मानवाधिकार पर आलोचनाओं का ‘प्रतिघात’ : धनखड़ का कड़ा बयान

भारत की मानवाधिकार स्थिति पर लगातार उठ रहे सवालों और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर देश की छवि खराब करने की कोशिशों के बीच उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक कड़ा बयान दिया है। उन्होंने देश में मानवाधिकारों को लेकर कुछ असामाजिक ताकतों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों को “देश की छवि खराब करने” की कोशिश बताते हुए इनके खिलाफ “प्रतिघात” करने की जरूरत बताई है।

“प्रतिघात” की आवश्यकता

धनखड़ ने शुक्रवार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस समारोह में कहा कि कुछ “दुष्ट ताकतें” भारत को “बुरे रंग” में दिखाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ये ताकतें अंतर्राष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठाने के लिए एक “दुष्ट रणनीति” अपना रही हैं। उन्होंने इस तरह की शक्तियों को बेअसर करने की आवश्यकता बताते हुए “प्रतिघात” यानी “जवाबी हमला” शब्द का प्रयोग किया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि ये ताकतें दुनिया के देशों को रैंकिंग देने के लिए “सूचकांक” बनाती हैं और भारत को “बुरी तरह से पेश” करती हैं। उन्होंने देश की भूख सूचकांक में खराब रैंकिंग का जिक्र करते हुए कहा कि कोविड महामारी के दौरान सरकार ने जाति या धर्म के भेदभाव के बिना 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया था।

भागलून, आपातकाल और 1984 के दंगे

धनखड़ ने “ह्यूमन राइट्स” को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली आलोचनाओं के जवाब में भारतीय इतिहास के अंधकारमय पलों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विभाजन, आपातकाल और 1984 के सिख विरोधी दंगे “स्वतंत्रता की नाजुकता” के “गंभीर स्मरण” हैं। उन्होंने कहा कि भारत को “सर्वदेशीय ताकतों” द्वारा “सिखाया” जाने की जरूरत नहीं है और ये लोग भारत को “मानवाधिकारों पर प्रवचन” नहीं दे सकते।

“प्रतिघात” की रणनीति

उपराष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत किसी भी तरह से मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले लोगों को बचाने में शामिल नहीं है। उन्होंने कहा कि देश का मानवाधिकार रिकॉर्ड बेहतर है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह बेहतर दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “प्रतिघात” का मतलब ये नहीं है कि भारत मानवाधिकारों के उल्लंघन को स्वीकार करेगा बल्कि इस मुद्दे पर दुनिया को अपनी बात रखने के लिए सक्रियता बढ़ाएगा।

निष्कर्ष

उपराष्ट्रपति के बयान ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की मानवाधिकार स्थिति पर उठाई जा रही आलोचनाओं को नजरअंदाज नहीं करेगा और अपनी रक्षा के लिए “प्रतिघात” की रणनीति अपनाएगा। इस बयान के बाद ये देखना दिलचस्प होगा कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत अपनी बात रखने के लिए कौनसी रणनीति अपनाता है। कुल मिलाकर यह स्पष्ट हो गया है कि भारत मानवाधिकारों पर होने वाली “निराधार” आलोचनाओं के आगे “चुप नहीं रहेगा” और देश की छवि खराब करने की कोशिश करने वाली शक्तियों का “जवाब” देगा।

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