बसपा का गिरता ग्राफ: क्या मायावती का जादू खत्म हो रहा है?

बसपा का गिरता ग्राफ: क्या मायावती का जादू खत्म हो रहा है?

क्या आप जानते हैं कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जिसकी एक समय उत्तर प्रदेश में दबदबा हुआ करता था, आज एक गंभीर संकट का सामना कर रही है? हाल ही के उपचुनावों में बसपा को मिले मात्र 7% वोट पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा झटका हैं. यह सवाल खड़ा करता है कि क्या मायावती का जादू अब खत्म हो रहा है? क्या दलित वोट बैंक में सेंध लग गई है? क्या बीजेपी और अन्य दलों ने बसपा को पीछे छोड़ दिया है? आइये, इस लेख में हम बसपा के गिरते जनाधार के पीछे छिपे कारणों पर गौर करते हैं।

दलित वोट बैंक में आई दरार

बसपा का कोर वोट बैंक हमेशा से ही दलित समाज रहा है. लेकिन अब लगता है कि इस वोट बैंक में बड़ी दरार आ गई है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव समाज के एक बड़े हिस्से ने नगीना सांसद चंद्रशेखर रावण का समर्थन किया है. दलितों का एक बड़ा वर्ग अब मायावती से नाखुश नजर आता है, और नए विकल्पों की तलाश में है. क्या यह बसपा के लिए एक अलर्ट है?

मायावती का नया फैसला: उपचुनावों से तौबा

हालात का आकलन करते हुए, बसपा प्रमुख मायावती ने ऐलान किया है कि बसपा अब कोई उपचुनाव नहीं लड़ेगी। उनके अनुसार चुनाव में व्यापक धांधली होती है, जो पार्टी को नुकसान पहुँचाती है. यह फैसला क्या पार्टी की मजबूरी है या एक रणनीतिक कदम? क्या इससे बसपा को फायदा होगा या नुकसान?

बीजेपी का बढ़ता दबदबा और बसपा का डूबता जहाज

बीजेपी पिछले कई चुनावों में अपनी रणनीति के जरिये दलित वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने में कामयाब हुई है. वहीं, बसपा का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है. 2012 में 80 सीटें और 2017 में भी प्रभावशाली प्रदर्शन के बाद बसपा का प्रदर्शन लगातार घटता गया. 2022 के विधानसभा चुनावों में केवल 12.83% वोट ही मिले और अब उपचुनावों में तो केवल 7% वोट ही मिले हैं. यह बहुत ही खराब प्रदर्शन है। क्या बसपा अपना खोया हुआ जनाधार वापस पा सकती है?

क्या बसपा का अस्तित्व ही खतरे में है?

बसपा के लगातार गिरते प्रदर्शन ने लोगों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बसपा का अस्तित्व ही खतरे में है? क्या मायावती अपने फैसलों और रणनीतियों में बदलाव करने के लिए तैयार हैं? क्या बसपा का भविष्य उजवल है या फिर यह पार्टी अब इतिहास का हिस्सा बन जाएगी? समय ही बताएगा!

Take Away Points

  • बसपा का वोट शेयर लगातार घट रहा है।
  • दलित वोट बैंक में पार्टी का प्रभाव कमजोर हुआ है।
  • मायावती का उपचुनाव न लड़ने का फैसला भी इसी हालात का नतीजा है।
  • बीजेपी और अन्य दलों ने बसपा को पीछे छोड़ा है।
  • बसपा के भविष्य को लेकर कई सवाल हैं।

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