन हो जाना इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के लिए मुखर होती आवाज भी एक वजह है। सऊदी अरब को धीरे-धीरे अहसास हो रहा है कि दुनिया में दहशत फैलाकर इस्लाम का भला नहीं हो सकता। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के दौर में यह बदलाव साफ दिखने भी लगा है। सलमान धीरे-धीरे सऊदी अरब की कट्टर इस्लामी छवि को उदार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब वहां महिलाओं को ड्राइविंग करते देखा जा सकता है।
2015 में पहली बार सऊदी महिलाओं ने म्यूनिसिपल इलेक्शन में वोट भी डाला। सिनेमा हॉल खुल रहे हैं। म्यूजिक कंसर्ट हो रहे हैं। ये वो चीजें हैं जिसकी कुछ साल पहले तक सऊदी अरब में कल्पना तक नहीं की जा सकती थीं। क्राउन प्रिंस सलमान के इन सुधारों को देखते हुए इस पर यकीन किया जा सकता है कि आतंकवाद पर धीरे-धीरे सऊदी का हृदय परिवर्तन हो रहा है। कह सकते हैं कि तबलीगी जमात पर उसका बैन किसी मजबूरी में उठाया गया नपा-तुला कदम नहीं बल्कि आतंकवाद के खतरे को लेकर उसकी गंभीरता को दिखाता है।
तबलीगी जमात पर सऊदी अरब का बैन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि इस संगठन का जन्म भारत में ही हुआ। 1926 में देवबंदी मौलाना मुहम्मद इलियास ने तबलीगी जमात की नींव रखी थी। इसका मुख्यालय दिल्ली के निजामुद्दीन में है। यह एक तरह का सुन्नी इस्लामिक मिशनरी मूवमेंट है जिसका मकसद मुस्लिमों को सुन्नी इस्लाम के शुद्ध रूप की तरफ लौटाना है।
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