आठ राज्यों में हिंदुस्तानी होने की सजा काटता हिन्दू अल्पसंख्यक

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देश के आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की तैयारी कर रही है. 14 जून 2018 ये वो तारीख है जो देश के कई राज्यों में हिन्दुओं के हक की लड़ाई के इतिहास में दर्ज होने जा रही है और हो सकता है ऐतिहासिक सुधार की गवाह भी बने. इसी दिन हिन्दू अल्पसंख्यक राज्यों को लेकर बड़ी कार्यवाही कोर्ट में होगी जिसके लिए फिलहाल राष्ट्रिय अल्पसंख्यक आयोग के नियमों की विवेचना की जा रही ।

इस बैठक में मसले पर फैसला लिए जाने की संभावना है.। बताया जा रहा है कि बैठक के बाद अल्पसंख्यक आयोग केंद्र को सिफारिश भेजेगा. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सामने नवंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्वनी उपाध्याय ने एक अर्जी दायर कर इस मुद्दे को उठाया था।

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अश्विनी ने उदाहरण देते हुए कहा, श्भारत सरकार हर साल 20 हजार अल्पसंख्यकों को टेक्निकल एजुकेशन में स्कॉलरशिप देती है। यह स्कॉलरशिप इन आठ राज्यों में हिंदुओं को नहीं मिल पाती। जबकि जम्मू-कश्मीर में 68.30 फीसदी मुस्लिम हैं, वहां सरकार ने हाल में 753 में से 717 मुस्लिम स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप दी। इस राज्य में हिंदू स्टूडेंट्स मुस्लिमों से कहीं कम हैं, लेकिन उन्हें स्कॉलरशिप का लाभ नहीं मिला। दूसरी बात यह है कि लक्षद्वीप में मुस्लिम 96.20ः, असम में 34.30ः, वेस्ट बंगाल में 27.5ः और केरल में 26.6ः हैं। यहां उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है। फिर जिन राज्यों में हिंदू कम हैं, वहां उन्हें अल्पसंख्यक क्यों नहीं माना जाता?

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2011 में हुई जनगणना के मुताबिक- लक्षद्वीप में 2.5%, मिजोरम 2.75%, नगालैंड में 8.75%, मेघालय में 11.53%, जम्मू कश्मीर में 28.44%, अरुणाचल प्रदेश में 29%, मणिपुर में 31.39% और पंजाब में 38.4% हिंदू हैं। इन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं मिलने से उन्हें सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। इन आठ राज्यों में हिन्दू अल्पसख्यक है. इसके आलावा कई राज्यों में मुस्लिम और ईसाई बहुसख्यक होने के बावजूद अल्पसंख्यक का दर्जा लेकर तमाम सरकारी सुविधाएं और सहानुभूति बटोर रहे है. ऐसे में सवाल उठता है कि हिंदुस्तान में हिन्दू होने की सजा कब तक भुगतेगा हिन्दू.।

फिलहाल देश के 8 राज्य जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं.। इसे लेकर कई बार मांग उठाई गई है मगर सिर्फ वोट बैंक को खतरे में न डालते हुए हिन्दुओं के साथ यह कह कर अन्याय जारी है कि देश तो हिन्दुओं का है बाकि सब तो अल्पसंख्यक. बस यह जुमला हर पार्टी और सरकार ने रट रखा है, जिसका खामियाजा सालों से हिदुस्तान के हिन्दू उठा रहे है. आखिर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग दोहरी नीति के तहत कैसे काम कर रहा है और क्यों. क्यों सिर्फ जाती ही अल्पसंख्यक होने का मानक है जबकि परिभाषा तो संख्यात्मकता को लेकर बनाई गई है. कश्मीर में 68 फीसदी मुस्लिम आबादी अल्पसंख्यक कैसे है समझ से परे है. देश के कई राज्यों का हाल ऐसा ही है.।

केंद्र सरकार हर साल राज्य सरकारों को अल्पसंख्यकों की मदद के लिए करोड़ों रुपए की आर्थिक मदद देती है. मगर इसका लाभ देश के उन आठ राज्यों में नहीं मिल पा रहा है जहां वे सही मायनों में अल्पसंख्यक हैं.।

बहरहाल 14 जून को एक बड़ा फैसला होना है जिसमे एक देश और दो तरह के कानून की बहस होना है और इस सवाल का जवाब भी आना है कि सियासी सहानुभूति कि आड़ में हिंदुस्तान में हिन्दू होने की सजा कब तक सहेगा।

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