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अच्छे पहलवान की पहचान अखाड़े में नहीं जिंदगी में होवे है।
मैंने पहलवानी जरूर छोड़ी है पर लड़ना नहीं भूला हूं…मैं जिंदा हूं।
मैंने जब ”सुल्तान” फिल्म देखी थी तो ये संवाद कानों से होकर दिल में उतर गए थे। सोच रखा था इन संवादों को अपनी किसी विशेष खबर के लिए कभी ना कभी जरूर उपयोग करूँगा। लखनऊ की पत्रकारिता की एक ऐसी ही शख्सियत जिसने इन संवादों को अपने जीवन में चरितार्थ कर लिया है उसका नाम है ”संजोग वॉल्टर”। उन्होने साबित कर दिया है कि महा योद्धा कभी हारते नहीं है।
लखनऊ की पत्रकारिता में संजोग वॉल्टर का नाम किसी वीर योद्धा से कम नहीं है उन्होने दो-दो बार कैंसर जैसी घातक बीमारी को मात दी है वही राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त समिति के हाल ही में हुए चुनाव में भी रिकार्ड तोड़ मतों से जीत हासिल कर ये साबित कर दिया है की अगर आपकी विल पॉवर मजबूत है तो आप को जीतने से कोई नहीं रोक सकता। मैं संजोग भाई को तब से जनता हूँ जब मैंने पत्रकारिता की दुनियां में कदम रखा था और वो राजधानी में पत्रकारिता के स्टार थे।
आज तक जैसे ब्रांड में ताबड़तोड़ ब्रेकिंग खबरे देने में हमेशा आगे रहते थे। लीडिंग अख़बार अपनी सुबह की मीटिंग में यही चर्चा करते की फला ख़बर जो आजतक पर चली थी वो हमसे कैसे छूट गई। एक बार की बात है मैं उनसे फील्ड पर मिला तो उन्होने मुझसे कहा की पत्रकारिता में दूरदर्शिता रखना बहुत जरूरी है वो आज भी मैं बनाये हुए हूँ। उन्होने मुझे हमेशा अपने भाई जैसा प्यार दिया और आज भी उनका आशीर्वाद मुझ पर बना हुआ है।
मुझे आज भी वो दिन अच्छे से याद है तारीख थी 11 अगस्त 2017। केजीएमयू के डॉक्टरों ने लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार संजोग वॉल्टर भाई का सफलतापूर्वक ऑपरेशन किया था । सुबह 10 बजे शुरू हुआ मेजर ऑपरेशन शाम 7 बजे तक चला था । डॉ की टीम ने काफी जटिल आपरेशन करके वॉटर भाई के परिवार को राहत दी थी। वे केजीएमयू के प्लास्टिक सर्जरी वार्ड में भर्ती हुई थे ।
नवम्बर 2015 में भी “संजोग वॉल्टर” का ओरल कैंसर का ऑपरेशन केजीएमयू के शताब्दी में हुआ था। बड़ी जंग जीत गए कैंसर जैसी बीमारी को हराना बड़ी बात है। बहुत से पत्रकार और परिचित लोग हालचाल लेने अस्पताल भी पहुंचे थे। दोनों ऑपरेशन में जो पत्रकार संगठन पत्रकारों के हित का दावा करते हैं, किसी ने भी संजोग वॉल्टर की सुध नहीं ली थी। अब जीत के बाद से विरोधी भी संजोग वॉल्टर का लोहा मान गए। समिति के सदस्य होने के नाते पत्रकारों की समस्याओं को प्रमुखता से समाधान करने का भी प्रण लिया है।
“संजोग वॉल्टर ” के लिए क्यों है ऐतिहासिक जीत
वैसे तो पत्रकारिता का धर्म मानव कल्याण और राष्ट्रिय हित है। “संजोग वॉल्टर ” ईसाई धर्म से आते है उनके बिरादरी के चंद लोग ही राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार है वो भी संख्या में चार लोग ही हैं।
“संजोग वॉल्टर ” की लोक प्रियता ही है जो उनको राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव में 170 मत मिलते है और सदस्य के चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी जीत दर्ज करते है। कुछ पत्रकार अगर इनके साथ थे तो कुछ ने कहा की हम आप को वोट नहीं देंगे उसके बावजूद बड़ी जीत हासिल कर विरोधियों को करारा जवाब भी दे दिया है। संजोग वॉल्टर के दो बड़े ऑपरेशन हुए इस हालत में इनका साथ किसी ने नहीं दिया था।
राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव में सबने “संजोग वॉल्टर ” के हौसले को सराहा जिस व्यक्ति को बोलने में समस्या होती है और वो ऐसे हालात में चुनाव लड़ रहा है। हौसला देखते हुए राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के सभी सदस्यों ने उनका साथ दिया। वही कई चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी एक वोट अपने लिए तो दूसरा वोट “संजोग वॉल्टर “के लिए मांग रहे थे। जिनकी मान्यता नहीं थी वे भी अपने स्तर से “संजोग वॉल्टर ” की जीत को सुनिश्चित कर रहे थे।
क्यों कहते है “रातों का राजा”
कुछ साल पहले टीवी पत्रकारिता में “संजोग वॉल्टर ” को पत्रकारिता जगत के लोग “रातों का राजा” कहा करते थे , क्योकि ज्यादातर खबरे रात में ही आज तक पर ब्रेक करा देते थे वाल्टर।
खबर लोगो को तब पता चलती थी जब ” आज तक ” पर ब्रेक होती थी। अख़बारों से भी खबर छूट जाती थी। मीटिंग में जवाब तलब होता था की यह खबर कैसे छूटी ? सभी चैनलों के हेड ऑफिस से फोन आता था कि देखो आज-तक पर क्या चल रहा है। खबर भेजो। हर दूसरे तीसरे दिन यही हाल होता था।
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