देश के कई मामले में यादगार फैसले

देश के कई मामले में यादगार फैसले

नवंबर माह का दूसरा सप्ताह देश की शीर्ष अदालत द्वारा दिये गये युगांतरकारी फैसलों के लिये हमेशा याद किया जायेगा। इसी माह सेवानिवृत्त हो रहे मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने देश हित से जुड़े ज्वलंत विषयों में मार्गदर्शक फैसले देकर नई मिसाल पेश की। सबसे पहले नौ नवंबर को सदियों से विवादों में फंसे अयोध्या विवाद मुद्दे में सुप्रीमकोर्ट की संवैधानिक बैंच का फैसला आया, जिसको देश के जनमानस ने सिर-माथे पर रखा। फैसले के बाद आम जनता, मीडिया और राजनीतिक दलों ने अनुकरणीय संयम का परिचय दिया, जिसके बाद ही दूसरे बहुचर्चित मामलों में फैसले का मार्ग प्रशस्त हो सका। फिर बुधवार को जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संवैधानिक बैंच ने फैसला दिया कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आता है। वहीं गुरु‍वार को तीन अहम मामलों में फैसले का दिन था। ये तीन मामले थे—आम चुनाव प्रचार के दौरान खूब उछला राफेल विमान खरीद का मुद्दा, सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश का मामला तथा राहुल गांधी पर अवमानना का प्रकरण। 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे जस्टिस रंजन गोगोई ने पिछले दिनों लगातार महत्वपूर्ण फैसले दिये।

इसी कड़ी में प्रधानमंत्री के खिलाफ की गई  अमर्यादित टिप्पणी पर हुए मानहानि के मामले में राहुल गांधी द्वारा माफी मांग लेने के बाद कोर्ट ने मामले का पटाक्षेप कर दिया। नि:संदेह बिना ठोस आधार के देश के प्रधानमंत्री पर राजनीतिक स्वार्थों के लिये अमर्यादित बयान देना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। वहीं राफेल मामले पर आरोप-प्रत्यारोपों से जहां रक्षा सेनाओं का मनोबल प्रभावित हुआ, वहीं फ्रांस के साथ राजनयिक संबंधों पर भी प्रभाव पड़ा। राफेल सौदे में पुनर्विचार याचिकाएं खारिज करके न्यायालय ने कहा कि सौदे में संदेह करने का कोई ठोस आधार नजर नहीं आता।

नि:संदेह बिना ठोस सबूतों के रक्षा जैसे संवेदनशील मामलों में प्रलाप करना राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करना है। कम से कम ऐसे वक्त में जब भारतीय वायुसेना लड़ाकू विमानों की गंभीर कमी से जूझ रही है, ऐसे मुद्दों पर सतही राजनीति करना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। ऐसे तमाम अहम फैसलों के बीच शीर्ष अदालत ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय सूचना के अधिकार के दायरे में आएगा क्योंकि यह सार्वजनिक प्राधिकार अर्थात पब्िलक अथॉरिटी है।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने विगत में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिये गए उस फैसले को मान्यता दी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश के पद को आरटीआई के दायरे में रखने की बात कही गई थी। उनका मानना था कि इस फैसले से सूचना के अधिकार कानून को मजबूती मिलेगी। कहीं न कहीं माना गया कि पारदर्शिता से न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती। साथ ही अदालत का यह भी मानना है कि आरटीआई कानून को न्यायपालिका पर निगरानी रखने के हथियार के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही पारदर्शिता के मुद्दे पर विमर्श के दौरान न्यायिक स्वतंत्रता भी कसौटी पर होगी। पीठ का यह भी मानना रहा कि कॉलेजियम के जरिये निर्धारित न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश की जानकारी तो दी जा सकती है, मगर सिफारिश के कारणों के बाबत नहीं बताया जायेगा। नि:संदेह यह 2005 में लागू हुए सूचना के अधिकार कानून के लिये बड़ी सफलता कही जा सकती है। सुप्रीमकोर्ट का फैसला न्यायिक स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही की भी बात करता है। इस बात की भी पुष्टि हुई है कि स्वतंत्र न्यायपालिका के लिये पारदर्शिता अपरिहार्य अंग है। नि:संदेह हर साल देशभर में साठ लाख आरटीआई अर्जियां दाखिल करने वाले लोगों का भरोसा इस फैसले के बाद बढ़ेगा। देश का लोकतंत्र उस दिन समृद्ध होगा, जिस दिन देश के राजनीतिक दल भी इस कानून के दायरे में आएंगे ताकि सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की जुगलबंदी पर अंकुश लग सके।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *