जानिये इन मासूम बच्चों को किस गुनाह की मिल रही है सजा !

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झांसी। बच्चे भगवान का रूप होते हैं, उनकी मुस्कराहट को ईश्वर की कृपा माना है। बच्चों के चंचल स्वभाव के कारण उनकी हर गलती को आनंद का हिस्सा माना जाता है। ऐसे बेनुगाह फितरत वाले चार मासूमों को मानो वसीयत में ही जेल मिली है। कारागार में बंद चार महिलाओं के साथ उनके मासूम बच्चे भी यहां पल रहे हैं। इनमें से स्कूल भी जाता है, जिसका सारा खर्च और जिम्मेदारी जेल प्रशासन उठाता है।

जिला कारागार में इस समय करीब 900 से अधिक कैदी हैं। करीब 45 महिला बंदी हैं, इनमें तीस से अधिक दहेज के मामले मेें सजा काट रही हैं। इन्हीं में से चार महिलाओं के साथ उनके बच्चे को अपना घर आंगन मान कर यहीं पल रहे हैं। एक बच्चा पांच साल का है, जिसका दाखिला जेल प्रशासन ने शहर के एक माने हुए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में कराया है। एक सिपाही रोज उसे स्कूल छोड़ने और वहां से लेने जाता है। उसकी ड्रेस, किताब-कॉपियों से लेकर स्कूल से मिलने वाले प्रोजेक्ट में आने वाले खर्चे को जेल प्रशासन वहन करता है। एक बच्चा डेढ़ साल का तो एक नौ महीने का है। एक बच्चा ऐसा भी है, जिसने जेल में ही पहली बार अपनी आंखें खोली थीं। सवा महीने के इस बच्चे का जन्म सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों ने कराया था। यही बच्चे नहीं अभी करीब चार बच्चे और जेल की चारदीवारी में अपनी आंखें खोलेंगे।

मां के साथ जेल में रह रहे इन बच्चों का जाने की किस गुनाह की सजा मिल रही है। इनसे मिलने न तो उनके परिजन आते हैं और न ही सगे संबंधी। जेल में बंद अन्य महिलाएं उन्हें अपना दुलार लुटाती हैं। कोई पढ़ाता है तो कोई उनके साथ खेलता है। जेल के कर्मचारी उनकी चंचलता पर मोहित होकर कभी नए कपड़े तो कभी खिलौने दे जाते हैं।

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार जेलों में महिला बंदियों की संख्या अधिक है। हाल ही में केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्रालय ने प्रदेश में महिला बंदियों और उनके बच्चों की स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है। स्वास्थ्य, पोषण, पुनर्वास, स्वच्छता आदि बिंदुओं पर केंद्र सरकार ने रिपोर्ट ली है। समय-समय पर अफसर निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट भी तैयार करते हैं। इसमें किसी भी प्रकार की कोई कोताही न बरती जाए, इसके लिए भी विशेष निर्देश दिए गए हैं।

स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान
जेल मैन्युअल के मुताबिक जेल में महिला बंदियों और बच्चों की देखभाल हो रही है। टीकाकरण, पोलियो ड्राप्स, पुष्टाहार और स्वास्थ्य परीक्षण के जरिए बच्चों की सुरक्षा का पूरा ध्यान है। 16 साल की आयु तक के बच्चे ही मां के साथ रह सकते है। बाद में परिजनों के सुपुर्द या बाल सुधार गृह में भेजा जाता है। इसके अलावा, जेल प्रशासन सप्ताह में एक बार बच्चों की मेडिकल जांच भी कराते हैं।

उंगली पकड़कर नियम कानून का पालन
मां की गोद में या अंगुली पकड़ बच्चा भी जेल के कायदे कानून निभाता है। मां काम करती है तो वह भी उसके साथ होता है। मां जब सलाखों (बैरक) के अंदर जाती है तो वह भी साथ जाता है। इतना ही नहीं, अन्य कैदियों का भी बच्चों को प्यार मिलता है।

मां के बिना नहीं रह सकते
समय-समय पर जेल का निरीक्षण कर खानपान व्यवस्था परखी जाती है। पांच साल से कम उम्र के ये बच्चे मां के बिना नहीं रह सकते। साथ ही इनके परिवार में कोई सदस्य नहीं है जो इन्हें संभाल सके। ऐसे में बाहर यदि किसी को इनकी देखभाल के लिए दिया भी जाए तो वो भी किसी सजा से कम नहीं होगा।
मोहम्मद आबिद
सदस्यध्मजिस्ट्रेट, बाल कल्याण समिति

पूरा ध्यान रखता जेल प्रशासन
मजबूरी में ये बच्चे मां के साथ जेल में हैं। जेल प्रशासन की ओर से इनका पूरा ध्यान रखा जाता है। इन्हें खेलने के लिए खिलौने और पीने के लिए दूध भी उपलब्ध कराया जाता है। एक बच्चे की पढ़ाई का पूरा ख्याल भी जेल प्रशासन द्वारा रखा जा रहा है। बच्चों का खर्चा भी जेल प्रशासन की तरफ से उठाया जाता है।
राजीव शुक्ला, वरिष्ठ जेल अधीक्षक

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