ये खाकी वर्दी इस युवक के लिए किसी फरिस्ते से कम नहीं थी, पढ़िये पूरी रिपोर्ट

ऐसे तो लोग पुलिस को हमेशा कोसते रहते हैं। लेकिन यहां कुछ इस तरह से मामला बना कि इस युवक घर वाले इस इंस्पेक्टर को फरिश्ते मानने लगे। संजय कुमार वैसे तो पुलिस इंस्पेक्टर हैं लेकिन राजू के परिवार के लिए वो किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं.। शनिवार की शाम संजय रोज की तरह बाड़ा हिंदू राव के पुलिस थाने में बैठे थे जब छह बजे के लगभग पीसीआर से एक फोन आया. पता चला कि उनके इलाके में 20-21 साल के एक युवक ने आत्महत्या कर ली है. संजय ने फौरन वहां कुछ पुलिसकर्मियों और एंबुलेंस को भेजा. कुछ मिनट बाद फिर फोन आया कि युवक मर चुका है और उसे पोस्टमॉर्टम के लिए मुर्दाघर ले जाया जा रहा है।
संजय ने कहा कि वह खघ्ुद घटनास्थल पर पहुंच रहे हैं और उनके वहां पहुंचने तक वो कहीं न जाएं. वो बताते हैं, ष्मैं जब पहुंचा तो 40-50 लोग वहां पहले से इकट्ठे हो चुके थे. मैंने देखा कि एक दुबला-पतला शखघ््स बेडशीट को अपने गले से लपेटे पंखे से लटका हुआ है. संजय ने बताया कि पंखे की तीनों ब्लेड झुक गए थे और लड़के के पांव जमीन पर झूल रहे थे. उन्होंने पूछा तो पता चला कि किसी ने ये चेक ही नहीं किया था युवक वाकई मर चुका है या नहीं. चूंकि उसने फांसी लगाई थी इसलिए लोगों ने उसे मरा मान लिया.
उन्होंने कहा, मैंने जब देखा कि लड़के के पैर जमीन छू रहे थे तभी मुझे लगा कि वो मरा नहीं है. हमें ट्रेनिंग में बताया जाता है कि अगर फांसी के दौरान पैरों को कोई सपोर्ट न मिले तो मौत होनी तय है क्योंकि उससे गर्दन के पिछले हिस्से की हड्डी टूट जाती है.श्
संजय ने आगे कहा, ष्लेकिन इस मामले में लड़के के पैरों को जमीन का सहारा मिल गया था इसलिए मुझे उसके मरने पर शकथा. मैंने तुरंत उसे पंखे से उतरवाया और उसके गले से फंदा खोला. राजू ने गले के चारों तरफ चादर को तेजी से कस रखा था इसलिए उन्हें गांठ खोलने में एक-दो मिनट का वक्त लग गया. संजय के मुताबिक, ष्गांठ खोलते ही मैंने उसकी नब्ज चेक की. नब्ज चल रही थी…बहुत धीरे-धीरे. लेकिन चल रही थी.।
उन्होंने युवक को तुंरत पास के अस्पताल में भेजा. सात बजे तक राजू डॉक्टरों की देखरेख में था. वो बताते हैं, ष्आठ बजे के लगभग मैंने अस्पताल में फोन किया और पता चला कि वो खघ्तरे से बाहर है. डॉक्टरों का कहना था कि अगर उसे जल्दी अस्पताल न लाया जाता तो वो निश्चित तौर पर मर जाता।
एक दिन तक अस्पताल में रहने के बाद राजू घर लौट आया. वो जिंदा है और बिल्कुल ठीक भी. अगर संजय ने सही वकघ््त पर सही फैसला न किया होता तो? तो राजू को मुर्दाघर पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाया जाता. वहां उसे कपड़े में लपेटकर रात भर फ्रीजर में रखा जाता जहां उसका मरना तय था।
इंस्पेक्टर संजय कुमार के रौबदार चेहरे पर किसी की जिंदगी बचाने की संतोष साफ देखा जा सकता है. वो विनम्रता से मुस्कुराते हुए कहते हैं, ष्मैंने बस वही किया जो एक पुलिसवाले का काम है. मैंने कुछ भी अलग या एक्स्ट्रा नहीं किया. जान बचाने वाला तो भगवान है.। राजू के पिता का कहना है कि उसे नशे की लत है और इसलिए उसे कई बार डांट-डपट दिया जाता है. इसी से नाराज होकर उसने ऐसा कदम उठाया
संजय इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि लोगों के मन में आमतौर पर पुलिस की नकारात्मक छवि होती है. उन्होंने कहा, ष्मैं वर्दी में सब्जी खरीदने से भी कतराता हूं. लोगों को लगता है कि पुलिसवाला है तो मुफ्त मे वसूली कर रहा होगा. मैं इस बात को महसूस करता हूं. वो कहते हैं, पुलिस की नौकरी में लोगों की मदद करने के कई मौके आते हैं. मुझे खुशी है कि मुझे किसी की जिंदगी बचाने का मौका मिला।

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