वृंदावन में विधवा महिलाओं ने दीपावली का जश्न मनाया: एक अनोखा उत्सव
यह दीपावली वृंदावन की विधवा महिलाओं के लिए बेहद खास रही। हजारों महिलाओं ने यमुना के घाट पर एक साथ दीप जलाकर पर्व मनाया। इस अनोखे उत्सव में शामिल होकर, हम इस समारोह के पीछे की कहानी और विधवा महिलाओं के जीवन में आशा की किरण को समझ सकते हैं।
परिवार से दूर, फिर भी साथ मिलकर
कई विधवा महिलाएँ अपने परिवारों से अलग-थलग जीवन जीने को मजबूर हैं। समाज के कई कटु नियमों के चलते उन्हें परिवारों से दूर रहना पड़ता है। लेकिन इस दीपावली ने उन्हें एक साथ लाकर दिखाया कि वे कभी अकेली नहीं हैं। विभिन्न राज्यों से आईं ये महिलाएँ यमुना के तट पर एक-दूसरे के साथ मिलकर इस पावन पर्व का आनंद उठा रही थीं। साड़ी पहने, रंग-बिरंगी रंगोलियों के साथ, उनका चेहरा उत्साह से खिल उठा था। 70 साल की छवि दासी, जो पश्चिम बंगाल से हैं, ने कहा, “यह दिवाली मुझे मेरे बचपन और शादी के दिनों की याद दिला रही है, जब मैं बिना किसी रोक-टोक के यह त्योहार मनाती थी।”
एक साथ मनाई गई दीपावली
69 वर्षीय रतामी कहती हैं, “मुझे कभी नहीं लगा था कि मैं फिर कभी दिवाली मना पाऊंगी।” 74 वर्षीय पुष्पा अधिकारी और 60 वर्षीय अशोका रानी भी इस पर्व में शामिल होकर बेहद खुश नजर आईं। सुलभ होप फाउंडेशन ने इन महिलाओं के लिए ये खास आयोजन किया था।
विधवाओं के प्रति समाज का नकारात्मक रवैया
सुलभ होप फाउंडेशन की उपाध्यक्ष विनीता वर्मा ने हिंदू समाज की उस सोच पर चिंता जताई, जिसमें विधवाओं को अशुभ माना जाता रहा है। उन्होंने कहा, “उन्हें हमेशा ही नीचा दिखाया गया, और उन्हें परिवार से अलग करके वृंदावन, वाराणसी या हरिद्वार जैसे स्थानों पर भीख माँगकर जीवन बिताने के लिए मजबूर किया गया।”
एनजीओ का प्रयास: विधवाओं को सम्मान दिलाना
इस भेदभाव के विरुद्ध एनजीओ का प्रयास सराहनीय है। विनीता वर्मा के मुताबिक, एनजीओ के संस्थापक स्वर्गीय बिंदेश्वर पाठक ने 12 साल पहले से ही होली और दीपावली मनाने की पहल शुरू की थी। यह निरंतर प्रयास विधवा महिलाओं को उनके सम्मान और अधिकारों के प्रति जागरूक करने में अहम भूमिका निभा रहा है।
आशा की एक किरण
वृंदावन में रहने वाली हजारों विधवा महिलाएँ, जिनमें से ज्यादातर बंगाल से हैं, अब सालों बाद दीपावली का त्यौहार साथ मिलकर मना रही हैं। सुलभ होप फाउंडेशन की ओर से दिया गया यह सम्मान और साथ मिलकर मनाया गया उत्सव उनकी ज़िंदगी में आशा की एक नई किरण बनकर उभरा है। यह हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम समाज में ऐसे कटु रूढ़िवादी नियमों को स्वीकार करना जारी रखेंगे जो विधवा महिलाओं के जीवन को नारकीय बना देते हैं?
आगे बढ़ने का समय
हमें सबको मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है ताकि विधवाओं को सामाजिक मान्यता और सम्मान मिले और समाज में उनका स्थान पुनः सुनिश्चित हो। आइए, उनके जीवन में सुख और शांति लाने में अपना योगदान दें।
टेक अवे पॉइंट्स
- वृंदावन में हजारों विधवा महिलाओं ने एक साथ दीपावली का जश्न मनाया।
- सुलभ होप फाउंडेशन के प्रयास से यह संभव हुआ।
- विधवा महिलाओं को समाज में सम्मान दिलाने की आवश्यकता है।
- यह आयोजन विधवाओं के जीवन में आशा की किरण बनकर उभरा है।

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