एंटीबायोटिक प्रतिरोध: एक खामोश महामारी

एंटीबायोटिक प्रतिरोध: एक मौन महामारी

दुनिया भर में, एक खतरनाक मौन महामारी तेज़ी से फैल रही है – एंटीबायोटिक प्रतिरोध (AMR)। यह एक ऐसी समस्या है जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है, लेकिन इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। भारत, विशेष रूप से, इस समस्या के केंद्र में है, जहाँ दुनिया के एक चौथाई से अधिक एंटीबायोटिक्स का सेवन होता है और हर साल एएमआर से 300,000 से अधिक मौतें होती हैं। इसके अलावा, हर साल 10 लाख अतिरिक्त मौतें ऐसी हैं जिनमें सुपरबग्स एक कारक हैं। एक मामूली सा घाव भी, यदि एंटीबायोटिक्स काम न करें, तो जानलेवा हो सकता है। नवजात शिशुओं में भी संक्रमण तेज़ी से बढ़ रहे हैं, जिनका कोई इलाज नहीं है। यह स्थिति कैसे पैदा हुई? आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध के कारण

नये एंटीबायोटिक्स की कमी

पिछले कुछ दशकों से कोई नया एंटीबायोटिक विकसित नहीं हुआ है। प्रारंभिक एंटीबायोटिक्स आसानी से मिल जाते थे, लेकिन अब जनसंख्या इनके प्रति प्रतिरोधी हो गई है। फार्मास्युटिकल कंपनियां अब एंटीबायोटिक्स की तुलना में कैंसर रोधी दवाओं पर अधिक शोध और विकास में निवेश कर रही हैं। दुनिया भर में प्राथमिकता वाले बैक्टीरिया के लिए नैदानिक विकास में केवल 27 दवा उम्मीदवार हैं जो एएमआर से निपटने के लिए हैं। इनमें से अधिकांश असफल हो जाएंगे और कैंसर के उपचार में 1,600 की तुलना में स्वीकृत नहीं होंगे। एएमआर प्रतिरोध पर ध्यान केंद्रित करने वाले केवल 3,000 सक्रिय शोधकर्ता हैं, जबकि कैंसर अनुसंधान के लिए 46,000 समर्पित हैं।

बाजार में विकृति

एंटीबायोटिक्स के विकास और उनके मूल्य निर्धारण में एक बड़ी विकृति है। यदि एक फार्मास्युटिकल कंपनी एंटीबायोटिक्स में बहुत पैसा लगाती है, तो उसे 10 साल लग सकते हैं। लेकिन जैसे ही पेटेंट समाप्त होता है, जेनेरिक विकल्प उपलब्ध हो जाते हैं, जिससे कंपनियों के पास आरएंडडी खर्चों को वसूल करने के लिए सीमित समय रहता है। इसका मतलब है कि एंटीबायोटिक्स को बहुत महँगा रखना पड़ता है, जिससे ये केवल सीमित लोगों के लिए ही उपलब्ध होते हैं। यह आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है।

अनुचित उपयोग

लोगों के द्वारा एंटीबायोटिक्स का अनुचित उपयोग भी एक बड़ा कारण है। छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी लोग स्वयं एंटीबायोटिक्स लेते हैं या आसानी से डॉक्टर से पर्ची बनवा लेते हैं। सरकार को इस पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए। कोविड-19 महामारी के दौरान, दस में से सात लोगों को बिना किसी आधार के एज़िथ्रोमाइसिन दिया गया था, भले ही उनमें बैक्टीरिया का संक्रमण न हो।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध से निपटने के उपाय

जागरूकता बढ़ाना

एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बारे में जागरूकता बढ़ाना बहुत जरूरी है। लोगों को एंटीबायोटिक्स के अनुचित उपयोग के खतरों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। सरकार को इस दिशा में प्रयास तेज करने चाहिए।

शोध और विकास में निवेश बढ़ाना

एंटीबायोटिक्स के शोध और विकास में निवेश को बढ़ाया जाना चाहिए। सरकार को फार्मास्युटिकल कंपनियों को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि वे नए एंटीबायोटिक्स के विकास में अधिक निवेश करें।

बेहतर निगरानी और नियंत्रण

एंटीबायोटिक प्रतिरोध पर बेहतर निगरानी और नियंत्रण की आवश्यकता है। सरकार को एंटीबायोटिक्स के उपयोग और प्रतिरोध पैटर्न की निगरानी के लिए एक प्रभावी प्रणाली स्थापित करनी चाहिए।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध के प्रभाव

एंटीबायोटिक प्रतिरोध के प्रभाव विनाशकारी हो सकते हैं। सामान्य संक्रमण भी जानलेवा हो सकते हैं, क्योंकि इन्हें ठीक करने के लिए कोई एंटीबायोटिक उपलब्ध नहीं होगी। यह स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर एक भारी बोझ डालता है और आर्थिक रूप से भी नुकसानदायक है।

भविष्य की चुनौतियाँ

अगर एंटीबायोटिक प्रतिरोध पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह एक वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल बन सकता है। इसे रोकने के लिए एक संयुक्त वैश्विक प्रयास की आवश्यकता है जिसमें सरकारों, फार्मास्युटिकल कंपनियों और वैज्ञानिकों का सहयोग शामिल हो।

निष्कर्ष

एंटीबायोटिक प्रतिरोध एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य समस्या है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और व्यक्तियों द्वारा समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।

मुख्य बातें:

  • एंटीबायोटिक प्रतिरोध एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य समस्या है जिससे लाखों लोग प्रभावित हैं।
  • नए एंटीबायोटिक्स के विकास में कमी है।
  • एंटीबायोटिक्स का अनुचित उपयोग समस्या को और बढ़ा रहा है।
  • सरकार को एंटीबायोटिक्स के शोध और विकास को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बारे में जन जागरूकता फैलाना बहुत महत्वपूर्ण है।

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