नवरात्र के पांचवे दिन आज मां भगवती स्कंदमाता रूप पूजा अर्चना होगी । नवदुर्गाआं में पांचवी दुर्गा हैं-माता स्कंदमाता। स्कंदमाता के नाम से मां का पांचवा स्वरूप विख्यात है। क्योंकि दुर्गा मां के पांचवे स्वरूप को भगवान स्कंद की माता होने का अधिकार प्राप्त हुआ। भगवान स्कंद का एक दूसरा नाम कुमार कार्तिकेय भी है। जब देवता और असुरों का संग्राम हुआ था तो भगवान स्कंद ने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया था। इन्हें कुार तथा शक्तिधर के नाम से भी जाना जाता है। मयूर की सवारी करने कारण इन्हें मयूरवाहन भी कहा जाता है।
स्कंदमाता आकाश तत्व की द्योतक हैं। नवदुर्गाओं में एक ओर चार कन्याएं तथा बीच में स्कंदमाता हैं इसमें मातृभाव है। अर्थात् यह सभी तत्वों का मूल बिंदु है। एक ओ भू, जल, अग्नि और वायु में चार तत्व हैं। दूसरी ओर मन, बुद्धि , चित्त और अहंकार है। इस प्रकार तत्व लक्ष्य से यह आकाश जननी है। क्रिया लक्ष्य में आधार जगदात्री हैं। इसलिए प्रकृति का क्रियात्मक अंग है। , जो आकाश तत्वात्मक है।
स्कंदमाता मानव को सोचने समझने की शक्ति प्रदान करने वाली देवी है। सभी प्रकार के ज्ञान, रूचि, समझ और तर्क की अधष्इात्री देवी स्कंदमाता की पूजा त्रिदेवों सहित यक्ष, किन्नरों और दैत्यों ने भी की है। स्कंदमाता की अर्चना और ध्यान इस मंत्र के साथ करना चाहिए-
या देवी सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।।
नवरात्रि के पांचवे दिन मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन भक्त का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। स्कंदमाता की गोद में भगवान स्कंद सुशोषित होते हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। दाहिनी ऊपरी तीन भुजाओं से स्कंदमाता भगवान स्कंद की गोद में पकड़ी हुई हैं। दाहिनी ऊपर उठी हुई निचलीभुजा में वह कमल का पुष्प धारण की हुई हैं। वरमुद्रा में बांयी ऊपर वाली भुजा तथा निचली भुजा जो ऊपर उठी हुई हैं इनमें स्कंदमाता कमल का पुष्प धारण की हुई है। श्वेतवर्णी स्कंदमाता कमल के आसन पर विराजमान रहती है।
यही कारण है कि इन्हें पद्मासना देवी के नाम से भी जाना जाता है। इस चक्र में चंचल मन वाले भक्त की समस्त चित्तवृत्तियां विलुप्त हो जाती हैं। नवरात्रि पूजन के पांचवे स्कंदमाता की आराधना के पश्चात भक्त विशुद्ध चैतन्यस्वरूपा हो जाता है। वह सांसारिक मायामोह से मुक्त होकर पूर्णतः स्कंदमाता के स्वरूप में ही तल्लीन हो जाता है। स्कन्दमाता की आराधना के समय भक्त को ध्यान एकाग्रचित कर पूर्णतः सावधानी के साथ उपासना करनी चाहिए। समस्त वृत्तियों का त्याग कर भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।
सांसारिक सुख-दुख के साथ अर्थात् मृत्युलोक के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए स्कंदमाता की उपासना के फलस्वरूप भक्त की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा उसे सुख और शांति की सुखद अनुभूति होती है। स्कन्दमाता की उपासना के साथ ही साथ भगवान स्कंद की भी उपासना स्वयंमेव हो जाती है। देवी के नवों रूपों में मात्र स्कंदमाता को ही यह विशेषता प्राप्त है। अतः इनकी उपासना से भक्त को अतिरिक्त फल की प्राप्ति होती है।
इसलिए भक्त को इनकी उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्कंदमाता सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी हैं। अतः भक्तों को पवित्र भाव से एकाग्रचित्त होकर मां के शरण में जाना चाहिए। यह वैकुण्ठ प्राप्त करने का सरल एवं उत्तम साधन है।
संहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरंद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।।
‘ओं में र्चैओं में चै
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