प्रयागराज के कुंभ मेले में कल्पवासियों का कल्पवास शान्ति पूर्ण ढग से संपन्न हुआ

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कुम्भनगरी (प्रयागराज)। हजारों वर्षों से चली आ रही तीर्थराज प्रयाग में कल्पवास की परम्परा के अनुसार लाखों कल्पवासियों ने अपने एक माह के संकल्प और तपस्या को माघी पूर्णिमा के स्नान के साथ मंगलवार को पूर्ण किया। वहीं आज करीब डेढ़ करोड़ भक्तों ने संगम में डुबकी लगाई है।  कल्पवासियों ने कहा कि इस कुंभ की तरह पहले कभी व्यवस्था देखने को नहीं मिली। सभी व्यवस्थाएं उत्तम रहीं। तप, त्याग व साधना के बाद कल्पवासियों ने माघी पूर्णिमा मंगलवार के दिन कल्पवास का आखिरी स्नान कर विधि विधान के साथ पूजा पाठ सम्पन्न किया। साथ ही दान पूर्ण भी किया। पौषी पूर्णिमा के दिन कुम्भ मेले में एक माह का लाखों श्रद्धालुओं ने कल्पवास किया। कल्पवास के दौरान गृहस्थों को अल्पकाल के लिए शिक्षा और दीक्षा दी जाती है।इस दौरान जो भी गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आता है, वह कुटी में रहता है। इस दौरान दिन में एक बार भोजन किया जाता है तथा मानसिक रुप से धैर्य, अहिंसा भक्तिभावपूर्ण रहा जाता है।
संगम तट पर वास करने वाले को सदाचारी, शान्त मन वाला तथा जितेन्द्रिय रहना पड़ता है। कल्पवास कर रहे प्रतापगढ़ जिले के राजबहादुर शुक्ल ने बताया कि माघी पूर्णिमा के दिन माघ माह की अंतिम तिथि होती है। माघी पूर्णिमा के दिन स्नान कर दान करने का बड़ा महत्व है। इसलिए देश विदेश से लाखों करोड़ों लोग डुबकी लगाने के लिए प्रयागराज के संगम तट पर पधारे और संगम स्नान कर के दान पूर्ण किया। माघ नक्षत्र भी है। इसलिए गंगा स्नान करने के बाद गंगा रेती पर निवास करने का बड़ा महत्व है। कल्पवासी शिव नारायण शुक्ल ने बताया कि हम 22 वर्षों से गंगा किनारे कल्पवास कर रहे हैं। कठोर संकल्प लेकर कल्पवास किया जाता है। लेकिन इस वर्ष जैसा गंगा का निर्मल जल कभी भी नहीं मिला।
बताया कि इस कुंभ जैसी व्यवस्था भी कभी नहीं मिली। कल्पवास का यही है कि पौष पूर्णिमा से संकल्प लेकर माघी पूर्णिमा तक गंगा की रेती पर निवास किया जाता है। एक ही घाट पर स्नान और एक ही शिविर में निवास करके रात-दिन यहीं पर रहना होता है। साधना के साथ कथा वार्ता भी किया जाता है गंगा स्नान के बाद थोड़ा सा भोजन, उसके बाद विश्राम, फिर कथा वार्ता किया जाता है। कल्पवासी सचितानन्द द्विवेदी ने बताया कि कल्पवास करने के लिए नियम तो बहुत हैं। यहां पर आ करके दिन में सिर्फ एक समय भोजन किया जाता है। शाम के समय कुछ फलहार किया जाता है। भोर में ही उठ कर स्नान किया जाता है। गंगा स्नान के बाद संकल्प के अऩुसार पूजा पाठ किया जाता है। गंगा आरती किया जाता है। इसके साथ ही कोई कल्पवासी एक बार स्नान करता है, कोई दो बार तो, कोई कोई तीन-चार बार भी कर लेता है। सभी देवी देवताओं का चिन्तन करते हुए सुबह शाम आरती होती है। लोककल्याण की प्रार्थना ले करके कल्पवास होता है। इसके साथ ही प्रतापगढ़ जिले के कल्पावासी अगवन्ती मिश्रा, आजमगढ़ जिले के शिवाराम, बस्ती जिले के सुरेश मिश्रा आदि ने भी कल्पवास के महत्व के बारे में चर्चा करते हुए कुम्भ में हुई व्यवस्था का गुणगान किया

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