रिपोर्ट:हर्ष यादव
मुसाफिरखाना।अमेठी जिले के मुख्यालय गौरीगंज से मुसाफिरखाना मार्ग पर 16 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह स्थान पौराणिक महत्त्व समेटे हुए है। यह यादवों का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। इस स्थान का प्रादुर्भाव कब हुआ इस विषय में कई मत प्रचलित हैं। वरिष्ठ नेता राम उदित के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम के साथ पौंड्रक नामक घमंडी राजा को मारने के लिए द्वारिका से काशी गए हुए थे। तब वसुदेव और नंदबाबा उनको खोजते हुए यहाँ आये थे। उस समय यहाँ घना जंगल था। पौंड्रक को मारकर श्रीकृष्ण बलराम के साथ द्वारिका वापस जा रहे थे, उस समय नन्दबाबा और वसुदेव से उनकी मुलाकात इसी स्थान पर हुई। सभी लोगों ने यहाँ तीन दिन तक विश्राम किया। उसी दौरान यहां एक यज्ञ का आयोजन भी किया गया। नंदबाबा ने भगवान की मूर्ति स्थापित करके उनकी पूजा की थी। श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव और नंदबाबा के चरणरज से यह स्थान पवित्र हो गया। यदुवंशियों के पूर्वज होने के कारण यह स्थान उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बन गया। तभी से लोग यहाँ अनवरत यज्ञ, हवन और पूजा करते आ रहे हैं। प्रभु की याद में धाम के पड़ोस में बसे तीन गांवों का नाम इस प्रकार है-हरि (श्रीकृष्ण) के नाम पर हरिकनपुर, वसुदेव के नाम पर बसयातपुर और नन्द के नाम पर नदियाँवा।नन्दबाबा ने जिस स्थान पर पूजा की थी, वहां पहले मिट्टी का चौरा (चबूतरा) था। किन्तु बाद में, सन 1956 ई. में , उस चौरे के स्थान पर मंदिर का निर्माण करावाया गया। उस मंदिर के भीतर मूर्तिकक्ष में प्रत्येक मंगलवार को गाय और भैंस का दूध चढ़ाये जाने की परंपरा है।
ऐसी मान्यता है कि गाय भैंस के बच्चा देने के बाद आगामी पांच मंगलवार यहाँ दूध चढाने से वह गाय भैंस स्वस्थ रहने के साथ बहुत दिनों तक अधिक दूध देती है। जाति-पाति का भेदभाव किये बिना सभी धर्मों और समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मंगलवार को यहाँ दूध चढाने आते है।मेले में क्षेत्र के मनीष यादव देवी शरण यादव गौरव अनिल यादव विजय यादव सुनील यादव प्रवीन यादव सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।
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