सुप्रीम कोर्ट का चौंकाने वाला बयान: काश पुरुषों को भी होता मासिक धर्म!
क्या आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले पर ऐसी प्रतिक्रिया दी है जिससे पूरा देश स्तब्ध है? एक महिला जज के साथ हुए अन्याय ने कोर्ट को इतना आहत किया कि जजों ने कहा, “काश पुरुषों को भी मासिक धर्म होता, तब उन्हें समझ आता कि एक महिला गर्भावस्था और गर्भपात से क्या गुजरती है!” यह मामला महिला जजों की बर्खास्तगी से जुड़ा है, जिसमें हाईकोर्ट ने उनकी गर्भावस्था और गर्भपात को अनदेखा कर दिया। आइए जानते हैं इस पूरे मामले की सच्चाई और सुप्रीम कोर्ट के इस विवादास्पद बयान के पीछे का कारण।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का विवादास्पद फैसला: महिला जजों की बर्खास्तगी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने छह महिला सिविल जजों को कथित रूप से असंतोषजनक प्रदर्शन के कारण बर्खास्त कर दिया। लेकिन क्या यह सच में असंतोषजनक प्रदर्शन था या इसके पीछे कुछ और ही वजह है? सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हाईकोर्ट ने महिला जजों के गर्भपात और उससे जुड़े शारीरिक और मानसिक कष्टों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। एक रिपोर्ट के अनुसार, एक जज के पास 1500 से ज्यादा लंबित मामले थे और उनका निपटान दर 200 से भी कम था। लेकिन क्या यह एक महिला की गर्भावस्था और गर्भपात के बाद उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किए बिना तय किया जा सकता है?
कोर्ट के फैसले पर उठे सवाल: क्या मातृत्व एक अपराध?
कोर्ट के इस फैसले ने कई सवाल खड़े किए हैं: क्या एक महिला की मातृत्व उसकी नौकरी की कुशलता का आकलन करने में बाधा बन सकती है? क्या मातृत्व अवकाश के दौरान की गई उत्पादकता की कमी, एक महिला की क्षमता को दर्शाती है या उसे कमतर आंकने का एक आधार है? क्या हाईकोर्ट ने न्याय के बजाय लैंगिक पक्षपात दिखाया?
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: काश पुरुषों को होता मासिक धर्म!
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले की कड़ी निंदा की है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस फैसले पर कहा कि “मुझे उम्मीद है कि पुरुष जजों पर भी ऐसे मानदंड लागू किए जाएंगे। मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है। महिला गर्भवती हो गई है और उसका गर्भपात हो गया है। गर्भपात से गुजरने वाली महिला का मानसिक और शारीरिक आघात। यह क्या है? हम चाहते हैं कि पुरुषों को मासिक धर्म हो। तब उन्हें पता चलेगा कि यह क्या है।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: महिलाओं के अधिकारों की रक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा है और साथ ही बर्खास्त की गई महिला जजों को न्याय दिलाने की कोशिश की है। इससे यह संदेश गया है कि सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कड़ा रुख अपनाने को तैयार है।
आगे क्या?
यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है और आगे क्या होता है, यह देखना दिलचस्प होगा। यह फैसला न सिर्फ महिला न्यायाधीशों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि यह देश भर में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी साबित हो सकता है। यह फैसला दिखाता है कि कार्यस्थल पर लैंगिक समानता और मातृत्व के मुद्दे पर अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
लंबित मामले और भविष्य के लिए चिंता
यह मामला कई सवालों के जवाब मांगता है: क्या सरकार कार्यस्थल में मातृत्व अवकाश को और अधिक अनुकूल बनाएगी? क्या भविष्य में इस तरह की घटनाएं नहीं होंगी? क्या महिलाओं के कार्यबल में बेहतर प्रतिनिधित्व और सहयोग सुनिश्चित किया जाएगा? इन सब सवालों का जवाब अब देश के सामने है।
टेक अवे पॉइंट्स
- सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले की कड़ी निंदा की है।
- हाईकोर्ट ने महिला जजों की बर्खास्तगी में गर्भावस्था और गर्भपात को अनदेखा किया।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को लैंगिक पक्षपात बताया है।
- यह मामला कार्यस्थल में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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