चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में उत्तर पुस्तिकाएं बदलने के बड़े खेल का खुलासा हुआ है। सामने आया है कि चार सालों में लगभग 600 नाकाबिल अभ्यर्थी एमबीबीएस की कॉपियां बदलवाकर डॉक्टर बन गए। एसटीएफ ने पूरे मामले का भंडाफोड़ करते हुए विवि के तीन कर्मचारियों समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है।
जिनकी उत्तर पुस्तिकाएं भी मेरठ विवि में ही रखी जाती हैं। इसके अलावा सहारनपुर मेडिकल कालेज में भी सौ सीटें हैं पर इस कालेज का बैच अभी नहीं निकला है।।
कॉपियां बदलवाने के खेल का एसटीएफ ने शनिवार को खुलासा कर दिया। एसटीएफ के एसपी आलोक प्रियदर्शी और सीओ एसटीएफ बृजेश सिंह के मुताबिक करोड़ों रुपये का खेल करने वाले इस गिरोह के तार यूनिवर्सिटी के अधिकारियों तक जुड़े हो सकते हैं तथा इनका नेटवर्क यूपी, हरियाणा व दिल्ली समेत कई राज्यों तक फैला है। शनिवार को पुलिस लाइन में आयोजित प्रेसवार्ता में चारों आरोपियों को मीडिया के सामने पेश किया।
अधिकारियों ने बताया है कि सीसीएसयू में कॉलेज व इंस्टीट्यूट में होने वाली परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाएं रखी होती थीं। उत्तर पुस्तिका अनुभाग इंचार्ज पवन से साठगांठ कर यह गिरोह उत्तर पुस्तिकाएं बदलते थे। स्नातक और परास्नातक के साथ साथ पिछले चार सालों से यह गिरोह एमबीबीएस और एलएलबी की उत्तर पुस्तिकाएं बदलने का धंधा चला रहे थे।
एसटीएफ मेरठ ने शुक्रवार की रात गढ़ रोड पर दुर्गापुरम, मेडिकल में छापा मारा। जहां से एक छात्रनेता कविराज निवासी शाहपुर श्योहारा बिजनौर को गिरफ्तार किया। उसके कमरे से मेडिकल कॉलेज बेगराज मंसूरपुर, मुजफ्फरनगर की एमबीबीएस द्वितीय वर्ष की परीक्षा की लिखी हुई दो उत्तर पुस्तिकाएं मिलीं। पूछताछ में कविराज ने बताया कि उत्तर पुस्तिकाएं बदलने में यूनिवर्सिटी के तीन कर्मचारी पवन कुमार, कपिल और संदीप शामिल हैं। इन तीनों आरोपियों को भी पकड़ लिया गया।
सीओ बृजेश सिंह के मुताबिक आरोपी कविराज ने बताया कि 1.20 लाख से 1.50 लाख रुपये में एक उत्तर कॉपी बदलने का सौदा होता था। 10 हजार रुपये यूनिवर्सिटी में संविदा कर्मचारी कपिल को जाते थे जो यूनिवर्सिटी की खाली उत्तर पुस्तिकाएं लाकर देता था। 35 से 65 हजार रुपये पवन, कपिल को जाते थे।
पवन यूनिवर्सिटी का स्थायी कर्मचारी था, जोकि परीक्षा उत्तर पुस्तिका अनुभाग में तैनात था। कपिल संविदा कर्मचारी था। पवन व कपिल उत्तर पुस्तिकाओं का ऊपर का पेज छोड़कर अंदर की कॉपी हटाकर दूसरी कॉपियां लगाते थे। अभ्यर्थी द्वारा दी कॉपी फिर पुरानी उत्तर पुस्तिकाएं में पंच होकर अंदर रखी जाती थीं। वहीं, स्नातक और परास्नातक की कॉपी 10 से 20 हजार में बदली जाती थीं।
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