राहुल गांधी: संविधान की रक्षा, सामाजिक न्याय और हाशिए के आवाज़

भारतीय संविधान की रक्षा करना राष्ट्र का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है: राहुल गांधी ने ‘संविधान सम्मान सम्मेलन’ में यह बात कही। उन्होंने कहा कि संविधान और मनुस्मृति के बीच का वैचारिक संघर्ष पीढ़ियों से चला आ रहा है। मनुस्मृति को मूलतः असंवैधानिक बताते हुए, उन्होंने केंद्र सरकार पर संविधान को कमजोर करने का आरोप लगाया है। इस लेख में हम राहुल गांधी के भाषण के मुख्य बिंदुओं और उनके द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करेंगे।

संविधान और मनुस्मृति: एक ऐतिहासिक संघर्ष

राहुल गांधी ने अपने भाषण में स्पष्ट रूप से कहा कि भारत का संविधान, हालाँकि 1949-50 में औपचारिक रूप से लिखा गया था, परन्तु इसके पीछे का दर्शन हजारों साल पुराना है। यह दर्शन महात्मा बुद्ध, गुरु नानक, बाबा साहेब आम्बेडकर, बिरसा मुंडा, नारायण गुरु और बसवन्ना जैसे महान विचारकों से प्रभावित है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन महान नेताओं के प्रभाव के बिना संविधान का अस्तित्व में आना संभव नहीं था। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आज इस प्रगतिशील सोच पर खतरा मंडरा रहा है और संविधान की रक्षा करना देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। यह वैचारिक संघर्ष आज भी जारी है, जहाँ संविधान के समावेशी और समानतावादी आदर्शों को मनुस्मृति के वर्णाश्रम व्यवस्था और सामाजिक पदानुक्रम के विचारों से लगातार चुनौती मिल रही है।

संविधान की रक्षा की आवश्यकता

राहुल गांधी ने इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित अन्य लोगों द्वारा संविधान को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया जा रहा है। उनका मानना है कि इन नेताओं का लक्ष्य संविधान को कमजोर करना और नष्ट करना है, लेकिन वे ऐसा नहीं होने देंगे। यह कथन वर्तमान सरकार की नीतियों और संस्थानों के कामकाज को लेकर उनकी गंभीर चिंता को दर्शाता है। उन्होंने जनता से संविधान की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया।

सामाजिक असमानता और जाति जनगणना

राहुल गांधी ने देश में बढ़ती असमानता पर चिंता व्यक्त की, जहाँ केवल 1% आबादी के पास 90% आबादी के अधिकारों पर नियंत्रण है। कांग्रेस पार्टी की जाति जनगणना की मांग को दोहराते हुए, उन्होंने कहा कि यह बढ़ती असमानता को दूर करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, जाति जनगणना से हाशिये पर स्थित समुदायों की वास्तविक स्थिति का पता चलेगा और उनके कल्याण के लिए उचित नीतियाँ बनाई जा सकेंगी। इसके साथ ही उन्होंने आरक्षण में 50% की सीमा को हटाने की भी वकालत की है।

हाशिये के समुदायों का इतिहास मिटाया जा रहा है

गांधी जी का यह भी मानना है कि हाशिये के समुदायों का इतिहास मिटाया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था में आदिवासी और पिछड़े समुदायों के प्रतिनिधित्व की कमी पर भी उन्होंने चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि स्कूली पाठ्यक्रम में आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्गों के इतिहास, संस्कृति और योगदान के बारे में शायद ही कोई अध्याय है। दलितों का केवल अस्पृश्यता के संदर्भ में उल्लेख है, और ओबीसी, किसानों और मजदूरों का योगदान बड़े पैमाने पर उपेक्षित है। यह शैक्षिक व्यवस्था में सुधार करने और हाशिये के समुदायों के योगदान को उजागर करने की आवश्यकता पर ज़ोर देता है।

संस्थागत भेदभाव और राजनीतिक शक्ति का असंतुलन

राहुल गांधी ने नौकरशाही, मीडिया, कॉरपोरेट नेतृत्व, न्यायपालिका और मनोरंजन क्षेत्रों में इन समुदायों के प्रतिनिधित्व की कमी की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर उन्हें उनकी हकदार शक्ति और अवसरों से दूर रख रही है। उन्होंने कहा कि अगर 100 रुपये का आवंटन हो, तो दलित अधिकारियों को केवल 1 रुपया मिलता है, और आदिवासी अधिकारियों को इससे भी कम। यह व्यापक संस्थागत भेदभाव की ओर इशारा करता है जो सामाजिक और आर्थिक समानता में बाधा डालता है।

आदिवासियों का अन्याय और भाजपा पर आरोप

उन्होंने भाजपा पर आदिवासियों को “वनवासी” कहकर संबोधित करने का आरोप लगाया, जिसे उन्होंने उन्हें हाशिए पर धकेलने का प्रयास बताया। गांधी ने कहा कि आदिवासी इस भूमि के मूल निवासी हैं और उन्हें इसके संसाधनों पर पहला अधिकार है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को संसद के उद्घाटन और राम मंदिर के उद्घाटन जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयोजनों से दूर रखे जाने का आरोप लगाते हुए भाजपा पर उनकी आदिवासी पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव करने का आरोप लगाया है। यह आदिवासी समुदायों के साथ भेदभाव और उनके अधिकारों की उपेक्षा के बारे में एक गंभीर आरोप है। उन्होंने भाजपा पर मीडिया, चुनाव आयोग, CBI, ED, आयकर और नौकरशाही सहित प्रमुख संस्थानों पर नियंत्रण करने का भी आरोप लगाया है।

निष्कर्ष:

राहुल गांधी का भाषण भारत में सामाजिक न्याय और समानता के मुद्दों पर केंद्रित था। उन्होंने संविधान की रक्षा, जाति जनगणना की आवश्यकता, संस्थागत भेदभाव और हाशिये पर स्थित समुदायों के अधिकारों की वकालत की। उनके भाषण में उठाए गए मुद्दे गंभीर हैं और इन पर गौर करने की आवश्यकता है।

टेकअवे पॉइंट्स:

  • मनुस्मृति संविधान विरोधी है।
  • संविधान की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है।
  • जाति जनगणना से सामाजिक असमानता को कम करने में मदद मिलेगी।
  • संस्थागत भेदभाव को दूर करना होगा।
  • हाशिये के समुदायों को उनके अधिकार और अवसर प्राप्त करने चाहिए।

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