महात्मा गांधी ने इस पत्रिका में लिखा था, मंदिरो को तोड़ कर बनाई गई मस्जिदे…

 

डेस्क। देश इस समय धर्म की राजनीतिक खींचतान में उलझा हुआ दिखाई दे रहा है। पहले धार्मिक हिंसाओं से जूझता भारत अब राजनीतिक अवबंदो में जकड़ा जा चुका है। सभी राजनीतिक पार्टी इस संवेदनशील मुद्दे को आग देकर अपना उल्लू सीधा करने में लगी हैं। कोर्ट में लगातार इससे जुड़े मामले फव्वारे की तरह बौछार मार रहें हैं। ज्ञानवावी से लेकर शाही ईदगाह और अजेमर शरीफ हो या ताजमहल ये सभी आज कड़घरे में जा खड़े हुए हैं। 

हर कोई इनको अपने धर्म का अटूट हिस्सा बता रहा है। कोई इतिहास को अपनी सत्यता का प्रमाण कह रहा है तो किसी का मानना है कि खोज होनी चाहिए, इतिहास नहीं प्रत्यक्ष जो आएगा वही प्रमाण होगा। इसी कड़ी में अदालतों और ASI पर बारंबार दवाब भी बनाया जा रहा है। पर क्या आप जानते हैं कि भारत में धार्मिक खींचतान और मेरी जगह-मेरा मजहब की लड़ाई बहुत पुरानी है। भारत-पाक विभाजन भी इसी का प्रमाण है। ग़दर की लड़ाई भी धर्म और मेरी जगह-मेरा राज्य का ही परिणाम स्वरूप थी। इस कड़ी में आज हम धार्मिक सियासत को लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करेंगे। 

उनके एक मासिक पत्रिका ‘सेवा समर्पण’ में तस्वीर के साथ छपे लेख जिसका शीर्षक, “मंदिरों को तोड़ कर बनाई गईं मस्जिदें ग़ुलामी के चिन्ह।” बता दें इस लेख में ‘नवजीवन’ के 27 जुलाई 1937 के अंक का संदर्भ दिया गया था। महात्मा गांधी का यह लेख देश में बने इस माहौल के बाद लाइमलाइट में आया है। जानकारी के अनुसार महात्मा गांधी का यह लेख श्रीराम गोपाल ‘शरद’ के एक पत्र के जवाब में था। जिसमें बापू ने केंद्र में ‘मंदिरों को तोड़ कर बनाई गईं मस्जिदें ग़ुलामी की निशानी है’ इस मुद्दे को प्रदर्शित करने की कोशिश की थी।

जानिए इस लेख के केंद्र बिंदु

इसमें कथित रूप से महात्मा गांधी ने लिखा है कि “किसी भी धार्मिक उपासना गृह के ऊपर बल पूर्वक अधिकार करना बड़ा जघन्य पाप है। मुगलकाल में धार्मिक धर्मान्धता के कारण मुगल शासकों ने हिंदुओं के बहुत से धार्मिक स्थानों पर अधिकार जमा लिया था जो हिंदु धर्म के पवित्र आराधना स्थल भी थे। इनमें से बहुत से लूटपाट कर नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए और बहुत को मस्जिद का रूप में बदल दिया गया। उन्होंने आगे कहा कि मंदिर और मस्जिद यह दोनों ही भगवान की उपासना के पवित्र स्थान हैं और दोनों में कोई भेद नहीं है पर हिंदू और मुसलमान दोनों की ही उपासना परंपरा बिल्कुल अलग है।” “धार्मिक दृष्टिकोण से एक मुसलमान यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसकी मस्जिद में, जिसमें वह इबादत करता चला आ रहा है, कोई हिंदू कुछ ले जाकर धर दे। इसी तरह से एक हिंदू भी कभी यह सहन नहीं करेगा कि उसके मंदिर में, जहां वह बराबर राम, कृष्ण, शंकर, विष्णु और देवों की उपासना करता चला आ रहा है, कोई उसे तोड़कर मस्जिद बना दें।”

गांधी ने इसे बताया गुलामी का प्रतीक

“जहां पर ऐसे कांड हुए हैं वह चिह्न गुलामी के हैं। हिंदू-मुसलमान दोनों को चाहिए कि ऐसी जगहों पर जहां इस तरह के झगड़े हों रहे है दोनों पक्ष आपस में मिलकर तय कर लें। मुसलमानों के वह पूजन-स्थल जो हिंदुओं के अधिकार में हैं, हिन्दू उन्हें उदारतापूर्वक मुसलमानों को लौटा दें। इसी प्रकार से हिंदुओं के जो धार्मिक स्थल मुसलमानों के कब्जे में हैं, वे उन्हें खुशी-खुशी हिंदुओं को वापस सौंप दें। इससे आपसी भेदभाव तो नष्ट होगा ही साथ में हिंदू-मुसलमान में एकता बढ़ेगी जो भारत जैसे धर्म प्रधान देश के लिए वरदान  है।”

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