अधिकारियों की सरपरस्ती में हो रहा था फर्जी टिकटों से रोडवेज बसों का संचालन, सरकार को लगाया करोड़ो का चूना, पढ़े पूरी रिपोर्ट

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लखनऊ। रोडवेज अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से इस अवैध संचालन में रोडवेज के एआरएम, टीएस, एटीआइ, सीनियर फोरमैन, डीजल बाबू, टाइम कीपर सहित अन्य कर्मचारियों की संलिप्तता है और उन्हें हर माह बंधी रकम बतौर हिस्सा दी जाती थी। यह तथ्य एसटीएफ की छानबीन में सामने आए हैं। गिरोह का संचालन ग्रुप नाम से होता था और उनके अपने कोड वर्ड थे। एसटीएफ ने डीजीपी मुख्यालय को भेजी अपनी रिपोर्ट में पूरे प्रकरण की विस्तृत जानकारी देते हुए परिवहन विभाग के अधिकारियों की भूमिका की जांच कराकर कार्रवाई की सिफारिश की है। जल्द रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी।

कमाई का बंदरबांट माफिया और रोडवेज के कर्मचारी
अलीगढ़ क्षेत्र में स्थानीय माफिया ने करीब चार दर्जन रोडवेज बसों पर कब्जा कर रखा था और मनमाने ढंग से उनका संचालन करते थे। दशक भर से चल रहे इस टिकट घोटाले की भनक मुख्यालय तक थी, लेकिन हर बार मामला दबा दिया जाता था। फर्जी टिकटों से होने वाली कमाई का बंदरबांट माफिया और रोडवेज के कर्मचारी आपस में करते थे। एमडी पी गुरु प्रसाद ने पहले एसटीएफ से जांच करवाई और फिर निगम की कमिटी बनाकर पूरे मामले का पर्दाफाश कर दिया। एसटीएफ की रिपोर्ट में कुछ माफियाओं के भी नाम हैं, जिन पर शासन कार्रवाई करेगा।

हर माह ऐसे होता था लाखों का घोटाला
अलीगढ़ में देवेंद्र सिंह व मेघ सिंह सहित 11 चालक-परिचालक व बाउंसरों को गिरफ्तार कर लंबे समय से संचालित हो रहे फर्जी टिकट माफिया का राजफाश किया था। देवेंद्र व मेघ सिंह लंबे समय से हाथरस में तैनात थे और अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, सादाबाद रूट पर करीब 50 बसों में फर्जी टिकटों का वितरण कर हर माह लाखों का घोटाला कर रहे थे। गिरोह ने राज्य परिवहन निगम की इलेट्रॉनिक टिकटिंग मशीन (ईटीएम) में छेड़छाड़ कर सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लगाया है। एसटीएफ ने अपनी रिपोर्ट में गिरोह द्वारा संचालित मथुरा डिपो की 13, हाथरस डिपो की 10 व बुद्धविहार डिपो की छह बसों का ब्योरा भी दिया है। बताया गया है कि आगरा रीजन की मथुरा डिपो की मथुरा से अलीगढ़ रूट पर 14 बसें तथा आगरा से अलीगढ़ रूट पर करीब 16 बसें ठेकेदारों द्वारा चलवाई जा रही थीं।

यात्रियों को टिकट की फोटोकापी दी जाती थी
इन बसों में यात्रियों को टिकट की फोटोकापी दी जाती थी। बसों में एक तरफ की यात्रा में औसतन 100 यात्री सवार होते थे, जिनमें 20 से 25 को ही सही टिकट दिया जाता था। ग्रुप नाम से कुख्यात गिरोह द्वारा संचालित बसों में प्रबुद्ध यात्रियों को ओके टिकट/प्लेन पेपर यानी सही टिकट दिया जाता था, जबकि अन्य यात्रियों को डब्ल्यू टी यानी ईटीएम से स्टेज वाईस रिपोर्ट की कापी थमा दी जाती थी, जिसमें किराया अंकित होता था। कई बार पुरानी टिकटों का भी इस्तेमाल किया जाता था। मथुरा निवासी महावीर जाट व रामवीर जाट ग्रुप के मास्टरमाइंड हैं। यही बसों को डिपो से निकलवाकर उनका संचालन करते थे। इन बसों पर चालक-परिचालक के बजाए ग्रुप के सदस्य सवार हो जाते थे। इनके अलावा अशोक, लोकेश पंडित, अनूप जाट व रामहंस ग्रुप के खास सदस्य हैं।

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