ये 21वीं सदी। कवित्री आरती अरू पड़ा- किसी की दी हुई मुस्कान किसी के नाम कर जाऊं, रहे कर्जदार ना जिंदगी मैं बस इतना संवर जाऊं, वतन के काम आ जाए जो गर एक सांस भी मेरी, नहीं कोई भी गम होगा जो एक पल में ही मर जाऊं। वहीं डॉक्टर मान सिंह ने पढ़ा- हर बुराई का दहन हो खुशियां रहे सघन, तन के मिटें विकार सभी जन मन से रहें मगन, ऊंच-नीच का भेद मिटे और सब के मिले हृदय, जीवन सबका सतरंगी हो प्रेम की रहे लगन।
हास्य कवि डॉ. रामकिशोर वर्मा ने पढ़ा- है जालु तुम्हार बड़ा कर्रा तुम आगि लगावतु पानी मा, जो फंसे न माया के चक्कर उइ फंसे जाति परधानी मा। भारत सिंह परिहार ने पढ़ा रंग रोली मुबारक रहे आपकी, प्यारी बोली मुबारक रहे आपकी, सारा जीवन कटे प्रेम रंग खेलकर,ऐसी होली मुबारक रहे आपकी। अन्य कवियों में मनोज सरल, संजीव तिवारी, अमर पाल, जय कृष्ण पाण्डेय आदि रहे। अध्यक्षता राम दत्त रमन व उपाध्यक्ष राम बरन सिंह करुण रहे। संचालन भारत सिंह परिहार ने किया।
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