सती के एक पिंड में इतनी शक्ति है पर इस मंदिर में तो माता के पूरे 51 शक्तिपीठों का अंश मौजूद हैं

डेस्क। आपने माता के शक्ति पीठो की अलग-अलग कहानियां सुनी होगी और उनसे जुड़ी महिमा का भी बखान सुना ही होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं दुनिया में एक ऐसी जगह भी है जहां पर यह शक्तिपीठ पूरे होते हैं यानी विश्व में एक ऐसी जगह है जहां पर इन सभी शक्तिपीठों का अंश एक साथ देखने को मिलता है। 

किसने किया था इस मंदिर का निर्माण

मंदिर की वर्तमान अध्यक्ष तृप्ति तिवारी ने हमें बताया कि 1998 में उनके पिता स्वर्गीय रघुराज दीक्षित जी ने इस मंदिर का शिलान्यास किया था। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने अपने बेटे की स्मृति में इस मंदिर को बनवाया था। जब रघुराज दीक्षित जी अपने बेटे की अस्थियां लेकर हरिद्वार उन्हें विसर्जित करने गए तो उन्होंने मां से कहा कि आपने मेरा जीवन निराधार कर दिया है…अब मुझे भी नहीं जीना मुझे भी अपनी शरण में ले लो। जिसके बाद उन्हें किसी दैवीय शक्ति ने संकेत दिया कि अभी उनका जीवन ख़त्म नहीं हुआ। अभी उन्हें माता का एक बहुत ही विशेष कार्य पूरा करना है। उनको संकेत दिया गया कि उन्हें माता के 51 शक्तिपीठों में जाकर वहां से पवित्र मिट्टी लाकर एक जगह पर स्थापित करना है।

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मंदिर अध्यक्ष तृप्ति तिवारी के साथ जनसंदेश रिपोर्टर प्रियांशी सिंह

 

यह संकेत मिलते ही स्वर्गीय रघुराज दीक्षित जी ने अपनी गृह संपत्ति सब कुछ बेचकर माता के मंदिर के लिए जमीन खरीदी और 51 शक्तिपीठों पर जाकर वहां की पवित्र मिट्टी लेकर आए। तृप्ति तिवारी जी आगे बताती है कि इस मंदिर के शिलान्यास करते ही उन्हें कुछ करना ही नहीं पड़ा बस माता की कृपा होती गई और मंदिर की भव्यता एवं प्रसिद्धि कब बढ़ गई पता ही नहीं चला।

इस मंदिर में क्या है खास

सर्वप्रथम इस मंदिर में माता के 51 शक्ति पीठो का अंश मौजूद है साथ ही इस मंदिर में दुनिया का दूसरा स्फटिक का शिवलिंग और माता सती के दसों तांत्रिक विद्या रूप भी विराजमान है। 

क्या है माता के शक्तिपीठों की कहानी

51 शक्ति पीठ बनने के पीछे की जो पौराणिक कथा है उसके अनुसार महादेव की पहली पत्नी सती के पिता दक्ष प्रजापति ने कनखल (वर्तमान में हरिद्वार के नाम से जाना जाता) में ‘बृहस्पति सर्व’ नाम का एक महा यज्ञ करवाया। इस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया लेकिन भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। पितु मोह में पड़कर भगवान शिव की पत्नी जो कि दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं वह बिना आमंत्रित और महादेव के रोकने के बावजूद चली गईं। 
यज्ञ-स्थल पर पहुँचकर सती ने अपने पिता से उनके दामाद और देव आदि देव महादेव को आमंत्रित न करने की वजह पूछी इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव को अपशब्द कहे। जिसपर क्रोधित होकर माता सती ने स्व तेज से स्वयं के शरीर को भस्म कर दिया।
भगवान शिव को जैसे ही इसका अभास हुआ तो क्रोध की वजह से उनका तीसरा नेत्र खुल गया और तांडव करने लगे। भगवन शिव ने यज्ञ-स्थल पर पहुंच कर यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाला और कंधे पर उठा लिया। 
तब चारो ओर हाहाकार मच गया था सभी जीव जंतुओं नदियों पहाड़ और धरती पर विचरण करने वाले अन्य जीवों का विनाश होने लगा। ऐसा लगा था कि मानो पृथ्वी का अंत हो जाएगा। महादेव को देखकर सभी देव गण घबराकर भगवान विष्णु के पास गए तब विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल करके माता के शरीर को खंडित कर दिया उनका कहना था कि जब तक माता का शरीर भगवान शिव के पास रहेगा उनका क्रोध शांत नहीं होगा। उसके बाद माता का शरीर अलग-अलग स्थानों पर गिरा और हर अंग से माता के एक नए रूप का जन्म हुआ जो आज 51 शक्तिपीठो के नाम से जाना जाता है।

माता सती की हर पिंडी में अपार शक्ति है। और इस मंदिर (51 शक्तिपीठ मंदिर) में जहां माता के सभी रूप एकसाथ मौजूद है यहां एक विशेष तेज एवं ऊर्जा की अनुभूति होती है। नवरात्रि के दिनों में यहां भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है। कहते हैं जो भी भक्त यहां आता है माता कभी उन्हें खाली हाथ नहीं भेजतीं।

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