कश्मीर में धारा 370 हटाने को लेकर अनशन पर बैठे वकील, थानें पहुंचकर दी गिरफ्तारी

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लखनऊ । कश्मीर में धारा 370 हटाये जाने को लेकर लखनऊ में वकीलों ने अनशन किया और नारेबाजी की। वहीं, जब उन पर अनशन खत्म करने के लिए प्रशासन ने दबाव डाला तो नाराज वकील हजरतगंज थाने पहुंच गए और हवालात का ताला खोलकर गिरफ्तारी दी। वकील कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने की मांग कर रहे थे। दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाने की बात की जा रही है। जिसके पक्ष में वकील प्रदर्शन कर रहे थे।

जम्मू कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी को हुए आतंकी हमले के बाद से जहां एक ओर देश भर में आक्रोश का माहौल है, वहीं जम्मू-कश्मीर में तनाव का माहौल बना हुआ है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहे तक और घर से लेकर दफ्तर तक हर जगह एक चर्चा आम है-अनुच्छेद 370।

लोग जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने की मांग कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में अगले सप्ताह से इस पर सुनवाई भी शुरू हो सकती है। जानकर आश्चर्य हो सकता है कि भारत का एक राज्य होने के बावजूद साल 1965 तक जम्मू कश्मीर में मुख्यमंत्री नहीं बल्कि प्रधानमंत्री होते थे।

महाराज हरि सिंह और पंडित जवाहर लाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। साल 1965 में पहले चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी के नेता गुलाम मोहम्मद सादिक जम्मू कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री बने। 1947 में अंग्रेजों से आजादी के बाद छोटी-छोटी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल किया गया। जम्मू-कश्मीर को भारत के संघ में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू करने के पहले ही पाकिस्तान समर्थित कबिलाइयों ने उस पर आक्रमण कर दिया। उस समय कश्मीर के राजा हरि सिंह थे, जिन्होंने कश्मीर के भारत में विलय का प्रस्ताव रखा। 

तब इतना समय नहीं था कि कश्मीर का भारत में विलय करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी की जा सके। हालात को देखते हुए भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष रहे एन गोपाल स्वामी आयंगर ने संघीय संविधान सभा में 306-ए प्रस्तुत किया, जो बाद में 370 बना। इस तरह से जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिल गए। 

जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा है। भारत के अन्य राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। वित्तीय आपातकाल लगाने वाली अनुच्छेद 360 भी जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होती। भारत की संसद जम्मू-कश्मीर में रक्षा, विदेश मामले और संचार के अलावा कोई अन्य कानून नहीं बना सकती। यहां धारा 356 लागू नहीं होती, राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है।  

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