अयोध्या : ठाकरे कानून को हाथ में लेकर मंदिर बनाने का प्रयास करेंगे ?

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अयोध्या। विश्व हिन्दु परिषद, राष्ट्रीय स्वंय संघ और भाजपा राम मंदिर के मुद्दे पर एक फिर एकजुट होकर सुनियोजित तरीके से काम कर रही है। धर्म सभा के बहाने भले ही वर्ष 1992 जैसा महौल बनाए जाने की कोशिश हो रही हो लेकिन यह सम्भव नही है। सन् 1992 के दौरान जनता में जुनुन था लेकिन अब विश्व हिन्दु परिषद, राष्ट्रीय स्वंय संघ और भाजपा के लोग ही इसमें भागीदारी कर रहे है आम राम भक्त इस धर्मसभा से दूर है। इसके बावजूद जिस तरह से विश्व हिन्दु परिषद, राष्ट्रीय स्वंय संघ और भाजपा ने माहौल बनाया है उससे अल्पसंख्यक समुदाय भयभीत है। 
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संभावना इस बाॅत की जताई जा रही है कि कही माहौल 2002 में गुजरात में हुए दंगे की तर्ज पर भड़क न जाए। इस धर्म सभा में गरम और नरम दल के लोग पहुंच रहे है। पर्याप्तय फोर्स के बावजूद अगर स्थिति बिगड़ जाए तो कोई बड़ी बाॅत नही है। केवल संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक का कहना है कि राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को लेकर 90 के दशक में हुए आंदोलन और अब के हालात में बहुत अंतर है। 1992 में हुए बाबरी विध्वंस के पहले जनचेतना को तैयार करने में वर्षों लगे थे। अशोक सिंघल की अगुआई में रामरथ और राम ज्योति यात्रा समेत विभिन्न कार्यक्रमों के चलते बड़े पैमाने पर जनता को भावानात्मक रूप से जोड़ा गया था। इसलिए उस समय आंदोलन को संगठित रूप देना आसान था।
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दूसरे बाबरी विध्वंस के बाद भी जनमानस के मन में नीति या कार्यक्रम को लेकर कोई प्रश्न नहीं था। इसके पीछे कारण यह था कि उस समय राम मंदिर निर्माण को लेकर सामने कोई और विकल्प ही नहीं था। इसलिए कारसेवा को ही अंतिम विकल्प मान लिया गया था। अब स्थितियां दूसरी हैं। राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट से भी रास्ता निकलने की उम्मीद है। मोदी-योगी सरकार के सुर भी मंदिर के पक्ष में है। ऐसी स्थिति में अगर वहां कुछ भी श्अनापेक्षितश् होता है तो उसका संदेश अच्छा नहीं जाएगा।
सोशल मीडिया के दौर में उनका प्रसार रोकना भी संभव नहीं होगा। यही वजह है कि संघ ने अनुशासन की दृष्टि से वरिष्ठ स्वयंसेवकों को खास तौर पर लगाया है। नजर इस पर विशेष तौर पर रहेगी कि संघ से जुड़े संगठनों की अगुआई में आई भीड़ में अराजक लोग न शामिल हों। सभा के दौरान भी उत्तेजक घटनाक्रम या कोई भी शारीरिक प्रदर्शन जैसी स्थितियां न होने पाए। राम मंदिर को लेकर भाजपा के सबसे शक्तिशाली नेता और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मंदिर निर्माण को लेकर स्पष्ट कह चुके है कि भाजपा मंदिर निर्माण के लिए संकल्पबंद्ध है। देश की राजनीतिक पार्टियों का सबसे पसंदीदा मुद्दा बन चुका अयोध्या में राम मंदिर इन दिनों खास तौर पर राजनीति के परवान चढ़ रहा है। लोकसभा के चुनाव नजदीक आते ही इस मुद्दे पर सियासतें गरमाने लग जाती हैं। हर कोई खुद को राम भक्त साबित करने की लाइन में लग जाता है।
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सियासी बयान बाजियों का बाजार सजने लगता है। इसी तरह का माहौल इस वक्त बनता हुआ दिखाई दे रहा है। कभी मंदिर की चैखट पर कदम ना रखना वाले भी राम नाम के नारों के साथ मैदान नें दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा इस बात से एक ही प्रश्न हमारे जहन में आता है कि क्या हकीकत में मंदिर बनवाने की तैयारी हो रही है या फिर सियासी मैदान की रणनीति तैयार की जा रही है। भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह का ‘‘जरूरत पड़ने पर 1992यय दोहराने जैसे संकल्प न संघ को सुहा रहे हैं और न ही भाजपा को। संघ के सामने चुनौती यह भी है कि 90 की दशक की भाजपा और आज की भाजपा में काफी बदलाव हो चुका है।
आंदोलन में पर्दे के पीछे से जो विधायक, सांसद या दूसरे नेता लगे हैं, उनका जुड़ाव भावनात्मक होने से अधिक सियासी है। इसलिए वे सवाल उठा रहे हैं कि जब सब संसाधन हमें ही देने हैं तो इस आंदोलन को भाजपा ने अपने हाथ में क्यों नहीं लियाध् ऐसे में संघ को इन्हें भी समझाना पड़ा रहा है। वहीं, भाजपा और सरकार की चिंता यह है कि केंद्र और प्रदेश दोनों में ही सरकार होने के कारण अगर कानून-व्यवस्था को लेकर कोई दिक्कत पैदा होती है तो जनता, विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट तीनों को ही जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि हमारी सरकार अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए कटुबद्ध हैं।
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हम अपने वादे से इंच भर भी पीछे हटने वाले नहीं हैं। ये हमारा देश की जनता से वादा है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के सरताज योगी आदित्यनाथ ने कहा है संबैधानिक दायरे में रहकर मामले का हल हम लोग निकालेंगे। इस पर कांग्रेस ने भी सियासी पलटवार करने में देर नहीं की। उन्होंने कहा कि मंदिर बनाना बीजेपी पहले हमसे सीखे, उनका राम मंदिर से कोई लेना देना नहीं है। ये बस ये बस वोट बटोरने के लिए इस मुद्दे को भुनाना चाहते हैं। इन सब बातों के बीच दिलचस्प बात है कि महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ गठबंधन वाली पार्टी सिवसेना ने शिवाजी पार्क से अयोध्या के लिए राम मंदिर का मुद्दा साथ लेकर के कूच कर दिया है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे 25 नवंबर को अयोध्या आ रहे हैं।
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जिसके लिए जोरदार तैयारियां शुरु हो गयी हैं। काफी बड़ी संख्या में लोग जुट रहे हैं। संत समाज भी इसके लिए नजरे गड़ाए बैठा है। इसे एक बात तो साफ हो गई है कि मंदिर को लेकर लोगों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। भारतीय जनता पार्टी काफी लंबे समय से अयोध्या में राम मंदिर बनाने की बात कहती आ रही है। हालांकि फिलहाल शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे इस मामले में कूद कर बीजेपी पर भारी पड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इन सब बातों के बीच प्रश्न उठता है कि जब मामला सर्वोच्च अदालत में है तो ठाकरे कानून को हाथ में लेकर मंदिर बनाने का प्रयास करेंगे?

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