कुशीनगर के नेबुआ नौरगिया पुलिस करे मनमानी, रपट में आनाकानी….

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उपेन्द्र कुशवाहा
पडरौना,कुशीनगर : नेबुआ नौरंगिया थाना में अपराध कैसे रुके जब पुलिस ही आम जनता की सुनती नहीं। चोरी, लूट, अपहरण,मारपीट या फिर छेड़छाड़ हो, पुलिस की बला से। वह तो अपने ढर्रे पर ही चलेगी। हाकिम का भी इनको डर नहीं है। आन लाइन जुआ और मोबाइल चोरी जैसी वारदात तो अपराध की श्रेणी में आता ही नहीं है। तभी तो वह इसकी रिपोर्ट नहीं लिखती है।
वादी पर पहले संदेह, फिर आगे की सोच
नेबुआ नौरंगिया पुलिस पहले वादी यानी मुकदमा लिखाने की तहरीर देने वाले को ही शक के दायरे में रखती है। एक नहीं बल्कि सौ सवाल पूछने के बाद ही प्रार्थनापत्र को हाथ लगाते हैं। छिनैती, चोरी होने की दशा में तो पीड़ित की मानों शामत ही आ जाती है। अजब-गजब सवालों का जवाब देते-देते वह खुद ही अवसाद ग्रस्त हो जाता है।
खुद ही लोग लिखाते हैं झूठी रिपोर्ट
नेबुआ नौरंगिया पुलिस का तर्क है कि अक्सर लोग तहरीर में बढ़ा-चढ़ाकर आरोप लगाते हैं। मसलन मारपीट हुई तो जेब से रुपये छीन लेने, जान से मारने की धमकी देने व छेड़छाड़ जैसी बातें अपनी तरफ से जोड़ देते हैं। यही हाल चोरी के मामलों में होता है। कई बार तो पारिवारिक विवाद के बीच चोरी जैसी घटना की झूठी कहानी गढ़ ली जाती है। विवेचना में ऐसे कई मामले सामने आते रहते हैं। यही वजह है कि सही व्यक्ति को भी रिपोर्ट लिखाने के लिए पूछताछ से होकर गुजरना पड़ जाता है।
आइटी से जुड़ी वारदात हो तो चुप रहने में भलाई
यहां अगर किसी की मोबाइल चोरी हो जाए या आन लाइन शापिंग के जरिए जालसाज एकाउंट खंगाल ले, पर अगर यह उम्मीद लगाई जाए कि पुलिस मदद करेगी तो यह आपकी भूल है। इस तरह के प्रकरण पुलिस भरसक कोशिश करके टाल देती है। बहुत जरूरी हुआ तो मुकदमा भी दर्ज कर लिया पर इसकी विवेचना टेढ़ी खीर साबित होती है। अब तक सामने आए आई एक्ट से जुडे़ किसी भी मामले में चार्जशीट तक पुलिस नहीं दाखिल कर पाई

क्या कहते हैं अधिकारी
एडीशनल एसपी की मानें तो पुलिस किसी भी मामले में हीलाहवाली नहीं करती बशर्ते प्रकरण सही हो। गलत होने पर भी तमाम लोग पुलिस पर दबाव बनाते हैं और कटघरे में खड़ा करते हैं। रही बात तहरीर बदलने की तो यह गंभीर मामला है। अगर ऐसी किसी शिकायत की जानकारी मिली तो कार्रवाई की जाएगी।
कुछ बहाने, जो अक्सर बनाती है पुलिस
– देखिए, अगर मुकदमा लिखवाना है तो तहरीर में छीन लेने, चोरी कर लेने जैसी बातें हटाइए।
– क्या करें, दबाव पड़ा तो मुकदमा लिख लिया, पर लगता नहीं कि कुछ हुआ है।
– नहीं भाई, ऐसा नहीं है। चोरी क्या, हम तो लूट, डकैती जो तहरीर दो, लिख देंगे।
– नहीं ऐसा नहीं हो सकता। कई बार लोग फोन का बीमा कराए रहते हैं और फोन पर जोर देते हैं। बात कुछ और रहती है।
– लोग तुरंत एफआइआर कराकर बीमा का अनुचित लाभ ले लेते हैं। ऐसा न हो इसके लिए पहले जाच फिर रिपोर्ट कराई जाती है।

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