देश– महिलाओ के प्रति आरएसएस की सोच पर इस समय पूरे भारत मे चर्चा हो रही है। संघ प्रमुख मोहन भागवत कई बार महिलाओ को आगे पुरुषों के साथ लेकर चलने का मुद्दा उठा चुके हैं।
वही आरएसएस के स्थापना दिवस पर जब दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट को दो बार फ़तह करने वाली संतोष यादव को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया।
संघ का यह नया रूप देखकर सभी लोग चौंक गए हैं और राजनैतिक गलियारों में इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या वास्तव में अब आरएसएस की सोच बदल गई है। क्योंकि अभी तक आरएसएस का हिस्सा सिर्फ एक हिन्दू पुरुष हो सकता था और महिलाओ के लिए एक अन्य संगठन था।
आरएसएस प्रमुख ने जब विजयदशमी के दिन अपने भाषण की शुरुआत की ओर कहा कि महिलाओ को पुरुषों के बराबर आंकना चाहिए। हिन्दू धर्म मे दुर्गा देवी को शक्ति के रूप में पूजा जाता है। वही देश के विकास तभी सम्भव है जब पुरुष महिला समान रूप से काम करें।
उन्होंने यह भी कहा था कि सर्वत्र शक्ति का आधार शक्ति ही है। लेकिन आरएसएस की इस नीति पर अब कई सवाल उठ रहे हैं और आरएसएस की संस्था राष्ट्र सेविका समिति सुर्खियों में बनी हुई है।
वैसे तो आरएसएस की इस संस्था को आरएसएस ही कहा जाता है। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या अब आरएसएस अपनी मुख्य शाखा में महिलाओं की एंट्री पर लगे प्रतिबंध को हटाने की कवायद में लग गया है।
क्या अब वास्तव में आरएसएस महिलाओ को लेकर अपनी विचारधारा में बदलाव कर रहा है। विशेषज्ञ का कहना है कि अब आरएसएस को बदलवा स्वीकार करना है।
आरएसएस यह जान चुकी है कि देश मे अब महिलाओ और पुरुषों के मध्य कोई असमानता नही है और आज महिला अब पुरुष के साथ उसका आगे बढ़ रही है।
आज कोई ऐसा क्षेत्र नही है कि जहां महिलाएं अपनी धाक न जमाए हो। वही आरएसएस यदि आज के समय मे महिलाओ को एक अलग रूप से देखती है तो यह समाज मे आरएसएस की एक धूमिल छवि स्थापित करेगा।
शायद यही एक मूल कारण है कि आरएसएस अब महिलाओ को लेकर अपना विचार बदल रही है और अब आरएसएस पूर्णतः बदल रही है
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